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बुधवार, 6 मार्च 2013

मैं शाकाहार क्यों अपनाऊँ ? जब कि मैं हमेशा से मांसाहार लेता रहा हूँ और मुझे वह पसंद भी है?

जब हम शाकाहार का प्रसार करने के प्रयास करते हैं तब अक्सर यह दो प्रश्न उठते हैं :

१. आप शाकाहारी हैं - यह आपका निजी निर्णय हैं । लेकिन मेरा भोजन मेरा निर्णय है । मैं मेरे भोजन को आपकी विचारधारा के अनुरूप क्यों बदलूँ ?

२. मैं आपसे तो आपका भोजन बदलने को नहीं कह रहा / रही । फिर आप मेरे भोजन के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़े हुए हैं ?  
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कुछ उत्तरों पर नज़र डालते हैं : ४ कारण 

1. हम लोग "आपके जीवन / आपकी विचारधारा / आपका भोजन" बदलने के प्रयास नहीं कर रहे । 

नहीं । 
हम बदलने का प्रयास कर रहे हैं उन करोड़ों निरीह प्राणियों का जीवन , जो आपके १५ मिनट के "भोजन" के लिए बरसों का दर्दभरा जीवन / दर्द / भय / यातना / लगातार / व्यग्रता / चिंता में जीते हैं - २- ३ साल का नर्क - सिर्फ १० मिनट आपके भोजन के थाली की सज्जा बढाने को  | २ -३ साल का नर्क (और भयानक ह्त्या के रूप में मृत्यु ) - सिर्फ १० - १५ मिनट के भोजन के लिए ? आपको यह उचित लगता है स्वाद / स्वंतत्र विचारधारा / निजी निर्णय के नाम पर ? 

2. फेक्टरी फ़ार्म पर जीवन भयावह है । 

सोच कर देखिये - क्या आप और हम सारी उम्र ( नवजात प्राणी के जन्म से २-३ वर्ष का समय ) १.५' वर्ग जमीन पर खड़े हुए अपना जीवन बिता सकते हैं ? क्योंकि हम इंसान इतनी जगह में खड़े रह सकते हैं न ? अवश्य रह सकते हैं । 

लेकिन क्या सारी उम्र खड़े रह सकते हैं ? क्या कहा ? नहीं ? क्यों नहीं???? - क्योंकि हम मानव हैं - थक जाते हैं - हमें आराम चाहिए ?

लेकिन मनुष्य होने का अर्थ मनुष्यता भी होता है न ?- तो मनुष्यता यह नहीं है कि  अपने भोजन के लिए दुसरे जीव को ऐसा जीवन जीने पर मजबूर किया जाए । ऐसे ही लगातार , सारी उम्र , बिना आराम या जगह के , खड़े रहने पर मजबूर किया  जाए ।  

लेकिन आपके भोजन की थाली में परोसा गया मुर्गा  ऐसे ही खडा रहा है अपनी सारी उम्र - क्योंकि फेक्टरी फ़ार्म कमाई के लिए होते हैं - जानवरों को काटने के लिए पाला जा रहा है उनके ऐशो आराम के लिए नहीं । तो उतनी जगह में जितने अधिक प्राणी रहे , उतना लाभ । बेचारे प्राणी ऐसे ही रहते हैं  वहां । सारी उम्र ऐसे ही ...... जन्म से मृत्यु (ह्त्या) तक ....

कुछ चित्र देखिये :

 







pigs factory farm
                                                                              Cows 

यदि हम खुद 24x7x365 खड़े नहीं रह सकते लेकिन चाहते हैं कि हमारे भोजन के लिए मूक प्राणी ऐसा जीवन जियें , तो क्या हमें खुद को मनुष्य कहने का अधिकार है ?

सूअर,गायें,मछलियाँ, मुर्गियां आदि , जो प्राणी खाए जा रहे हैं , भी सोचने समझने वाले जीव हैं - जो आपकी और हमारी ही तरह भय और दर्द महसूस कर सकते हैं - लगातार भय , लगातार दर्द - पूरे पूरे जीवन :( :(  यदि आप कहते हैं कि  आप फेक्टरी फ़ार्म का मांस नहीं  लेते , तो बताइये कि इतना मांस कहाँ से आता है जो इतने मांसाहारियों को भोजन के लिए पर्याप्त हो ? पता कीजिये - आपके फेवरेट रेस्तराओं में कहाँ से मांस सप्लाय हो रहा है ? 

कृपया जानिये (और याद रखिये ) एक वर्ष में 25,00,00,00,000 से अधिक पशुओं की क्रूर ह्त्या होती है , मानव भोजन के लिए  :(

3. क्रूरता :
जी - हाँ मानती हूँ कि हम में से अधिकाँश लोग पशुओं के प्रति क्रूर नहीं हैं  । हम सड़क चलते बिल्लियों पर, कुत्तों को, पत्थर नहीं मारते । अपने बच्चों को भी मना करते हैं कि ऐसा करना गलत है , उन्हें दर्द होगा । यदि कोई ऐसा करता दिखे तो हमें क्रोध भी आता है । 

फिर फेक्टरी फ़ार्म के पशु इस से अलग किस तरह हैं ? क्या उन्हें भी इस सहानुभूतिपूर्ण रवैये का अधिकार नहीं है ? 

a. 
मुझे इंजेक्शन लगवाना पसंद नहीं । वह भी ऐसे इंजेक्शन जो मेरी सेहत के लिए (अच्छे नहीं हो कर) बुरे हैं । 

लेकिन फेक्टरी फार्मों के पशुओं को हर हफ्ते ग्रोथ हारमोंस के इंजेक्शन दिए जाते हैं - वे कुछ नहीं कर सकते  । यह उन्हें उम्र से जल्दी बड़ा और मोटा करने को दिए जा रहे हैं - क्योंकि ज्यादा मांस अर्थात ज्यादा  पैसा । उन्हे अपने बढ़ते शरीर का बोझ उठाने के लिए हड्डियों के लिए केल्शियम चाहिए - लेकिन कीमत तो हड्डियों की नहीं -  मांस की मिलती है - तो उन्हें केल्श्यम युक्त भोजन नहीं  दिया जाता । कम्जोर (बच्चे) शरीर की हड्डियाँ और परिपक्व से भी बड़े शरीर का भार , और २४ घंटे खड़े रहना ।  ऐसा जैसे एक १ वर्ष का मानव बालक , २ साल तक लगातार , अपने पिता को गोद में उठा कर खडा हो - बिना बैठे , बिना आराम किये -- सोचिये ज़रा । 

उनके पैर सूजे रहते हैं और भयावह रूप से दर्द करते हैं । कई पशु चल भी नहीं पाते और भोजन तक नहीं पहुँच पाने से भीड़ में गिर कर /  भूख से / दब कर .... मर जाते हैं  । उनकी मृत देह वहीँ सडती रहती है और दुसरे पशु उसी सडती हुई देह से सटे खड़े रहने को मजबूर हैं | 

b.
मैं अपने ही मल मूत्र से घिरा सना नहीं जीना चाहूंगा  । किन्तु फेक्टरी फ़ार्म की जीवों के पास कोई चोइस नहीं है :( .. उनके आराम की किसे  फ़िक्र है? वे तो काटे जाने के लिए जी रहे हैं :(

c. 
मैं नहीं चाहूंगी एक लाइन में खड़ी आगे बढती रहूँ जिसमे बारी आने पर आगे वाले को दर्दनाक रूप से काट कर मार दिया जा रहा है ।  लेकिन काटने का समय आने पर इनमे से हर प्राणी ऐसे ही अपनी बारी का इंतज़ार करता है I शायद ऐसी लाइन में खडी रहने पर मैं तो अपनी बारी से पहले ही डर के मारे दिल के दौरे से मर जाऊंगी । :( । लेकिन इसी भयग्रस्त मनःस्थिति में करीब आधे घंटे खड़े आगे धकेली जाते पशु को काटा जा रहा है - और उसके शरीर में भय से होने वाले स्राव अपनी चरम सीमा पर हैं - और वे सब भयग्रस्त स्राव आपकी प्लेट में रखे भोजन में हैं । 

d.
मैं नहीं चाहूंगी कि कोई मुझे जबरदस्ती छुए /  धकेले / फेंके / बांधे / उलटा लटका कर गला रेंत कर तड़पते हुए मरने के लिए खून बहने को छोड़ दे ...आदि I पर यही होता है उन प्राणियों के साथ । उनमे से हर एक के साथ - जो आपकी थाली में परोसा जाता है ...... और आगे लाइन में अपनी अबरी का इंतज़ार कर रहा पशु यह सब देख रहा होता है - भय से तड़पता रहता है - पर क्या करे ? 

e. 
ये फ़ार्म इतने गंदे हैं, इतने कीटाणुओं से भरे , कि सारे जानवर काटने से पहले ही इन्फेक्शन से मर  जाएँ । मल मूत्र, मरे हुए प्राणियों का सड़ता शरीर आदि के कारण । लेकिन उनके ऐसे ही मर जाने से नुक्सान होगा न ? इन्हें जीवित कैसे रखा जाए ? ...... 

उन्हें बड़ी भारी मात्रा में एंटीबायोटिक इंजेक्शन दिए जाते हैं  ।कहने की ज़रुरत ही नहीं की यही एंटीबायोटिक आपके भोजन के साथ आपके शरीर में पहुँच रहे हैं । 

f.
गायों के भोजन की घास में (गाय शाकाहारी है) में मरी हुई गायों की हड्डियां पीस कर मिलाई जाती हैं - दूध बढाने के लिए  । ऐसे ही - रोज अंडे देने के लिए मुर्गियों को तेज़ प्रकाश में रखा जाता है जिससे वे सोये नहीं और रोज़ अंडे दें । 

4. पर्यावरण  

a. जितने समय में , जितनी भूमि में . 20,000 पाउंड आलू उगाये जा सकते हैं, उतनी ही भूमि में उतने ही समय में एक गाय का १ पाउंड मांस तैयार होता है  । भुखमरी से होने वाली कितनी मानव मौतें इससे बच सकती थीं ?

b.
रेंन फोरेस्ट्स काटे जाते हैं मांस के लिए पाले जा रहे पशुओं की चारागाह बनाने के लिए । 257 hamburgers के बनने योग्य मांस के लिए, एक पल में, एक फुटबाल मैदान जितना रेंन फोरेस्ट काटा जा रहा है ।

c.
: प्रदूशण : फेक्टरी फार्मों पर हर्बिसाइड और पेस्टिसाईड का छिडकाव होता है - जो मिटटी को खराब करता है, और नदियों में प्रवेश कर लोगों के पीने के पानी को खराब करता है । इससे केंसर आदि बढ़ रहा है । इसके अलावा सिंथेटिक एन्हान्सर्स जो पशुओं को दिए जाते हैं - उनके कारण भी भयानक केमिकल प्रदूषण फैलता है  | 

d. 
एक कार एक दिन में ३ किलो कार्बन डाई ऑक्साइड बनाती है  । और रेंन फोरेस्ट को काटने में जो मशीन चलती हैं - वे एक दिन में ७५ किलो कार्बन डाई ऑक्साइड बनाती है  । अर्थात  एक हैमबर्गर के लिए 75 किलो कार्बन दाई ऑक्साइड । 

एक पाउंड हैमबर्गर खाना उतना ही प्रदूषण कर रहा है जितना अपनी कार को ३ हफ्ते तक  चलाना ।सोचिये । 
e.
ऊर्जा बहुत लगती है : 5000 गैलन पानी एक पाउंड बीफ के लिए व्यय होता है । 

यह सब पढने के बाद एक बार खुले मन से - सोचिये निरामिष भोजन या सामिष ?

आपका आभार .....

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

क्या मांसाहार से मनोवृति पर कोई प्रभाव नहीं पडता?

यह सत्य है कि इंसान का अच्छा या बुरा, हिंसक अहिंसक होना उसकी अपनी प्रवृत्ति है। कोई जरूरी नहीं आहार के कारण ही एक समान प्रवृति दिखे। किन्तु यह प्रवृत्तियाँ भी उसकी क्रूर-अक्रूर वृत्तियोँ के कारण ही बनती है. दृश्यमान प्रतिशत भले ही कम हो फिर भी वृत्तियों का असर मनोवृति पर पडना अवश्यंभावी है। भाव के शुभ अशुभ चिंतन से ही व्यवहार और वर्तन का निर्माण होता है.व्यक्ति की मनोदशा का प्रभाव उसके व्यवहार और व्यक्तित्व में आए बिना नहीं रहता। यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि मन की भावनाओं के अनुरूप मानव-शरीर में हार्मोन्स स्राव होता है और उन हार्मोन्स का प्रभाव, मन की भावनाओं और प्रवृतियों को बदलने में समर्थ होता है।

मांस प्राप्त करने के लिए जब प्राणी की हिंसा की जाती है। निसहाय होते हुए भी मरणांतक संघर्ष करता है। जैसे भय विवशता दुख हर्ष विषाद तनाव के समय प्रत्येक जीव के शरीर में उन भावनाओं को सहने योग्य अथवा प्रतिकार योग्य रसायनों का स्राव होता है। उसी प्रकार प्राणी मरने से पहले भयक्रांत होता है, जीवन बचाने की जिजीविषा में संघर्ष करता है। तड़पता है। उसके शरीर में भी तदनुकूल हार्मोन्स का स्राव होता है वे हार्मोन्स क्षण मात्र में रक्तप्रवाह के माध्यम से मांस-मज्जा तक पहुँच कर संग्रहित हो जाते है। इन हार्मोन्स का प्रभाव भय, आवेश, क्रोध, दुस्साहस आदि पैदा करना होता है। ऐसे संघर्षशील प्राणी के मरने के उपरान्त भी ये हार्मोन उसके मांस-मज्जा में सक्रीय रहते है। ऐसा मृत प्राणी-मांस जब मनुष्य आहार द्वारा अपने शरीर में ग्रहण करता है, वे हार्मोन्स मानव शरीर में प्रवेश कर सक्रिय होते है। परिणाम स्वरूप मांसाहारी भिन्न- भिन्न आवेशों को महसुस करता है।(शायद, अपराधी अपराध के समय अक्सर मांस शराब आदि का सेवन इन्ही दुस्साहस युक्त आवेशों को पाने के लिए करता होगा) वे आवेग कुछ पल के लिए नशे की तरह आवेश आक्रोश उत्पन्न करते है जो प्रथमतः स्फूर्तिवर्धक प्रतीत हो सकते है। हमें भ्रम होता है कि शरीर में अतिरिक्त उर्जा का संचार हुआ है जबकि वह आवेग मात्र होता है।

ग्वालियर के दो शोधकर्ताओं, डॉ0 जसराज सिंह और सी0 के0 डेवास ने ग्वालियर जेल के 400 बन्दियों पर शोध कर ये बताया कि 250 माँसाहारियों में से 85% चिड़चिड़े व लडाकू प्रवृति के मिले। जबकि शेष 150 शाकाहारी बन्दियों में से 90% शांत स्वभाव और खुश मिजाज थे।

पिछले दिनों अमेरिका के एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने इस बात को प्रमाणित किया कि माँसाहार का असर व्यक्ति की मनोदशा पर भी पड़ता है। ज्यादा मांसाहार से चिड़चिड़ेपन के साथ स्वभाव उग्र होने लगता है। शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि लोगों की हिंसक प्रवृत्ति का सीधा संबंध माँसाहार के सेवन से है।

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

मांस का आहार या अवशिष्ट का?

चिकित्सा वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि प्रत्येक शरीर जीवित कोशिकाओं से मिल कर बनता है और शरीर में जब भोजन पहुंचता है तो ये सब कोशिकायें अपना-अपना भोजन प्राप्त करती हैं व मल त्याग करती हैं। यह मल एक निश्चित अंतराल पर शरीर बाहर फेंकता रहता है। यदि किसी जीव की हत्या कर दी जाये तो उसके शरीर की कोशिकायें मृत शरीर में मौजूद नौरिश्मेंट का उपभोग करके यथासंभव जीवित रहने का प्रयास करेगी। यह कुछ ऐसा ही है कि जैसे किसी बंद कमरे में पांच-सात व्यक्ति ऑक्सीजन न मिल पाने के कारण मर जायें तो उस कमरे में ऑक्सीजन का प्रतिशत शून्य मिलेगा। जितनी भी ऑक्सीजन कमरे में थी, उस सब का उपभोग हो जाने के बाद ही, एक-एक व्यक्ति मरना शुरु होगा। इसी प्रकार शरीर से काट कर अलग कर दिये गये अंग में जितना भी नौरिश्मेंट मौजूद होगा, वह सब कोशिकायें प्राप्त करती रहेंगी और जब नौरिश्मेंट समाप्तप्रायः हो जाएगा, तब मात्र मल ही शेष रहेगा और कोशिकायें धीरे धीरे मरती चली जायेंगी। ऐसे में कहा जा सकता है कि मृत पशु से नौरिश्मेंट पाने के प्रयास में हम वास्तव में कोशिका मल खा रहे होते हैं। सम्भव है यह बात कुछ लोगों को अरुचिकर लगे। पर यथार्थ तो यही है क्योंकि यह बायोलोजिकल तथ्य हैं। न केवल मल बल्कि उस मल पर निर्भर जिवाणुओं की भी उत्पत्ति होती है।

भारत जैसे देश में, जहां मानव के लिये भी स्वास्थ्य-सेवायें व स्वास्थ्यकर, पोषक भोजन दुर्लभ हैं, पशुओं के स्वास्थ्य की, उनके लिये पोषक व स्वास्थ्यकर भोजन की चिन्ता कौन करेगा? घोर अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में रहते हुए, जहां जो भी, जैसा भी, सड़ा-गला मिल गया, खाकर बेचारे पशु अपना पेट पालते हैं। उनमें से अधिकांश घनघोर बीमारियों से ग्रस्त हैं। ऐसे बीमार पशुओं को भोजन के रूप में प्रयोग करने की तो कल्पना भी मुझे कंपकंपी उत्पन्न कर देती है। यदि आप फिर भी उनको भोजन के रूप में बड़े चाव से देख पाते हैं तो ऐसा भोजन आपको मुबारक। हम तो पेड़ - पौधों पर छिड़के जाने वाले कीटनाशकों से निबट लें तो ही खैर मना लेंगे।
-- लेखक श्री सुशान्त सिंहल

सोमवार, 11 जून 2012

लाभदायक शाकाहार

शाकाहार में लाभ ही लाभ है। प्रथम तो शाकाहार सस्ता और सर्व सुलभ होता है। मानव शरीर के उर्जा व शक्ति के लिए जरूरी ऐसा कोई पौष्टिक तत्व नहीं है, जो वनस्पतियों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। शाकाहार अपने आप में पूर्ण संतुलित पोषक आहार है बशर्ते विभिन्न प्रकार के वनस्पति आधारित पदार्थों का सुनियोजित सेवन किया जाए। शाकाहार पचने मे आसान होता है।

 

शाकाहार मे बीमारी के कीटाणु आ जाने की संभावना कम रहती है। शाकाहार से व्यक्ति औसतन कम बीमार पड़ता है। शाकाहार से उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदयरोग तुलनात्मक कम होते है शाकाहार से व्यक्ति अधिक शक्तिशाली होता है और अधिक समय तक जीता है। शाकाहार से पेट की समस्याएँ कम से कम होती है। जबकि माँसाहार से हानियाँ ही अधिक सम्भावित है जैसे माँसाहार पचने मे अधिक समय लाते है और उस से गॅस और पेट संबंधी शिकायते बढ़ जाती है माँसाहार को पचाने मे अधिक उर्जा लगती है। माँसाहार में उपस्थित कीटाणु अधिकत्तम तापमान पर भी नष्ट नही होते। पशु की हत्या के समय उसके शरीर में बड़े पैमाने पर विषैले रसायनों का अन्तर्स्राव होता है जो मानव स्वास्थ्य के लिए घातक होते है एवं कई बिमारियों को जन्म देते है।

 

ईश्वर ने हमारा पाचन तंत्र शाकाहार के ही अनुकूल बनाया है। माँसाहार से जीवों की क्रूर हत्या होती है जो मानव के शान्ति लक्ष्य के विरूद्ध है। शाकाहार से मानव के लिए आहार श्रंखला और उर्जाचक्र सुनियोजित रहता है। जबकि माँसाहार से पर्यावरण में गम्भीर असंतुलन पैदा होता है।

 

माँसाहार से आपराधिक प्रवृत्ति की ओर रूझान देखा गया है इसका चिंतन ही आवेश आक्रोश और हिंसा में वृद्धि करता है। हम विचार करें, तो हमें अनुभूति होगी कि जो खाना हम खाते हैं, उसका हमारे शरीर, भावना तथा मानसिक स्थिति पर अप्रत्यक्ष किन्तु एक निश्चित प्रभाव पङता है। करूणा व अहिंसा के भाव शाकाहारी भोजन का आधार हैं। यदि हम अहिंसा और दया से पूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, यदि हम अधिक गंभीर शांत और संतुष्ट होना चाहते हैं, यदि हम अपने मन और इंद्रियों पर संयम रखना चाहते हैं, तब हमें स्वाभाविक रुप से ऐसा आहार ग्रहण करना होगा, जो कि हमें हमारे ध्येय की प्राप्ति में सहायक हो। शान्त सुखमय संतोषी जीवन ही हमारा लक्ष्य है। शाकाहार उस लक्ष्य का सहज सरल मार्ग है।

सोमवार, 12 मार्च 2012

खाद्य शृंखला, विवेकाहारी

खाद्य शृंखला में सभी जीव (organisms) की सामान्यतया तीन कडि़यां होती हैं -
1-उत्पादक
2-उपभोक्ता
3-अपघटक

दूसरे उपभोक्ता के अन्तर्गत खाद्य उपभोग के आधार पर जीव को इन तीन कक्षाओं में वर्गीकृत किया जा सकता हैं।
1-शाकाहारी जीव (Herbivores)
2-माँसाहारी जीव (Carnivores)
3-सर्वाहारी जीव (Omnivores)

शाकाहारी जीव (Herbivores) हिरण, गाय, भैस, बैल, घोडा, हाथी आदि
माँसाहारी जीव (Carnivores) शेर चिता लोमडी भेड़िया आदि
सर्वाहारी जीव (Omnivores) भालू, सुअर (कुछ कुछ कुत्ता बिल्ली भी)आदि

तो मानव की कक्षा क्या है?

सर्वाहारी? खाने को तो मानव कुछ भी खा सकता है, पचा भी लेता है। धूल, काँच, जहर आदि कुछ भी!! पर क्या इस कौतुक भरी आदतों को सामान्य आहर कहकर ग्रहण किया जा सकता हैं? माँसाहार भी मानव का अभ्यास उपार्जित कौशल मात्र ही है। यह प्राकृतिक सहज स्वभाव नहीं है। इसलिए मानव सर्वाहार लेकर भी सर्वाहारी नहीं है।

तो फिर खाद्य उपभोग कक्षा में मानव का स्थान क्या है?

वस्तुतः मानव इन तीनो वर्गों से इतर विशिष्ट वर्ग का जीव है।

वह है “विवेकाहारी (विवेकाचारी) जीव”!!

‘विवेकाहारी’ कैसे?

1-वह विवेक से खाद्य प्रबंध करता है ताकि उर्ज़ा-चक्र और जैव-चक्र बाधित न हो
2-वह विवेक से अपनी भोजन आवश्यकता की पूर्ति के लिए सम्भवतया हिंसा और अहिंसा में से अहिंसक आहार का चुनाव करता है।
3-वह सुपोषण और कुपोषण में अन्तर करके विवेक से अल्प किन्तु सुपोषण अपनाता है।
4-वह सुपाच्य दुपाच्य में चिंतन करके विवेक से सुपाच्य ग्रहण करता है।
5-अपने आहार स्वार्थ की प्रतिपूर्ति से कहीं अधिक, समस्त जीव-जगत के हित हेतु विवेक से संयम को सर्वोपरि स्थान देता है।
6-स्वाद, मनमौज से उपर उठकर विवेक से आरोग्य को महत्व देता है।
7-अल्पकालीन व दीर्घकालीन प्रभावों पर चिंतन करके विवेक से दीर्घकालीन प्रभावों पर क्रियाशील रहता है।

मानव का विवेक उसे निरामिष रहने को प्रेरित करता है। 

बुद्धिमान मनुष्य का वर्गीकरण ‘विवेकाहारी’ (विवेकाचारी) में ही हो सकता है।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

भोजन का चुनाव व्यक्तिगत मामला मात्र नहीं है।



अकसर कहा जाता है कि आहार व्यक्ति की व्यक्तिगत रुचि (चॉइस) की बात है। जिसका जो दिल करे खाए। हमारा आहार कोई अन्य उपदेशित या प्रबन्धित क्यों करे? क्या खाना क्या नहीं खाना यह हमारा अपना स्वतंत्र निर्णय है।

किन्तु यह सरासर एक संकुचित और स्वार्थी सोच है, विशेषकर तब जब उसके साथ हिंसा सलग्न हो। प्रथम दृष्टि में व्यक्तिगत सा लगने वाला यह आहार निर्णय, समग्र दृष्टि से पूरे विश्व के जन-जीवन को प्रभावित कर सकता है। मात्र आहार ही नहीं हमारा कोई भी कर्म यदि किसी दूसरे के जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा हो, उस दशा में तो और भी धीर-गम्भीर चिंतन और विवेकयुक्त निर्णय हमारा उत्तरदायित्व बन जाता है। यदि आपके किसी भी कृत्य से कोई दूसरा  (मनुष्य या प्राणी जो भी) प्रभावित होता है, समाज प्रभावित होता है, देश प्रभावित होता है विश्व प्रभावित होता है उस स्थिति में आपके आहार-निर्णय की एकांगी सोच या स्वछंद विचारधारा, कैसे मात्र व्यक्तिगत रह सकती है।

अन्य जीवन का सवाल :-

यह तो साफ है कि माँस किसी प्राणी का जीवन समाप्त करके ही प्राप्त किया जा सकता है। जो आहार किसी दूसरे प्राणी का जीवन ही हर ले, जिसमें किसी अन्य प्राणी को अपनी मूल्यवान जान देनी पडे, कैसे मात्र आपका व्यक्तिगत मसला हो सकता है।

भावनायें आहत होती हैं :-

माँसाहारियो के लिये यह मात्र आहार की बहस है। पर शाकाहारियों के लिये निश्चित ही किसी जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का प्रश्न है। पशुओं को कटते हुए न देख पाना, खून से लथपथ माँस, यत्र-तत्र बिखरे उनके व्यर्थ अवयव, पकने पर फैलती इन पदार्थों की दुर्गन्ध, खाते देखकर पैदा होती जगुप्सा। दूसरो की भावनाओं को आहत करने के लिए पर्याप्त है। जो आहार दूसरों की भावनाओं को आहत करे, कैसे यह  मुद्दा व्यक्तिगत पसंद तक सीमित हो सकता है?

हिंसा को प्रोत्साहन :-

जब आप माँसाहार करते है तो समाज में यह संदेश जाता है कि माँसाहार में छुपी पशुहिंसा सहज सामान्य है यह आहार शैली एक तरह से हिंसा को अप्रत्यक्ष समर्थन है। यह प्रकृति में उपस्थित जीवन का अनादर है। यह सोच समाज में शनैः शनैः निष्ठुरता का प्रसार करती है। यदि आहार इस तरह समाज के मानवीय जीवनमूल्यों को क्षतिग्रस्त करे तो वह कैसे मात्र व्यक्तिगत मामला हो सकता है।

वैश्विक मानव पोषण और स्वास्थ्य :-

पोषण के भी असंयमी स्वछंद उपभोग से न केवल प्राकृतिक-वितरण में असन्तुलन पैदा होता है बल्कि आप अतिरिक्त माल को व्यर्थ मिट्टी बना रहे होते है। अतिरिक्त उर्ज़ायोग्य तत्वों को अनावश्यक अपशिष्ट बना कर व्यर्थ कर देते है। यह दुरपयोग, किसी कुपोषण के शिकार के मुंह का निवाला छीन लेने की धृष्टता है। इस प्रकार व्यर्थ गई उर्ज़ा को पुनः रिसायकल करने में प्रकृति का  बेशकीमती समय तो बर्बाद होता ही है, प्रकृति के संसाधन भी अनावश्यक ही खर्च होते है।  तब बात और भी गम्भीर हो जाती है जब आप जो उर्ज़ा सीधे वनस्पति से प्राप्त कर सकते थे, बीच में एक जानवर और उसकी बेशकीमती जान का भोग ले लेते है। और मांसाहार से द्वितीय श्रेणी की उर्ज़ा पाने का निर्थक और जटिल उद्यम करते है। माँसाहार, कुपाच्य और रेशे रहित होता है परिणाम स्वरूप कईं रोगों का निमंत्रक बनता है, इसे अगर व्यक्तिगत आरोग्य-हानि भी मान लें पर सामुहिक रूप से यह विश्व स्वास्थ्य के प्रति उत्तरदायी है। माँसाहार पर सवार होकर प्रसार पाती महामारियों से आज कोई भी अनभिज्ञ नहीं है। इस तरह मांसाहार जब वैश्विक पोषण और स्वास्थ्य को प्रभावित करता है तो कैसे मात्र व्यक्तिगत चुनाव का प्रश्न कहकर पल्ला झाडा जा सकता है?

विश्व खाद्यसंकट-

भोजन का सम्मान होना चाहिए, उसका दुरपयोग या अपव्यय दूसरे प्राणी के मुँह के कौर को धूल में मिलाने के समान है। जब हम अपना भोजन बनाने की विधि में भी अनावश्यक व्यर्थ करते है या हमारी थाली में भी जूठा छोड कर फैक देते है तो यह भी एक अपराध है। यह दूसरे लोगों को भूखमरी के हवाले करने का अपराध है। जब भोजन के साथ सहज ही हो जानेवाला यह मामूली सा अविवेक भी अपराध की श्रेणी में आता है तो 13 किलो शाकाहार को व्यर्थ कर के आहार के लिए मात्र 1 किलो माँस पाने की क्रिया कैसे निर्दोष हो सकती है? और पशु की आधे से भी अधिक मात्रा वेस्टेज कर दी जाती है। विश्व की एक-चौथाई उपजाऊ भूमि पशुपालन में झोंक दी गई है। यह खाद्य अपव्यय, संसाधनो का दुरपयोग, प्रकृति के विनाश का अक्षम्य अपराध है। ऐसी मांसाहार भोजन-शैली, वैश्विक भूखमरी का कारण हो, जो हमारे समस्त जीवनोपयोगी संसाधनो की बरबादी का कारण हो, कैसे एक व्यक्तिगत मामले में खपा दी जा सकती है।

विश्व पर्यावरण :-

नवीनतम शोध के अनुसार लगभग सभी वैज्ञानिक इस बात से सहमत है कि माँसाहार का प्रयोग ग्लोबल वॉर्मिंग का एक प्रमुख कारक है। मांस-उद्योग सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैसेज का स्रोत बनकर मुँह चि्ढ़ा रहा है। पर्यावरण दूषण आज मानव अस्तित्व के लिए ही चुनौति बनकर खड़ा है। क्योंकि अनियंत्रित भोग और मनमौज ही प्राकृतिक संसाधनों का शोषण है। पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की बरबादी अर्थात् मानव अस्तित्व के लिए विकराल खतरा। जिस निर्णय से मानव अस्तित्व ही खतरे में पड जाय तो कैसे उस चुनाव को मात्र व्यक्तिगत कह कर किनारा किया जा सकता है?

नशा, ड्र्ग्स, धूम्रपान, गुटका आदि व्यक्तिगत खुराक होते हुए भी व्यक्तिगत इच्छाओं के अधीन स्वछंद छोडी नहीं जा सकती। यह समस्त विश्व के स्वास्थ्य कल्याण का गम्भीर प्रश्न बनती है। उसी तरह आहार भी यदि वैश्विक समस्याएँ खडी करता है तो मसला किसी भी दृष्टि से व्यक्तिगत चुनाव तक संकीर्ण नहीं रह जाता।

इस तरह 'आहार का चुनाव' केवल आहारी व्यक्ति के व्यक्तिगत पसंद-नापसंद का विषय नहीं है। आपका आहार समाज से लेकर वैश्विक पर्यावरण तक को प्रभावित करता है। वह सीधे सीधे वैश्विक संसाधनो को प्रभावित करता है। अप्रत्यक्ष रूप से विश्व शान्ति को प्रभावित करता है।जीव-जगत के रहन-सहन-व्यवहार ही नहीं उनके जीने के अधिकार को प्रभावित करता है। फिर भला आहार, मात्र व्यक्तिगत मुद्दा कैसे हो सकता है!!॥

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मानव के भोजन का उद्देश्य




भोजन का उद्देश्य मात्र उदरपूर्ति या स्वादतृप्ति ही नहीं है। हम भोजन के लिए नहीं जीते, बल्कि जीवित रहने के लिए हमें भोजन करना पडता है। भोजन का उद्देश्य, शरीर सौष्ठव बनाना मात्र नहीं है। आहार से तो बस हमें जीवन उर्ज़ा मात्र चाहिए। आहार से उर्ज़ा प्राप्त कर, उस शक्ति को मानसिक और चारित्रिक विकास में लगाना हमारा ध्येय है। 

सुविधायुक्त जीना हमारा भ्रांत लक्ष्य है, सुखरूप जीना ही वास्तविक लक्ष्य है। दूसरों को सुखरूप जीने देना हमारे ही सुखों का अर्जन है। सुखरूप जीनें के लिए आचार-विचार उत्तम होने चाहिए। दया, करूणा और सम्वेदनाओं से हृदय भरा होना चाहिए । हमारी सम्वेदनाएं आहार से प्रभावित होती है। मन की सोच पर आहार का स्रोत हावी ही रहता है,यदि वह स्रोत क्रूरता प्रेरित है तो हमारी कोमल भावनाओं को निष्ठुर बना देता है। 

आहार का आचार विचार व व्यवहार से गहरा सम्बंध है। हमारा सम्वेदनशील मन किसी के प्रति, प्रिय अप्रिय भावनाएं पैदा करता है। जिस प्रकार बार बार क्रूर दृश्य देखने मात्र से हमारे करूण भावों में कमी आती है, ठीक उसी प्रकार आहार स्रोत के चिंतन का प्रभाव हमारी सम्वेदनाओं का क्षय कर देता है। अतः भोजन का उद्देश्य, भौतिक ही नहीं मानसिक विकास भी होता है।

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

शान्ति और तृप्ति का आधार शाकाहार



निरामिष आहार से हमारे विचार प्रभावित होते हैं। यदि हम मन, वचन और कर्म से पवित्र होना चाहते हैं, तो इसके लिए हमें शाकाहार, यानी साग-सब्जी से पूर्ण आहार ही लेना चाहिए। कहते है, हर इंसान के मन के एक कोने में पशु सम व्यवहार छुपा होता है। इसलिए यदि हमें उस पशुता के उभार से मुक्त होना है, तो मांसाहार का त्याग करना ही होगा।


हमें न केवल अपनी जीभ के स्वाद के लिए दूसरे जीवों को हानि पहुंचाने से बचना होगा, बल्कि उनकी रक्षा के लिए लगातार प्रयास भी करते रहना होगा। इसलिए ऐसा भोजन ही करना चाहिए, जो न केवल पौष्टिक हो, बल्कि उसे खाने से किसी जीव की हानि भी न हो। निरामिष आहार किसी भी व्यक्ति के जीने की शैली भी निर्धारित करता है। ऐसे आहार न केवल दिल, बल्कि शरीर को भी मजबूत करते हैं। देखा गया है कि शाकाहार से न केवल हमारे विचार अच्छे होते हैं, बल्कि दया, करूणा क्षमा आदि भावों का भी विकास होता है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम लोग जीने के लिए भोजन करते हैं, न कि भोजन के लिए जीते हैं। स्मरण रहे कि आहार जीवन के लिए मात्र एक साधन है, साध्य नहीं।

प्राणिविज्ञान के अनुसार, मनुष्य भी पशु जगत का ही एक प्राणी है, लेकिन उसकी बुद्धि और संवेदनाएं ही उसे पशुओं से अलग करती हैं। यह करुणा का ही भाव है, जो उसे अपने आहार के लिए दूसरे प्राणी का प्राण नहीं लेने की प्रेरणा देता है। यदि हम गहराई से विचार करें, तो पाएंगे कि हमारी तरह ही दूसरे प्राणियों को भी जीने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है।

यदि जीवन प्रकृति है, तो जीवन का नाश विकृति है। हम अपनी भूख को मिटाने के लिए भोजन तो करते हैं, लेकिन सच तो यह है कि इससे हमारी आत्मा भी प्रभावित होती है। यदि हम मांसाहारी हैं, तो इसके लिए पहले हमें मूक एवं निर्बल पशुओं की हत्या से जुड़ना पडता है और हत्या-हिंसा के कारण ही सभी अशांतियों का जन्म होता है। दूसरी ओर, शाकाहार के लिए हमें हिंसा की जरूरत नहीं पडती है, इसलिए आत्मा को शांति और तृप्ति मिलती है।

सोमवार, 16 मई 2011

अनुकंपा भाव की सुरक्षा का उपाय है शाकाहार



येन केन पेट भरना ही मानव का उद्देश्य नहीं है। आहार-भय-निंद्रा-मैथुन तो पशुओं का भी उद्देश्य है। किसी भी प्रकार आहार प्राप्त करना तो विशेष रूप से पशुओं का लक्षण है। और विस्मय तो तब होता है जब शाकाहारी पशु भूखे मर जाते है पर माँस पर मुँह नहीं मारते!! मानव नें प्रकृति प्रदत्त बुद्धि से ही सभ्यता साधी। अपनी विकृत आहार व्यवस्था को मानव ने सुसंस्कृत बनाया। शाकाहार ही वह सुसंस्कृति है। प्रकृति प्रदत्त बुद्धि हमें यह विवेकशीलता भी प्रदान करती है, कि हमारे विचार और व्यवहार सौम्य व पवित्र बने रहे। सभी जीवों के साथ सहजीवन में हम क्रूरता से दूर रहें। समस्त सृष्टि का जीवन सहज और सुखप्रद हो, इसिलिये सभ्यता और संस्कार हमारे लक्ष्य होते है।

जीवन जीने की हर प्राणी में अदम्य इच्छा होती हैं। हम देखते है कि कीट व जंतु भी जीवन टिकाए रखने के लिए, कीटनाशक दवाओं के खिलाफ़ प्रतिकार शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु-रोगाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं के विरुद्ध जीवन बचाने के तरिके खोज लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जीजिविषा का परिणाम होता है। सभी जीना चाह्ते है मरना कोई नहीं चाहता। एसे में प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के लिये मार खाना तो क्रूरता और विकार की पराकाष्ठा है।

हिंसाजन्य आहार लेने से, हिंसा के प्रति सम्वेदनाएं समाप्तप्राय हो जाती है। किसी का जीवन ही गटक जाने की विकृत मानसिकता से दूसरे जीव के प्रति दया करूणा के भाव तिरोहित हो जाते है। अनावश्यक हिंसा-भाव मन में रूढ हो जाते है, और वे हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। इस प्रकार क्रूरता हमारे आचरण में समाहित हो जाती है। ऐसी मनोदशा में, हमारे सुखों के विपरित/प्रतिकूल स्थिति उत्पन होनें पर आवेश का आना सहज सा हो जाता है। आवेश में हिंसक कृत्य का हो जाना भी सम्भव है। आहार इसी तरह हमारी मनोस्थिति को प्रभावित करता है।

हमारी सम्वेदनाओं और अनुकंपा भाव के संरक्षण के लिये, हमारे विचार और वर्तन को विशुद्ध रखनें के लिये, शाकाहार हमारी पहली पसंद ही नहीं, नैतिक कर्तव्य होना चाहिए। और फ़िर जहाँ और जब तक हमें सात्विक पौष्ठिक शाकाहार, प्रचूरता से उपलब्ध है, वहां तो इन निरिह जीवों को करूणादान अथवा अभयदान देना ही चाहिए। समस्त जीव-संसार हमारा पडौसी है, उनके अस्तित्व से ही हमारा जीवन टिका हुआ है। मानव मात्र का यह कर्तव्य है जीए और जीने दे।

सहजीवन सरोकार, विवेकयुक्त संयम, सम्वेदनाओं की रक्षा और सात्विक संस्कृति शाकाहार शैली है

रविवार, 15 मई 2011

शाकाहार, श्रेष्ठता शुद्धता और पवित्रता का दंभ नहीं, हिंसात्याग के संघर्षशील पुरूषार्थ का आत्मगौरव है।

सजग रहकर हिंसा से बचना आत्मागौरव है। जैसे देशभक्त होना गौरव का विषय है, तुच्छ व्यवहार से दूर रहना स्वाभिमान है। झूठ को त्यागना आत्मगर्व की बात है वैसे ही हिंसा को प्रोत्साहन देने से भरसक दूर रहना, अपनी आवश्यकताओं की प्रतिपूर्ती के लिए भी हिंसा से बचना, हिंसा को कम करने के उपायों पर सजगता और संघर्ष से डटे रहना और इन्ही उद्देश्यों से सात्विक शाकाहार अपनाना निश्चित ही आत्मगौरव की बात है।

यह श्रेष्ठता का दंभ नहीं है, वस्तुत: सात्विक आहारी कभी भी माँसाहारियों (व्यक्तियों) को हेय या अपराधी की दृष्टि से नहीं देखता। बल्कि वह माँस की उत्पत्ति को हिंसा उपार्जित मानता है उसका सारा खेद हिंसा के प्रति होता है। अब क्योंकि माँस अपने आप में स्वयंमेव हेय है वह हिंसक कृत्य की ही उपज है हिंसाजनित पदार्थ को शाक के समकक्ष सम्मान कैसे मिल सकता है? आपके सामने मांसाहारी और शाकाहारी दोनो पदार्थ लाए जाय तो किस पदार्थ को देखकर आपको जगुप्सा उत्पन्न होगी? निसंदेह वे माँस के टुकडे होंगे। किसी प्राणी की काया और अंगो के टुकडे!! देखने में हुबहु हमारे शरीर के अंश समान!! माँस जो हिंसक कृत्य से ही प्राप्त होता है और हिंसा घृणित आचार है इसलिए हिंसा के प्रति घृणा को विपरित आहारी व्यक्ति विशेष की नफ़रत का आरोप लगाकर भ्रम नहीं फैलाया जाना चाहिए। कोई भी शाकाहारी अगर मन से सात्विक है, मनोवृति करूणा प्रधान हो रही है, जब प्रत्येक जीवन के प्रति अनुकम्पा है तो वह दूसरे मनुष्य से घृणा नहीं कर सकता। उसके वचनो में प्रवर्तमान क्षोभ व घृणा निश्चित रूप से हिंसा से है।

माँसाहार शैली अपवित्र कर्म इसलिए भी माना गया है कि पेटपूर्ती के लिए पर्याप्त शाकाहार उपलब्ध होते हुए भी वे लोग स्वादलोलुपता के कारण हिंसक आचारण अपनाते है और उसे समर्थन भी देते है। शाकाहार, विकृति से संस्कृति की ओर मानव का जीवन उत्थान है इसिलिए इसे शुद्धता और पवित्रता की महत्ता प्राप्त है। अहिंसा व करूणा को प्रोत्साहन देने वाली संस्कृति को भला क्यों न शुद्ध व पवित्र माना जाय?

यहाँ किसी भी तरह के पक्षपात अथवा उँच नीच का प्रश्न ही नहीं उठता। दोनो आहारों, शाकाहार व माँसाहार की मात्र आहारपरक समानता निरा भ्रम है। किंचित भी न्यायसंगत नहीं है, मांसाहार, मासांहारियों के लिये मात्र आहार हो सकता है, मगर एक शाकाहारी की दृष्टि में यह निष्प्रयोजन हिंसा से प्राप्त अनावश्यक आहार है, जो एक दुष्कृत्य है। सम्यक् विवेचन, न्यायसंगत तुलना का विवेक जरूरी है। परिहार्य विकल्प के उपलब्ध रहते मात्र 'आहार स्वतंत्रता' और 'स्वादलोलुप मानसिकता' को प्रशय देना मूर्खता ही नहीं 'मनोविकृति' है। यह मानसिकता पतनोमुख गुनाह है। अपराध से दूरी आत्मसंतोष और गौरव का कारण है।

गुरुवार, 31 मार्च 2011

माँसाहार अर्थात वैश्विक अशान्ति का घर


माँसाहार को अगर "अशान्ति का घर" कहा जाये, तो शायद कुछ गलत नहीं होगा. डा. राजेन्द्र प्रसाद जी नें एक बार कहा था कि-


"अगर संसार में शान्ति कायम करनी है तो उसके लिए दुनिया से माँसाहार को समाप्त करना होगा. बिना माँसाहार पर अंकुश लगाये ये संसार सदैव अशान्ति का घर ही बना रहेगा".


डा. राजेन्द्र प्रसाद जी नें कितनी सही बात कही है. ये कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि माँसाहार के चलते दुनिया में शान्ति कायम नहीं रह सकती. शाकाहारी नीति का अनुसरण करने से ही पृथ्वी पर शान्ति, प्रेम, और आनन्द को चिरकाल तक बनाये रखा जा सकता है, अन्यथा नहीं.

पश्चिमी विद्वान मोरिस सी. किघली का भी कुछ ऎसा ही मानना है. उनके शब्दों में कहा जाए, तो " यदि पृथ्वी पर स्वर्ग का साम्राज्य स्थापित करना है तो पहले कदम के रूप में माँस भोजन को सर्वथा वर्जनीय करना होगा, क्योंकि माँसाहार अहिँसक समाज की रचना में सबसे बडी बाधा है".

आज जहाँ शाकाहार की महत्ता को स्वीकार करते हुए माँसाहार के जनक पश्चिमी राष्ट्रों तक में शाकाहार को अंगीकार किया जाने लगा है, उसके पक्ष में आन्दोलन छेडे जा रहे हैं, जिसके लिए न जाने कितनी संस्थायें कार्यरत हैं. पर अफसोस! भगवान राम और कृष्ण के भक्त, शाकाहारी हनुमान जी के आराधक, भगवान महावीर के 'जितेन्द्रिय', गुरू नानक जी के निर्मल चित्त के चित्तेरे, कबीर के 'अविनाशी' पद को प्राप्त करने की परीक्षा में लगे हुए साधक, महर्षि दयानन्द जी के अहिँसक आर्य समाजी और रामकृष्ण परमहँस के 'चित्त परिष्कार रेखे' देखने वाले इस देश भारत की पावन भूमी पर "पूर्णत: शुद्ध शाकाहारी होटलों" को खोजने तक की आवश्यकता आन पडी है. आज से सैकडों वर्ष पहले महान दार्शनिक सुकरात नें बिल्कुल ठीक ही कहा था, कि-----"इन्सान द्वारा जैसे ही अपनी आवश्यकताओं की सीमाओं का उल्लंघन किया जाता है, वो सबसे पहले माँस को पथ्य बनाता है.". लगता है जैसे सीमाओं का उल्लंघन कर मनुष्य 'विवेक' को नोटों की तिजोरी में बन्द कर, दूसरों के माँस के जरिये अपना माँस बढाने के चक्कर में लक्ष्यहीन हो, किसी अंजान दिशा में घूम रहा हो.......

आईये हम माँसाहार का परिहार करें-----"जीवो जीवस्य भोजनं" अर्थात जीव ही जीव का भोजन है जैसे फालतू के कपोलकल्पित विचार का परित्याग कर "मा हिँसात सर्व भूतानि" अर्थात किसी भी जीव के प्रति हिँसा न करें----इस विचार को अपनायें.

माँस एक प्रतीक है---क्रूरता का, क्योंकि हिँसा की वेदी पर ही तो निर्मित होता है माँस. माँस एक परिणाम है "हत्या" का, क्योंकि सिसकते प्राणियों के प्रति निर्मम होने से ही तो प्राप्त होता है--माँस. माँस एक पिंड है तोडे हुए श्वासों का, क्योंकि प्राण घोटकर ही तो प्राप्त किया जाता है--माँस. माँस एक प्रदर्शन है विचारहीन पतन का, क्योंकि जीवों के प्रति आदर( Reverence of Life) गँवाकर ही तो प्राप्त किया जाता है, माँस.

इसके विपरीत शाकाहार निर्ममता के विपरीत दयालुता, गन्दगी के विपरीत स्वच्छता, कुरूपता के विरोध में सौन्दर्य, कठोरता के विपरीत संवेदनशीलता, कष्ट देने के विपरीत क्षमादान, जीने का तर्क एवं मानसिक शान्ति का मूलाधार है. 

अब ये आप को सोचना है कि क्या आप अब भी माँस जैसे इस जड युगीन अवशेष से अपनी क्षुधा एवं जिव्हा लोलुपता को शान्त करते रहना चाहेंगें....................

गुरुवार, 17 मार्च 2011

सम्वेदनाओं के संरक्षण भाव से बढ़ती है शाकाहार रूचि

हिंसा चाहे धर्म पर अथवा ईश्वर के नाम पर ही क्यों न की जाय, हिंसा, हिंसा ही होती है। हिंसा किसी भी काल में नैतिक नहीं बन सकती, न कभी हिंसा अनुकरणीय हो सकती है। हिंसा का अन्त सदैव प्रतिशोधपूर्ण हिंसा पर ही खत्म होता है। हिंसा किसी भी प्रयोजन से की जाय, कभी भी, किसी के लिए भी कल्याणकारी नहीं हो सकती। हिंसक दृश्य और क्रूर सोच प्रेरित मानसिकता, हमारी मनोवृति पर दुष्प्रभाव ही डालती है। हमारी सम्वेदनाएं शिथिल होती जाती और अन्तः हिंसा हमारे अवचेतन में हमारी विचार, वाणी, स्वभाव में समाहित हो जाती है, जो हमारे व्यवहार व वर्तन में प्रकट होने लगती है।

मानसिक क्रियाओं का मानवीय जीवन-व्यवहार पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। अच्छे बुरे विचार ही व्यक्ति को अच्छा या बुरा बनाते है। व्यवहार शुद्ध बनाने के लिए, विचारों को उत्तरोत्तर शुद्ध बनाया जाना आवश्यक है। बिना किसी जीव की हिंसा किये मांस प्राप्त करना असम्भव है, और ऐसे अभक्ष्य से विरत हुए बिना अहिंसा-भाव को ह्रदय में स्थान देना दुष्कर है। उसीतरह अहिंसा-भाव के अभाव में, दिल से प्रेम, दया और करूणा का झरना बहना नामुमकिन है। हिंसक कृत्यों व मंतव्यो से ही उत्पन्न सामिष अभक्ष्य से हिंसक मनोवृति रूढ़ बन जाना स्वभाविक है।

पिछले दिनों अमेरिका के एक अंतरराष्ट्रीय शोध दल ने इस बात को प्रमाणित किया कि मांसाहार का असर व्यक्ति की मनोदशा पर भी पड़ता है। शोधकर्ताओं ने अपने शोध में पाया कि लोगों की हिंसक प्रवत्ति का सीधा संबंध मांसाहार के सेवन से है। अध्ययन के परिणामों ने इस बात की ओर संकेत दिया कि मांसाहार के नियमित सेवन के बाद युवाओं में धैर्य की कमी, छोटी-छोटी बातों पर हिंसक होने और दूसरों को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

इसलिए अब सहजता से कहे जाते इस कथन का कोई औचित्य नहीं कि ‘जरूरी नहीं मांसाहारी क्रूर प्रकृति के ही हों’। कदाचित न भी हों, पर संभावनाएं अत्यधिक ही होती है। विवेकवान व्यक्ति तो, परिणामो से पूर्व ही सम्भावनाओं पर पूर्णविराम लगाने की सोचता है। हिंसा के प्रति कारूणिक सम्वेदनाओं के अभाव में अहिंसा की मनोवृति प्रबल नहीं बन सकती। यकिनन दयालुतापूर्ण सम्वेदनाएँ, हमें मानवों के प्रति भी सहिष्णु और सम्वेदनशील बनाती है।

बुधवार, 2 मार्च 2011

माँस मनुष्य का भोजन नहीं...

पशु,पक्षी,कीट, पतंगे आदि संसार में जितने भी प्रकार के प्राणी हैं, सब के सब अपने-अपने स्वाभाविक भोजन को भलीभाँती जानते तथा पहचानते हैं. अपने भोजन को छोडकर दूसरे पदार्थों को सर्वदा अभक्ष्य समझते हैं, उनको देखते, सूँघते तक नहीं. अत: अपने आपको सब प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ समझने वाले इस इन्सान से तो अन्य सभी प्राणी कहीं अच्छे हैं. जैसे जो पशु घास खाते हैं, वे माँस की ओर देखते तक भी नहीं और जो माँसाहारी पशु हैं, वे घासफूस की ओर खाने के लिए दृष्टिपात तक नहीं करते. उसी प्रकार कन्द-मूल और फल-फूल भक्षी प्राणी इन पदार्थों को छोडकर घासफूस नहीं खाते. परन्तु यह अभिमानी मनुष्य संसार का एक विचित्र प्राणी है, जिसे भक्ष्य-अभक्ष्य का कोई विचार नहीं, पेय-अपेय की कोई मर्यादा नहीं----खानपान में सर्वदा उच्छ्रंखल, कोई नियम-बंधन नहीं. यह सर्वभक्षी बना हुआ है. पशु-पक्षी-कीट-पतंगें इत्यादि सबको चट कर जाता है. उसने पेट को सभी प्राणियों का कब्रिस्तान बना छोडा है. निरपराध निर्बल प्राणियों को मारकर खाने में इसनें न जाने कौन सी वीरता समझ रखी है. यहाँ मुझे राष्ट्रीय कवि मैथली शरण गुप्त जी की लिखी चार पंक्तियाँ स्मरण हो रही हैं, जिसमें उन्होने इसका अच्छा चित्र खींचा है------
" वीरत्व हिँसा में रहा जो मूल उनके लक्ष्य का
   कुछ भी विचार उन्हे नहीं है आज भक्ष्याभक्ष्य का !
  केवल पतंग विहंगमों में जलचरों में नाव ही,
  बस भोजनार्थ चतुष्पदों में चारपाई बच रही !! "
अर्थात जो अपने शत्रुओं का वध(हिँसा) युद्ध में करके अपनी वीरता दिखाते थे, आज वे भक्ष्याभक्ष्य का कुछ विचार न करके निर्दोष प्राणियों को मारकर अभक्ष्य भोजन करने के लिए अपनी वीरता दिखा रहे हैं. पापी मनुष्य नें सब प्राणी खा लिए, केवल नभचरों में आसमान में उडने वाली पतंग, जल में रहने वालों में लकडी की नाव और चौपायों में केवल एक चारपाई बची है, जिसे वो खा न सका. इन तीनों को छोडकर शेष सबको इसनें अपने पेट में पहुँचा दिया. इसी के फलस्वरूप मनुष्य सभी प्राणियों की अपेक्षा कहीं अधिक रोगी व दु:खी रहता है.
पुरातन काल की बात है, एक बार ऋषियों की शरण में जाकर किसी नें अपनी जिज्ञासा रखी ओर तीन बार प्रश्न किया कि रोग रहित पूर्ण स्वस्थ कौन रहता है ?
प्रश्न:---- कोरूक्, कोरूक्, कोरूक्
             कौन निरोग रहता है ? कौन निरोग रहता है? कौन निरोग रहता है?
उत्तर:--- ऋतभुक्, हितभुक्, मितभुक्
            (1) जो धर्मानुसार भोजन करता है, (2) जो हितकारी भोजन करता है, (3) और जो मितभोजन अर्थात भूख से कुछ कम भोजन (अल्पाहार) करता है।---वह सर्वथा रोगरहित और पूर्णत: स्वस्थ व सुखी रहता है.

माँसाहार कभी धर्मानुसार इन्सान का भोजन नहीं हो सकता. माँसाहारी ऋतभुक नहीं हो सकता क्योंकि बिना किसी प्राणी के प्राण लिए माँस की प्राप्ति नहीं होती और किसी निरपराध को सताना, मारना, उसके प्राण लेना ही हिँसा है और हिँसा से प्रप्त हुई कोई सामग्री भक्ष्य नहीं होती.
हितभुक् जो हितकारी पदार्थों का सेवन करता है, वह हितभुक् सदा स्वस्थ रहता है.
मितभुक् जो भूख रखकर थोडा मिताहार करता है, ऎसा व्यक्ति पूर्णत: स्वस्थ रहता है.
जो लोग ईश्वर नाम की किसी सत्ता पर विश्वास करने वाले हैं, उन्हे भी ये समझना चाहिए कि ईश्वर सभी प्राणियों का पिता है. संसार का हर जीव उसके पुत्र तुल्य है, वह सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य को अपनी अन्य संतानों पशु, पक्षी आदि की हिँसा करके खाने की आज्ञा भला कैसे दे सकता है तथा अपनी संतानों के प्रति की गई हिँसा से कैसे प्रसन्न हो सकात है ? उन लोगों को ये समझना चाहिए कि जो पदार्थ हिँसा से किसी को सताकर, मारकर, छल-कपट, अधर्म से प्राप्त हों, उनका सेवन करना किसी भी प्रकार से इन्सान के लिए हितकारी नहीं हो सकता. 
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी!
 संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातका: !!
सम्मति देने वाला, अंग काटने वाला, मारनेवाला, खरीदनेवाला, बेचनेवाला, पकानेवाला, परोसनेवाला और खानेवाला ये आठ प्रकार के पातक अर्थात कसाई कहे गये हैं. ऎसे हिँसक कसाई अधर्मियों के लोक-परलोक दोनों बिगड जाते हैं. इसलिए हिँसा से बचिए और न केवल अपने अपितु अपनी आने वाली पीढियों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए भी माँसाहार का परित्याग कर शाकाहार को अपनाईये.

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सोमवार, 24 जनवरी 2011

शाकाहार ही क्यों?

जैसे विषयुक्त आहार हमारे शरीर में भयंकर विकार उत्पन्न करता है वैसे ही विकार युक्त विचार भी हमारे मस्तिष्क में प्रविष्ट होकर भयंकर तनाव, दुःख, अशान्ति व असाध्य रोग उत्पन्न करते हैं। अतः यदि आप एक ऊँचा व्यक्तित्व पाना चाहते हो तो आहार एवं विचारों के प्रति प्रतिपल सजग रहना अवश्यक है। व्यक्ति अपने शरीर के प्रति जितनी बेरहमी बर्तता है शायद ही इतनी बेरहमी वह किसी के साथ करता हो।यह देह देवालय, शिवालय है। यह शरीर भगवान् का मन्दिर है। इसे शराब पीकर सुरालय, तम्बाकु आदि खाकर रोगालय और मांसादि खाकर इसे श्मशान या कब्रिस्तान नहीं बनाओ। ऋत्भुक्, मित्भुक् व हितभुक् बनो। समय से, सात्विक, संतुलित व सम्पूर्ण आहार का सेवन कर शरीर को स्वस्थ बनाओ।

जैसे इस दुनिया में हमें जीने का हक है, वैसे ही सृष्टि के अन्य प्राणियों को भी निर्भय होकर, यहां जीने का अधिकार है। यदि हम किसी जीव को पैदा नहीं कर सकते तो उसे मारने का अधिकार हमें किसने दिया । और हम किसी पशु-जीव या प्राणी को मात्र इसलिए मार देते हैं कि ये देखने में हमारे जैसे नहीं लगते। वैसे तो सब प्राणियों के दिल, दिमाग व आँखें होती हैं। इनको दुःख या गहरी पीड़ा होती है। लेकिन हम इसलिए उन्हें मार दें कि उनके पास अपनी सुरक्षा के लिए हथियार नहीं हैं या लोकतन्त्र की नई तानाशाही के इस युग में उन्हें मतदान करने का अधिकार नहीं है। इसलिए उनकी सुरक्षा की सरकारों को दरकार नहीं है। काश! उनको भी हमारे जैसी बोली बोलनी आती तो अपनी पीड़ा व दर्द से शायद वे इन्सान को अवगत करा देते, लेकिन क्या करें, बेचारे इन जीवों को इन्सानी भाषा नहीं आती और हम बेरहमी से निरपराधी, निरीह, मूक प्राणियों की हत्याएं करके खुशियां मनाते हैं और दरिंदगी के साथ कुत्तों एवं भेड़ियों की तरह मांस को नोच-नोचकर खाने में गौरव का अनुभव करते हैं। इससे ज्यादा घोर पाप और अपराध और कुछ नहीं हो सकता। जब बिना निर्दोष प्राणियों की हत्या किए ही शाकाहार से तुम जीवन जी सकते हो तो क्यों अनावश्यक प्राणियों का कत्ल किये जा रहे हो? मनुष्य स्वभाव से ही शाकाहारी है। मानवीय शरीर की संरचना शाकाहारी प्राणी की है, यह एक वैज्ञानिक सत्य है।

शनिवार, 22 जनवरी 2011

शाकाहार : जीवनमूल्य


एक बार जॉर्ज बर्नार्ड शॉ बहुत बीमार हो गए। डॉक्टरों ने उन्हें सलाह दी कि ताकत बढ़ाने के लिए वे मांस खाएं, इससे स्वस्थ रहेंगे और दीर्घायु होंगे। इस पर उन्होंने कहा कि इस राक्षसपन से तो मृत्यु ही उत्तम है। मैंने अपनी वसीयत लिख दी है। मेरी मृत्यु पर मेरी अर्थी के साथ विलाप करती गाड़ियों की आवश्यकता नहीं है। मेरे साथ गायों, बैलों, भेड़ों और मुर्गों का एक काफिला होगा। इन सभी पशु-पक्षियों के गले में सफेद दुपट्टे होंगे, उस दोस्त के शोक में जिसने अपने साथी प्राणियों को खाने की अपेक्षा मरना उत्तम समझा।

निरामिष आहार के 2 रूप हैं- स्थूल एवं सूक्ष्म। स्थूल अर्थ है सिर्फ खाने में मांसाहार का त्याग। पर हम आहार में मांसाहार का त्याग करें, लेकिन मन में अमैत्री का भाव हो, व्यवहार में शोषण हो, वचन में कटुता, रोष और अहंकार हो तो क्या फायदा? जिस प्रकार एक ओर चींटी को चीनी खिलाएँ या मछलियों को तालाब में दाना दें तथा दूसरी ओर बेहिचक मुनाफाखोरी और शोषण करें तो वह अहिंसा का मजाक उड़ाने की तरह है। उसी प्रकार एक तरफ निरामिष आहार का व्रत लेना और दूसरी तरफ धोखा, आडम्बर, विश्वासघात और वैर में लगे रहना एक तरह का पाखंड है।

वास्तव में निरामिष आहार के विचार का विकास, मानव के धार्मिक और आध्यात्मिक विकास का लक्षण है। यदि हमें पाशविकता को खत्म करना है, तो अपने आहार के लिए दूसरे प्राणी का जीवन लेने का मोह भी छोड़ना होगा। निरामिष आहार का दर्शन है- मैत्री भाव। यह एक जीवन मूल्य है, यह एक जीवन शैली है।

 हम लोग जीने के लिए भोजन करते हैं, भोजन के लिए नहीं जीते। आहार एक साधन है, साध्य नहीं। इस दृष्टि से हमें ऐसे ही आहार को अपनाना चाहिए जो हमें पोषण देने के साथ-साथ हमारे वातावरण से भी तादात्म्य स्थापित कर सके। यद्यपि जीवन शास्त्र की दृष्टि से मनुष्य भी पशु जगत का ही एक प्राणी है। फिर भी उसमें बुद्धि और कोमल संवेदनाओं का इतना विकास हुआ है कि वह अपने पशु भाव को संयमित रख पाता है। उसकी यही करुणा उसे अपने आहार के लिए दूसरे प्राणियों के प्राण नहीं लेने की प्रेरणा देती है।

जहाँ एक ओर मानव में क्रूरता का भाव है, वहीं अपरिमित करुणा भी है। वह विकृत होकर विश्व का सबसे बर्बर एवं नृशंस प्राणी बन सकता है और सभ्य होकर करुणा की मूर्ति बन सकता है। आहार जीवन के लिए जरूरत है, किन्तु कैसा भी आहार ग्रहण कर मृत्युंजय नहीं बना जा सकता।

यदि हम विश्व के समस्त प्राणियों की एकता के विचार को स्वीकार करें तो जैसे हमें जीने का अधिकार है, उसी प्रकार अन्य प्राणियों को भी जीने का प्राकृतिक अधिकार है। हर जीव ईश्वर का अंश है, इसलिए वह उतना ही पवित्र है, जितना ईश्वर। यदि हर जीव में ईश्वर का वास है, तब किसी भी जीव का वध एक प्रकार का ईश्वर दोह ही है।

हम अपने को आध्यात्मिक जीव तथा अन्य प्राणियों को अपना आखेट मान लें, यह धर्म नहीं हो सकता। मांसाहार में घृणा के बीज छिपे हैं। निरामिष आहार अहिंसा का आयाम है। कुछ लोग तर्क देते हैं कि सृष्टि में एक व्यापक आहार चक्र है। एक प्राणी दूसरे प्राणी को अपना आहार बनाता है। लेकिन इस तर्क का खंडन करते हुए प्राचीन यूनानी दार्शनिक पाइथोगोरस कहते हैं- बाघ एवं सिंह आदि के लिए आखेट उनकी प्रकृति है, किन्तु मनुष्यों के लिए विलासिता और अपराध है।

यजुर्वेद के प्रथम अध्याय के प्रथम ही मंत्र में कहा गया है, अघ्न्या यजमानस्य पशून पाहि!' अर्थात हे पुरुष, तू इन पशुओं को कभी मत मार और यजमान अर्थात सबके सुख देने वाले जनों के संबंधी पशुओं की रक्षा कर, जिनसे तेरी भी पूरी रक्षा होए। इसलिए श्रेष्ठजन केवल स्वाद के लिए निरीह पशुओं की हिंसा को पाप, अधर्म और बर्बर कृत्य मानते हैं।