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शनिवार, 21 अप्रैल 2012

अहिंसा की गंगोत्री



अक्सर लोगों द्वारा दुर्भावनाओं के वशीभूत, हिन्दुत्व पर हिंसक और माँसाहारी होने के आरोपण किए जाते है। किन्तु हिन्दुत्व अपने आदि-काल से ही अहिंसा प्रधान धर्म रहा है।अहिंसा परमो धर्मः ही इसका आदि-अनादि परम् उपदेश उपदेश रहा है। उतरोत्तर निम्न काल  प्रभाव से कुछ विकृतियों का पनपना सामान्य है पर इस दर्शन की यह विशेषता है कि सिद्धांतो को प्रमुखता देकर यह स्व-सुधार में सक्षम है। जैसे गंगा अपने उद्भव पर परम शुद्ध रहते हुए अपने परिचालन मार्ग में अस्वच्छ हो जाती है। किन्तु इसका जल अपनी पावनता सुरक्षित रखता है। उसी तरह वैदिक धर्म के मूल सिद्धान्त  पावन और प्रवर्तमान रहते है। यही अहिंसा का मूल  सिद्धांत वेद-उपदेशों में ग्रंथित है।  अर्थात अहिंसा गुण ही वेदों की गंगोत्री है। देखें परम् पवित्र वेदों से प्रवाहित अहिंसा की गंगोत्री……

अहिंसा को पुष्ठ करते वेदमंत्र और शास्त्र श्रलोक :-----

ऋग्वेद- 

 अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वत: परि भूरसि स इद देवेषु गच्छति (ऋग्वेद- 1:1:4)

 -हे दैदीप्यमान प्रभु ! आप के द्वारा व्याप्त ‘हिंसा रहित’ यज्ञ सभी के लिए लाभप्रद दिव्य गुणों से युक्त है तथा विद्वान मनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है |

ऋग्वेद संहिता के पहले ही मण्डल के प्रथम सुक्त के चौथे ही मंत्र में यह साफ साफ कह दिया गया है कि यज्ञ हिंसा रहित ही हों। ऋग्वेद में सर्वत्र यज्ञ को हिंसा रहित कहा गया है इसी तरह अन्य तीनों वेदों में भी अहिंसा वर्णित हैं | फिर यह कैसे माना जा सकता है कि वेदों में हिंसा या पशु वध की आज्ञा है ?

अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय (ऋग्वेद- 1:164:26)

 -अघ्न्या गौ- हमारे लिये आरोग्य एवं सौभाग्य लाती हैं |

सूयवसाद भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम 
अद्धि तर्णमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती (ऋग्वेद 1:164:40)

-अघ्न्या गौ- जो किसी भी अवस्था में नहीं मारने योग्य हैं, हरी घास और शुद्ध जल के सेवन से स्वस्थ रहें जिससे कि हम उत्तम सद् गुण,ज्ञान और ऐश्वर्य से युक्त हों।

सुप्रपाणं भवत्वघ्न्याभ्य: (ऋग्वेद- 5:83:8)

-अघ्न्या गौ के लिए शुद्ध जल अति उत्तमता से उपलब्ध हो |

क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः । 
एहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन ।। (ऋग्वेद- 7:6:21:9)

-"मैं मांस भक्षी या जलाने वाली अग्नि को दूर हटाता हूँ, यह पाप का भार ढोने वाली है ; अतः यमराज के घर में जाए. इससे भिन्न जो यह दूसरे पवित्र और सर्वज्ञ अग्निदेव है, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ. ये इस शक्तिशाली हविष्य को देवताओं के समीप पहुँचायें ; क्योंकि ये सब देवताओं को जानने वाले है."

आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु (ऋग्वेद 7:56:17)

-ऋग्वेद गौ- हत्या को जघन्य अपराध घोषित करते हुए मनुष्य हत्या के तुल्य मानता है और ऐसा महापाप करने वाले के लिये दण्ड का विधान करता है |

वैदिक कोष निघण्टु में गौ या गाय के पर्यायवाची शब्दों में अघ्न्या, अहि- और अदिति का भी समावेश है। निघण्टु के भाष्यकार यास्क इनकी व्याख्या में कहते हैं -अघ्न्या – जिसे कभी न मारना चाहिए। अहि – जिसका कदापि वध नहीं होना चाहिए | अदिति – जिसके खंड नहीं करने चाहिए। इन तीन शब्दों से यह भलीभांति विदित होता है कि गाय को किसी भी प्रकार से पीड़ित नहीं करना चाहिए । प्राय: वेदों में गाय इन्हीं नामों से पुकारी गई है।

घृतं वा यदि वा तैलं, विप्रोनाद्यान्नखस्थितम ! 
यमस्तदशुचि प्राह, तुल्यं गोमासभक्षण: !! 
माता रूद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि: ! 
प्र नु वोचं चिकितुपे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट !! (ऋग्वेद- 8:101:15)

अर्थात- रूद्र ब्रह्मचारियों की माता, वसु ब्रह्मचारियों के लिए दुहिता के समान प्रिय, आदित्य ब्रह्मचारियों के लिए बहिन के समान स्नेहशील, दुग्धरूप अमृत के केन्द्र इस (अनागम) निर्दोष (अदितिम) अखंडनीया (गाम) गौ को (मा वधिष्ट) कभी मत मार. ऎसा मैं (चिकितेषु जनाय) प्रत्येक विचारशील मनुष्य के लिए (प्रनुवोचम) उपदेश करता हूँ.

यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः 
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च (ऋग्वेद-10:87:16)

-मनुष्य, अश्व या अन्य पशुओं के मांस से पेट भरने वाले तथा दूध देने वाली अघ्न्या गायों का विनाश करने वालों को कठोरतम दण्ड देना चाहिए |

ऋग्वेद के ६ वें मंडल का सम्पूर्ण २८ वां सूक्त गाय की महिमा बखान रहा है –

१.आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु

-प्रत्येक जन यह सुनिश्चित करें कि गौएँ यातनाओं से दूर तथा स्वस्थ रहें |

२.भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने

-गाय की देख-भाल करने वाले को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है |

३.न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति

-गाय पर शत्रु भी शस्त्र का प्रयोग न करें |

४. न ता अर्वा रेनुककाटो अश्नुते न संस्कृत्रमुप यन्ति ता अभि

-कोइ भी गाय का वध न करे |

५.गावो भगो गाव इन्द्रो मे अच्छन्

-गाय बल और समृद्धि लातीं हैं |

६. यूयं गावो मेदयथा

-गाय यदि स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगी तो पुरुष और स्त्रियाँ भी निरोग और समृद्ध होंगे |

७. मा वः स्तेन ईशत माघशंस:

-गाय हरी घास और शुद्ध जल क सेवन करें | वे मारी न जाएं और हमारे लिए समृद्धि लायें |

अथर्ववेद-

वत्सं जातमिवाघ्न्या (अथर्ववेद- 3:30:1)

-आपस में उसी प्रकार प्रेम करो, जैसे अघ्न्या – कभी न मारने योग्य गाय – अपने बछड़े से करती है |

ब्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम् एष वां भागो निहितो 
रत्नधेयाय दान्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च (अथर्ववेद- 6:140:2)

-हे दंतपंक्तियों! चावल, जौ, उड़द और तिल खाओ। यह अनाज तुम्हारे लिए ही बनाये गए हैं| उन्हें मत मारो जो माता–पिता बनने की योग्यता रखते हैं|

शिवौ ते स्तां ब्रीहीयवावबलासावदोमधौ ! 
एतौ यक्ष्मं विबाधेते एतौ मुण्चतौ अंहस: !! (अथर्ववेद- 8:2:18)

-हे मनुष्य ! तेरे लिए चावल, जौं आदि धान्य कल्याणकारी हैं. ये रोगों को दूर करते हैं और सात्विक होने के कारण पाप वासना से दूर रखते हैं.

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: ! 
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अनागोहत्या वै भीमा कृत्ये मा नो गामश्वं पुरुषं वधीः (अथर्ववेद-10:1:29)

-निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है | हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार |

धेनुं सदनं रयीणाम् (अथर्ववेद- 11:1:4)

-गाय सभी ऐश्वर्यों का उद्गम है |

"मा हिंस्यात सर्व भूतानि "

-किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे.

पुष्टिं पशुनां परिजग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम ! 
पय: पशुनां रसमोषधीनां बृहस्पति: सविता मे नियच्छात !! (अथर्ववेद- 19:31:5)

इस मन्त्र में भी यही कहा है कि- मैं पशुओं की पुष्टि वा शक्ति को अपने अन्दर ग्रहण करता हूं और धान्य का सेवन करता हूँ. सर्वोत्पादक ज्ञानदायक परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बनाया है कि (पशुनां पय:) गौ, बकरी आदि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण किया जाये न कि मांस तथा औषधियों के रस का आरोग्य के लिए सेवन किया जाए. यहां भी "पशुनां पयइति बृहस्पति: मे नियच्छात:" अर्थात- ज्ञानप्रद परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बना दिया है कि मैं गवादि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण करूँ, स्पष्टतया मांसनिषेधक है !

यजुर्वेद-

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

पशूंस्त्रायेथां (यजुर्वेद- 6:11)

-पशुओं का पालन करो |

ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे (यजुर्वेद-11:83)

-सभी दो पाए और चौपाए प्राणियों को बल और पोषण प्राप्त हो |

विमुच्यध्वमघ्न्या देवयाना अगन्म (यजुर्वेद-12:73)

-अघ्न्या गाय और बैल तुम्हें समृद्धि प्रदान करते हैं |

घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ने मा हिंसी: (यजुर्वेद-13:49)

-सदा ही रक्षा के पात्र गाय और बैल को मत मार |

द्विपादव चतुष्पात् पाहि (यजुर्वेद-14:8)

-हे मनुष्य ! दो पैर वाले की रक्षा कर और चार पैर वाले की भी रक्षा कर |

अन्तकाय गोघातं (यजुर्वेद-30:18)

-गौ हत्यारों का अंत हो |

यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत: 
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत: (यजुर्वेद- 40:7)

-जो सभी भूतों में अपनी ही आत्मा को देखते हैं, उन्हें कहीं पर भी शोक या मोह नहीं रह जाता क्योंकि वे उनके साथ अपनेपन की अनुभूति करते हैं | जो आत्मा के नष्ट न होने में और पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों, वे कैसे यज्ञों में पशुओं का वध करने की सोच भी सकते हैं ? वे तो अपने पिछले दिनों के प्रिय और निकटस्थ लोगों को उन जिन्दा प्राणियों में देखते हैं |

वेदों में पशुओं की हत्या का विरोध तो है ही बल्कि गौ- हत्या पर तो तीव्र आपत्ति करते हुए उसे निषिद्ध माना गया है | यजुर्वेद में गाय को जीवनदायी पोषण दाता मानते हुए गौ हत्या को वर्जित किया गया है |

महाभारत ---

अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो तपः। 
अहिंसा परमो सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो दमः। 
अहिंसा परम दानं, अहिंसा परम तपः॥ 
अहिंसा परम यज्ञः अहिंसा परमो फलम्‌। 
अहिंसा परमं मित्रः अहिंसा परमं सुखम्‌॥ (महाभारत/अनुशासन पर्व-115:23/116:28,29)

"अहिंसा सकलो धर्मः।" (अनुशासन पर्व- महाभारत) 
भावार्थ:- सभी प्रकार की धार्मिक और सात्विक प्रवृत्तियों का समावेश केवल अहिंसा में हो जाता है।


अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान्मतो मम । 
अनृतं वा वदेद्वाचं न हिंस्यात्कथं च न ॥ (कर्णपर्व-69:23)

-मैं प्राणियों को न मारना ही सबसे उत्तम मानता हूँ । झूठ चाहे बोल दे, पर किसी की हिंसा न करे ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् । 
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

मनुस्मृति में माँसाहार निषेध-

यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च ।
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन ॥ (मनुस्मृति- 5:47)

-ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित ।
न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत् ॥ (मनुस्मृति- 5:48)

-किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है इसलिए यह निश्चित है कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों को मांस भक्षण वर्जित करना चाहिए।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । 
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

अर्थ - अनुमति = मारने की आज्ञा देने, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिए लेने और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले - ये आठों प्रकार के मनुष्य घातक, हिंसक अर्थात् ये सब एक समान पापी हैं

मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद् म्यहम्। 
एतत्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ (मनुस्मृति- 5:55)

अर्थ – जिस प्राणी को हे मनुष्य तूं इस जीवन में खायेगा, अगामी जीवन मे वह प्राणी तुझे खायेगा।

"अहिंसया च भूतानानमृतत्वाय कल्पते।" (मनु-स्मृति) 
भावार्थ:- अहिंसा के फल स्वरूप, प्राणियों को अमरत्व पद की प्राप्ति होती है।

अन्य ग्रंथ-

"अहिंसा परमं दानम्।" (पद्म-पुराण) 
 भावार्थ:- अहिंसा स्वरूप अभयदान ही परम दान है। 

"अहिंसा परमं तपः।" (योग-वशिष्ट) 
 भावार्थ:- अहिंसा ही सबसे बड़ी तपस्या है। 

"अहिंसा परमं ज्ञानम्।" (भागवत-स्कंध) 
 भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। 

"अहिंसा परमं पदम्।" (भागवत-स्कंध) 
भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वोत्तम आत्मविकास अवस्था है। 

"अहिंसा परमं ध्यानम्।" (योग-वशिष्ट) 
भावार्थ:- अहिंसा की परिपालना ही उत्कृष्ट ध्यान है।

"अहिंसैव हि संसारमरावमृतसारणिः।" (योग-शास्त्र) 
भावार्थ:- अहिंसा ही संसार रूप मरूस्थल में अमृत का मधुर झरना है। 

"रूपमारोग्यमैश्वर्यमहिंसाफलमश्नुते।" (बृहस्पति स्मृति) 
भावार्थ:- सौन्दर्य, नीरोगता एवं ऐश्वर्य सभी अहिंसा के फल है। 


"ये न हिंसन्ति भूतानि शुद्धात्मानो दयापराः।" (वराह-पुराण) 
भावार्थ:- जो प्राण-भूत जीवों की हिंसा नहीं करते, वे ही आत्माएं पवित्र और दयावान है।

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

यज्ञ हो तो हिंसा कैसे ।। वेद विशेष ।।


वेद  का अर्थ ज्ञान होता है. वेद को ज्ञान का सर्वोच्च शिखर भी कहा जाता है . और ज्ञान ही ब्रह्म का स्वरुप है. इस तरह वेद और परमात्मा भिन्न नहीं है . और परमात्मा के लिए उपनिषद कहतें है ----
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
                                                   पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते।।

जैसे ब्रह्म अनवद्य और अनामय है, वैसे ही वेद भी है; अतः वेद में कोई ऐसी बात नहीं हो सकती जो मनुष्य के लिए परम कल्याणमयी न हो. जब ब्रह्म ही शांत और शिवरूप है तब उसी का ज्ञान वेद अशिवरूप कैसे हो सकता है

कोई भी सामान्य विचारशील आदमी भी विवेक का उपयोग करे तो उसे जीव हिंसा अनुचित लगने लगती है . यहाँ तक की मांसाहारी लोग भी अगर पशुओं को निर्ममतापूर्वक काटे जाते हुए देख लें तो शायद ज्यादातर मांसाहारी जो की परंपरा से मांसाहारी नहीं है मांसाहार करना छोड़ दें. सामान्य संवेदना भी जिसमें है वह भावनाशील व्यक्ति भी किसी की हिंसा करना तो दूर रहा उसे देखना भी पसंद नहीं कर सकता. ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि सामान्य भावशीलता के रहते जो कर्म अनुचित लगता है, उस कर्म का समर्थन,  उद्दात्त और स्वाभाव से ही प्राणिमात्र के कल्याण की कामना करने वाली भारतीय संस्कृति के आधार-ग्रंथों में किस प्रकार हो सकता है.

बहुत से मतवादी लोग वेद पर आक्षेप लागतें है कि वेदों में यज्ञ के लिए पशुहिंसा की विधि है. कहने की आवश्यकता नहीं कि गीता अध्याय सोलह में वर्णित प्रकृति के लोग ही मांस और अश्लीलता के सेवक होते है. और अधिकांशतया ऐसे ही लोगों ने अर्थ का अनर्थ करके वेदों के विषय में अपने सत्यानाशी मत का प्रचलन किया है.

यहाँ  यह भी उतना ही सत्य है कि कुछ परम आदरणीय आचार्यों और महानुभावों ने भी किन्ही किन्ही शब्दों का मांस-परक अर्थ किया है. इसका सबसे प्रधान कारण यह है कि उनमें से अधिकाँश परमार्थवादी साधक थे. गूढ़ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयों पर विशेष द्रष्टि रखकर उनका विषद अर्थ करने पर उनका जितना ध्यान था, उतना लौकिक विषयों पर नहीं था. इसलिए उन्होंने ऐसे विषयों का वही अर्थ लिख दिया है जो देश की परिस्थिति विशेष में उस समय अधिकाँश में प्रचलित था.

लेकिन इसका मतलब बिलकुल भी यह नहीं है कि वेद में यह अनाचार निर्दिष्ट है. कारण वही कि वेद साक्षात ब्रह्म का  स्वरुप होने से पूर्ण है तथा उनको समझने का प्रयत्न करने वाला जीव अपूर्ण तथा अल्पज्ञ .

वेद की पूर्णता का ज्ञान इस हानिकर तथ्य से भी होता है कि असुर प्रकृति के वैचारिक भी अपने मत के स्थापन के लिए वेद को ही प्रमाण बतलातें है और प्रथम द्रष्टतया यह प्रमाणिक भी भासता है.

पर ऋषियों ने वेदार्थ को समझने के लिए कुछ पदत्तियाँ निश्चित की हैं; उन्हीके हिसाब से चलकर ही हमें श्रद्धापूर्वक  वेदार्थ को समझने की साधना करनी चाहिये 

देवसंस्कृति के मर्मज्ञ ऋषियों ने इसी कारण से वेदाध्ययन करने वालों के लिए दो तत्व अनिवार्य बताए हैंश्रद्धा एवं साधना. श्रद्धा की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि आलंकारिक भाषा में कहे गए रूपकों के प्रतिमानशाश्वत सत्यों को पढ़कर बुद्धि भ्रमित न हो जाय. साधना इस कारण आवश्यक है कि श्रवण-मनन-निदिध्यासन की परिधि से भू ऊपर उठकर मन ‘‘अनन्तं निर्विकल्पम्’’ की विकसित स्थिति में जाकर इन सत्यों का स्वयं साक्षात्कार कर सके.  मंत्रों का गुह्यार्थ तभी जाना जा सकता है.

ऋग्वेद में लिखा है -- ' यज्ञेन वाचं पदवीयमानम्' अर्थात समस्त वेदवाणी यज्ञ के  द्वारा ही स्थान पाती है.  अतः वेद का जो भी अर्थ किया जाये, वह यज्ञ में कहीं-न-कहीं अवश्य उपयुक्त होता हो- यह ध्यान रखना आवश्यक है.  वेदार्थ के औचित्य की दूसरी कसौटी है --- 
'बुद्धिपूर्वा वाक्प्रकृतिर्वेदे' (वैशेषिकदर्शन) 
अर्थात वेदवाणी की प्रकृति बुद्धिपूर्वक है. वेदमंत्र का अपना किया हुआ अर्थ बुद्धि के विपरीत न हो - बुद्धि में बैठने योग्य हो, इस बात पर भी ध्यान रखने की जरुरत है. साथ ही यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हमने जो अर्थ किया है, वह तर्क से सिद्ध होता है या नहीं.  स्म्रतिकार भी कहतें है - ''यस्तर्केणानुसन्ध्त्ते स धर्मं वेद नापरः'
' जो तर्क से वेदार्थ का अनुसंधान करता है, वही धर्म को जानता है, दूसरा नहीं'    अतः समुचित तर्क से समीक्षा करना वेदार्थ के परिक्षण का तीसरा मार्ग है.

चौथी रीति यह है कि इस बात पर नज़र रखी जाए कि हमारा किया हुआ अर्थ शब्द के मूलधातु के उलट तो नहीं है; क्योंकि निरुक्तकार ने धातुज अर्थ को ही ग्रहण किया है . इन चारों हेतुओं को सामने रखकर यदि वेदार्थ पर विचार किया जाये तो भ्रम कि संभावना नहीं रहती है ऐसा महापुरषों ने निर्देशित किया है.

संस्कृत भाषा की वैदिक और लौकिक इन दो शाखाओं में से वेद की भाषा प्रथम शाखा के अंतर्गत है.
वेद कि भाषा अलौकिक है और इसके शब्दरूपों में लौकिक संस्कृत से पर्याप्त अंतर है. इसलिए वेदों में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ में अनेक भ्रांतियां भी है.

वैदिक शब्दों के गूढ़ अर्थों के स्पस्थिकरण के लिए 'निघंटु' नाम के वैदिक भाषा के शब्दकोष की रचना हुई तथा अनेक ऋषियों ने 'निरुक्त' नाम से उसके व्याख्या-ग्रन्थ लिखे.
महर्षि यास्क ने अपने निरुक्त में अट्ठारह निरुक्तों के उद्धरण दियें है. इससे पता चलता है कि गूढ़ वैदिक शब्दों कि अर्थाभिव्यक्ति के लिए अट्ठारह से ज्यादा निरुक्त-ग्रंथों कि रचना हो चुकी थी.
वेदार्थ निर्णय में महर्षि यास्क ने अर्थगूढ़  वैदिक शब्दों का अर्थ प्रकृति-प्रत्यय-विभाग की पद्दति से स्पष्ट किया है.
इस पद्दति से अर्थ के स्पष्ठीकरण में यह सिद्ध करने का उनका प्रयास रहा है कि वेदों में भिन्नार्थक शब्दों के योग से यदि मिश्रित अर्थ की अभिव्यक्ति होती है तो गुण-धर्म के आधार पर एक ही शब्द विभिन्न  सन्दर्भों में विभिन्न  अर्थों का द्योतन करता है.
उदहारण के लिए निरुक्त के पंचम अध्याय के प्रथम पाद में 'वराह' शब्द का निर्वचन दृष्टव्य  है.

संस्कृत में 'वराह' शब्द शूकर के अर्थ में ही प्रयुक्त हैपर वेदों में यह शब्द कई भिन्न अर्थों में भी प्रयुक्त है. जैसे --
१. 'वराहो मेघो भवति वराहार:' 
    ----- मेघ उत्तम या अभीष्ट आहार देने वाला होता है, इसीलिए इसका नाम 'वराह' है.

२. 'अयाम्पीतरो वराह एतस्मादेव। वृहति मूलानि। वरं वरं मूलं वृह्तीति वा।' 'वराहमिन्द्र एमुषम्'
 ----- उत्तम-उत्तम फल, मूल आदि आहार प्रदान करने वाला होने के कारण पर्वत को भी 'वराह' कहतें है.

३.  ' वरं वरं वृहती मूलानी'
 ----- उत्तम-उत्तम जड़ों या औषधियों  को खोदकर खाने के कारण शूकर  'वराह' कहलाता है.

हिंदी में  'गो' शब्द गाय के अर्थ में ही प्रयुक्त है पर संस्कृत में गाय और इन्द्रिय के अर्थ में प्रयुक्त है. वही वेदों में 'गो' गाय तथा इन्द्रिय के अर्थ में तो है ही, महर्षि यास्क के अनुसार 'गौर्यवस्तिलो वत्सः' अर्थात गो  'यव' के और तिल 'वत्सः' के अर्थ में भी प्रयुक्त है.

सभी जानतें है, कि लगभग सभी भाषाओँ में अनेकार्थी शब्द होतें है.  काव्य में उनका अलंकारिक प्रयोग भी किया जाता है और सहज रूप से भी वे भाषा में प्रयुक्त होते रहतें है. उनका सन्दर्भ के अनुरूप कोई एक अर्थ ही निकाला जाता है. दूसरा अर्थ निकालना अपने अज्ञान या भाषा के प्रति अन्याय का ही प्रमाण होता है.

तर्क और बुद्धि  से भी यही बात मालूम होती है की वेद हिंसात्मक या अनाचारात्मक कार्यों के लिए आदेश नहीं दे सकतें है. यदि कहीं कोई ऐसी बात मिलती भी है तो वह अर्थ  करने वालों की ही भूल है .
प्राय यज्ञ में पशुवध की बात बड़े जोर शोर से उठायी जाती है. पर यज्ञ के ही जो प्राचीन नाम मिलतें है, उनसे यह सिद्ध हो जाता है की यज्ञ सर्वथा अहिंसात्मक ही होते आयें है. 
निघंटु में यज्ञ के १५ नाम दियें है -
१. यज्ञ --- यह यज् घातु से बना है. यज् देवपूजा-संगतिकरण-दनेशु- यह सूत्र है.  देवों का पूजन अर्थात श्रेष्ठ प्रवृति वालों का सम्मान अन्सरन करना ,  प्रेमपूर्वक हिलमिल कर सहकारिता से रहना यज्ञ है.

२. वेनः --- वें-गति-ज्ञान-चिंता-निशामन वादित्र- ग्रहणेषु  अर्थात गति देने, जानने, चिंतन करने, देखने, वाध्य बजने तथा ग्याहन करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है.

३. अध्वर: --- 'ध्वरति वधकर्मा '  'नध्वर:'  इति  अध्वर'   - अर्थात  हिंसा  का  निषेध  करने  वाला . इस  संबोधन  से  भी  स्पष्ट  होता है कि हिंसा का निषेध करने वाले कर्म के किसी अन्य नाम का अर्थ भी हिन्सापरक नहीं हो सकता है.  सभी जानतें है की यज्ञ कर्म में भूल से भी कोई कर्मी-कीट अग्नि से मर ना जाये इसके लिए  अनेक सावधानियां बरती जाती है. वेदी पर जब अग्नि की स्थापना होती है तो उसमें से थोड़ी सी आग निकालकर बाहर रख दी जाती है कि कहीं उसमें 'क्रव्याद' (मांस-भक्षी या मांस जलाने वाली आग ) के परमाणु न मिल गएँ हो, इसके लिए 'क्रव्यादांशं त्यक्त्वा' होम की विधि है.

४.  मेध: --- मेधृ- मेधा, हिंसनयो:  संगमे  च ---  मेधा(बुद्धि) का संवर्धन, हिंसा और संगतिकरण इसके अर्थ है. अब जब यह यज्ञ अर्थात  अध्वर: का पर्यायवाची संबोधन है तो यज्ञीय सन्दर्भ में इसका अर्थ हिन्सापरक लेना सुसंगत किस तरह होगा ?

५. विदध् -- विद ज्ञाने सत्तायाम, लाभे, विचारणे, चेतना-आख्यान-निवासेषु।
६. नार्यः  ---  नारी 'नृ -नये' मनुष्यों के नेतृत्व के लिए, उन्हें श्रेष्ट्र मार्ग पर चलने के अर्थ में प्रयुक्त होता है.
७. सवनम् --- सु-प्रसवे-एश्वर्यो: ---- प्रेरणा देना, उत्पन्न कर्ण और प्रभुत्व  प्राप्त करना.
८. होत्रा---      हु-दान-आदानयो:, अदने -- सहायता देना, आदान-प्रदान करना एवं भोजन करना इसके भाव है.
९. इष्टि , १०. मख: , ११. देव-ताता , १२. विष्णु , १३. इंदु , १४. प्रजापति , १५. घर्म: 
उक्त सभी संबोधनों के अर्थ देखने से भी यही निष्कर्ष निकलता है की यज्ञ में हिंसक कर्मों का समावेश नहीं है.  एक सिर्फ मेध शब्द का एक अर्थ हिंसापरक है लेकिन यज्ञीय सन्दर्भ में उसकी संगती अन्य पर्यायवाची  शब्दों के अनुसार ही होगी ना कि अनर्थकारी असंगत हत्या के अर्थ में.

यहाँ थोडा विचार आलभन और बलि शब्दों पर भी कर लेना चाहिये.

आलभन का अर्थ स्पर्श, प्राप्त करना तथा वध करना होता है. पर वैदिक सन्दर्भ में इसका अर्थ वध के सन्दर्भ में असंगत बैठेगा जैसे कि --- 
  'ब्राह्मणे ब्राह्मणं आलभेत'
  ' क्षत्राय राजन्यं आलभेत
इसका सीधा अर्थ होता है ' ब्राह्मणत्व के लिए ब्राह्मण को प्राप्त करें, उसकी संगती करें और शौर्य के लिए  क्षत्रिय को प्राप्त करें उसकी संगती करें. 

पर  यदि आलभेत का अर्थ  वध लिया जाये तो बेतुका अर्थ बनता है, ' ब्राह्मणत्व के लिए ब्राह्मण तथा शौर्य के लिए क्षत्रिय का वध करें

बलि --- इस शब्द का अर्थ भी वध के अर्थ में निकाला जाने लगा है , जबकि वास्तव में सूत्र है -- बलि-बल्+इन्  , अर्थात आहुति,भेंट, चढ़ावा तथा भोज्य पदार्थ अर्पित करना.
हिन्दू  ग्राहस्थ के नित्यकर्मों में 'बलि वैश्व देवयज्ञ' का विधान है. इसमें भोजन का एक अंश निकालकर उसे अग्नि को अर्पित किया जाता है, कुछ अंश निकालकर पशुपक्षियों व चींटियों के लिए डाला जाता है . बलि कहलाने वाली इस क्रिया में किसी जीव का वध दिखाई देता है या दुर्बल जीवों को भोजन द्वारा बल-पोषण देना दिखाई देता है ?
स्पष्ट है 'बलि' बलिवैश्व के रूप में अर्पित अन्नादि ही है. बलि का अर्थ 'कर-टैक्स' भी होता है.

रघुवंश महाकाव्य में राजा दिलीप की शाशन व्यवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है ----
 
प्रजानेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत
सहस्रगुणमुत्स्रष्ठुम  आदत्ते हि रसं रवि:

यहाँ भी बलि का प्रचलित अर्थ किया जाय को कैसा रहेगा ?????

श्राद्ध कर्म में गोबली, कुक्कुर बलि, काकबलि, पिपिलिकादी बलि, का विधान है उसमें गौ, कुत्ता, कौआ और चींटी के लिए श्रद्धापूर्वक भोज्यपदार्थ अर्पित किया जाता है ना कि उनके वध किया जाता है.

वृहत्पाराषर में  कहा गया है कि श्राद्ध में मांस देने वाला व्यक्ति मानो चन्दन की लकड़ी  जलाकर उसका कोयला बेचता है. वह तो वैसा ही मूर्ख है जैसे कोई बालक अगाध कुँए में अपनी वस्तु डालकर उसे वापस पाने की इच्छा करता है.

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि न तो कभी मांस खाना चहिये, न श्राद्ध में ही देना चहिये.

वेदों की तो यह स्पष्ट आज्ञा है कि--- "मा हिंस्यात सर्व भूतानि "  (किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे).

जारी .......