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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2014

तुम कौनसे शास्त्र की आड़ लेकर अपनी अमानुषिक जीभ को तृप्त करने के चक्कर में जगद्जननी माता को स्वसंतान भक्षिणी सिद्ध करने पे तुले हो ?


वैसे तो आजकल सार्वजनिक सामूहिक दुष्कर्म बलि-काण्ड कहीं दिखाई सुनाई नहीं देता हैं. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं हो सकता की ऐसा हो ही नहीं रहा हैं।
अरे भैया एक तरफ तो जगन्नमाता बोलकर जयकार लगाते हो दूसरी तरफ उसीकी संतानो की उसके आगे बलि चढ़ाकर उसको हत्यारिन बना रहे हों।
अगर तुम्हारे अनुसार देवी वास्तव में बलि भक्षिणी हैं तो तो भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारी तथाकथित बलि भक्षिणी देवी।
अरे भैया न तो वेदों में ना वेदानुगामी अन्य शास्त्रों में कहीं जीव-हत्या का निर्देश हैं, फिर तुम कौनसे शास्त्र की आड़ लेकर अपनी अमानुषिक जीभ को तृप्त करने के चक्कर में जगद्जननी माता को स्वसंतान भक्षिणी सिद्ध करने पे तुले हो ??????
अरे माँ तो अपनी संतान के हलकी सी चोट लगने पर ही व्याकुल हो जाती हैं और तुम असुर स्वभावी तामसी दुष्ट जगत जननी के सामने उसीकी संतान की बलि चढ़ाते हो !!!!!!!!!
मांस -- "योगनी तंत्र " में लिखा है
माँ शब्दाद रसना ज्ञेया संद्शान रसनाप्रियां।
एतद यो भक्षयेद देवी स एव मांससाधक:।।
अत: यह स्पष्ट है की बलि देना और तांत्रिक साधनों में मांस का भक्षण करना आवश्यक नहीं है यह तो उन पाखंडी, ढोगी और ठग तांत्रिको ने अपने स्वाद की पूर्ति करने हेतु मांस का भक्षण करना आवश्यक बना दिया। यह तो तांत्रिकों द्वारा शास्त्रों मे प्राचीन ऋषियों द्वारा दिए गए मन्त्रों के अर्थों का अनर्थ कर मांस को ही आवश्यक मान लिया गया है।
कोई भी तामसी, शास्त्रों में पशु हिंसा और मांस भक्षण के पक्ष में कुतर्क देने से पहले नीचे दिए गए लिंकों पर दिए प्रमाणों को पढ़े फिर अपना प्रलाप करें क्योंकि तुम जो कहना कहोगे वे सब यहाँ खंडित हुए पड़े हैं।

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

अमृतपान - एक कविता

(अनुराग शर्मा)

हमारे पूर्वजों के चलाये
हजारों पर्व और त्यौहार
पूरे नहीं पड़ते
तेजस्वी, दाता, द्युतिवान
उत्सवप्रिय देवों को
जभी तो वे नाचते गाते
गुनगुनाते
शामिल होते हैं
लोसार, ओली व खमोरो ही नहीं
हैलोवीन और क्रिसमस में भी
लेकिन मुझे यकीन है कि
बकरीद हो या दसाइन
बेज़ुबान प्राणियों की
कुर्बानी, बलि या हत्या में
उनकी उपस्थिति नहीं
स्वीकृति भी नहीं होती
मृतभोजी नहीं हो सकते वे
जो अमृतपान पर जीते हैं

शनिवार, 18 फ़रवरी 2012

ऋषभ कंद - ऋषभक का परिचय ।। वेद विशेष ।।

भारतीय  संस्कृति सदा से ही अहिंसा की पक्षधर रही है । अन्याय, अनाचार, हिंसा, परपीडन आदि समस्त आसुरी प्रवृतियों का निषेध सभी आर्ष ग्रंथों में किया गया है । भारत की पुण्य भूमि में उत्पन्न हर परंपरा में अहिंसा को ही परम धर्म बताते हुये "अहिंसा परमोधर्म" का पावन उद्घोष किया गया है ।  और यह उद्घोषणा सृष्टि के आदि मे प्रकाशित वेदों में सर्वप्रथम सुनाई दी थी, वेदों में सभी जीवों को अभय प्रदान करते हुये घोषित किया गया "मा हिंस्यात सर्व भूतानि "  और अहिंसा की यही धारा उपनिषदों, स्मृतियों, पुराणों, महात्मा बुद्ध, महावीर स्वामी द्वारा संरक्षित होती हुयी आज तक अविरल बहती आ रही है ।

लेकिन निरामिष वृति का यह डिंडिम घोष कई तामस वृत्तियों के चित्त को उद्विग्न कर देता है जिससे वे अपनी प्रवृत्तियों के वशीभूत हो प्रचारित करना शुरू कर देते है कि यह पावन ध्वनि  "अहिंसा अहिंसा अहिंसा"   नहीं   "अहो हिंसा - अहो हिंसा" है ।

भारतीय संस्कृति का ही जिनको ज्ञान नहीं और जो भारत में जन्म लेकर भी भारतीय संस्कृति को आत्मसात नहीं कर पाये वे दुर्बुद्धिगण भारती-संस्कृत से अनभिज्ञ होते हुये भी संस्कृत में लिखित आर्ष ग्रन्थों के अर्थ का अनर्थ करने पर आमादा है । ये रक्त-पिपासु इस रक्त से ना केवल भारतीय ज्ञान-गंगा बल्कि इस गंगा के उद्गम गंगोत्री स्वरूप पावन वेदों को भी भ्रष्ट करने का प्रयास करतें  है ।

जो साधारण संस्कृत नहीं जानते वे वेदों की क्लिष्ट संस्कृत के विद्वान बनते हुये अर्थ का अनर्थ करते है । शब्द तो काम धेनु है उनके अनेक लौकिक और पारलौकिक अर्थ निकलते है । अब किस शब्द  की जहाँ संगति बैठती हैवही अर्थ ग्रहण किया जाये तो युक्तियुक्त होता है अन्यथा अनर्थकारी ।

ऐसे ही बहुत से शब्द वेदों मे प्राप्त होते है, जिनको संस्कृत भाषा और भारतीय संस्कृति से हीन व्यक्ति अनर्गल अर्थ लेते हुये अर्थ का कुअर्थ करते हुये अहिंसा की गंगोत्री वेदों को हिंसक सिद्ध करने की भरसक कोशिश करते है ।  लेकिन ऐसे रक्त पिपासुओं के कुमत का खंडन सदा से होता आया है, और वर्तमान में  भी  अहिंसक भारतीयता  के साधकों द्वारा सभी जगह इन नर पिशाचों को सार्थक उत्तर दिया जा रहा है । इसी महान कार्य में अपनी आहुती निरामिष द्वारा भी निरंतर अर्पित की जा रही है, जहाँ शाकाहार के प्रचार के साथ आर्ष ग्रन्थों की पवित्रता को उजागर करते हुये लेख प्रकाशित किए जाते हैं । जिनके पठन और मनन से कई मांसाहारी भाई-बहन मांसाहार त्याग चुके है, जो निरामिष परिवार की महान सफलता है ।

लेकिन फिर भी कई  रक्त मांस लोलुप आसुरी वृतियों के स्वामी अपने  जड़-विहीन आग्रहों से ग्रसित हो मांसाहार का पक्ष लेने के लिए बालू की भींत सरीखे तर्क-वितर्क करते फिरते है । इसी क्रम में निरामिष के एक लेख जिसमें यज्ञ के वैदिक शब्दों के संगत अर्थ बताते हुये इनके प्रचार का भंडाफोड़ किया गया था ।  वहाँ इसी दुराग्रह का परिचय देते हुये ऋग्वेद का यह मंत्र ----------

अद्रिणा ते मन्दिन इन्द्र तूयान्त्सुन्वन्ति 
सोमान् पिबसि त्वमेषाम्।
पचन्ति ते वृषभां अत्सि तेषां 

पृक्षेण यन्मघवन् हूयमानः ॥
         -ऋग्वेद, 10, 28, 3

लिखते हुये इसमें प्रयुक्त "वृषभां"  का अर्थ बैल करते हुये कुअर्थी कहते हैं  की इसमें बैल पकाने की बात कही गयी है ।  जिसका उचित निराकरण करते हुये बताया गया की नहीं ये बैल नहीं है ; इसका अर्थ है ------
 
-हे इंद्रदेव! आपके लिये जब यजमान जल्दी जल्दी पत्थर के टुकड़ों पर आनन्दप्रद सोमरस तैयार करते हैं तब आप उसे पीते हैं। हे ऐश्वर्य-सम्पन्न इन्द्रदेव! जब यजमान हविष्य के अन्न से यज्ञ करते हुए शक्तिसम्पन्न हव्य को अग्नि में डालते हैं तब आप उसका सेवन करते हैं।

इसमे शक्तिसंपन्न हव्य को स्पष्ट करते हुये बताया गया की वह शक्तिसम्पन्न हव्य "वृषभां" - "बैल" नहीं बल्कि बलकारक  "ऋषभक" (ऋषभ कंद) नामक औषधि है ।

लेकिन दुर्बुद्धियों को यहाँ भी संतुष्टि नहीं और अपने अज्ञान का प्रदर्शन करते हुये पूछते है की ऋषभ कंद का "मार्केट रेट" क्या चल रहा है आजकल ?????

अब दुर्भावना प्रेरित कुप्रश्नों के उत्तर उनको तो क्या दिये जाये, लेकिन भारतीय संस्कृति में आस्था व  निरामिष के मत को पुष्ठ करने के लिए ऋषभ कंद -ऋषभक का थोड़ा सा प्राथमिक परिचय यहाँ दिया जा रहा है ----

आयुर्वेद में बल-पुष्टि कारक, काया कल्प करने की अद्भुत क्षमता रखने वाली  आठ महान औषधियों का वर्णन किया गया है, इन्हे संयुक्त रूप से "अष्टवर्ग" के नाम से भी जाना जाता है ।
अष्ट वर्ग में सम्मिलित आठ पौधों के नाम इस प्रकार हैं-
 
१॰   ऋद्धि
२॰   वृद्धि
३॰   जीवक
४॰   ऋषभक 
५॰   काकोली
६॰   क्षीरकाकोली
७॰   मेदा
८॰   महामेदा

ये सभी आर्किड फैमिली के पादप होते हैं, जिन्हें दुर्लभ प्रजातियों की श्रेणी में रखा जाता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता व दमखम बढ़ाने में काम आने वाली ये औषधिया सिर्फ अत्यधिक ठंडे इलाकों में पैदा होती हैं। इनके पौधे वातावरण में बदलाव सहन नहीं कर सकते ।

वन अनुसंधान संस्थान [एफआरआइ] और वनस्पति विज्ञान के विशेषज्ञों के मुताबिक अष्ट वर्ग औषधियां बहुत कम बची हैं।  जीवक, ऋषभ व क्षीर कोकली औषधियां नाममात्र की बची हैं। अन्य औषध पौधे भी विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं।

जिस औषधि की यहाँ चर्चा कर रहे है वह  ऋषभक नामक औषधी इस अष्ट वर्ग का महत्वपूर्ण घटक है । वैधकीय ग्रंथों में इसे - "बन्धुर , धीरा , दुर्धरा , गोपती .इंद्रक्सा , काकुदा , मातृका , विशानी , वृषा  और  वृषभाके नाम से भी पुकारा जाता है । आधुनिक वनस्पति शास्त्र में इसे Microstylis muscifera Ridley के नाम से जाना जाता है ।




ऋषभक और अष्ठवर्ग की अन्य औषधियों के विषय में विस्तृत जानकारी अगले लेख में दी जाएगी।
जारी ...................

शनिवार, 14 जनवरी 2012

शाकाहार पहेली 2012 के परिणाम

निरामिष शाकाहार पहेली 2012 - परिणाम निरामिष ब्लॉग की पहली वर्षगांठ के अवसर पर हमने आपका आभार व्यक्त करने के लिये एक छोटी सी शाकाहार प्रहेलिका का आयोजन किया था। आइये, आज एक नज़र डालें निरामिष पहेली के परिणामों पर।
प्रथम निरामिष शाकाहार पहेली - सवालों पर एक पुनर्दृष्टि
प्रश्न 1: निरामिष स्वर

यह किसकी आवाज़ है? भारतीय सिने जगत से जुड़ी यह अभिनेत्री जन्म से मांसाहारी थी। अपने परिवार, आस-पड़ोस में इन्होंने पशुहत्या और मांसाहार ही होते देखा था। लेकिन जैसे ही इन्हें अवसर मिला, इस हस्ती ने अहिंसा और दया के महत्व को पहचाना और शाकाहारी जीवन अपनाया।
उत्तर: पाकिस्तान में जन्मी अभिनेत्री वीना मलिक ने अपने देश में सदा जीवहत्या का वातावरण ही देखा परंतु भारत से जुड़ने के बाद उन्होंने न केवल अहिंसा और शाकाहार को अपनाया बल्कि अब वे शाकाहार जागृति अभियानों से भी जुड़ीं हैं।

प्रश्न 2: निरामिष चित्र
इस चित्र में अमेरिका में अहिंसक परिवर्तन के प्रणेता, प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता और गांधीवादी मार्टिन लूथर किंग जूनियर के आगे खड़ी ये प्रसिद्ध शाकाहारी अमेरिकी महिला कौन हैं और किस कार्य के लिये विश्वप्रसिद्ध हैं?
उत्तर: अमेरिका के अनेक नगरों की तरह मॉंटगुमरी के नियमों के अनुसार बसों की सीटें श्वेत यात्रियों के लिए आरक्षित सीटें होती थी। यदि श्वेत यात्री आये तो अश्वेत यात्रियों को सीट खाली करनी होती थी। मनुष्यों में भेदभाव करने वाले कानून को रोकने के लिये दृढप्रतिज्ञ रोज़ा पार्क्स ने 1 दिसम्बर 1955 को एक बसयात्रा में अपनी सीट एक श्वेत यात्री के लिए खाली करने से मना किया और गिरफ़्तार हुईं और उन पर 10 डॉलर का जुर्माना लगा। मार्टिन लूथर किंग जूनियर के नेतृत्व में काले कानून का अहिंसक विरोध होता रहा और 40,000 से अधिक अश्वेतों ने 381 दिनों तक बसों का अहिंसक बहिष्कार किया। 20 दिसंबर 1956 में अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के आदेश से इस भेदभाव का अंत हुआ। और उसकी नायिका बनीं, शाकाहारी सामाजिक कार्यकर्ता रोज़ा पार्क्स। सन 2005 में अपनी मृत्यु तक वे नागरिक अधिकारों के लिए काम करती रहीं।

प्रश्न 3: वैदिक यज्ञ
यज्ञ की अग्नि में अन्न व औषधियों की समिधा देने वाले हमारे ऋषि-मुनियों ने पशुबलि में लिप्त रहे समुदायों के उत्थान और समन्वयीकरण के उद्देश्य से कई निरामिष यज्ञों में अन्न का बना पशु भी प्रयोग किया। विभिन्न प्रकार के अन्न यथा जौ, चावल, तिल के साथ अन्य पदार्थ गुड़, सोमरस, घी आदि मिलाकर बने वास्तविक जैसे लगने वाले यज्ञ-पशु को क्या कहते हैं?
उत्तर: ऐतरेय ब्राह्मण की कथा में वर्णन है कि देवताओं ने मेधा को ढूंढना आरम्भ किया तो उसे पृथ्वी से अन्न के रूप में उगता पाया। उसी ग्रंथ में अग्निहोत्र के लिये अन्न से यज्ञ पशु बनाने की विधि का विस्तृत वर्णन है। अन्न से बने इस यज्ञपशु को पुरोडाश कहा गया है। विभिन्न मिट्टी के कपाळ (खपटे) पर रखकर यज्ञों में देवताओं के लिये पुरोडाश पकाया जाता था। पुरोडाश के लिये पीसे गये अन्न को पिष्ट (पिट्ठी) कहने के कारण इसे पिष्ट पशु भी कहते हैं। मनु और श्रद्धा के एक सन्दर्भ में पाकयज्ञ स्थल पर मित्रावरुण देवों की उपस्थिति में ग्रीष्म ऋतु को अग्नि और शरद ऋतु को पुरोडाश माना गया है।


प्रश्न 4: पर्यावरण
मांसाहार पर्यावरण के लिये एक बड़ा खतरा बनकर सामने आया है। इसके प्रमुख दुष्प्रभाव निम्न हैं
 क) वन विनाश घ) जलवायु प्रदूषण ख) खाद्यान्न की कमी त) हिंसक प्रवृत्ति का सामान्यीकरण ग) बिजली और पानी की बर्बादी थ) मांसाहार उपरोक्त सभी हानियों का कारक है
उत्तर: मांसाहार उपरोक्त सभी हानियों का कारक है।

प्रश्न 5: स्वास्थ्य
शरीर में, प्रयोगशाला में और मृदा में पाये जाने वाले बैक्टीरिया द्वारा संश्लेषित विटामिन बी12 के प्रमुख ज्ञात शाकाहारी स्रोत निम्न हैं:
क) पनीर घ) मट्ठा ख) दूध त) T-6635+ खमीर ग) दही थ) उपरोक्त सभी
उत्तर:विटामिन बी12 बैक्टीरिया द्वारा संश्लेषित होता है और प्राणियों के पाचन तंत्र के अतिरिक्त उपरोक्त सभी शाकाहारी तत्व भी विटामिन बी12 के ज्ञात स्रोत हैं।

प्रश्न 6: क्रीड़ा, स्पोर्ट्स
1 अप्रैल 1911 को जलन्धर, भारत में जन्मे शतायु मैराथन धावक सन् 1992 से लंडन में रहते हैं। उनकी जीवनी का शीर्षक "द टर्बन्ड टॉर्नेडो" है। अंतर्राष्ट्रीय खेल जगत का यह शाकाहारी नायक दाल, सब्ज़ी, और फुल्कों के अतिरिक्त दूध, दही और सोंठ का मुरीद हैं। 5 फ़ुट 11 इंच ऊंचाई और 52 किलो भार वाले इस शाकाहारी शतायु युवा धावक का नाम क्या है?
उत्तर: विश्व के सबसे उम्रदराज़ मैराथन धावक फ़ौजा सिंह शुद्ध शाकाहारी हैं। उनके बारे में विस्तृत जानकारी निरामिष के आलेख "चैम्पियन शतायु धावक" में उपलब्ध है।
प्रथम शाकाहार प्रहेलिका 2012 के पुरस्कार
प्रथम पुरस्कार: 2,500 रुपये की पुस्तकें और प्रमाणपत्र
द्वितीय पुरस्कार: 1,500 रुपये की पुस्तकें और प्रमाणपत्र
तृतीय पुरस्कार: 500 रुपये की पुस्तकें और प्रमाणपत्र
लगता है कि हमारी पहली पहेली कुछ ज़्यादा ही कठिन हो गयी थी। किसी भी पाठक ने सभी छः प्रश्नों का सही उत्तर नहीं दिया, इसलिये इस बार का प्रथम पुरस्कार अनक्लेम्ड रहा है। फिर भी हमें दो विजेता मिले हैं। शिल्पा मेहता ने चार सही उत्तर देकर तृतीय पुरस्कार और अभिषेक ओझा ने पाँच सही उत्तर देकर द्वितीय पुरस्कार प्राप्त किया है। निरामिष सम्पादक मंडल की ओर से इन दोनों को हार्दिक बधाई और धन्यवाद!
प्रथम शाकाहार प्रहेलिका 2012 के विजेता
तृतीय विजेता: शिल्पा मेहता
(500 रुपये की पुस्तकें, प्रमाणपत्र और निरामिष ब्लॉग पर लेखन का आमंत्रण)
द्वितीय विजेता: अभिषेक ओझा
(1,500 रुपये की पुस्तकें, प्रमाणपत्र और निरामिष ब्लॉग पर लेखन का आमंत्रण)
प्रथम पुरस्कार: कोई विजेता नहीं
हमारे पाठक ही हमारे लिये असली विजेता हैं। आप सभी पाठकों का हार्दिक धन्यवाद! मकर संक्रांति, भोगाली बिहू, भोगी, सुग्गी, बोर नहान, तिलगुल, लोहड़ी, पोंगल, उत्तरायणी पर्व की हार्दिक बधाइयाँ!
(निवेदक: निरामिष सम्पादक मंडल)

गुरुवार, 5 जनवरी 2012

निरामिष शाकाहार प्रहेलिका 2012

निरामिष के सभी पाठकों व हितैषियों को नववर्ष 2012 की शुभकामनायें! पता ही नहीं चला कि आपसे बात करते-करते कब एक वर्ष बीत गया। शाकाहार, करुणा, और जीवदया मे आपकी रुचि के कारण ही इस अल्पकाल में निरामिष ब्लॉग ने इतनी प्रगति की। एक वर्ष के अंतराल में ही हमारे नियमित पाठकों की संख्या हमारे अनुमान से कहीं अधिक हो गयी है और लगातार बढती जा रही है। इस ब्लॉग पर हम शाकाहार के सभी पक्षों को वैज्ञानिक, स्वास्थ सम्बन्धी, धार्मिक, मानवीय विश्लेषण करके तथ्यों के प्रकाश में सामने रखते हैं ताकि ज्ञानी पाठक अपने विवेक का प्रयोग करके शाकाहार का निष्पाप मार्ग चुनकर संतुष्ट हों।

हमारे पाठक ब्लॉगर श्री सतीश सक्सेना जी, डॉ रूपचन्द शास्त्री जी, राकेश कुमार जी, रेखा जी, वाणी गीत जी, मदन शर्मा जी, तरूण भारतीय जी, सवाईसिंह जी, पटाली द विलेज, संदीप पंवार जी, कुमार राधारमण जी का प्रोत्साहन के लिए आभार व्यक्त करते है।

हमारे सुदृढ़ स्तम्भ, विशेषकर सर्वश्री विरेन्द्र सिंह चौहान, गौरव अग्रवाल, डॉ मोनिका शर्मा, शिल्पा मेहता, आलोक मोहन, प्रश्नवादी  जैसे समर्थकों का विशेषरूप से आभार व्यक्त करना चाहते हैं जिन्होंने लेखकमण्डल से बाहर रहते हुए भी हमें भरपूर समर्थन दिया है। हमारे एक जोशीले पाठक ने निरामिष ब्लॉग के सामने शाकाहार के विरोध में कई भ्रांतियाँ और चुनौतियाँ रखीं। डॉ. अनवर जमाल द्वारा पोषण, शाकाहार, और भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के सम्बन्ध में प्रस्तुत प्रश्नों ने हमें प्रचलित बहुत सी भ्रांतियों को दूर करने का अवसर प्रदान किया। मांसाहार की बुराइयों को उद्घाटित करने और उनके मन में पल रहे भ्रम के बारे में जानने के कारण हमें शाकाहार सम्बन्धी विषयों की वैज्ञानिक और तथ्यात्मक जानकारी प्रस्तुत करने में अपनी प्राथमिकतायें चुनने में आसानी हुई। आशा है कि वे हमें भविष्य में भी झूठे प्रचार की कलई खोलने के अवसर इसी प्रकार प्रदान करते रहेंगे।

पहेली की ओर आगे बढने से पहले हम अभिनन्दन करना चाहते हैं उन सभी महानुभावों का जिन्होने गतवर्ष शाकाहार अपनाकर हमारे प्रयास को बल दिया:
* दीप पांडेय
* इम्तियाज़ हुसैन
* कुमार राधारमण
* शिल्पा मेहता


अपनी पहली वर्षगांठ के अवसर पर आज हम आपका आभार व्यक्त करना चाहते हैं, एक छोटे से आयोजन के साथ। आइये, हल करते हैं आज की निरामिष पहेली अपने निराले शाकाहारी, सात्विक अन्दाज़ में। केवल कुछ सरल प्रश्न और बहुत से पुरस्कार। हमारा प्रयास है कि इस प्रतियोगिता में सम्मिलित प्रश्नों के उत्तर या उनके संकेत आपको निरामिष ब्लॉग की पिछली प्रविष्टियों व टिप्पणियों में मिल जायें।
प्रथम निरामिष शाकाहार पहेली
प्रश्न 1: निरामिष स्वर

ज़रा ध्यान से सुनिये यह आवाज़। भारतीय सिने जगत से जुड़ी यह अभिनेत्री जन्म से मांसाहारी थी। अपने परिवार, आस-पड़ोस में इन्होंने पशुहत्या और मांसाहार ही होते देखा था। लेकिन जैसे ही इन्हें अवसर मिला, इस हस्ती ने अहिंसा और दया के महत्व को पहचाना और शाकाहारी जीवन अपनाया, ज़रा पहचानिए तो इस आवाज़ को, और लिख दीजिये इनका नाम - टिप्पणी बक्से में:


प्रश्न 2: निरामिष चित्र
इस श्वेत-श्याम चित्र को ध्यान से देखिए। इसमें अमेरिका में अहिंसक परिवर्तन के प्रणेता, प्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता और गान्धीवादी मार्टिन लूथर किंग जूनियर को तो आपने ज़रूर ही पहचान लिया होगा। हमारा प्रश्न है कि उनके आगे खड़ी ये प्रसिद्ध शाकाहारी अमेरिकी महिला कौन हैं और किस कार्य के लिये विश्वप्रसिद्ध हैं? संकेत यह है कि यह शाकाहारी महिला अमेरिका में एक क्रांति की सूत्रधार बनीं। यद्यपि अपने उद्देश्य पर अड़े रहने के लिये आरम्भ में उन्हें काफ़ी कष्ट सहने पड़े, पर समय बीतने के साथ संसार ने मानवता के प्रति इनके आग्रह को समझा और इन्हें बहुत सम्मान मिला। आज यह महान हस्ती इस संसार में नहीं हैं परंतु आप इनसे न्यूयॉर्क के मैडम तुसाद वैक्स म्यूज़ियम में आज भी मिल सकते हैं। इनका नाम और इनकी प्रसिद्धि का कारण हमारे टिप्पणी बक्से में लिख दीजिये और इस प्रतियोगिता का विजेता बनने की ओर अपना दावा सशक्त कीजिये।

सभ्यता के प्रसार से पहले की कबीलाई संस्कृतियों में न केवल पशु, बल्कि मानव भी सुरक्षित नहीं थे। नरभक्षी कबीले तो इंसान को भी खा जाते थे, बहुत से कबीले बलि के नाम पर पशु हत्या को धर्म का नाम देते थे। जब ऋषियों ने देवपूजा का नया मार्ग प्रस्तुत किया जिसमें यज्ञ की अग्नि में अन्न व औषधियों की समिधा दी जाने लगी, तब आसुरी व राक्षसी शक्तियों ने पशुमांस व अस्थियाँ डाल-डालकर ऐसे यज्ञों का ध्वंस आरम्भ किया और विरोध करने वाले ऋषियों का अपमान, त्रास व हत्या करने लगे। पहले से पशुबलि में लिप्त रहे समुदायों के उत्थान और समन्वयीकरण के उद्देश्य से हमारे ऋषियों द्वारा किये जाने वाले कई निरामिष यज्ञों में अन्न का बना पशु भी प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 3: वैदिक यज्ञ
क्या आप बता सकते हैं कि विभिन्न प्रकार के अन्न यथा जौ, चावल, तिल के साथ अन्य पदार्थ गुड़, सोमरस, घी आदि मिलाकर बने इस वास्तविक जैसे लगने वाले यज्ञ-पशु को क्या कहते हैं?

धरती की बढती पर्यावरण समस्या ग्रीन हाउस गैसों की वृद्धि में 18 प्रतिशत का योगदान मांस उद्योग के लिये किये जा रहे पशुपालन का है जो कि परिवहन क्षेत्र से भी अधिक है। वध किये जाने वाले पशुओं के चरागाह और पशु आहार की खेती के लिए दुनिया भर में वनों को काटा जा रहा है। केवल लैटिन अमेरिका में ही बूचड़खनों द्वारा 70% वन भूमि को चरागाह में बदल दिया गया है। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषक होते हैं। उनकी कमी से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है और तापमान में बढ़ोतरी होती है। बूचड़खानों द्वारा छोड़े पशु-अवशेष से नाइट्रस ऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैस निकलती है जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 296 गुना जहरीली है। इस प्रकार हम देखते हैं कि शाकाहारी भोजन प्रकृति और पर्यावरण की सुरक्षा के लिये भी आवश्यक है। हमारी एक पुरानी पोस्ट से लिया गया आज का चौथा सवाल पर्यावरण से सम्बन्धित है।

प्रश्न 4: पर्यावरण
मांसाहार पर्यावरण के लिये एक बड़ा खतरा बनकर सामने आया है। इसके प्रमुख दुष्प्रभाव निम्न हैं
क) वन विनाशघ) जलवायु प्रदूषण
ख) खाद्यान्न की कमीत) हिंसक प्रवृत्ति का सामान्यीकरण
ग) बिजली और पानी की बर्बादीथ) मांसाहार उपरोक्त सभी हानियों का कारक है

ब्रिटेन में कई दशकों तक 11,207 व्यक्तियों पर किये गये अध्ययन से ज्ञात हुआ कि सर्वोच्च बुद्धि अंक (आइक्यू, IQ) वाले बच्चे 30 वर्ष की आयु से पहले ही शाकाहारी हो गये। इसके अतिरिक्त शाकाहारियों के दीर्घायु होने की बात भी अनेक अध्ययनों द्वारा स्थापित हुई है। सर्वज्ञात है कि भारत में हृदय से जुड़ी बीमारियाँ, मधुमेह और कैंसर के मामले बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं और इसका सीधा संबंध अंडों, मांस आदि की बढ़ती खपत से है। भारत में तेजी से बढ़ रहे मधुमेह टाइप 2 से पीड़ित लोग शाकाहार अपना कर इस बीमारी पर नियंत्रण पा सकते हैं और अपना मोटापा भी घटा सकते हैं। शाकाहारी खाने में कोलेस्ट्राल बिल्कुल नहीं होता, वसा कम होती है, और यह कैंसर के खतरे को 40% कम करता है। स्वास्थ्य और शाकाहार के सम्बन्ध में अब प्रस्तुत है हमारा पाँचवाँ प्रश्न:

प्रश्न 5: स्वास्थ्य
शरीर में, प्रयोगशाला में और मृदा में पाये जाने वाले बैक्टीरिया दारा संश्लेषित विटामिन बी12 के प्रमुख ज्ञात शाकाहारी स्रोत निम्न हैं:
क) पनीरघ) मट्ठा
ख) दूधत) T-6635+ खमीर
ग) दहीथ) उपरोक्त सभी

आधुनिक खेल जगत स्वास्थ्य, पोषण व चिकित्सा के क्षेत्र में नवीनतम जानकारियों और सर्वश्रेष्ठ तकनीक का प्रयोग करने में सर्वप्रथम रहा है। टेनिस सितारा मार्टिना नवरातिलोवा, विश्व हैंगग्लाइडिंग चैम्पियन जूडी लेडेन, विंडसर्फ़िंग के विश्व चैम्पियन जटा म्युलर, कुश्ती के विश्व चैम्पियन क्रिस कैम्पबेल तथा 9 ओलम्पिक स्वर्ण विजेता व 8 विश्व-चैम्पियनशिप विजेता एथलीट कार्ल लुइस जैसे अग्रणी महा-खिलाड़ियों ने भारत के बाहर भी सम्पूर्ण विश्व में शाकाहार का लोहा मनवाया है। आज का अंतिम प्रश्न खेल जगत से सम्बन्धित है।

प्रश्न 6: क्रीड़ा, स्पोर्ट्स
खेल सामग्री निर्माता ऐडीडाज़ के विज्ञापनों में फ़ुटबाल खिलाड़ी डेविड बैकहम को हटाकर नये पोस्टर बॉय बनने वाले शतायु मैराथन धावक 1 अप्रैल 1911 को जलन्धर, भारत में जन्मे थे और सन् 1992 से लंडन में रहते हैं। उनकी जीवनी का शीर्षक "द टर्बन्ड टॉर्नेडो" अर्थात "पगड़ी वाला चक्रवात" है। अंतर्राष्ट्रीय खेल जगत का यह शाकाहारी नायक दाल, सब्ज़ी, और फुल्कों के अतिरिक्त दूध, दही और सोंठ का मुरीद हैं। क्या आप 5 फ़ुट 11 इंच ऊंचाई और 52 किलो भार वाले इस शाकाहारी शतायु युवा धावक का नाम बता सकते हैं?

प्रतियोगिता में भाग लेने के नियम....

1. आपको जितने प्रश्नों के उत्तर पता हैं, उन्हें टिप्पणी बॉक्स में लिखकर प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं।
2. प्रतियोगिता पूरी होने तक मॉडरेशन ऑन है ताकि आपके सही/ग़लत उत्तर किसी अन्य व्यक्ति को दिखाई न दें।
तो अब ध्यान लगाइए और जल्दी से हमारे टिप्पणी बॉक्स में अपने उत्तर लिख दीजिए।

(निवेदक: निरामिष सम्पादक मंडल)
* सम्बन्धित कड़ियाँ *
* शाकाहार पहेली 2012 के परिणाम

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

यज्ञ हो तो हिंसा कैसे ।। वेद विशेष ।।


वेद  का अर्थ ज्ञान होता है. वेद को ज्ञान का सर्वोच्च शिखर भी कहा जाता है . और ज्ञान ही ब्रह्म का स्वरुप है. इस तरह वेद और परमात्मा भिन्न नहीं है . और परमात्मा के लिए उपनिषद कहतें है ----
पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।
                                                   पूर्णस्य पूर्णमादाय, पूर्णमेवावशिष्यते।।

जैसे ब्रह्म अनवद्य और अनामय है, वैसे ही वेद भी है; अतः वेद में कोई ऐसी बात नहीं हो सकती जो मनुष्य के लिए परम कल्याणमयी न हो. जब ब्रह्म ही शांत और शिवरूप है तब उसी का ज्ञान वेद अशिवरूप कैसे हो सकता है

कोई भी सामान्य विचारशील आदमी भी विवेक का उपयोग करे तो उसे जीव हिंसा अनुचित लगने लगती है . यहाँ तक की मांसाहारी लोग भी अगर पशुओं को निर्ममतापूर्वक काटे जाते हुए देख लें तो शायद ज्यादातर मांसाहारी जो की परंपरा से मांसाहारी नहीं है मांसाहार करना छोड़ दें. सामान्य संवेदना भी जिसमें है वह भावनाशील व्यक्ति भी किसी की हिंसा करना तो दूर रहा उसे देखना भी पसंद नहीं कर सकता. ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि सामान्य भावशीलता के रहते जो कर्म अनुचित लगता है, उस कर्म का समर्थन,  उद्दात्त और स्वाभाव से ही प्राणिमात्र के कल्याण की कामना करने वाली भारतीय संस्कृति के आधार-ग्रंथों में किस प्रकार हो सकता है.

बहुत से मतवादी लोग वेद पर आक्षेप लागतें है कि वेदों में यज्ञ के लिए पशुहिंसा की विधि है. कहने की आवश्यकता नहीं कि गीता अध्याय सोलह में वर्णित प्रकृति के लोग ही मांस और अश्लीलता के सेवक होते है. और अधिकांशतया ऐसे ही लोगों ने अर्थ का अनर्थ करके वेदों के विषय में अपने सत्यानाशी मत का प्रचलन किया है.

यहाँ  यह भी उतना ही सत्य है कि कुछ परम आदरणीय आचार्यों और महानुभावों ने भी किन्ही किन्ही शब्दों का मांस-परक अर्थ किया है. इसका सबसे प्रधान कारण यह है कि उनमें से अधिकाँश परमार्थवादी साधक थे. गूढ़ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विषयों पर विशेष द्रष्टि रखकर उनका विषद अर्थ करने पर उनका जितना ध्यान था, उतना लौकिक विषयों पर नहीं था. इसलिए उन्होंने ऐसे विषयों का वही अर्थ लिख दिया है जो देश की परिस्थिति विशेष में उस समय अधिकाँश में प्रचलित था.

लेकिन इसका मतलब बिलकुल भी यह नहीं है कि वेद में यह अनाचार निर्दिष्ट है. कारण वही कि वेद साक्षात ब्रह्म का  स्वरुप होने से पूर्ण है तथा उनको समझने का प्रयत्न करने वाला जीव अपूर्ण तथा अल्पज्ञ .

वेद की पूर्णता का ज्ञान इस हानिकर तथ्य से भी होता है कि असुर प्रकृति के वैचारिक भी अपने मत के स्थापन के लिए वेद को ही प्रमाण बतलातें है और प्रथम द्रष्टतया यह प्रमाणिक भी भासता है.

पर ऋषियों ने वेदार्थ को समझने के लिए कुछ पदत्तियाँ निश्चित की हैं; उन्हीके हिसाब से चलकर ही हमें श्रद्धापूर्वक  वेदार्थ को समझने की साधना करनी चाहिये 

देवसंस्कृति के मर्मज्ञ ऋषियों ने इसी कारण से वेदाध्ययन करने वालों के लिए दो तत्व अनिवार्य बताए हैंश्रद्धा एवं साधना. श्रद्धा की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि आलंकारिक भाषा में कहे गए रूपकों के प्रतिमानशाश्वत सत्यों को पढ़कर बुद्धि भ्रमित न हो जाय. साधना इस कारण आवश्यक है कि श्रवण-मनन-निदिध्यासन की परिधि से भू ऊपर उठकर मन ‘‘अनन्तं निर्विकल्पम्’’ की विकसित स्थिति में जाकर इन सत्यों का स्वयं साक्षात्कार कर सके.  मंत्रों का गुह्यार्थ तभी जाना जा सकता है.

ऋग्वेद में लिखा है -- ' यज्ञेन वाचं पदवीयमानम्' अर्थात समस्त वेदवाणी यज्ञ के  द्वारा ही स्थान पाती है.  अतः वेद का जो भी अर्थ किया जाये, वह यज्ञ में कहीं-न-कहीं अवश्य उपयुक्त होता हो- यह ध्यान रखना आवश्यक है.  वेदार्थ के औचित्य की दूसरी कसौटी है --- 
'बुद्धिपूर्वा वाक्प्रकृतिर्वेदे' (वैशेषिकदर्शन) 
अर्थात वेदवाणी की प्रकृति बुद्धिपूर्वक है. वेदमंत्र का अपना किया हुआ अर्थ बुद्धि के विपरीत न हो - बुद्धि में बैठने योग्य हो, इस बात पर भी ध्यान रखने की जरुरत है. साथ ही यह भी ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हमने जो अर्थ किया है, वह तर्क से सिद्ध होता है या नहीं.  स्म्रतिकार भी कहतें है - ''यस्तर्केणानुसन्ध्त्ते स धर्मं वेद नापरः'
' जो तर्क से वेदार्थ का अनुसंधान करता है, वही धर्म को जानता है, दूसरा नहीं'    अतः समुचित तर्क से समीक्षा करना वेदार्थ के परिक्षण का तीसरा मार्ग है.

चौथी रीति यह है कि इस बात पर नज़र रखी जाए कि हमारा किया हुआ अर्थ शब्द के मूलधातु के उलट तो नहीं है; क्योंकि निरुक्तकार ने धातुज अर्थ को ही ग्रहण किया है . इन चारों हेतुओं को सामने रखकर यदि वेदार्थ पर विचार किया जाये तो भ्रम कि संभावना नहीं रहती है ऐसा महापुरषों ने निर्देशित किया है.

संस्कृत भाषा की वैदिक और लौकिक इन दो शाखाओं में से वेद की भाषा प्रथम शाखा के अंतर्गत है.
वेद कि भाषा अलौकिक है और इसके शब्दरूपों में लौकिक संस्कृत से पर्याप्त अंतर है. इसलिए वेदों में प्रयुक्त शब्दों के अर्थ में अनेक भ्रांतियां भी है.

वैदिक शब्दों के गूढ़ अर्थों के स्पस्थिकरण के लिए 'निघंटु' नाम के वैदिक भाषा के शब्दकोष की रचना हुई तथा अनेक ऋषियों ने 'निरुक्त' नाम से उसके व्याख्या-ग्रन्थ लिखे.
महर्षि यास्क ने अपने निरुक्त में अट्ठारह निरुक्तों के उद्धरण दियें है. इससे पता चलता है कि गूढ़ वैदिक शब्दों कि अर्थाभिव्यक्ति के लिए अट्ठारह से ज्यादा निरुक्त-ग्रंथों कि रचना हो चुकी थी.
वेदार्थ निर्णय में महर्षि यास्क ने अर्थगूढ़  वैदिक शब्दों का अर्थ प्रकृति-प्रत्यय-विभाग की पद्दति से स्पष्ट किया है.
इस पद्दति से अर्थ के स्पष्ठीकरण में यह सिद्ध करने का उनका प्रयास रहा है कि वेदों में भिन्नार्थक शब्दों के योग से यदि मिश्रित अर्थ की अभिव्यक्ति होती है तो गुण-धर्म के आधार पर एक ही शब्द विभिन्न  सन्दर्भों में विभिन्न  अर्थों का द्योतन करता है.
उदहारण के लिए निरुक्त के पंचम अध्याय के प्रथम पाद में 'वराह' शब्द का निर्वचन दृष्टव्य  है.

संस्कृत में 'वराह' शब्द शूकर के अर्थ में ही प्रयुक्त हैपर वेदों में यह शब्द कई भिन्न अर्थों में भी प्रयुक्त है. जैसे --
१. 'वराहो मेघो भवति वराहार:' 
    ----- मेघ उत्तम या अभीष्ट आहार देने वाला होता है, इसीलिए इसका नाम 'वराह' है.

२. 'अयाम्पीतरो वराह एतस्मादेव। वृहति मूलानि। वरं वरं मूलं वृह्तीति वा।' 'वराहमिन्द्र एमुषम्'
 ----- उत्तम-उत्तम फल, मूल आदि आहार प्रदान करने वाला होने के कारण पर्वत को भी 'वराह' कहतें है.

३.  ' वरं वरं वृहती मूलानी'
 ----- उत्तम-उत्तम जड़ों या औषधियों  को खोदकर खाने के कारण शूकर  'वराह' कहलाता है.

हिंदी में  'गो' शब्द गाय के अर्थ में ही प्रयुक्त है पर संस्कृत में गाय और इन्द्रिय के अर्थ में प्रयुक्त है. वही वेदों में 'गो' गाय तथा इन्द्रिय के अर्थ में तो है ही, महर्षि यास्क के अनुसार 'गौर्यवस्तिलो वत्सः' अर्थात गो  'यव' के और तिल 'वत्सः' के अर्थ में भी प्रयुक्त है.

सभी जानतें है, कि लगभग सभी भाषाओँ में अनेकार्थी शब्द होतें है.  काव्य में उनका अलंकारिक प्रयोग भी किया जाता है और सहज रूप से भी वे भाषा में प्रयुक्त होते रहतें है. उनका सन्दर्भ के अनुरूप कोई एक अर्थ ही निकाला जाता है. दूसरा अर्थ निकालना अपने अज्ञान या भाषा के प्रति अन्याय का ही प्रमाण होता है.

तर्क और बुद्धि  से भी यही बात मालूम होती है की वेद हिंसात्मक या अनाचारात्मक कार्यों के लिए आदेश नहीं दे सकतें है. यदि कहीं कोई ऐसी बात मिलती भी है तो वह अर्थ  करने वालों की ही भूल है .
प्राय यज्ञ में पशुवध की बात बड़े जोर शोर से उठायी जाती है. पर यज्ञ के ही जो प्राचीन नाम मिलतें है, उनसे यह सिद्ध हो जाता है की यज्ञ सर्वथा अहिंसात्मक ही होते आयें है. 
निघंटु में यज्ञ के १५ नाम दियें है -
१. यज्ञ --- यह यज् घातु से बना है. यज् देवपूजा-संगतिकरण-दनेशु- यह सूत्र है.  देवों का पूजन अर्थात श्रेष्ठ प्रवृति वालों का सम्मान अन्सरन करना ,  प्रेमपूर्वक हिलमिल कर सहकारिता से रहना यज्ञ है.

२. वेनः --- वें-गति-ज्ञान-चिंता-निशामन वादित्र- ग्रहणेषु  अर्थात गति देने, जानने, चिंतन करने, देखने, वाध्य बजने तथा ग्याहन करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है.

३. अध्वर: --- 'ध्वरति वधकर्मा '  'नध्वर:'  इति  अध्वर'   - अर्थात  हिंसा  का  निषेध  करने  वाला . इस  संबोधन  से  भी  स्पष्ट  होता है कि हिंसा का निषेध करने वाले कर्म के किसी अन्य नाम का अर्थ भी हिन्सापरक नहीं हो सकता है.  सभी जानतें है की यज्ञ कर्म में भूल से भी कोई कर्मी-कीट अग्नि से मर ना जाये इसके लिए  अनेक सावधानियां बरती जाती है. वेदी पर जब अग्नि की स्थापना होती है तो उसमें से थोड़ी सी आग निकालकर बाहर रख दी जाती है कि कहीं उसमें 'क्रव्याद' (मांस-भक्षी या मांस जलाने वाली आग ) के परमाणु न मिल गएँ हो, इसके लिए 'क्रव्यादांशं त्यक्त्वा' होम की विधि है.

४.  मेध: --- मेधृ- मेधा, हिंसनयो:  संगमे  च ---  मेधा(बुद्धि) का संवर्धन, हिंसा और संगतिकरण इसके अर्थ है. अब जब यह यज्ञ अर्थात  अध्वर: का पर्यायवाची संबोधन है तो यज्ञीय सन्दर्भ में इसका अर्थ हिन्सापरक लेना सुसंगत किस तरह होगा ?

५. विदध् -- विद ज्ञाने सत्तायाम, लाभे, विचारणे, चेतना-आख्यान-निवासेषु।
६. नार्यः  ---  नारी 'नृ -नये' मनुष्यों के नेतृत्व के लिए, उन्हें श्रेष्ट्र मार्ग पर चलने के अर्थ में प्रयुक्त होता है.
७. सवनम् --- सु-प्रसवे-एश्वर्यो: ---- प्रेरणा देना, उत्पन्न कर्ण और प्रभुत्व  प्राप्त करना.
८. होत्रा---      हु-दान-आदानयो:, अदने -- सहायता देना, आदान-प्रदान करना एवं भोजन करना इसके भाव है.
९. इष्टि , १०. मख: , ११. देव-ताता , १२. विष्णु , १३. इंदु , १४. प्रजापति , १५. घर्म: 
उक्त सभी संबोधनों के अर्थ देखने से भी यही निष्कर्ष निकलता है की यज्ञ में हिंसक कर्मों का समावेश नहीं है.  एक सिर्फ मेध शब्द का एक अर्थ हिंसापरक है लेकिन यज्ञीय सन्दर्भ में उसकी संगती अन्य पर्यायवाची  शब्दों के अनुसार ही होगी ना कि अनर्थकारी असंगत हत्या के अर्थ में.

यहाँ थोडा विचार आलभन और बलि शब्दों पर भी कर लेना चाहिये.

आलभन का अर्थ स्पर्श, प्राप्त करना तथा वध करना होता है. पर वैदिक सन्दर्भ में इसका अर्थ वध के सन्दर्भ में असंगत बैठेगा जैसे कि --- 
  'ब्राह्मणे ब्राह्मणं आलभेत'
  ' क्षत्राय राजन्यं आलभेत
इसका सीधा अर्थ होता है ' ब्राह्मणत्व के लिए ब्राह्मण को प्राप्त करें, उसकी संगती करें और शौर्य के लिए  क्षत्रिय को प्राप्त करें उसकी संगती करें. 

पर  यदि आलभेत का अर्थ  वध लिया जाये तो बेतुका अर्थ बनता है, ' ब्राह्मणत्व के लिए ब्राह्मण तथा शौर्य के लिए क्षत्रिय का वध करें

बलि --- इस शब्द का अर्थ भी वध के अर्थ में निकाला जाने लगा है , जबकि वास्तव में सूत्र है -- बलि-बल्+इन्  , अर्थात आहुति,भेंट, चढ़ावा तथा भोज्य पदार्थ अर्पित करना.
हिन्दू  ग्राहस्थ के नित्यकर्मों में 'बलि वैश्व देवयज्ञ' का विधान है. इसमें भोजन का एक अंश निकालकर उसे अग्नि को अर्पित किया जाता है, कुछ अंश निकालकर पशुपक्षियों व चींटियों के लिए डाला जाता है . बलि कहलाने वाली इस क्रिया में किसी जीव का वध दिखाई देता है या दुर्बल जीवों को भोजन द्वारा बल-पोषण देना दिखाई देता है ?
स्पष्ट है 'बलि' बलिवैश्व के रूप में अर्पित अन्नादि ही है. बलि का अर्थ 'कर-टैक्स' भी होता है.

रघुवंश महाकाव्य में राजा दिलीप की शाशन व्यवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है ----
 
प्रजानेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत
सहस्रगुणमुत्स्रष्ठुम  आदत्ते हि रसं रवि:

यहाँ भी बलि का प्रचलित अर्थ किया जाय को कैसा रहेगा ?????

श्राद्ध कर्म में गोबली, कुक्कुर बलि, काकबलि, पिपिलिकादी बलि, का विधान है उसमें गौ, कुत्ता, कौआ और चींटी के लिए श्रद्धापूर्वक भोज्यपदार्थ अर्पित किया जाता है ना कि उनके वध किया जाता है.

वृहत्पाराषर में  कहा गया है कि श्राद्ध में मांस देने वाला व्यक्ति मानो चन्दन की लकड़ी  जलाकर उसका कोयला बेचता है. वह तो वैसा ही मूर्ख है जैसे कोई बालक अगाध कुँए में अपनी वस्तु डालकर उसे वापस पाने की इच्छा करता है.

श्रीमद्भागवत में कहा गया है कि न तो कभी मांस खाना चहिये, न श्राद्ध में ही देना चहिये.

वेदों की तो यह स्पष्ट आज्ञा है कि--- "मा हिंस्यात सर्व भूतानि "  (किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे).

जारी .......