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शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

मांसाहार और शाकाहार समान हैं ?

मांसाहार और शाकाहार समान हैं ?

अक्सर सुनती हूँ मैं 
तर्क मांसाहार के सन्दर्भ में 
कि 
शाकाहार और मांसाहार समान हैं। 

क्या सच ?

एक सुखद अनुभूति की
याद है मन में
कॉलेज की खिड़की पर बैठी मैं 
खिड़की से भीतर आती 
सौम्य जीवनदायी वायु।  

गहरी साँसें लेती मैं 
अमृत को भीतर प्रविष्ट होते 
महसूस कर पाती हूँ। 
पौधों की हंसती टहनियाँ 
पेड़ों की झूमती डालियाँ 
दूर तक दिखते ,
नारियल के गर्वित वृक्ष 
जिनसे अनेकानेक बार 
अगणित नारियल तोड़ 
नारियल पानी वाले 
कितने प्यासे राहियों को 
अमृतपान कराते हैं। 
किन्तु वह वृक्ष 
तनिक भी तो कुम्हलाते नहीं ?

उनकी ओर से हवा में 
वही सुगंध 
हर दिन क्यों बिखरती है ?
क्या वे दर्द में हैं ,
अपने फल देकर ?
लगते तो खुश हैं न ?
झूमते नाचते 
रोज़ प्रसन्नता बिखेरते हैं न ?

और एक याद है मन में 
गए थे हम 
अपार्टमेंट्स में फ्लैट खरीदने
सस्ता था उस समय के अनुपात से 
सोचा यह सस्ता है - घर ले लेते हैं। 
गए वहाँ देखने 
पीछे की खिड़की से 
सुनाई दिया अजीब सा कोलाहल 
उस तरफ जाने लगी तो 
एजेंट ने रोका - अजी उधर तो 
"वियु" नहीं है, ना "एलिवेशन" ही 
फिर भी गयी 
दरवाजा खोला तो 
अजब सड़ांध आयी 
और चीखती आवाज़ें 
पूछ ताछ की 
पता चला उधर कत्लखाना है 
पास के बाज़ार में मांस 
ऊंचे दामों बिकता है। 

इसीलिए इस जगह पर 
फ्लैट बिकते नहीं। 
लोग आना नहीं चाहते, 
ना ही किराया अच्छा मिलेगा 

सोचने लगी मैं। 

कहाँ वह नारियल के पेड़ 
और उनसे बरसती सुख शान्ति 
मिलता पीने को अमृत 
सांस लेने को अमृत 
और यहाँ यह ……

क्या सचमुच एक से ही हैं 
मांसाहार और शाकाहार ?

बुधवार, 11 जुलाई 2012

खाद्य शृंखला और निरामिष

खाद्य श्रृंखला

पृथ्वी भिन्न भिन्न प्रकार के जीवों की आश्रय स्थली है जिसमें जटिल वनस्पतियों और प्राणियों से लेकर सरल एककोशीय जीव सम्मिलित हैं। परन्तु चाहे बड़ा हो या छोटा, सरल हो या जटिल, कोई भी जीव अकेला नहीं रहता। हर कोई किसी न किसी रूप में अपने आस-पास स्थित जीवों या निर्जीव पर्यावरण पर निर्भर करता है। यह हमें एक श्रृंखला में जोड़ता है जिसे खाद्य श्रृंखला कहा जाता है।

खाद्य श्रृंखला और उर्जा प्रसारण

श्रृंखला की हर कड़ी पर ऊर्जा का अत्यधिक ह्रास होता है, किसी खाद्य श्रृंखला में एक प्राणी उसे प्राप्त होने वाली ऊर्जा का मात्रा 10 प्रतिशत ही आगे प्रसारित करता है। स्थितिज ऊर्जा का 90 प्रतिशत भाग ऊष्मा के रूप में लुप्त हो जाता है। इसलिए खाद्य श्रृंखला में जितना आगे आप जाएंगे उतनी कम ऊर्जा की उपलब्धता पाएंगे। इससे स्पष्ट होता है कि शाकाहारियों के एक सामान्य आकार के झुण्ड के भरण-पोषण के लिए काफी कम संख्या में वृक्ष और हरियाली की आवश्यकता होती है जबकि कुछ मांसाहारियों का पेट एक शाकाहारियों का सामान्य आकार का झुण्ड भी नहीं पाल सकता है। खाद्य श्रृंखला जितनी प्रत्यक्ष और कम कडी की होगी, जीवों के लिए उतनी अधिक ऊर्जा उपलब्ध होगी।


एक खाद्य श्रृंखला में सामान्यतया निम्न कडि़यां होती हैं:
- मूल या प्रारंभिक उत्पादक
- मूल या प्रारंभिक उपभोक्ता
- द्वितीयक या माध्यमिक उपभोक्ता
- तृतीयक उपभोक्ता
- अपघटक



उत्पादक

उत्पादक अपना भोजन स्वयं तैयार करने में सक्षम होते हैं। स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में उत्पादक सामान्यतः हरे पौधे होते हैं। स्वच्छ जल और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में आमतौर पर शैवाल प्रमुख उत्पादक होते हैं। प्रकृति के चक्र में वनस्पतियां सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। इनके बिना धरा पर जीवन संभव नहीं है। ये प्रारंभिक उत्पादक हैं जो सभी अन्य जीव प्रकारों को कायम रखते हैं। यह इसलिए है कि वनस्पति ही वह जीव है जो अपना भोजन खुद निर्मित कर सकता है। प्राणी, जो भोजन निर्माण में सक्षम नहीं होते, अपनी खाद्य आपूर्ति के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वनस्पतियों पर निर्भर रहते हैं। सभी प्राणी और जो भोजन वे ग्रहण करते हैं, उसे मूल रूप से पौधों से निसृत माना जा सकता है।

जिस ऑक्सीजन को हम सांस के द्वारा लेते हैं वह पौधों से प्राप्त होती है। प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में पौधे सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करते हैं, वायु से कार्बन डाइऑक्साइड लेते हैं तथा मिट्टी से पानी एवं खनिज अवशोषित करते हैं। इसके बाद वे पानी और ऑक्सीजन को मुक्त कर देते हैं। इस चक्र में प्राणी एवं अन्य गैर उत्पादक जीव श्वसन क्रिया के माध्यम से भागीदारी करते हैं। श्वसन वह प्रक्रिया है जिसमें जीव द्वारा भोजन से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ऑक्सीजन का उपयोग किया जाता है और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ी जाती है। प्रकाश संश्लेषण और श्वसन चक्र की मदद से पृथ्वी पर ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और जल का सन्तुलन बरकरार रहता है।

उपभोक्ता

उपभोक्ता वे होते हैं जो अपने भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं। वे या तो सीधे ही मूल उत्पादक पर या अन्य उपभोक्ताओं पर निर्भर रहते हैं। चूंकि शाकाहारी अपना भोजन सीधे उत्पादक से प्राप्त करते हैं, उन्हें प्रारंभिक या प्रथम उपभोक्ता कहा जाता है। जानवर अपना भोजन खुद नहीं बना सकते इसलिए उनके लिए पौधों या अन्य प्राणियों को खाना आवश्यक होता है। उपभोक्ता तीन प्रकार के हो सकते हैं; जो प्राणी सिर्फ और सिर्फ वनस्पति खाते हैं, उन्हें शाकाहारी कहा जाता है, जो प्राणी दूसरे प्राणियों का भक्षण करते हैं, मांसाहारी कहलाते हैं और जो  प्राणी वनस्पति एवं प्राणी दोनों को खाते हैं वे सर्वाहारी कहलाते हैं।

अपघटक

अपघटक वे जीव होते हैं जो अपक्षय या सड़न की प्रक्रिया को तेज करते हैं जिससे पोषक तत्वों का पुनः चक्रीकरण हो सके। ये निर्जीव कार्बनिक तत्वों को अकार्बनिक यौगिकों में तोड़ते हैं। अपघटक खनिज तत्वों को पुनः खाद्य श्रृंखला से जोड़ने के लिए मुक्त करने में सहायक होते हैं जिससे उत्पादक यानि वनस्पतियां इन्हें अवशोषित कर सकें। पोषण तल

वे जीव, जिनका भोजन वनस्पतियों से समान चरणों में प्राप्त होता है, एक पोषण तल या ट्रोफिक लेवल में आते हैं। उत्पादक होने के नाते हरी वनस्पतियां पहले पोषण तल पर आती हैं। शाकाहारी दूसरी मंजिल या तल पर माने जाते हैं। मांसाहारी, जो शाकाहारियों को अपना आहार बनाते हैं, तीसरे पोषण तल पर आते हैं, जबकि मांसाहारी जो मांसाहारियों का ही भक्षण करते हैं, चौथे पोषण तल पर माने जाते हैं। एक प्रजाति अपने आहार के आधार पर एक या एक से अधिक पोषण तल पर मौजूद रह सकती है।

ऊर्जा का पिरैमिड

ऊर्जा का पिरैमिड किसी खाद्य श्रृंखला या जाल में आहार और ऊर्जा के संबंध को दर्शाता है। तीनों पारिस्थितिकीय पिरैमिडों में से ऊर्जा का पिरैमिड प्रजातियों के समूहों की क्रियात्मक प्रकृति का अब तक का सर्वश्रेष्ठ चित्रण प्रस्तुत करता है।

यह समझना आवश्यक है कि खाद्य श्रृंखलाओं और जालों में ऊर्जा पोषण तलों से प्रवाहित होती है और हर अगले तल में ऊर्जा की मात्रा घटती जाती है। अंत में पूरी ऊर्जा नष्ट हो जाती है जिसका अधिकांश भाग ऊष्मा के रूप में लुप्त होता है। पोषक तत्व, हालांकि, खाद्य श्रृंखलाओं में कभी समाप्त नहीं होते और पुनर्चक्रित होते रहते हैं। इस प्रकार के चक्र में जीव, जल, वायुमण्डल और मिट्टी शामिल होते हैं। ये तत्व स्वपोषी जीवों, जिनमें भोजन निर्माण की क्षमता होती है, द्वारा कार्बनिक यौगिकों के साथ समाविष्ट कर दिए जाते हैं जहां से खाद्य जाल के विभिन्न उपभोक्ताओं में से गुजरते हुए पुनः सैप्रोफाइट यानी मृतजीवी (वे जीव जो मृत या सड़े-गले पदार्थों से अपना पोषण प्राप्त करते हैं) द्वारा अकार्बनिक रसायनों के रूप में पुनर्चक्रित कर दिए जाते हैं।

जैव-भूरसायन चक्र

जैव-भूरसायन चक्र मानवीय गतिविधियों से गड़बड़ा सकते हैं और गड़बड़ा रहे हैं। जब हम अवयवों को उनके स्रोत या आश्रय स्थल से जबरदस्ती निकालकर प्रयोग करते हैं तो हम प्राकृतिक जैव-भूरसायन चक्र को अव्यवस्थित कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर, हमने धरती की गहराइयों से हाइड्रोकार्बन ईंधनों को निकालकर और जलाकर स्पष्ट रूप से कार्बन चक्र में बदलाव कर दिया है। हमने नाइट्रोजन और फास्फोरस को कृषि उर्वरकों के रूप में बड़ी मात्रा में प्रयोग कर इनके चक्रों में भी बदलाव पैदा कर दिया है। मात्रा की आधिक्यता ने जल स्रोतों में प्रवेश कर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में भी अतिउर्वरता पैदा कर दी है। इन विशाल, भूमंडलीय चक्रों की सबसे रोचक बात यह नहीं है कि ये लगातार बगैर रूके चलते रहते हैं, बल्कि यह है कि हमें धरती पर उपस्थित जीवन पर उनके प्रभाव का पता भी नहीं चलता है।
प्रस्तुत अंश, जीव-विज्ञानी सुश्री सुकन्या दत्ता की पुस्तक ‘धरा पर जीवन’ के ‘जीवन श्रृंखलाएं और जीवन जाल’ अध्याय से साभार लिया गया है।
सम्पादकीय टिप्पणी-

खाद्य शृंखला के शाकाहार निहितार्थ –

“श्रृंखला की हर कड़ी पर ऊर्जा का अत्यधिक ह्रास होता है”

पेड़ - पौधे प्रथम कड़ी में 'उत्पादक' है शाकाहार श्रेणी में सीधे प्रथम 'उपभोक्ता' स्तर पर ही आहार ग्रहण करने पर उर्जा का भारी अपव्यय बच जाता है।

“जैव-भूरसायन चक्र मानवीय गतिविधियों से गड़बड़ा सकते हैं और गड़बड़ा रहे हैं। जब हम अवयवों को उनके स्रोत या आश्रय स्थल से जबरदस्ती निकालकर प्रयोग करते हैं”

प्रथम 'उपभोक्ता' स्तर पर शाकाहार से सहज निर्वाह होने के उपरांत भी जब हम जबरद्स्ती तीसरे तल पर भी अपना अधिकार जमाते है और मांसाहार ग्रहण करते है तो जैवीय चक्र को अनधिकार गड़बड़ा रहे होते है, अतिक्रमण कर रहे होते है। सीधा प्रबल उर्जा स्रोत प्राप्य होते हुए भी शृंखला में एक और उपभोक्ता कड़ी को बढ़ाकर खाद्य शृंखला को अदृ्श्य आघात पहुँचाते है। उर्जा प्रवाह और उपभोग को असंतुलित कर देते है।

लोग खाद्य शृंखला का तर्क आगे कर मांसाहार को ग्रहणीय साबित करने का अबोध प्रयास करते है जबकि 'उर्जा', 'कड़ी' और 'पिरामिड़-तल' के आधार पर 'खाद्य शृंखला' चीख चीख कर कह रही है, मनुष्य को शीघ्रातिशीघ्र उर्जा का प्राथमिक और मितव्ययी उपभोक्ता हो जाना चाहिए। अर्थात् शाकाहारी बनकर प्रकृति संयम के प्रति निष्ठावान हो जाना चाहिए।

गुरुवार, 28 जून 2012

जीवरक्षा क्यों?

“जीव जीवस्य भोजनम्”, (हर जीव, जीव का भोजन है)


हर जीव किसी दूसरे जीव का भोजन है। एक दृष्टि से यह बात यथार्थ प्रतीत होती है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि अविवेक से जो भी सीधा सहज पशु मिला, उस जीव को अपना भोजन बना लेना चाहिए। मनुष्य स्वयं जंगली माँसाहारी पशुओं का भोजन हो सकता है तो क्या मनुष्य खुद को उन जंगली दरिंदो के आगोश में परोस दे? जैसे मनुष्य को जंगली पशुओं का आहार बनते हुए आतंक महसुस होता है, मनुष्य को सोचना चाहिए कि भयभीत पशुओं को अविवेक से सहज ही अपना आहार बना लेना कहाँ का न्याय है। विवेक को यहाँ सारथी बनाना चाहिए।


“परस्परग्रहो जीवानाम् (प्रत्येक जीवन परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है)


माँसाहारी लोग अपने भोजन के रूप में जिन पशुओं के माँस का सेवन करते हैं वे पशु भी घास आदि खाकर शाकाहार से ही अपना भोजन लेते हैं। यानी पशु जिस भोजन से सीधे तौर पर उर्जा लेते हैं माँसाहारी लोग उसी उर्जा को अप्रत्यक्ष व अनेकगुना क्षय अपव्यय के बाद पाते हैं।उस पर कलंक यह कि कोई जीव जान से चला जाता है। सुखरूप जीना है तो दूसरे जीवों के जीवन का का मार्ग सहज सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी हो जाती है।


"द्विपादव चतुष्पात् पाहि" (अपने अस्तित्व के लिए दो पांव वालों के साथ ही चार पांवो वालो की भी रक्षा कर) "मा हिंस्यात सर्व भूतानि" (किसी भी भूत-प्राणी की हिंसा ना करे.)


भोजन शृंखला में भी पर्यावरण मुख्य मुद्दा है। वास्तव में पर्यावरण की सुरक्षा हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी है। और शाकाहार शैली पर्यावरण सुरक्षा में गहन गम्भीर और अन्तिम उपाय है। अगर हम जीवन शृंखला की बात करते है तो पहले हमें पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना होगा। और पर्यावरण विभिन्न संकेतो से हमें चेतावनी दे रहा है कि हमें समय रहते शाकाहारी हो जाना चाहिए।


"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् ।।" 

(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े ।)

मंगलवार, 5 जून 2012

शाकाहार संकल्प और पर्यावरण संरक्षण (पर्यावरण दिवस पर विशेष)


हरे भरे जीवनदायी ग्रह पर जहां हम निवास करते हैं, वहां से जीवों की कई प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो रही हैं। ऐसा सदियों से होता आ रहा है। कई प्रजातियां इंसान के प्रादुर्भाव से पहले धरती को विदा कह गई, जबकि कई प्रजातियां हमारे सामने विलुप्त हो गई। इंसान के लालच और जरूरत के चलते जिस गति से इन दिनों जंगलों से जैव विविधता नष्ट की जा रही है, उसे देखते हुए लगता है कि जल्दी ही हमारा अस्तित्व ही संकट में आ जाएगा। जिस गति से जंगल और समुद्र जीवों से रीते होते जा रहे हैं, क्या उसका असर समूचे पर्यावरण पर नहीं प़ड रहा है ? जाहिर है कि धरती पर जीवन को सुरक्षित रखना हमारी पहली प्राथमिकता है।

आज दुनिया का अस्तित्व ही संकट में है और संकट का कारण है बिगड़ता पर्यावरण तथा ग्लोबल वार्मिंग। माना जा रहा है कि ग्रीन हाउस गैस ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य कारक है और जानवर ग्रीनहाउस गैस का उर्त्सजन करते है। वास्तव में पशु-पक्षी हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं और इनका आहार के रूप में भक्षण प्रकृति विरोधी है निश्चित तौर पर हर प्रकृति विरोधी बात पर्यावरण विरोधी होती है, जहॉ तक माँसाहार की बात है इसके लिए पशुओ की फार्मिंगं पर्यावरण विरोधी है।

ब्रेंट फोर्ड के सांसद लोर्ड स्टर्न जोर देकर कहते हैं कि शाकाहारी भोजन ही पृथ्वी को विनाश से बचा सकता है। लॉर्ड स्टर्न का तर्क है कि मांसाहार का सेवन करने से जैविक चक्र तो बाधित होता ही है, साथ ही साथ मीट की प्रोसेसिंग में पानी का अनहद उपयोग होता है और ग्रीनहाउस गेसों का उत्सर्जन भी। इससे पृथ्वी के स्रोतों का इस्तेमाल कई गुना बढ जाता है।

शाकाहार से पर्यावरण संरक्षण इस विचारधारा पर आधारित है कि जन उपभोग के लिए मांस उत्पाद और पशु उत्पाद खाद्य पर्यावरण की दृष्टि से अरक्षणीय होते हैं. 2006 में संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर किए गए एक अनुसंधान के अनुसार, दुनिया में पर्यावरण संबंधी की दुर्दशा में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक मवेशी उद्योग है, मांसाहारी खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए आधुनिक तरीकों से पशुओं की तादद बढ़ाने से बहुत ही बड़े पैमाने पर वायु और जल प्रदूषण, भूमि क्षरण, जलवायु परिवर्तन जैव विविधता को नुकसान हो रहा है। निष्कर्ष में यह तथ्य उभर पर आया कि स्थानीय से लेकर वैश्विक प्रत्येक स्तर पर, पर्यावरणीय समस्याओं में सबसे महत्वपूर्ण योगदानकर्ताओं में पशुपालन क्षेत्र का स्थान एकदम से शीर्ष पर दूसरा या तीसरा है।

इसके अलावा, पशु फार्म ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के बड़े स्रोत हैं और दुनिया भर में 18 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जिसे CO2 के समकक्ष मापा गया है, के लिए ये पशु फार्म ही जिम्मेवार है। तुलनात्मक रूप से, दुनिया भर के सभी परिवहनों (जहाजों, सभी की गाड़ियों, ट्रकों, बसों, ट्रेनों, जहाजों और हवाई जहाजों समेत) से उत्सर्जित CO2 का प्रतिशत 13.5 है. पशु फार्म मानव संबंधित नाइट्रस ऑक्साइड का उत्पादन 65 प्रतिशत करता है और सभी मानव प्रेरित मीथेन का प्रतिशत 37 है। जो लगभग 21 गुना अधिक है। मीथेन गैस के ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) की तुलना में कार्बन डाइ ऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड का GWP 296 गुना है।

चारे पर निर्भर पशुओं की तुलना में  अनाज  पर पोषित पशुओं को कहीं अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। यूएसडीए (USDA) के अनुसार, फार्म पशुओं को खिलाने के लिए उगाई फसलों की पैदावार के लिए पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका के लगभग आधी जल आपूर्ति और 80 प्रतिशत कृषि भूमि के पानी की जरूरत होती है. इसके अतिरिक्त, अमेरिका में भोजन के लिए पशुओं को बड़ा करने में 90 प्रतिशत सोया की फसल, 80 प्रतिशत मक्के की फसल और 70 प्रतिशत कुल अनाज की खपत हो जाती है

शाकाहार को बढ़ाने में एक जापानी वैज्ञानिक के प्रयोग भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन प्रयोगों में सिद्ध किया गया है कि एक किलो बीफ के उत्पादन के साथ 36.4 किलो कार्बन डाइऑक्साइड भी उत्पन्न होती है। यह गैस ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसीलिए कहा था कि यदि दुनिया बीफ (गाय का मांस) खाना बंद कर दे तो कार्बन उत्सर्जन में नाटकीय ढंग से कमी आएगी और ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी धीमी हो जाएगी। सौभाग्य की बात है कि भारत में गौमांस (बीफ) का ज्यादा चलन नहीं है। मांस के ट्रांसपोर्टेशन और उसे पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन से भी ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है। इतना ही नहीं, जानवरों के मांस से स्वयं भी कई प्रकार की ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न होती हैं जो वातावरण में घुलकर उसके तापमान को बढ़ाती हैं।

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे संगठन ग्रीनपीस के नीति सलाहकार श्रीनिवास के अनुसार शाकाहार अपनाने से अप्रत्यक्ष तौर पर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है। उनके मुताबिक माँसाहार के अधिक प्रचलन के कारण कहीं न कहीं वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। इसलिए माँसाहार जलवायु परिवर्तन में भूमिका निभा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि माँसाहार का बढ़ता प्रचलन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जलवायु परिवर्तन और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। इससे बचाव और पर्यावरण संतुलन के लिए विशेषज्ञ शाकाहार को अपनाने का सुझाव देते हैं।वास्तव में पर्यावरण की सुरक्षा हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी है। और शाकाहार इसकी एक महत्तवपूर्ण कड़ी है। अगर हम गम्भीरता से पर्यावरण संरक्षण की बात करतें है तो हमें शाकाहारी होना चाहिए।

सोमवार, 12 मार्च 2012

खाद्य शृंखला, विवेकाहारी

खाद्य शृंखला में सभी जीव (organisms) की सामान्यतया तीन कडि़यां होती हैं -
1-उत्पादक
2-उपभोक्ता
3-अपघटक

दूसरे उपभोक्ता के अन्तर्गत खाद्य उपभोग के आधार पर जीव को इन तीन कक्षाओं में वर्गीकृत किया जा सकता हैं।
1-शाकाहारी जीव (Herbivores)
2-माँसाहारी जीव (Carnivores)
3-सर्वाहारी जीव (Omnivores)

शाकाहारी जीव (Herbivores) हिरण, गाय, भैस, बैल, घोडा, हाथी आदि
माँसाहारी जीव (Carnivores) शेर चिता लोमडी भेड़िया आदि
सर्वाहारी जीव (Omnivores) भालू, सुअर (कुछ कुछ कुत्ता बिल्ली भी)आदि

तो मानव की कक्षा क्या है?

सर्वाहारी? खाने को तो मानव कुछ भी खा सकता है, पचा भी लेता है। धूल, काँच, जहर आदि कुछ भी!! पर क्या इस कौतुक भरी आदतों को सामान्य आहर कहकर ग्रहण किया जा सकता हैं? माँसाहार भी मानव का अभ्यास उपार्जित कौशल मात्र ही है। यह प्राकृतिक सहज स्वभाव नहीं है। इसलिए मानव सर्वाहार लेकर भी सर्वाहारी नहीं है।

तो फिर खाद्य उपभोग कक्षा में मानव का स्थान क्या है?

वस्तुतः मानव इन तीनो वर्गों से इतर विशिष्ट वर्ग का जीव है।

वह है “विवेकाहारी (विवेकाचारी) जीव”!!

‘विवेकाहारी’ कैसे?

1-वह विवेक से खाद्य प्रबंध करता है ताकि उर्ज़ा-चक्र और जैव-चक्र बाधित न हो
2-वह विवेक से अपनी भोजन आवश्यकता की पूर्ति के लिए सम्भवतया हिंसा और अहिंसा में से अहिंसक आहार का चुनाव करता है।
3-वह सुपोषण और कुपोषण में अन्तर करके विवेक से अल्प किन्तु सुपोषण अपनाता है।
4-वह सुपाच्य दुपाच्य में चिंतन करके विवेक से सुपाच्य ग्रहण करता है।
5-अपने आहार स्वार्थ की प्रतिपूर्ति से कहीं अधिक, समस्त जीव-जगत के हित हेतु विवेक से संयम को सर्वोपरि स्थान देता है।
6-स्वाद, मनमौज से उपर उठकर विवेक से आरोग्य को महत्व देता है।
7-अल्पकालीन व दीर्घकालीन प्रभावों पर चिंतन करके विवेक से दीर्घकालीन प्रभावों पर क्रियाशील रहता है।

मानव का विवेक उसे निरामिष रहने को प्रेरित करता है। 

बुद्धिमान मनुष्य का वर्गीकरण ‘विवेकाहारी’ (विवेकाचारी) में ही हो सकता है।

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

शाकाहार से प्रकृति और पर्यावरण को लाभ



शाकाहार और मांसाहार को लेकर पिछले कई दशकों से चल रहे विवाद में भले ही दोनों पक्षों के पास अपने अपने प्रबल तर्क हों, लेकिन शाकाहार के पक्ष में यह बात सबसे महत्वपूर्ण साबित होती है कि इसके जरिये प्रकृति और पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की बजाय लाभ होता है। दुनियाभर में शाकाहार को बढ़ावा देने वाली प्रतिष्ठित संस्था ‘पेटा’ की प्रवक्ता बेनजीर सुरैया ने कहा, “भारत शाकाहार का जन्मस्थान रहा है और ‘विश्व शाकाहार दिवस’ के मौके पर हमें शाकाहारी होने पर विचार करना चाहिये। इससे हानिकारक गैसों का उत्पादन रुकेगा और जलवायु परिवर्तन रुकेगा। इसके अलावा आप खुद भी चुस्त दुरुस्त रहेंगे।“

बेनजीर ने बताया कि अध्ययन से पता चला है कि शाकाहारी लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मांस खाने वाले लोगों से ज्यादा मजबूत होती है। इसी तरह शाकाहारी लोगों को दिल से जुड़ी बीमारियां, कैंसर और मोटापा जैसी बीमारियां बहुत ही कम होती हैं। आहार विशेषज्ञ डॉक्टर भुवनेश्वरी गुप्ता ने कहा, “आहार विशेषज्ञ होने के नाते मैं जानती हूं कि मेरे शरीर के लिये शाकाहारी भोजन ही सबसे उत्तम है। मांस, अंडे और डेयरी उत्पाद छोड़ देने से कम वसा, कम कोलेस्ट्राल और बहुत पौष्टिक खाना मिलता है।“

उन्होंने कहा,“भारत में हृदय से जुड़ी बीमारियाँ, मधुमेह और कैंसर के मामले बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं और इसका सीधा संबंध अंडों, मांस और डेयरी उत्पादों जैसे मक्खन, पनीर और आईपीम की बढ़ रही खपत से है।“ भारत में तेजी से बढ़ रहे मधुमेह टाइप 2 से पीड़ित लोग शाकाहार अपना कर इस बीमारी पर नियंत्रण पा सकते हैं और अपना मोटापा भी घटा सकते हैं। शाकाहारी खाने में कोलेस्ट्राल नहीं होता, बहुत कम वसा होती है, और यह कैंसर के खतरे को 40 फीसद कम करता है।“  

बेनजीर ने कहा, “शाकाहारी खाना खाने वाले लोगों में मांस खाने वाले लोगों की तुलना में मोटापे का खतरा एक चौथाई ही रहता है।“ उन्होंने कहा, “खाने के लिये पशुओं की आपूर्ति में बड़े पैमाने पर जमीन, खाद्यान्न, बिजली और पानी की जरूरत होगी।  वर्ष 2010 में संयुक्त राष्ट्र ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जलवायु परिवर्तन को रोकने, प्रदूषण को कम करने, जंगलों को काटे जाने को रोकने और दुनियाभर से भुखमरी को खत्म करने के लिये वैश्विक स्तर पर शाकाहारी भोजन अपनाया जाना जरूरी है।“  डॉक्टर भुवनेश्वरी गुप्ता ने कहा कि एक स्वास्थ्यवर्धक तथा संतुलित शाकाहारी खाने में सभी अनाज, फल, सब्जियां, फलियां, बादाम, सोया दूध और जूस आता है।  यह खाना आपकी दिन प्रतिदिन की विटामिन, कैल्शियम, आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन सी, प्रोटीन और अन्य जरूरतों को पूरा करता है। 

सम्बंधित आलेख

पर्यावरण:  शाकाहार में सुरक्षित है पर्यावरण संरक्षण
पर्यावरण : माँसाहार से ग्लोबल वॉर्मिंग भय
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खाद्य संकट:  यदि अखिल विश्व शाकाहारी हो भी जाय, भरे रहेंगे अन्न भंड़ार
स्वास्थ्य:   कुछ रोग तो माँसाहारियों के लिए आरक्षित है.
पोषक तत्व:  पोषणयुक्त पूर्ण संतुलित शाकाहार

शनिवार, 24 सितंबर 2011

अहिंसा में निहित है पर्यावरण की सुरक्षा




पर्यावरण आज विश्व की गम्भीर समस्या हो गई है। प्रकृति को बचाना अब हमारी ज्वलंत प्राथमिकता है। लेकिन प्राकृतिक सन्तुलन को विकृत करने में स्वयं मानव का ही हाथ है। पर्यावरण और प्रदूषण मानव की पैदा की हुई समस्या है। प्रारम्भ में पृथ्वी घने वनों से भरी थी। लेकिन जनसंख्या वृद्धि और मनुष्य के सुविधाभोगी मानस ने, बसाहट,खेती-बाडी आदि के लिए वनों की कटाई शुरू की। औद्योगिकीकरण के दौर में मानव नें पर्यावरण को पूरी तरह अनदेखा कर दिया। जीवों के आश्रय स्थल उजाड़ दिए गये। न केवल वन सम्पदा और जैव सम्पदा का विनाश किया, बल्कि मानव नें जल और वायु को भी प्रदूषित कर दिया। कभी  ईंधन के नाम पर तो कभी इमारतों के नाम पर। कभी खेती के नाम पर तो कभी जनसुविधा के नाम पर, मानव प्राकृतिक संसाधनो का विनाशक दोहन करता रहा।

वन सम्पदा में पशु-पक्षी आदि, प्राकृतिक सन्तुलन के अभिन्न अंग होते है। प्रकृति की एक समग्र जैव व्यवस्था होती है। उसमें मानव का स्वार्थपूर्ण दखल पूरी व्यवस्था को विचलित कर देता है। मनुष्य को कोई अधिकार नहीं प्रकृति की उस व्यवस्था को अपने स्वाद, सुविधा और सुन्दरता के लिए खण्डित कर दे। अप्राकृतिक रूप से जब इस कड़ी को खण्डित करने का दुष्कर्म होता है, प्रकृति में विनाशक विकृति उत्पन्न होती है जो अन्ततः स्वयं मानव  अस्तित्व के लिए ही चुनौति बन खड़ी हो जाती है। जीव-जन्तु हमारी ही भांति इस प्रकृति के आयोजन-नियोजन का अटूट हिस्सा होते है। वे पूरे सिस्टम को आधार प्रदान करते है। प्रकृति पर केवल मानव का मालिकाना हक़ नहीं है। मानव को समस्त प्रकृति के संरक्षण की शर्तों के साथ ही अतिरिक्त उपयोग बुद्धि मिली है। मानव पर, प्रकृति के नियंत्रित उपयोगार्थ विधानों का आरोपण किया गया है, जिसे हम धर्मोपदेश के नाम से जानते है। वे शर्तें और विधान, यह सुनिश्चित करते है कि सुख सभी को समान रूप से उपलब्ध रहे।

इसीलिए विश्व के सभी धर्मों के प्रणेता व महापुरूष, हिंसा, क्रूरता, जीवों को अकारण कष्ट व पीड़ा देने को गुनाह कहते है। वे प्रकृति के संसाधनों के मर्यादित उपभोग की सलाह देते है। अपरिग्रह का उपदेश देते है। मन वचन काया से संयमित,अनुशासित रहने की प्रेरणा देते है। इसी भावना से वे प्राणी मात्र में अपनी आत्मा सम झलक देखते/दिखलाते है। जब वे कण कण में भगवान होने की बात करते है,तो अहिंसा का ही आशय होता है । सभी को सुख प्रदान करने के उद्देश्य से ही वे यह सूत्र देते है कि ‘आत्मा सो परमात्मा’ या हर जीव में परमात्मा का अंश होता है। यह भी कहा जाता है कि सभी को ईश्वर नें पैदा किया अतः सभी जीव ईश्वर की सन्तान है। इसीलिए जीव-जन्तु, पशु-पक्षियों के साथ दया, करूणा का व्यवहार करनें की शिक्षा दी जाती है। सारी बुराईयां किसी न किसी के लिए पीड़ादायक हिंसा बनती है। अतः सभी सद्गुणों को अहिंसा में समाहित किया जा सकता है। यही धर्म है। यही प्रकृति का धर्म है। यही सुनियोजित जीवन का विधान है। अर्थात्, अहिंसा पर्यावरण का संरक्षण विधान है।

बुधवार, 29 जून 2011

प्राकृतिक संसाधनो का संयत उपभोग मानव का कर्तव्य



मानव सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी है। इस नाते, प्रकृति संरक्षण के प्रति उत्तरदायित्व पूर्वक सोचना भी, मानव का कर्तव्य हो जाता है। उससे कमसे कम यह तो अपेक्षा की ही जाती है कि  वह अपना भोजन प्रबंध कुछ इस प्रकार करे कि, आहार की इच्छा होने से लेकर, उस आहार को ग्रहण करने तक, सृष्टि की जीवराशी कम से कम खर्च हो। आहार संयम ही आहार की ‘संस्कृतिहै। जहां तक सम्भव हो वह प्रकृति के आहार उत्पादों का संयत उपभोग करे। हिंसा में संयम रखते हुए जितना भी हिंसा से बच  सके उसे बचना चाहिये। और क्रूरत्तम हिंसा का तो सर्वथा त्याग करना चाहिए। प्रकृति और अर्थशास्त्र में मितव्ययता का सिद्धांत है कि संसाधनो का विवेक पूर्वक और ज्यादा से ज्यादा दक्षता से उपभोग किया जाय। अर्थात् कम से कम संसाधन खर्च कर अधिक से अधिक उसका लाभ प्राप्त किया जाय। मानव के पास ही वह बुद्धिमत्ता और क्षमता है कि वह उपलब्ध संसाधनो का सर्वोत्तम प्रबंध करने में सक्षम है। 
 


इसलिए आहार का चुनाव करते समय हमें अपने विवेक को वैज्ञानिक अभिगम देना होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि सृष्टि में जीवन विकास, सुक्षम एकेन्द्रिय जीव से प्रारंभ होकर क्रमशः पंचेंद्रिय तक पहुँचा है। ऐसे में यदि हमारा जीवन निर्वाह कम से कम विकसित जीवों (एकेन्द्रिय जीव) की हिंसा से हो सकता है तो हमें कोई अधिकार नहीं हम उससे अधिक विकसित जीवों की आहार के लिए अनावश्यक हिंसा करें। विकास के दृष्टिकोण से पूर्ण विकसित ( पशु) की हिंसाप्रकृति का जघन्य शोषण है। 

प्रकृति के दोहन के परिपेक्ष्य में देखें तो शाकाहार प्रथम स्टेज का भोजन है क्योंकि वनस्पति सूर्य आदि प्रकृतिक संसाधनों से सीधे और स्वयं अपना भोजन बनाती है और अपने भोजन में शाकाहार लेकर हम प्रथम श्रेणी व स्तर का भोजन प्राप्त कर लेते है। जबकि मांसाहार दूसरे स्टेज का भोजन है। मांसाहार में वनस्पति आदि प्राकृतिक संसाधनो का दोहरा ही नहीं, कईं गुना अधिक उपभोग होता है। एक तो हम सीधे शाकाहार से  ही आवश्यक उर्ज़ा प्राप्त करते है, वहीं मांस प्राप्त करने के लिए लगभग 16 गुना अनाज पशु को खिलाना पडता है इतना ही नहीं, साथ ही कईं गुना पानी,समय और संसाधन उस पर व्यय कर दिए जाते है, तब जाकर 1 किलो माँस का प्रबंध हो पाता है।

यदि सभ्यता विकास और शान्त सुखप्रद जीवन ही मानव का लक्ष्य है तो उसे शाकाहार के स्वरूप में प्रकृति के संसाधनों का कुशल प्रबंध करना ही होगा।

मंगलवार, 31 मई 2011

हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है।


हिंसा को कम से कमत्तर (अल्पीकरण) करनें का पुरूषार्थ स्वयं में अहिंसा है। साथ ही यह अहिंसा के मार्ग पर दृढ कदमों से आगे बढने का उपाय भी है अथवा यूँ कहिए कि अल्पीकरण का निरन्तर संघर्ष ही अहिंसा के सोपान है। जब सुक्ष्म हिंसा अपरिहार्य हो, द्वेष व क्रूर भावों से बचते हुए, न्यूनता का विवेक रखना, अहिंसक मनोवृति है। यह प्रकृति-पर्यावरण नियमों के अनुकूल है। बुद्धि, विवेक और सजगता से अपनी आवश्यकताओं को संयत व सीमित रखना अहिंसक वृति की साधना है।

अहिंसा में विवेक के लिये दार्शनिकों ने तीन आयाम प्रस्तुत किए है। पहला आयाम हैं संख्या के आधार पर, जैसे 5 की जगह 10 जीवों की हिंसा दुगुनी हिंसा हुई। दूसरा आयाम है जीव की विकास श्रेणी के आधार पर एक इन्द्रिय, दो इन्द्रिय विकास क्रम के जीवों से क्रमशः तीन, चार अधिक विकसित है और पांच इन्द्रिय जीव पूर्ण विकसित। यह विवेकजन्य व्यवहार, विज्ञान सम्मत और नैतिक अवधारणा से पुष्ट तथ्य है। अत: हिंसा की श्रेणी भी उसी क्रम से निर्धारित होगी। तीसरा आयाम है, हिंस्र भाव के आधार पर। प्रायः अनजाने से लेकर जानते हुए, स्वार्थवश से लेकर क्रूरतापूर्वक तक आदि मनोवृति व भावनाओं की कईं श्रेणी होती है। प्रथम दृष्टि हिंसा पर सोचना होगा कि उसकी भावना करूणा की है, अथवा परमार्थ की?  स्वार्थ की है या अहंपोषण की?  निर्थक उपक्रम है या उद्देश्यपूर्ण?

एक उदाहरण से समझते है- एक लूटेरा घर लूटने के प्रयोजन से, घर के बाहर सुस्ताने बैठे, किसी अन्य व्यक्ति को खतरा मान हत्या कर देता है। दूसरा, एक कारचालक, जिसकी असावधानी से राहगीर उस गाडी के नीचे आ जाता है। तीसरा, एक डॉक्टर, जिसकी ऑपरेशन  टेबल पर जान बचाने के भरसक  प्रयास के बाद भी मरीज दम तोड़ देता है। तीनो किस्सों में मौत तो होती है, पर भावनाएं अलग अलग है। इसलिए दोष भी उन भावों की श्रेणी के अनुसार होना चाहिए। प्रायः न्यायालय में भी, हत्या के आरोपी को स्वबचाव, सहज स्वार्थ और क्रूर घिघौनी मनोवृति के आधार पर सजा निर्धारित होती है।

चित्र: द जैन युनिवर्स
मनोवृति आधारित जैन दर्शन में लेश्याका एक अभिन्न दृष्टांत है। छह पदयात्री जा रहे थे। जोर की भूख लगी थी। रास्ते में एक जामुन का पेड़ दिखाई दिया। एक यात्री बोला- अभी इस पेड़ को जड़ से काट कर सभी का पेट भर देता हूँ। इस पर दूसरा बोला-जड़ से काटने की जरूरत नहीं, शाखा को काट देता हूँ धराशायी होगी तो सभी फल पा लेंगे। तीसरा  व्यक्ति एक टहनी, तो चौथा फलों के गुच्छे को ही पर्याप्त होने की बात करता है। पाँचवा मात्र गुच्छे से फल चुननें की वकालत करता है तो छठा कहता है पक कर जमीन पर बिखरे पड़े जामुनों से ही हमारा पेट भर सकता है। यह मानव मन की मनोवृतियों का,  क्रूरत्तम से शुभत्तम भाव निश्चित करने का एक श्रेष्ठ और दुर्लभ उदाहरण है।

अतः हिंसा और अहिंसा को उसके संकल्प, समग्र सम्यक् दृष्टिकोण, सापेक्षनिर्भर और परिणाम के सर्वांगिण परिपेक्ष्य से ग्रहण करना आवश्यक है।

शुक्रवार, 27 मई 2011

यदि अखिल विश्व शाकाहारी हो जाय तो ??

भ्राँतियाँ पैदा करने वाले माँसाहार समर्थक अकसर यह तर्क देते मिलेंगे कि- 'यदि सभी शाकाहारी हो जाय तो सभी के लिए इतना अन्न कहाँ से आएगा?' इस प्रकार भविष्य में खाद्य अभाव का बहाना पैदा कर, वर्तमान में ही सामुहिक पशु-वध और हिंसा को उचित ठहराना तो दिमाग का दिवालियापन है। जबकि सच्चाई तो यह है कि अगर बहुसंख्य भी शाकाहारी हो जाय तो विश्व में अनाज की बहुतायत हो जाएगी।

दुनिया में बढ़ती भुखमरी-कुपोषण का एक मुख्य कारण माँसाहार का बढ़ता प्रचलन है। माँस पाने ले लिए जानवरों का पालन पोषण देखरेख और माँस का प्रसंस्करण करना एक लम्बी व जटिल एवं पृथ्वी-पर्यावरण को नुकसान पहुचाने वाली प्रक्रिया है। एक अनुमान के मुताबिक एक एकड़ भूमि पर जहाँ 8000 कि ग्रा हरा मटर, 24000 कि ग्रा गाजर और 32000 कि ग्रा टमाटर पैदा किए जा सकतें है वहीं उतनी ही जमीन का उपभोग करके, मात्र 200कि ग्रा. माँस पैदा किया जाता है।

आधुनिक पशुपालन में लाखों पशुओं को पाला-पोषा जाता है। उन्हें सीधे अनाज, तिलहन और अन्य पशुओं का मांस भी ठूंस-ठूंस कर खिलाया जाता है ताकि जल्द से जल्द, ज्यादा से ज्यादा माँस हासिल किया जा सके। औसत उत्पादन का दो-तिहाई अनाज व सोयाबीन पशुओं को खिला दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया की माँस खपत में मात्र 10 प्रतिशत की कटौती प्रतिदिन भुखमरी से मरने वाले 18 हजार बच्चों व 6 हजार वयस्कों का जीवन बचा सकती है।

एक किलो माँस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन का उपभोग हो जाता है। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। एक किलो आलू पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही माँस के लिए 10,000 लीटर पानी व्यय होता है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए अनेकगुना जमीन और संसाधनों का अपव्यय होता है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में झोक दी गई है। यदि माँस उत्पादन में व्यर्थ हो रहे अनाज, जल और भूमि आदि संसाधनो का सदुपयोग किया जाय तो इस एक ही पृथ्वी पर शाकाहार की बहुतायत हो जाएगी।

एक अमेरिकी अनुसंधान से जो आंकडे प्रकाश में आए है उसके अनुसार अमेरिका में औसतन प्रतिव्यक्ति, प्रतिवर्ष अनाज की खपत 1100 किलो है। जबकि भारत में प्रतिव्यक्ति अनाज की खपत मात्र 150 किलो प्रतिवर्ष है जो कि सामान्य है। किन्तु एक अमेरिकन इतनी विशाल मात्रा में अन्न का उपभोग कैसे कर लेता है? वस्तुत: उसका सीधा आहार तो 150 किलो ही है। किन्तु एक अमेरिकन के 1100 किलो अनाज के उपभोग में, सीधे भोज्य अनाज की मात्रा केवल 62 किलो ही होती है, बाकी का 88 किलो हिस्सा माँस होता है। भारत के सम्दर्भ में कहें तो 150 किलो आहार में यह अनुपात 146.6 किलो अनाज और 3.4 किलो माँस होता है।

एक अमेरिकन की औसतन वार्षिक प्रतिव्यक्ति 1100 किलो अनाज की खपत से वह वास्तव में मात्र 62 किलो अनाज का आहार करता है तो बाकि 1038 किलो अनाज कहाँ जाता है? वह 1038 किलो अनाज जाता है मात्र 88 किलो माँस को प्राप्त करनें में । अर्थात् अपनी वार्षिक 1 किलो प्रोटीन की आवश्यकता के लिए एक आम भारतीय अनुमानित 150 किलो अनाज का उपभोग करता है वहीं इसी आवश्यकता को पूरी करने के लिए एक आम अमेरिकन 1100 किलो अनाज को व्यर्थ कर देता है। कोढ में खाज यह कि बेचारे एक निर्दोष जानवर को बिचोलिया बनाकर अपनी मामूली सी प्रोटीन पूर्ती करता है।

एक विशेष तथ्य पर गौर करें। यदि सभी (25 करोड़) अमेरिकन शाकाहारी हो जाय तो मात्र अमेरिका में ही प्रतिव्यक्ति (1100-150= 950) किलो के हिसाब से प्रतिवर्ष 24 करोड़ टन अनाज की बचत हो जाएगी, जो विश्व मे 170 करोड़ लोगों को प्रतिवर्ष भरपेट खिलाने को पर्याप्त होगा। यह आंकडे मात्र अमेरिका के संदर्भ में है। यदि समस्त विश्व के बारे में सोचा जाय तो आंकडे कल्पातीत हो जाएँगे। अगले 100 वर्षों तक विश्व को भूखमरी से निजात दिलायी जा सकती है।

स्पष्ट है कि यदि सभी शाकाहारी हो भी जाय तो निश्चित ही पृथ्वी पर अनाज़ की बहुतायत हो जाएगी। इतनी कि शायद भंडारण के लिए भी हमारे संसाधन कम पड़ जाय।

सोमवार, 16 मई 2011

अनुकंपा भाव की सुरक्षा का उपाय है शाकाहार



येन केन पेट भरना ही मानव का उद्देश्य नहीं है। आहार-भय-निंद्रा-मैथुन तो पशुओं का भी उद्देश्य है। किसी भी प्रकार आहार प्राप्त करना तो विशेष रूप से पशुओं का लक्षण है। और विस्मय तो तब होता है जब शाकाहारी पशु भूखे मर जाते है पर माँस पर मुँह नहीं मारते!! मानव नें प्रकृति प्रदत्त बुद्धि से ही सभ्यता साधी। अपनी विकृत आहार व्यवस्था को मानव ने सुसंस्कृत बनाया। शाकाहार ही वह सुसंस्कृति है। प्रकृति प्रदत्त बुद्धि हमें यह विवेकशीलता भी प्रदान करती है, कि हमारे विचार और व्यवहार सौम्य व पवित्र बने रहे। सभी जीवों के साथ सहजीवन में हम क्रूरता से दूर रहें। समस्त सृष्टि का जीवन सहज और सुखप्रद हो, इसिलिये सभ्यता और संस्कार हमारे लक्ष्य होते है।

जीवन जीने की हर प्राणी में अदम्य इच्छा होती हैं। हम देखते है कि कीट व जंतु भी जीवन टिकाए रखने के लिए, कीटनाशक दवाओं के खिलाफ़ प्रतिकार शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु-रोगाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं के विरुद्ध जीवन बचाने के तरिके खोज लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जीजिविषा का परिणाम होता है। सभी जीना चाह्ते है मरना कोई नहीं चाहता। एसे में प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के लिये मार खाना तो क्रूरता और विकार की पराकाष्ठा है।

हिंसाजन्य आहार लेने से, हिंसा के प्रति सम्वेदनाएं समाप्तप्राय हो जाती है। किसी का जीवन ही गटक जाने की विकृत मानसिकता से दूसरे जीव के प्रति दया करूणा के भाव तिरोहित हो जाते है। अनावश्यक हिंसा-भाव मन में रूढ हो जाते है, और वे हमारे स्वभाव का हिस्सा बन जाते हैं। इस प्रकार क्रूरता हमारे आचरण में समाहित हो जाती है। ऐसी मनोदशा में, हमारे सुखों के विपरित/प्रतिकूल स्थिति उत्पन होनें पर आवेश का आना सहज सा हो जाता है। आवेश में हिंसक कृत्य का हो जाना भी सम्भव है। आहार इसी तरह हमारी मनोस्थिति को प्रभावित करता है।

हमारी सम्वेदनाओं और अनुकंपा भाव के संरक्षण के लिये, हमारे विचार और वर्तन को विशुद्ध रखनें के लिये, शाकाहार हमारी पहली पसंद ही नहीं, नैतिक कर्तव्य होना चाहिए। और फ़िर जहाँ और जब तक हमें सात्विक पौष्ठिक शाकाहार, प्रचूरता से उपलब्ध है, वहां तो इन निरिह जीवों को करूणादान अथवा अभयदान देना ही चाहिए। समस्त जीव-संसार हमारा पडौसी है, उनके अस्तित्व से ही हमारा जीवन टिका हुआ है। मानव मात्र का यह कर्तव्य है जीए और जीने दे।

सहजीवन सरोकार, विवेकयुक्त संयम, सम्वेदनाओं की रक्षा और सात्विक संस्कृति शाकाहार शैली है

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

भुखमरी को बढाते ये माँसाहारी और माँस उद्योग।

भुखमरी, कुपोषण के कई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कारण गिनाए जाते रहे हैं, लेकिन मांसाहार की चर्चा शायद ही कभी होती हो, जबकि वास्तविकता यह है कि दुनिया में बढ़ती भुखमरी-कुपोषण का एक मुख्य कारण मांसाहार का बढ़ता प्रचलन है। इसकी जड़ें आधुनिक औद्योगिक क्रांति और पाश्चात्य जीवन शैली के प्रसार में निहित हैं। दुनिया में यूरोप की सर्वोच्चता स्थापित होने के साथ ही मांसाहारी संस्कृति को बढ़ावा मिलना शुरू हुआ। आर्थिक विकास और औद्योगीकरण ने पिछले दो सौ साल में मांस केंद्रित आहार संस्कृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विकास व रहन-सहन के पश्चिमी माडल के मोह में फंसे विकासशील देशों ने भी इस आहार संस्कृति को अपनाया। इन देशों में जैसे-जैसे आर्थिक विकास हो रहा है वैसे-वैसे मांस व पशुपालन उद्योग फल-फूल रहा है।

गौरतलब है कि 1961 में विश्व का कुल मांस उत्पादन 7.1 करोड़ टन था, जो 2007 में बढ़कर 28.4 करोड़ टन हो गया। इस दौरान प्रति व्यक्ति खपत बढ़कर दोगुने से अधिक हो गई। विकासशील देशों में यह अधिक तेजी से बढ़ी और 20 वर्षो में ही प्रति व्यक्ति खपत दोगुनी से अधिक हो गई। मांस की खपत बढ़ाने में मशीनीकृत पशुपालन तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

उदाहरण के लिए पहले चीन में पोर्क (सूअर का मांस) सिर्फ वहाँ का संभ्रांत वर्ग खाता था, लेकिन आज वहाँ का गरीब तबका भी अपने रोज के खाने में उसे शामिल करने लगा है। यही कारण है कि चीन द्वारा पोर्क के आयात में तेजी से बढ़ोतरी हुई है।

औद्योगिकीकरण व पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव के कारण उन देशों में भी मांस प्रमुख आहार बनता जा रहा है जहाँ पहले कभी-कभार ही मांस खाया जाता था, जैसे भारत। भारत में भी नॉन वेज खाना स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। जिन राज्यों व वर्गों में संपन्नता व बाहरी संपर्क बढ़ा है, उनमें मांस के उपभोग में भी तेजी आई है। इस कारण हमारे ट्रैडिशनल फूड की बड़ी उपेक्षा हुई है। इस क्रम में परंपरागत आहारों की घोर उपेक्षा हुई। पहले गाँवों में कुपोषण दूर करने में दलहनों, तिलहनों, गुड़ की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, लेकिन खेती की आधुनिक पद्धतियों व खानपान में इन तीनों की उपेक्षा हुई। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए विटामिन की गोली दी जाने लगी।

पहले प्राकृतिक संसाधनों पर समाज का नियंत्रण होने से उसमें सभी की भागीदारी होती थी, लेकिन उन संसाधनों पर बड़ी कंपनियों, भूस्वामियों के नियंत्रण के कारण एक बड़ी जनसंख्या इनसे वंचित हुई। शीतल जल के प्याऊ की जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बोतलबंद पानी ने ले ली और वह दूध से भी महंगा बिक रहा है। फार्म एनिमल रिफार्म मूवमेंट के अनुसार अमेरिकी उपभोक्ता मांस की भूख के कारण न केवल पर्यावरण को हानि पहुँँचा रहे हैं, अपितु अमेरिकी आहार आदतें दुनिया भर में फैल रही हैं। विज्ञान व तकनीक का क्षेत्र हो या फैशन, यह धारणा दुनिया भर में फैल गई है कि जो अमेरिका कर रहा है वह ठीक है। मांस की खपत बढ़ाने में मशीनीकृत पशुपालन तंत्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले गाँव-जंगल-खेत आधारित पशुपालन होता था। इस पद्धति में खेती, मनुष्य के भोजन और पशुआहार में कोई टकराव नहीं था। दूसरी ओर आधुनिक पशुपालन में छोटी सी जगह में हजारों पशुओं को पाला जाता है। उन्हें सीधे अनाज, तिलहन और अन्य पशुओं का मांस ठूंस-ठूंस कर खिलाया जाता है ताकि जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा मांस हासिल किया जा सके। इस तंत्र में बड़े पैमाने पर मांस का उत्पादन होता है, जिससे वह सस्ता पड़ता है और अमीर-गरीब सभी के लिए सुलभ होता है।

इस आधुनिक पशुपालन ने प्रकृति व मनुष्य से भारी कीमत वसूल की। इस पशुपालन में पशु आहार तैयार करने के लिए रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, पानी का अत्यधिक उपयोग किया जाता है। सघन आवास, रसायनों और हार्मोन युक्त पशु आहार व दवाइयां देने से पर्यावरण और हमारे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। पशुपालन के इन कृत्रिम तरीकों ने ही मैड काऊ, बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू जैसी नई महामारियाँ पैदा की हैं।

मक्का और सोयाबीन की खेती के तीव्र प्रसार में आधुनिक पशुपालन की मुख्य भूमिका रही है। आज दुनिया में पैदा होने वाला एक-तिहाई अनाज जानवरों को खिलाया जा रहा है, जबकि भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका में दो-तिहाई अनाज व सोयाबीन पशुओं को खिला दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया के मांस खपत में मात्र 10 प्रतिशत की कटौती प्रतिदिन भुखमरी से मरने वाले 18 हजार बच्चों व 6 हजार वयस्कों का जीवन बचा सकती है

मांस उत्पादन में खाद्य पदार्थों की बड़े पैमाने पर बर्बादी भी होती है। एक किलो मांस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन की जरूरत पड़ती है। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। एक किलो आलू पैदा करने में जहाँ मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही मांस के लिए 10,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से मांसाहारी भोजन तैयार करने के लिए काफी जमीन और संसाधनों की जरूरत होती है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में लगा दी गई है। जैसे-जैसे मांस की मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे पशु आहार की खेती बढ़ती जाएगी, और इससे ग्रीनहाउस गैसों में भी तेजी से बढ़ोतरी होगी।
(रमेश कुमार दुबे के लेख का अंश)

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

माँसाहार से ग्लोबल वॉर्मिंग


क्या आप नॉन-वेज खाते हैं?

अगर हां, तो क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा करके आप ग्लोबल वॉर्मिंग बढ़ा रहे हैं? यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है पर दोनों में गहरा संबंध है। हमारी टेबल पर सजा लज़ीज़ मांसाहार हमारे स्वास्थ्य पर चाहे जो प्रभाव डाल रहा हो लेकिन पर्यावरण पर तो इसका बहुत बुरा असर हो रहा है।

फूड ऐंड ऐग्रिकल्चर ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) के अनुसार पशुपालन क्षेत्र ग्लोबल ग्रीन हाउस गैसों में 18 प्रतिशत का योगदान करता है जो कि परिवहन क्षेत्र से अधिक है। पशुपालन के कारण ग्लोबल टेम्प्रेचर भी बढ़ा है। असल में दुनिया भर में चरागाह और पशु आहार की खेती के लिए वनों को काटा जा रहा है। एफएओ के अनुसार लैटिन अमेरिका में 70 प्रतिशत वन भूमि को चरागाह में बदल दिया गया है। पेड़- पौधे कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषक होते हैं। पेड़ों के कम होने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है जिसके कारण तापमान में भी बढ़ोतरी होती है। ऐनिमल वेस्टेज से नाइट्रस ऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैस निकलती है जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 296 गुना जहरीली है। गौ पालन के कारण मिथेन का उत्पादन होता है, जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में तेइस गुना खतरनाक है।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसीलिए कहा था कि यदि दुनिया बीफ (गाय का मांस) खाना बंद कर दे तो कार्बन उत्सर्जन में नाटकीय ढंग से कमी आएगी और ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी धीमी हो जाएगी। सौभाग्य की बात है कि भारत में बीफ का ज्यादा चलन नहीं है। मांस के ट्रांसपोर्टेशन और उसे पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन से भी ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है। इतना ही नहीं, जानवरों के मांस से भी कई प्रकार की ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न होती हैं जो वातावरण में घुलकर उसके तापमान को बढ़ाती हैं।

कोपनहेगन सम्मेलन में साफ हो गया कि कार्बन इमिशन में कटौती पर कानूनी बाध्यताओं को स्वीकार करना फिलहाल संभव नहीं है। यह भी तय हो गया कि इमिशन में स्वैच्छिक कटौती तब तक संभव नहीं होगी जब तक कि जन-जन इसके लिए प्रयास न करे। इस दिशा में मांसाहार में कटौती एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम करने के अन्य उपायों की तुलना में यह सबसे आसान है। क्या हम इसके लिए तैयार हैं?
(रमेश कुमार दुबे के आलेख का अंश)

शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

शाकाहारी बनकर धरती के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभायें

संसार में भुखमरी जैसी गम्भीर समस्याओं के बावजूद मांस व्यवसाय द्वारा अन्न, जल एवम अन्य संसाधनों की बर्बादी सभ्य समाज के लिये सदा ही चिंता का विषय रही है। संयुक्त राष्ट्र संघ के सम्बन्धित संस्थान "भोजन एवम कृषि संघ" ने इस चिंता से कई कदम आगे आकर अपनी रपट  LIVESTOCK'S LONG SHADOW (लाइव्स्टॉक'स लॉंन्ग शेडो - सन 2006) में इस बात पर ज़ोर दिया है कि धरती को हानि पहुंचा रही ग्रीनहाउस गैसों का कम से कम 18% भाग  मांस व्यवसाय द्वारा फैलाया जा रहा है।

इस रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण को अठारह प्रतिशत हानि पहुंचाने वाला यह व्यवसाय विश्व के सकल उत्पादन का केवल डेढ प्रतिशत है। इसके द्वारा धरा को मुख्यतः चार प्रकार से हानि पहुंचाई जा रही है: भूमि, जल, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जैविक हानि।

ध्यान देने योग्य कुछ बिन्दु
9 प्रतिशत :- कार्बन डाइ ऑक्साइड प्रदूषण - परिवहन द्वारा
37 प्रतिशत :- मीथेन गैस प्रदूषण - मांस प्रसंसकरण के बाद सडते अवशेषों से
65  प्रतिशत :- नाइट्रस ऑक्साइड -  मांस प्रसंसकरण के बाद बची गन्दगी से
67  प्रतिशत :- तेज़ाबी बारिश की ज़िम्मेदार अमोनिया गैस
जल हानि :- पीने योग्य जल का 9 प्रतिशत मांस उत्पादन में बर्बाद

मांस के लिये पाले गये पशुओं को खिलाये गये ऐंटिबायटिक, हार्मोन और उनके चारे में प्रयुक्त   ज़हरीले कीटनाशकों द्वारा फैलाया गया प्रदूषण भी विश्व के लिये एक बडा खतरा है। इसके अलावा जंगली पशुओं के रहने योग्य धरती का एक बडा हिस्सा धीरे-धीरे मांस के लिये पाले गये पशुओं के लिये छीना जा रहा है जिससे विश्व के अनेकों अभयारण्य विनाश के कगार पर धकेले जा रहे हैं। हालत यह है कि आजकल विश्व के कुल जैविक भार का पाँचवाँ भाग मांस के लिये पाले गये पशुओं का है।

यह पूरी रिपोर्ट "भोजन एवम कृषि संघ" की वैबसाइट से मूल अंग्रेज़ी में पढी जा सकती है:
पीडीऐफ (19 एमबी)
     

सोमवार, 31 जनवरी 2011

मांसाहार भुखमरी, पर्यावरण और जल की बर्बादी का बड़ा भीषण कारक !


यह जानकारीपूर्ण लेख अभी कुछ दिनों पहले मुझे मेल से मिला था, जो की श्री रमेश जी दुबे द्वारा लिखित है. मेल में इस जानकारी के प्रसार का निवेदन था, इसलिए इस ब्लॉग पर आप से साझा कर रहा हूँ , आशा है हवन व अन्य परम्पराओं को भुखमरी और जल संसाधनों की बरबादी का कारण बतलाने वाले और मांसाहार के पक्ष में ऊल-जुलूल तर्क देने वाले सज्जनों की कुछ आँखे तो खुलेंगी .

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भुखमरी, कुपोषण के कई प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कारण गिनाए जाते रहे हैं, लेकिन मांसाहार की चर्चा शायद ही कभी होती हो, जबकि वास्तविकता यह है कि दुनिया में बढ़ती भुखमरी-कुपोषण का एक मुख्य कारण मांसाहार का बढ़ता प्रचलन है। इसकी जड़ें आधुनिक औद्योगिक क्रांति और पाश्चात्य जीवन शैली के प्रसार में निहित हैं। दुनिया में यूरोप की सर्वोच्चता स्थापित होने के साथ ही मांसाहारी संस्कृति को बढ़ावा मिलना शुरू हुआ। आर्थिक विकास और औद्योगिकीकरण ने पिछले दो सौ वर्षो में मांस केंद्रित आहार संस्कृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विकास व रहन-सहन के पश्चिमी माडल के मोह में फंसे विकासशील देशों ने भी इस आहार संस्कृति को अपनाया। इन देशों में जैसे-जैसे आर्थिक विकास हो रहा है वैसे-वैसे मांस और पशुपालन उद्योग तेजी से फल-फूल रहा है। उदाहरण के लिए 1961 में विश्व का कुल मांस उत्पादन 7.1 करोड़ टन था, जो 2007 में बढ़कर 28.4 करोड़ टन हो गया। इस दौरान प्रति व्यक्ति खपत बढ़कर दोगुने से अधिक हो गई। विकासशील देशों में यह अधिक तेजी से बढ़ी और 20 वर्षो में ही प्रति व्यक्ति खपत दोगुनी से अधिक हो गई। उदाहरण के लिए सुअर का मांस कभी चीन का संभ्रांत वर्ग ही खाता था, लेकिन आज चीन का गरीब व्यक्ति भी अपने दैनिक आहार में मांस को शामिल करने लगा है।
औद्योगिकीकरण व पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव के कारण उन देशों में भी मांस प्रमुख आहार बनता जा रहा है जहां पहले कभी-कभार ही मांस खाया जाता था, जैसे भारत। इस क्रम में परंपरागत आहारों की घोर उपेक्षा हुई। पहले गांवों में कुपोषण दूर करने में दलहनों, तिलहनों, गुड़ की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, लेकिन खेती की आधुनिक पद्धतियों व खानपान में इन तीनों की उपेक्षा हुई। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए विटामिन की गोली दी जाने लगी। पहले प्राकृतिक संसाधनों पर समाज का नियंत्रण होने से उसमें सभी की भागीदारी होती थी, लेकिन उन संसाधनों पर बड़ी कंपनियों, भूस्वामियों के नियंत्रण के कारण एक बड़ी जनसंख्या इनसे वंचित हुई। शीतल जल के प्याऊ की जगह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के बोतलबंद पानी ने ले ली और वह दूध से भी महंगा बिक रहा है। फार्म एनिमल रिफार्म मूवमेंट के अनुसार अमेरिकी उपभोक्ता मांस की भूख के कारण न केवल पर्यावरण को हानि पहुंचा रहे हैं, अपितु अमेरिकी आहार आदतें दुनिया भर में फैल रही हैं। विज्ञान व तकनीक का क्षेत्र हो या फैशन, यह धारणा दुनिया भर में फैल गई है कि जो अमेरिका कर रहा है वह ठीक है। मांस की खपत बढ़ाने में मशीनीकृत पशुपालन तंत्र की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पहले गांव-जंगल-खेत आधारित पशुपालन होता था। इस पद्धति में खेती, मनुष्य के भोजन और पशुआहार में कोई टकराव नहीं था। दूसरी ओर आधुनिक पशुपालन में छोटी सी जगह में हजारों पशुओं को पाला जाता है। उन्हें सीधे अनाज, तिलहन और अन्य पशुओं का मांस ठूंस-ठूंस कर खिलाया जाता है ताकि जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा मांस हासिल किया जा सके। इस तंत्र में बड़े पैमाने पर मांस का उत्पादन होता है, जिससे वह सस्ता पड़ता है और अमीर-गरीब सभी के लिए सुलभ होता है। आधुनिक पशुपालन ने प्रकृति व मनुष्य से भारी कीमत वसूल की। इस पशुपालन में पशु आहार तैयार करने के लिए रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों, पानी का अत्यधिक उपयोग किया जाता है। मक्का और सोयाबीन की खेती के तीव्र प्रसार में आधुनिक पशुपालन की मुख्य भूमिका रही है। आज दुनिया में पैदा होने वाला एक-तिहाई अनाज जानवरों को खिलाया जा रहा है, जबकि भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका में दो-तिहाई अनाज व सोयाबीन पशुओं को खिला दिया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया की मांस खपत में मात्र 10 प्रतिशत की कटौती प्रतिदिन भुखमरी से मरने वाले 18 हजार बच्चों व 6 हजार वयस्कों का जीवन बचा सकती है।
मांस उत्पादन में खाद्य पदार्थो की बड़े पैमाने पर बर्बादी भी होती है। एक किलो मांस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन की जरूरत पड़ती है। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। यह भी एक तथ्य है कि एक किलो आलू पैदा करने में मात्र पांच सौ लीटर पानी की खपत होती है वहीं इतने ही मांस के लिए दस हजार लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चारागाह व पशुआहार तैयार करने में नियोजित है। जैसे-जैसे मांस की मांग बढ़ेगी वैसे-वैसे पशुआहार की सघन खेती की जाएगी, जिससे ग्रीनहाउस गैसों में तेजी से बढ़ोतरी होगी। 



क्या आप नॉन वेज खाते हैं? अगर हां, तो क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा करके आप ग्लोबल वॉर्मिंग    बढ़ा रहे हैं? यह बात थोड़ी अटपटी लग सकती है पर दोनों में गहरा संबंध है। हमारी टेबल पर सजा लज़ीज़ मांसाहार हमारे स्वास्थ्य पर चाहे जो प्रभाव डाल रहा हो लेकिन पर्यावरण पर तो इसका बहुत बुरा असर हो रहा है। असल में पूरी दुनिया में नॉन वेज (मांसाहार) की संस्कृति का प्रसार विश्व पर यूरोपीय वर्चस्व स्थापित करने की भावना से जुड़ा है। आर्थिक विकास और औद्योगीकरण ने पिछले दो सौ साल में नॉनवेज फूड कल्चर को पॉप्युलर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विकासशील देशों ने डिवेलपमेंट व लाइफ स्टाइल के वेस्टर्न मॉडल के मोह में फंस कर इसे अपनाया है। इन देशों में जैसे-जैसे आर्थिक विकास हो रहा है वैसे-वैसे मांस व पशुपालन उद्योग फल-फूल रहा है।

उदाहरण के लिए पहले चीन में पोर्क्स (सूअर का मांस) सिर्फ वहां का संभ्रांत वर्ग खाता था, लेकिन आज वहां का गरीब तबका भी अपने रोज के खाने में उसे शामिल करने लगा है। यही कारण है कि चीन द्वारा पोर्क्स के आयात में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। भारत में भी नॉन वेज खाना स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है। जिन राज्यों व वर्गों में संपन्नता व बाहरी संपर्क बढ़ा है, उनमें मांस के उपभोग में भी तेजी आई है। इस कारण हमारे ट्रैडिशनल फूड की बड़ी उपेक्षा हुई है। पहले गांवों में कुपोषण दूर करने में दलहनों-तिलहनों और गुड़ की    महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, लेकिन आज खेती की आधुनिक पद्धतियों व खानपान में इन तीनों की काफी उपेक्षा हुई है।

गौरतलब है कि 1961 में दुनिया की कुल मांस सप्लाई लगभग 7 करोड़ टन थी जो 2008 में बढ़कर 28 करोड़ टन से भी ज्यादा हो गई। इस दौरान विश्व स्तर पर प्रति व्यक्ति मांस की औसत खपत दोगुनी हो गई।    लेकिन गौर करने की बात है कि विकासशील देशों में यह अधिक तेजी से बढ़ी और मात्र 20 साल में ही प्रति    व्यक्ति खपत दोगुने से अधिक हो गई। मांस की खपत बढ़ाने में मशीनीकृत पशुपालन तंत्र की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

हमारे यहां पहले भी पशुपालन होता था, लेकिन वह गांव-जंगल और खेती पर आधारित होता था। उसकी उत्पादकता कम थी, इसलिए वह महंगा पड़ता था। मगर इसका लाभ यह था कि इस पद्धति में खेती, मनुष्य के भोजन और पशु आहार में कोई टकराव नहीं होता था। आधुनिक पशुपालन में छोटी सी जगह में हजारों पशुओं को पाला जाता है। उन्हें सीधे अनाज, तिलहन और अन्य पशुओं का मांस ठूंस-ठूंसकर खिलाया जाता है, ताकि जल्द से जल्द उनसे ज्यादा से ज्यादा मांस हासिल किया जा सके। इससे बड़े पैमाने    पर मीट का उत्पादन होता है, जिससे वह सस्ता पड़ता है।

इस आधुनिक पशुपालन ने प्रकृति व मनुष्य से भारी कीमत वसूल की है। इसमें पशु आहार तैयार करने के लिए रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों तथा पानी का अत्यधिक उपयोग किया जाता है। इससे पानी का संकट, वायु व जल प्रदूषण, मिट्टी की उर्वरा शक्ति में गिरावट जैसी स्थितियां पैदा हो रही हैं। मक्का और सोयाबीन की खेती के तीव्र प्रसार में आधुनिक पशुपालन की मुख्य भूमिका रही है। आज दुनिया में पैदा होने    वाला एक-तिहाई अनाज जानवरों को खिलाया जा रहा है, ताकि उनका मांस खाया जा सके, जबकि दूसरी तरफ भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अमेरिका में तो दो-तिहाई अनाज व सोयाबीन    पशुओं को खिला दिया जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार दुनिया की मांस खपत में मात्र 10 प्रतिशत की कटौती प्रतिदिन भुखमरी से मरने वाले 18000 बच्चों व 6000 वयस्कों का जीवन बचा सकती है। सघन आवास, रसायनों और हार्मोन युक्त पशु आहार व दवाइयां देने से पर्यावरण और हमारे स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ा है। पशुपालन के इन कृत्रिम तरीकों ने ही मैड काऊ, बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू जैसी नई महामारियां पैदा की हैं। मांस उत्पादन में खाद्य पदार्थों की बड़े पैमाने पर बर्बादी भी होती है। एक किलो मांस पैदा करने में 7 किलो अनाज या सोयाबीन की जरूरत पड़ती है। अनाज के मांस में बदलने की प्रक्रिया में 90 प्रतिशत प्रोटीन, 99 प्रतिशत कार्बोहाईड्रेट और 100 प्रतिशत रेशा नष्ट हो जाता है। एक किलो आलू पैदा करने में जहां मात्र 500 लीटर पानी की खपत होती है, वहीं इतने ही मांस के लिए 10,000 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। स्पष्ट है कि आधुनिक औद्योगिक पशुपालन के तरीके से भोजन तैयार करने के लिए काफी जमीन और संसाधनों की जरूरत होती है। इस समय दुनिया की दो-तिहाई भूमि चरागाह व पशु आहार तैयार करने में लगा दी गई है। जैसे-जैसे मांस की मांग बढ़ेगी, वैसे-वैसे पशु आहार की खेती बढ़ती जाएगी, और इससे ग्रीनहाउस गैसों में तेजी से बढ़ोतरी होगी।

फूड ऐंड ऐग्रिकल्चर ऑर्गनाइजेशन (एफएओ) के अनुसार पशुपालन क्षेत्र ग्लोबल ग्रीन हाउस गैसों में 18 प्रतिशत का योगदान करता है जो कि परिवहन क्षेत्र से अधिक है। पशुपालन के कारण ग्लोबल टेम्प्रेचर भी बढ़ा है। असल में दुनिया भर में चरागाह और पशु आहार की खेती के लिए वनों को काटा जा रहा है। एफएओ के अनुसार लैटिन अमेरिका में 70 प्रतिशत वन भूमि को चरागाह में बदल दिया गया है। पेड़- पौधे कार्बन डाइऑक्साइड के अवशोषक होते हैं। पेड़ों के कम होने से वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ती है    जिसके कारण तापमान में भी बढ़ोतरी होती है। ऐनिमल वेस्टेज से नाइट्रस ऑक्साइड नामक ग्रीनहाउस गैस निकलती है जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में 296 गुना जहरीली है। गौ पालन के कारण मिथेन का उत्पादन होता है, जो कि कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में तेइस गुना खतरनाक है।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसीलिए कहा था कि यदि दुनिया बीफ (गाय का मांस) खाना बंद कर दे तो कार्बन उत्सर्जन में नाटकीय ढंग से कमी आएगी और ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी धीमी हो जाएगी। सौभाग्य की बात है कि भारत में बीफ का ज्यादा चलन नहीं है। मांस के ट्रांसपोर्टेशन और उसे पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन से भी ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है। इतना ही नहीं, जानवरों के मांस से भी कई प्रकार की ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न होती हैं जो वातावरण में घुलकर उसके तापमान को बढ़ाती हैं।

कोपनहेगन सम्मेलन में साफ हो गया कि कार्बन इमिशन में कटौती पर कानूनी बाध्यताओं को स्वीकार करना फिलहाल संभव नहीं है। यह भी तय हो गया कि इमिशन में स्वैच्छिक कटौती तब तक संभव नहीं होगी जब तक कि जन-जन इसके लिए प्रयास न करे। इस दिशा में मांसाहार में कटौती एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। ग्रीन हाउस उत्सर्जन कम करने के अन्य उपायों की तुलना में यह सबसे आसान है। क्या हम इसके लिए तैयार हैं? 
लेखक - रमेश कुमार दुबे

मंगलवार, 25 जनवरी 2011

सर्वोत्तम है शाकाहार

कहते है कि हमारे अच्छे विचारों के लिए कुछ हद तक हमारा आहार भी जिम्मेदार होता है। इसलिए मनुष्य यदि अपने आहार को दुरुस्त रखे, तो उसके विचार भी अच्छे होंगे। और अच्छे विचारों से ही हमारी उन्नति संभव है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमारे लिए कौन-सा आहार उचित हो सकता है? दरअसल, मानव शरीर के लिए शाकाहार ही सर्वोत्तम है।

 वैज्ञानिकों के अनुसार, हमारे पाचन तंत्रों की बनावट शाकाहार के अनुकूल है। वहीं दूसरी ओर, हमारे वेद, पुराण, गीता, कुरान, गुरुग्रंथ साहिब और दूसरे धर्म ग्रंथों में हमें दूसरे जीवों के प्रति करुणा और दया का भाव रखने की सलाह दी गई है। सच तो यह है कि परमात्मा की सृष्टि से प्रेम करना परमात्मा से प्रेम करने के समान है। यदि आप चाहते है कि ईश्वर हम पर दया और कृपा करता रहे, तो आपको भी उन प्राणियों के प्रति प्रेम और दया की दृष्टि रखनी होगी, जिन्हे परमात्मा ने बनाया है। बहुत पुरानी कहावत है-जैसा पिएं पानी, वैसी बने वाणी। जैसा खाएं अन्न, वैसा बने मन। इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे मन पर आहार का बहुत प्रभाव पड़ता है।

सच तो यह है कि मांसाहार का सेवन करने वाले व्यक्ति का मन पवित्र हो ही नहीं सकता है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जीवों के प्राणों का अंत कर उसे खाने वाले मनुष्यों पर ईश्वर की कृपा दृष्टि नहीं होती। महर्षि दयानंद के अनुसार, मांसाहार से मनुष्य का स्वभाव हिंसक हो जाता है। गीता में भोजन की तीन श्रेणियां बताई गई है। सात्विक भोजन- फल, दालें, अनाज, मेवे, दूध, मक्खन आदि। इनसे मनुष्यों में सुख, शांति, दया, अहिंसा और करुणा का भाव बढ़ता है। राजसी भोजन में तीखे, गर्म, कड़वे, खट्टे और मिर्च-मसाले वाले भोजन आते है। इनसे जलन पैदा होती है। इस तरह का भोजन दुख, रोग और चिन्ता बढ़ाने वाला होता है। तामसिक भोजन- बासी, अधपक्व, दुष्पक्व, दुर्गध वाले, नशीले, मांसाहार आदि। ऐसे आहार गंदे संस्कारों की तरफ ले जाते है। हमारी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, शरीर में अनेक बीमारियां उत्पन्न होती है और आलस्य बढ़ता है। इससे यह पता चलता है कि सात्विक आहार ही हमारे लिए सर्वोत्तम है।

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंसटीन कहते थे कि शाकाहार का हमारी प्रकृति पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि दुनिया शाकाहार अपना ले, तो हिंसा होने की गुंजाइश ही खत्म हो जाए। महान दार्शनिक जॉर्ज बर्नाड शॉ ने लिखा है, 'हम मांस खाने वाले चलती-फिरती कब्रों के समान हैं, जिनमें कई जानवरों की लाशें दफन हैं।'

भारत में भी कई संत और दार्शनिक हुए है, जिन्होंने मांसाहार को जहरीला या राक्षसी आहार कहा है और उनसे दूर रहने की हिदायत दी है। महान दार्शनिक और संत तिरुवल्लुवर ने कहा है कि उस मनुष्य में दया की भावना कैसे आ सकती है, जो अपना मांस बढ़ाने के लिए दूसरे जीव-जंतुओं का मांस खाता है? गुरुनानक देव ने भी मांसाहार को सर्वथा त्याज्य बताया है। इसके अलावा, महाकवि शैले, जो महान शाकाहारी थे, ने कहा है कि इनसान जब जीव-जंतुओं का सेवन करने लगता है, तो वह उन नीच जानवरों की श्रेणी में आ जाता है, जो स्वभावत: मांसाहारी और क्रूर होते हैं। इसलिए मांसाहार को पाप और अपराध के लिए जिम्मेदार बताया गया है। इसके बावजूद भी यदि हम मांस खाते है, तो यह हमारी मूर्खता होगी। सच तो यह है कि यदि आप चाहते है कि आपका मन पवित्र हो और आपके विचार सर्वोत्तम हों, तो आपको आज से ही मांसाहार का परित्याग कर देना चाहिए।