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गुरुवार, 14 मार्च 2013

निरामिष परिचय

निरामिष शब्दार्थ व भावार्थ:-

निरामिष : मांसरहित (fleshless)

निरामिष आहार : ऐसा खाद्य पदार्थ या भोजन जिसमें आमिष अर्थात् मांस या सामिष अर्थात् मांस के अंश या मांस स्वरूप अंडा या मछली न मिला हो।

निरामिष व्यक्ति : जो मांस, अंडा, मछली आदि न खाता हो।

अर्थात्, निरामिष आहार एक ऐसा शाकाहार है जिसमें दुग्ध पदार्थ सम्मलित है। शाकाहार के आधुनिक श्रेणी में हम निरामिष आहार को लैक्टो-शाकाहार ( lacto-vegetarian ) कह सकते है। परम्परागत भारतीय संदर्भ में शुद्ध शाकाहार या सात्विक आहार का आशय “निरामिष” आहार से ही है। अर्थात वह आहार जिसमें किसी भी प्रकार के मांस या मांस-व्युत्पन्न पदार्थ, अंडा मछली आदि उत्पाद शामिल न हो।

प्रारंभिक काल से ही निरामिष आहार घनिष्ठ रूप से प्राणियों के प्रति अहिंसा व अनुकम्पा से जुड़ा हुआ है। अहिंसा के जीवन मूल्यों में प्रत्येक जीवन के प्रति आदर व्यक्त हुआ है। अहिंसा में दया का सद्भाव है, जो प्राणीमात्र के लिए शान्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

जीवदया का मार्ग निरामिष आहार से प्रशस्त होता है। मनुष्य के हृदय में तब तक अहिंसा भाव परिपूर्णता से स्थापित नहीं हो सकता जब तक उसमें निरीह जीवों की हत्या कर मांसाहार करने का जंगली संस्कार विद्यमान हो। जब मात्र स्वाद और पेट्पूर्ती के लिए मांसाहार का चुनाव किया जाता है तो मांसाहार के उद्देश्य से प्राणी हत्या, मानस में क्रूर भाव का आरोपण करती है जो निश्चित ही हिंसक मनोवृति के लिए जवाबदार है। मांसाहार द्वारा कोमल सद्भावनाओं का नष्ट होना व स्वार्थ व निर्दयता की भावनाओं का पनपना आज विश्व में बढ़ती हिंसा, घृणा व अपराधों का मुख्य कारण है। जीवदया और करूणा भाव हमारे मन में कोमल सम्वेदनाओं को स्थापित करते है। यही सम्वेदनाएं हमें मानव से मानव के प्रति भी सम्वेदनशील बनाए रखती है। शाकाहार मानवीय जीवन-मूल्यों का संरक्षक है। आज संसार में यदि शान्ति लक्षित है तो समस्त मानव समाज को निरामिष आहार अपना लेना चाहिए। क्योँकि अहिंसा ही शान्ति और सुख का अमोघ उपाय है।

मांसाहार में कोमल भावनाओं के नष्ट होने की संभावनाएं अत्यधिक ही होती है। हर भोजन के साथ उसके उत्पादन और स्रोत पर चिंतन हो जाना स्वभाविक है। हिंसक कृत्यों व मंतव्यो से ही उत्पन्न माँस, हिंसक विचारों को जन्म देता है। ऐसे विचारों का बार बार चिंतवन, अन्ततः परपीड़ा की सम्वेदनाओं को निष्ठुर बना देता है। हिंसक दृश्य, निष्ठुर सोच और परपीड़ा को सहज मानने की मानसिकता, हमारी मनोवृति पर दुष्प्रभाव डालती है। भले यह मात्र सम्भावनाएँ हो, इन सम्भावनाओं देखते हुए,  सावधानी जरूरी है कि घटित होने के पूर्व ही सम्भावनाओं पर ही लगाम लगा दी जाय। विवेकवान व्यक्ति परिणामो से पूर्व ही सम्भावनाओं पर पूर्णविराम लगाने का उद्यम करता है। हिंसा के प्रति जगुप्सा के अभाव में अहिंसा की मनोवृति प्रबल नहीं बन सकती।


“निरामिष” ब्लॉग, शाकाहार के प्रसार, प्रचार और जागृति को समर्पित एक सामुदयिक ब्लॉग है। “निरामिष”, स्वस्थ समाज निर्माण के उद्देश्य के प्रति निष्ठावान है। "निरोगी काया, निर्विकार मन, निरामय समाज।" हमारा नीति – वाक्य है। 'निरामिष ब्लॉग', तथ्यनिष्ठ, प्रमाणिक और विश्वसनीय जानकारी प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

सोमवार, 5 नवंबर 2012

क्या मांसाहार में कोई शक्ति है?

माँसाहार से आने वाले क्षणिक आवेश और उत्तेजना को उत्साह और शक्ति मान लिया जाता है। जबकि वह आवेग मात्र होता है विशिष्ट खोजों के द्वारा यह भी पता चला है कि जब किसी जानवर को मारा जाता है तब वह आतंक व वेदना से भयभीत हो जाता है उसका शरीर मरणांतक संघर्ष करता है परिणामस्वरूप उत्तेजक रसायन व हार्मोन उसके सारे शरीर में फैल जाते हैं और वे आवेशोत्पादक तत्व मांस के साथ उन व्यक्तियों के शरीर में पहुँचते हैं, जो उन्हें खाते हैं।

दिल्ली के राकलैंड अस्पताल की मुख्य डायटीशियन सुनीता कहती हैं कि माँसाहार के लिए जब पशुओं को काटा जाता है तो उनमें कुछ हार्मोनल बदलाव होते हैं। ये हार्मोनल प्रभाव माँसाहार का सेवन करने वालों के शरीर में भी पहुँच जाते हैं।

जीव या पशु संरचना पर ध्यान देने पर हम देखते हैं कि सर्वाधिक शक्तिशाली, परिश्रमी, व अधिक सहनशीलता वाले पशु जो लगातार कई दिन तक काम कर सकते हैं, जैसे हाथी, घोडा, बैल, ऊँट, आदि सब शाकाहारी होते हैं। इग्लेंड में परीक्षण करके देखा गया है कि स्वाभाविक माँसाहारी शिकारी कुत्तों को भी जब शाकाहार पर रखा गया तो उनकी बर्दाश्त शक्ति व क्षमता में वृद्धि हुई।
मांसाहार में कोई शक्ति नहीं, वह अल्पकालिक आवेश मात्र है।

बुधवार, 18 जनवरी 2012

शाकाहार पर ‘निरामिष’ की तथ्यनिष्ठा


निरामिष सामूहिक ब्लॉग मानवीय जीवन के पोषण और स्वास्थ्य विषय की सम्वेदनशीलता के प्रति पूर्ण सचेत और निष्ठावान है। मानवीय पोषण और स्वास्थ्य मामलों पर लिखते हुए हम अति सम्वेदनशील होते है, स्थापित वैज्ञानिक तथ्यों व सन्दर्भों के साथ ही जानकारी प्रस्तुत करना हमारी निष्ठा है क्योंकि मामला जब मानव स्वास्थ्य का होता है तो इसकी गम्भीरता के प्रति अतिरिक्त सजग रहना हमारा कर्तव्य है। इसीलिए पोषण और स्वास्थ्य के प्रति फैलाई जा रही भ्रांतियों का खण्डन भी हमारे लिए परम् आवश्यक है। मानव पोषण व स्वास्थ्य के साथ किसी भी तरह की खिलवाड़ नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। मात्र तर्क जीतना  हमारा लक्ष्य नहीं है,  कभी तार्किक तथ्य परास्त भी हो जाय, पर अवैज्ञानिक धारणाओ का सहारा लेकर बात बचाना हमारा ध्येय नहीं है ।

यह स्थापित सत्य  है कि शक्ति, ऊर्जा, पोषण, स्वास्थ्य और मानवता की दृष्टि से शाकाहार जीवन शैली सर्वोत्कृष्ट है।

ऐतिहासिक शोध साक्ष्यों और स्थापित विकास मॉडल के आधार पर भी शाकाहार, विकसित सभ्य खाद्याचार सिद्ध है। नवीनतम पर्यावरणीय संशोधनों के अनुसार शाकाहार निश्चित ही सर्वश्रेष्ठ पर्यावरण मित्र  है।

विभिन्न मूल धार्मिक उपदेश,  धर्मग्रंथो के सत्यनिष्ठ भावार्थ और करूणा प्रधान धर्म-सिद्धांत, शाकाहारी जीवन शैली को ही उपादेय सुनिश्चित करते है।

मानव जीवन में करूणा, अहिंसा और सम्वेदनाओं की अनिवार्यता पर कोई विशिष्ठ वैज्ञानिक शोध उपलब्ध नहीं है। किन्तु सर्वजग में शान्ति, और सहजीवन सहकारिता के लिए अहिंसा, करुणा, और सम्वेदनाओं की आवश्यकता सर्वोपरि है। सम्पूर्ण मानव सभ्यता के अनुभवजन्य ज्ञान से भी करुणा, अहिंसा और सम्वेदनाओं की पूर्णरूपेण ज्वलंत आवश्यकता निश्चित है। अतः करुणा, अहिंसा और सम्वेदनाओं में विकास के लिए शाकाहारी जीवन मूल्यों को स्थापित करना अपरिहार्य है।

आप हमारे आलेखों का सन्दर्भ निर्भयता के साथ दे सकते हैं क्योंकि प्रत्येक आलेख की प्रमाणिकता की यथासम्भव जाँच की गयी है और हमारे आलेखों में केवल विश्वसनीय जानकारी को ही लिया गया है।
सभी आलेखों का सर्वाधिकार “निरामिष” व लेखकों के पास सुरक्षित है। किसी भी रूप में पुनर्प्रकाशन से पहले अनुमति एवं प्रकाशन पर सन्दर्भ देना आवश्यक है।

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

कॉलेस्टरॉल किस चिड़िया का नाम है?

कॉलेस्टरॉल प्राणियों के शरीर में निर्मित होने वाला एक दानेदार रासायनिक पदार्थ (स्टैरॉल, ऐल्कोहल) है। कॉलेस्टरॉल के अणु प्राणियों के शरीर में कई प्रक्रियाओं के लिये अनिवार्य घटक हैं। इसके कुछ उपयोग निम्न हैं:
  • विटामिन डी का निर्माण
  • वसा-पाचन के अम्लों का निर्माण
  • कोशिका-भित्ति के सामान्य कार्य-निष्पादन
  • कई हार्मोनों का निर्माण

मानव शरीर में कॉलेस्टरॉल वसा में घुलनशील प्रोटीन (लिपोप्रोटीन) के रूप में हमारे रक्त में प्रवाहित होता है। घनत्व के अनुसार इसके सामान्यतः दो प्रकार होते हैं अल्प-सान्द्र (कम घनत्व = LDL=Low-density lipoprotein; बुरा) कॉलेस्टरॉल व अति-सान्द्र (अधिक घनत्व = HDL=high-density lipoprotein; अच्छा) कॉलेस्टरॉल। लहू में अल्प-सान्द्र कॉलेस्टरॉल का आधिक्य हृदयरोग का कारक बनता है जबकि अति-सान्द्र कॉलेस्टरॉल हृदय को स्वस्थ रखने में सहायता करता है।

अमेरिकी स्वास्थ्य प्रक्रिया में 20 वर्ष से अधिक आयु के व्यक्तियों को पाँच वर्ष में कम से कम एक बार कॉलेस्टरॉल की जाँच कराने की सलाह दी जाती है। और कॉलेस्टरॉल के आधिक्य की स्थिति में इसकी मात्रा की और यकृत (जिगर/लिवर) की वार्षिक जाँच की सलाह है।

कॉलेस्टरॉल वनस्पति जगत में नहीं पाया जाता। हमारे शरीर में कॉलेस्टरॉल की उपस्थिति के दो कारण हो सकते हैं, एक सामिष भोजन और दूसरा आंतरिक निर्माण। मांसाहार से शरीर में आने वाला अधिकांश कॉलेस्टरॉल अल्प-घनत्व वाला, हानिप्रद होता है। शाकाहारी भोजन करने से हम इस प्रकार के हानिप्रद कॉलेस्टरॉल के आगमन से पूर्णतया बच सकते हैं। मांसाहार तो वैसे ही कॉलेस्ट्रॉल के लिये बुरा है पर उसमें भी जिगर आदि अंग तो विशेषरूप से कॉलेस्टरॉल से लदे होते हैं।

कॉलेस्टरॉल का दूसरा स्रोत हमारा शरीर है। फल, सब्ज़ी, संतुलित भोजन, व्यायाम और शारीरिक गतिविधियों द्वारा हम शरीर में अच्छे कॉलेस्टरॉल के निर्माण की प्रक्रिया को बढा सकते हैं। इसके उलट मांसाहार, तला भोजन और आरामतलब जीवनशैली हमारे शरीर में भी बुरे कॉलेस्टरॉल की मात्रा बढाती है। कॉलेस्टरॉल के मामले में शाकाहारी भोजन एक दुधारी तलवार है। एक ओर तो यह स्वयं कॉलेस्टरॉल-मुक्त होता है। वहीं, दूसरी ओर इसमें उपस्थित रेशे (fibers) शरीर में बनने वाले कॉलेस्टरॉल को भी पाचन तंत्र द्वारा अवशोषित होने से रोकते हैं।
निरामिष, सात्विक, शाकाहार पूर्णतया कॉलेस्टरॉल-मुक्त होता है।
कुल कॉलेस्टरॉल की स्वस्थ मात्रा 200 mg/dL (मिलिग्राम प्रति डेसिलीटर) के नीचे मानी जाती है। 240 mg/dL से अधिक कॉलेस्टरॉल खतरनाक है। एलडीएल (बुरा) की मात्रा 70 mg/dL से कम होनी चाहिये। एचडीएल (अच्छा) की मात्रा पुरुषों के लिये 40 mg/dL से ऊपर व महिलाओं के लिये 50 mg/dL से ऊपर अपेक्षित है। बुरे कॉलेस्टरॉल की अधिक मात्रा हमारी धमनियों की आंतरिक दीवारों पर पपड़ी के रूप में चिपकती रहती है और उन्हें संकरा और कड़ा बनाती जाती है। अच्छा कॉलेस्टरॉल, धमनियों की दीवारों पर जमने वाले बुरे कॉलेस्टरॉल के कणों को पकड़कर वापस यकृत में जमा कर देता है। कुछ चिकित्सकों की मान्यता है कि हम भारतीयों की धमनियाँ वैसे भी कुछ संकरी होती हैं और हमारी जीवन-शैली में श्रम का कम होता महत्व भी हमारा शत्रु बन रहा है। कारण जो भी हो पर यह सच है कि विदेश में रहने वाले भारतीय यहाँ के स्थानीय निवासियों के मुकाबले कॉलेस्टरॉल से अधिक पीड़ित हैं। पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में अच्छा कॉलेस्ट्रोल अधिक पाया जाता है। इसी प्रकार धूम्रपान करने वालों में बुरे कॉलेस्टरॉल की अधिकता पायी गयी है।

शरीर में अच्छे कॉलेस्टरॉल की मात्रा बढाने के लिये संतुलित शाकाहारी भोजन, मेवे, फल, फूल, शाक की अधिकता, गतिमान व्यायाम (सूर्य नमस्कार, साइकिल, जॉगिंग, नृत्य, ऐरोबिक्स आदि) लाभप्रद हैं। मांस, तले हुए पदार्थ, और धूम्रपान से बचाव बुरे कॉलेस्टरॉल की मात्रा कम करने में सहायक है। फल, सब्ज़ी, मोटा अनाज, ईसबगोल, अलसी, सूर्यमुखी आदि के बीज आदि से प्राप्त होने वाला रेशा (फ़ाइबर) शरीर में मौजूद कॉलेस्टरॉल को पाचन-तंत्र द्वारा अवशोषित हुए बिना बाहर निकालने में सहायक है।

रक्त की नियमित जाँच कराकर हम अपने कॉलेस्टरॉल की मात्रा जानकर सही उपाय करके ह्रदयघात, स्ट्रोक आदि से बच सकते हैं। यदि उपरोक्त उपाय काम न आयें, तो प्रमाणित और कारगर दवाओं का सहारा लिया जा सकता है। याद रहे संतुलित शाकाहारी भोजन हमें स्वस्थ और सम्पूर्ण आहार प्रदान करता है। उचित जीवन शैली अपनाकर हम न केवल निरोग रह सकते हैं बल्कि समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को भी बेहतर रूप से निभा सकते हैं।

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* सम्बन्धित कड़ियाँ *
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* शाकाहार रोके दिल का दौरा
* पनीर से कम करें कॉलेस्टरॉल
* स्पाइरुलीना
* कोलेस्टेरॉल-विकीपीडिया

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

रक्त निर्माण के लिये आवश्यक है विटामिन बी12

संपादकीय नोट: यह जानकारी किसी चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी संशय, बीमारी, लक्षण की स्थिति में अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य लीजिये।

दूध, दही, खमीर, अंकुरित दालें, शैवाल
संतुलित भोजन अच्छे स्वास्थ्य की और पहला कदम है। स्वस्थ भोजन में प्रोटीन, शर्करा, वसा, खनिज पदार्थों आदि के अतिरिक्त सूक्ष्म मात्रा में भी बहुत से ऐसे पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जिन्हें विटामिन कहते हैं। संतुलित शाकाहारी भोजन विभिन्न विटामिनों सहित उपरोक्त सभी तत्वों को प्रदान करने में सक्षम है। तो भी शाकाहार के विरोध में कभी-कभी ऐसे बयान पढने या सुनने में आते हैं जिनसे ऐसी शंका हो सकती है कि निरामिष भोजन में सभी तत्व भरपूर हैं कि नहीं। शाकाहार-विरोधी ऐसे ही प्रचार को ध्यान में रखते हुये निरामिष सम्पादक मण्डल ने समय समय पर शाकाहारी भोजन में उपस्थित पोषक तत्वों की जानकारी देने के उद्देश्य से स्वास्थ्य के लिये आवश्यक खनिजों व विटामिनों के बारे में जानकारीपूर्ण आलेख प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है। पिछले दिनों आपने विटामिन डी सम्बन्धी जानकारी के लिये "विटामिन डी - सूर्य नमस्कार से पोषण" पढा था। इसी शृंखला में आज प्रस्तुत है विटामिन बी 12 के बारे में तथ्यात्मक जानकारी।

विटामिन बी के नाम से पुकारा जाने वाला समूह बहुत से विटामिनों का ऐसा समूह है जिसके अधिकांश घटक शाकाहारी भोजन में निसन्देह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। केवल एक घटक "बी12" के बारे में कुछ समूह बार-बार यह बात कहते हैं कि यह वनस्पति जगत में नहीं होता। आइये सत्यान्वेषण पर आगे चलने से पहले इस तर्क को परख लिया जाये। यदि बी12 वनस्पति जगत में न बनकर केवल प्राणियों के शरीरों में उत्पन्न होता तब तो उसके लिये चिंता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती, क्योंकि तब वह हमारे शरीर में भी आवश्यकतानुसार उत्पन्न होना ही चाहिये था। और तथ्य यह है कि ऐसा होता भी है। अंतर केवल इतना है कि वह मांस का उत्पाद न होकर सूक्ष्म जीवों(Streptomyces griseus, Propionibacterium shermanii, Pseudomonas denitrificans) द्वारा ही उत्पादित पोषक तत्व है। अधिकांश प्राणियों की तरह हमारे शरीर में भी पाचन-तंत्र के कुछ अवयवों में इन्हीं सूक्ष्म जीवों की सहायता से बी 12 की भारी मात्रा उत्पन्न होती है। पशुमांस में भी यह विटामिन जिन अंगों/अवयवों में अधिक मात्रा में पाया जाता है उन भागों को तो अधिकांश मांसाहारी अभक्ष्य ही मानते हैं।
विटामिन बी12 के लिये मांसाहार अनिवार्य नहीं है। शाकाहारी प्राणी अपने शरीर में विटामिन बी 12 की पर्याप्त मात्रा उत्पन्न करते हैं।
यह सच है कि पौधे विटामिन बी12 के महत्वपूर्ण स्रोत हैं या नहीं, इस पर बहुत खोज हुई ही नहीं है। पोषण सम्बन्धी अधिकांश आधुनिक अध्ययन पश्चिमी देशों में हुए हैं जहाँ मांस और दुग्धाहार सामान्य है इसलिये किसी वैकल्पिक स्रोत की जाँच की आवश्यकता नहीं पड़ती। परंतु यह कहना बिल्कुल ग़लत है कि वनस्पति स्रोतों में बी12 का पूर्णाभाव है। हाल के वर्षों में पश्चिम में शाकाहार के बढते प्रचलन के कारण विटामिन बी12 के स्रोतों पर शोधों में भी वृद्धि हुई है। गोबर आदि जैविक खादों से पोषित भूमि में उगाई गयी फसलों में बी12 की जांच योग्य मात्रा पाये जाने के प्रमाण हैं। पशुओं के दूध और दुग्ध-उत्पादों यथा दही, पनीर, खोया, मट्ठा आदि से भी बी12 की पर्याप्त मात्रा प्राप्त होती है। अन्य प्राणियों की तरह ही मानव शरीर भी बी12 को लम्बे समय तक सुरक्षित रखता है और इसके सार को नष्ट किये बिना बारम्बार इसका उपयोग करता है। नई आपूर्ति के बिना भी हमारा शरीर विटामिन "बी12" को 30 वर्षों तक सुरक्षित रख सकता है, ऐसे चिकित्सकीय प्रमाण हैं। इसका कारण यह है कि अन्य विटामिनों के विपरीत, विटामिन बी12 अन्य प्राणियों की तरह हमारी मांसपेशियों और शरीर के अन्य अंगों विशेषकर यकृत में भंडारित रहता है। लेकिन यह वहाँ उत्पन्न नहीं होता है।

घास, चारा, पत्तियाँ और अनाज खाने वाले मवेशियों के मांस और दूध में पाया जाने वाला विटामिन बी12 उनके जठरांत्र संबंधी मार्ग में जहाँ-तहाँ रहते सूक्ष्मजीवों द्वारा संश्लेषित होता है। सच तो यह है कि शाकाहारी प्राणियों में विटामिन बी12 का संश्लेषण मांसाहारी पशुओं के मुकाबले इतना अधिक है कि उनके दूध और मांस ही अधिकांश मानवों के लिये बी12 का स्रोत हैं। वास्तव में यह सारा बी12 उन्हीं सूक्ष्म जीवों बैक्टीरिया द्वारा आया है जो हमारे पाचन-तंत्र में ही निवास करते हैं। संतुलित शाकाहारी भोजन से हम उन सूक्ष्म-जीवों की वृद्धि के लिये अनुकूल वातावरण उत्पन्न करते हैं और इस प्रकार बी12 पर बाह्य निर्भरता को कम कर सकते हैं। विटामिन बी12 के उत्पादक सूक्ष्म जीवों के लिये ऐसा अनुकूलन करने के लिये दूध, दही, पनीर, खमीर उचित आहार है। जानकारी के कुछ स्रोतों के अनुसार सोयाबीन, मूंगफली, दालें और अंकुरित बीज भी अच्छे हैं। समुद्री शैवाल स्पाइरुलिना भी अन्य विटामिनों के साथ बी12 का भी अच्छा स्रोत है। यीस्ट के एक विशिष्ट प्रकार टी 6635+ (Red Star T-6635+) में ऐक्टिव बी12 पाया गया है।
कोबाल्ट का यौगिक विटामिन बी12 मांस या शाक से नहीं बल्कि सूक्ष्मजीव बैक्टीरिया से उत्पन्न होता है।
वयस्कों के लिये बी12 की सुझाई हुई दैनिक मात्रा 2.4 माइक्रोग्राम है। विटामिन बी12 की कमी के बहुत से मामले दरअसल उसके अवशोषण की कमी के मामले होते हैं। चालीस से अधिक वय के लोगों की बी12 अवशोषण की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। बहुत सी दवाइयाँ भी लम्बे समय तक प्रयोग किये जाने पर बी12 के अवशोषण को अस्थाई रूप से या सदा के बाधित करती हैं। इसके अलावा भोजन में नियमित रूप से बी12 की अधिकता होने पर शरीर उसकी आरक्षित मात्रा में कमी कर देता है। आहार में लिये गये विटामिन बी12 का अवशोषण प्राणियों की छोटी आंत के अंत में आंतों की दीवार की कोशिकाओं द्वारा छोड़े गये एक जैव-रासायनिक अणु (intrinsic factor, a glycoprotein) की सहायता से सूक्ष्मजीवों द्वारा होता है। यदि आपके शरीर में इस जैव-रासायनिक अणु की कमी है तो हम भोजन में कितना भी बी12 लें, हमारा शरीर उसे ग्रहण करने में असमर्थ रहता है। इसी प्रकार , कोबाल्ट धातु/खनिज की आपूर्ति या विशिष्ट सूक्ष्मजीवों की अनुपस्थिति में प्राणियों के शरीर में इसका निर्माण संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त भोजन में भले ही बी12 होने का दावा किया जाये, अधिक पकाये हुए भोजन में बी12 नष्ट हो जाता है। ऐसी स्थिति में लम्बे समय तक विटामिन बी12 की कमी रहने पर मस्तिष्क सम्बन्धी गतिविधियाँ और रक्त निर्माण जैसी प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है और चिकित्सकों की सलाह से सुइयों या नासिका के द्वारा विटामिन बी की पूरक मात्रा शरीर में पहुँचाई जा सकती है।

भोजन के प्राकृतिक स्रोतों और शरीर के भीतर निर्मित होने वाले विटामिन बी12 के अतिरिक्त हम इसकी आपूर्ति पूरक स्रोतों, जैसे विटामिन की गोलियों द्वारा भी कर सकते हैं। पूरक स्रोतों में पाया जाने वाला विटामिन बी12 प्रयोगशाला में संश्लेषित होता है। इसमें किसी पशु-उत्पाद का प्रयोग नहीं होता है। पश्चिमी देशों में प्रचलित डब्बाबन्द शाकाहारी नाश्ता (फ़ोर्टिफ़ाइड सेरियल) और चिक्की/पट्टी (ग्रेनोला बार) बी12 सहित आवश्यक विटामिनों और खनिजों से भरपूर होता है।

तो देर मत कीजिये। अपने नाश्ते में दूध का गिलास और अंकुरित दालों को शामिल कीजिये, और भोजन में गाहे-बगाहे खमीरी रोटी और स्पाइरुलिना भी ले लिया कीजिये, विशेषकर यदि आप चालीस के निकट हैं या उससे आगे पहुँच चुके हैं। संतुलित भोजन कीजिये और शाकाहारी रहिये, यह आपके लिये तो अच्छा है ही, हमारे पर्यावरण के लिये भी उपयोगी है।

सार:
शरीर को रक्त-निर्माण जैसे कार्यों के लिये विटामिन बी12 (कोबालअमीन) की अत्यल्प मात्रा की आवश्यकता होती है। बी12 को बैक्टीरिया बनाते हैं जो हमारे पाचन-तंत्र के आंतरिक अंगों में रहते हैं। खमीर, अंकुरित दालों, शैवालों, दुग्ध-उत्पादों तथा विशिष्ट शाकाहारी भोजन और इन सूक्ष्म-जीवों की सहायता से बी12 की पर्याप्त मात्रा प्राप्त कर सकते हैं। हमारा शरीर बी12 को लम्बे समय तक आरक्षित रख सकता है। मांसाहार आदि करने वालों में होने वाली अधिक आमद में शरीर बी12 का संचित कोष रखना बन्द कर देता है; अतः, मांस से शाक की ओर आने वालों को दूध आदि न लेने पर नया कोष बनने तक बी12 की कमी हो सकती है जिसे दूध, दही आदि के संतुलित आहार, फोर्टिफाइड फूड, या विटामिन की पूरक गोलियों द्वारा पूरा किया जा सकता है

विटामिन बी12 की सुझाई हुई मात्रा और विभिन्न पदार्थों में पायी जाने वाली मात्रायें माइक्रोग्राम (μg) में निम्न सारणी में अनुसूचित हैं। सामिष भोजन से तुलना के लिये मुर्गी के अंडे की मात्रा भी सूची में है।

वयस्क के लिये2.4
गर्भवती के लिये2.6
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स्विस पनीर 100 ग्राम3.34
स्किम्ड मॉज़रेला पनीर 100 ग्राम0.7
पूरक गोली 12.4 से 12 तक
T-6635+ एक चम्मच4
आइसक्रीम 1 कप0.6
स्किम्ड दूध 1 पाव1.15
दही 1 पाव1.33
मट्ठा 100 ग्राम2.5
चीज़ पिज़्ज़ा 1 स्लाइस0.53
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अंडा एक0.5
एक अंडे की सफ़ेदी0.1

सम्बन्धित आलेख
* Reliable Vegan Sources of Vitamin B12
* Vitamin B12 in the Vegan Diet
* विटामिन बी12 - विकीपीडिया
* विटामिन डी

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

बेल्जियम का नगर घेंट - शाकाहार का मार्गदर्शक



कुछ समय पहले मैंने शाकाहार पर एक श्रंखला लिखी थी जिसमें अन्य बातों के साथ पर्यावरण पर शाकाहार के अच्छे प्रभाव का ज़िक्र भी नैसर्गिक रूप से आ गया था। हम भारतीय तो नसीब वाले हैं कि हमारे देश में अहिंसा, प्राणीप्रेम और शाकाहार की हजारों वर्ष पुरानी परम्परा रही है। अहिंसक विचारधारा की जन्मभूमि में आज भले ही कुछ लोग शाकाहार को पुरातनपंथी मानने लगे हों, शाकाहार का डंका विश्व भर में बज रहा है। व्यक्तिगत रूप से तो शाकाहार विश्व भर में ही प्रचलन में आ रहा है परन्तु बेल्जियम के गेंट नगर ने इसे आधिकारिक बनाकर इतिहास ही रच डाला है।

पर्यावरण की रक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए मांसाहार के दुष्प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से बेल्जियम के गेंट के नगर प्रशासन ने हर सप्ताह एक दिन (गुरूवार को) 'शाकाहार दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। इस दिन नगर के अधिकारी और चुने गए जन-प्रतिनिधि शाकाहारी भोजन करेंगे और स्कूली बच्चे भी अपने तरीके से शाकाहार दिवस को मनाएँगे।

नगर प्रशासन को विश्वास है कि इस प्रयोग से धरा को क्षति पहुंचाने वाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी तो होगी ही, लगे हाथ मोटापा और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से छुट्टी भी मिल जायेगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि विश्व में ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन का एक बड़ा भाग मांस के कारखानों से आता है। हम तो इतना ही कहेंगे - बधाई गेंट, बधाई बेल्जियम! आपने पहल की है, अन्य देश-नगर भी धीरे-धीरे सीख ही लेंगे।

[अनुराग शर्मा]

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

भारतीय संस्कृति में मांस भक्षण?

वेदों के नाम पर थोपी गई इन सारी मिथ्या बातों का उत्तरदायित्व मुख्यतः मध्यकालीन वेदभाष्यकार महीधर, उव्वट और सायण द्वारा की गई व्याख्याओं पर है तथा वाम मार्गियों या तंत्र मार्गियों द्वारा वेदों के नाम से अपनी पुस्तकों में चलायी गई कुप्रथाओं पर है । ~अग्निवीर
प्रागैतिहासिक मानव प्राकृतिक रूप से शाकाहारी था, यह एक वैज्ञानिक तथ्य है। जब मानव के जंगली समुदाय बनने लगे तब उनके क्षेत्रीय प्रभुत्व के झगड़े और तामसिक वृत्तियों के कारण वे एक दूसरे से संघर्ष करते रहे। बहुत सी जंगली जातियों में आदमखोरी जैसी पैशाचिक प्रथायें भी पनपीं। अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये आदमखोरी पर तो प्रतिबन्ध लगे परंतु "माइट इज़ राइट" वाले जंगली समुदायों में कमज़ोर का दमन चलता रहा। हाँ, सभ्यता का प्रकाश आने के साथ-साथ ऐसी प्रवृत्तियों में कमी आती गयी। भारत जैसे पवित्र क्षेत्रों में सभ्यता का सूर्योदय शेष विश्व से बहुत पहले हुआ और साक्षरता विकास का स्वर्णयुग तभी आ गया जब शेष विश्व में क़बीलाई हिंसा सामान्य जीवन का अभिन्न अंग थी। स्पष्ट है कि अहिंसा, करुणा और दया की भावनायें भी जल्दी ही हमारे दैनिक जीवन का सामान्य अंग बन गयी थीं। जब दुनिया के कई हिस्से खून के बदल खून और आँख के बदले आंख की मांग कर रहे थे हम विश्वव्यापी हिंसा को पीछे छोड़कर "क्षमा वीरस्य भूषणम" की ओर बढ रहे थे। पश्चिम में पशु-अधिकार की बात नई है परंतु "ईशावास्यमिदं सर्वं" का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति में कण-कण में प्रभु का अंश देखना अति प्राचीन विचार है।
मेरे स्वामी शाकाहारी थे, यद्यपि देवीप्रसाद में मिलने पर वे माँस को भी सर माथे लगाते थे। जीवनहरण निश्चित रूप से पाप है ... जिनका शुद्ध सत्व विकसित होता है मांस-मच्छी के प्रति उनकी सारी रुचि नष्ट हो जाती है। यह आत्मा के उदात्त होने का चिन्ह है~स्वामी विवेकानन्द
सिकन्दर के हमले के समय भारत आये लेखक मेगस्थनीज़ ने इंडिका में भारत में डंडों से बिना मधुमक्खी के शहद बनाने की बात कही है क्योंकि यूरोप की तथाकथित सभ्यता के लिये ईख और शर्करा एक अनोखा आश्चर्य था। इसी प्रकार हज़ारों वर्षों से भरतीयों द्वारा प्रयुक्त हो रहे हीरों के खनन के बारे में शेष विश्व को केवल कुछ शती पहले ही जानकारी हुई। दशमलव अंक पद्धति, शून्य व अनंत की परिकल्पना और वैज्ञानिक और सुस्पष्ट नियमबद्ध संस्कृत वाक व व्याकरण तक पहुँचना तो अन्य समुदायों के लिये असम्भव ही था। यूरोपीय लिपियों में भारतीय अंकों की स्वीकृति तो सामान्य ही लगती है परंतु अरबी, फ़ारसी जैसी उलटी दिशा में लिखी जाने वाली लिपियों द्वारा भी सीधे लिखे जाने वाले भारतीय अंकों को अपनाना इस पद्धति की विश्व-स्वीकार्यता का स्पष्ट उदाहरण है। अपने ज्ञान से विश्व को चमत्कृत करने वाली भारतीय सभ्यता "असतो मा सद्गमय" के साथ ही "मृत्योर्मामृतं गमय" की वाहक है। यह संस्कृति न कभी मृतजीवी थी और न ही कभी हो सकती है।
प्राचीन काल से यज्ञ केवल अन्न से होते आये है। मद्य-मांस की प्रथा इन धूर्त असुरों ने अपनी मर्जी से चला दी है। वेद में इन वस्तुओं का विधान ही नहीं है। (महाभारत)
विश्व भर में सम्माननीय इस भारतीय संस्कृति की आधारशिलाओं में अहिंसा और सद्भाव एक प्रमुख स्थान रखते है। अन्य राष्ट्रों की तरह भारत में भी हिंसक समुदाय रहे हैं परंतु भारतीय संस्कृति अभारतीय राष्ट्रों व असंस्कृत भाषायी समुदायों से इस मामले में एकदम अलग है कि यहाँ हिंसा को कभी भी शास्त्रीय स्वीकृति नहीं मिली। समय-समय पर विश्व भर में स्वादलोलुप लोगों ने कभी स्थानीय आवश्यकता, कभी स्वास्थ्य और कभी देवी, देवता, ईश्वर को बलि या क़ुर्बानी के नाम पर अपने हिंसक कृत्यों को जायज़ ठहराने के प्रयास किये हैं मगर कम से कम भारत में धार्मिक और सामाजिक विचारधारा में ऐसे प्रयासों को सदा ही निरुत्साहित किया गया है। यही कारण है कि जिन धार्मिक स्थलों पर पशुबलि के दृश्य आम थे उनमें भी बहुतायत से कमी आयी है। और यह परिवर्तन किसी बाहरी दवाब से नहीं बल्कि आंतरिक चेतना से ही हुआ है।
ब्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम् एष वां भागो
निहितो रत्नधेयाय दान्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च
(अथर्ववेद 6/140/2)
हे दंतपंक्तियों! चावल, जौ, उड़द और तिल खाओ। यह अनाज तुम्हारे लिए ही बनाये गए हैं| उन्हें मत मारो जो माता–पिता बनने की योग्यता रखते हैं|
जहाँ जंगली जातियों में असहिष्णुता और हिंसा को सामाजिक व धार्मिक स्वीकृति प्राप्त थी वहीं हमारे समाज में ऐसा कभी नहीं रहा। दुनिया में मौजूद तत्वों जैसे असुर, पिशाच आदि का वर्णन भी ग्रंथों में वैसे ही मिलता है जैसे देवत्व और मानवता का परंतु हिंसा का महिमामंडन कहीं नहीं है। हाँ दया, करुणा, प्रेम, अहिंसा, अनुशासन, त्याग, सत्यनिष्ठा, न्याय आदि को सर्वदा उन्नत स्थान प्रदान किया गया है। खुशी की बात है कि हमारी उस उन्नत विचारधारा को आज बेल्जियम हो या जर्मनी, सब जगह हर्षोल्लास से अपनाया जा रहा है।
अन्नाद्भवति भूतानि पर्जन्यादन्न संभवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्या यज्ञः कर्म समुद्भवः।। (गीता 3/14)
सम्पूर्ण प्राणी अन्न से ही होते हैं।
शांतिकाल के ग्रंथों में करुणा और दया की बात तो शायद बहुत सी सभ्यताओं में की गयी हो परंतु 18 अक्षौहिणी सेना के सामने रणभूमि के बीच गाये गये ग्रंथ में भी अहिंसा और समता का गुणगान भारत की विशेषता है। पूर्ण अहिंसक राजाओं का चक्रवर्ती सम्राट बने रहना अहिंसा की इस जन्मभूमि में ही सम्भव है। दुःख की बात है कि भारतीय संस्कृति की इस मूलभावना पर आज काफ़ी प्रहार किये जा रहे हैं। मुझे विश्वास है कि जिस विचारधारा को बनाने में सहस्रों वर्षों का अटूट श्रम लगा है वह सहस्रों वर्षों के आलस के बिना नहीं टूट सकती है। तो आइये आलस और अज्ञान के इस दुष्चक्र को तोड़ें जो हमारी संस्कृति की गरिमामय आधारशिला को काटने का प्रयास कर रहा है।
द्विपादव चतुष्पात् पाहि। (यजुर्वेद 14/8)
दो पैर वाले और चार पैर वाले की भी रक्षा हो|
संस्कृत में प्रचलित कुछ शब्दों से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय परम्परा में सब प्राणियों पर दया करने की परम्परा कितनी गहरी है। वनस्पति के लिये एक शब्द शस्य प्रयुक्त हुआ है जिससे भारतीय परम्परा में वनस्पति के भोज्य होने की पूर्ण स्वीकृति स्पष्ट होती है। जिसका स्पष्ट अर्थ है कि जीवहत्या को स्वीकृति नहीं है। मनुस्मृति के अनुसार मांस शब्द का अर्थ: मांस: = मम + स: = मुझे + यह = यह मुझे वही करेगा जो मैं इसे कर रहा हूँ = मैंने इसे खाया/सताया तो यह मुझे खायेगा/सतायेगा। यहाँ भी पशुहत्या और मांसाहार को अवांछनीय बताया गया है। भोज्य पदार्थों के लिये अन्न का प्रयोग आज भी भोजन को रोटी कहने या विवाह में भात की परम्परा जैसे नामों से जीवित है। पर्वों के खिचड़ी संक्रांति या पोंगल जैसे लोक नाम भी इसी परम्परा का उदाहरण हैं। शाकाहार की परम्परा न केवल मठों व मन्दिरों का सामान्य अंग है, अखाड़ों, गुरुद्वारों व डेरों आदि में भी अहिंसा व शाकाहार अपेक्षित और सर्व-स्वीकृत है। पका भोजन पक्वान्न है, मिठाई मिष्ठान्न है। और तो और देवी माँ का एक नाम अन्नपूर्णा होना भारतीय भोजन के अन्न-आधारित होने का जीता-जागता सबूत है। देवताओं का एक लक्षण अमृतजीवी होना है। मतलब यह कि देव मृत पशुओं का माँस नहीं खाते हैं। उस महान प्राचीन सतत परम्परा के बीच से यदि एकाध असम्बद्ध से उदाहरणों का परम्परा-विपरीत अनर्थ अनुवाद करके कोई यह समझने लगे कि हिंसा को शास्त्रीय स्वीकृति है तो क्या ऐसी नासमझी पर केवल हँसकर रहा सकता है? यदि भारतीय संस्कृति में से भूतदया की बात हटा दी जाये तो एक निर्वात सा बन जायेगा यह सर्वविदित है।
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी
संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः
(मनुस्मृति 5/51)
पशु को मारने की आज्ञा देने वाला, मारने के लिए लेने वाला, बेचने वाला, मारने वाला, मांस को खरीदने और बेचने वाला, पकाने वाला और खाने वाला यह सभी हत्यारे हैं|
शैली को मार्क्स ने भी सराहा था
भारतीय संस्कृति सर्वदा सांगोपांग अहिंसा पूरित है ही, ज्यों-ज्यों विश्व ज़ाहिलियत से सभ्यता की ओर बढ रहा है "तमसो मा ज्योतिर्गमय" के सिद्धांत के अनुरूप इन अभारतीय संस्कृतियों में भी जीवदया की समझ और स्वीकृति बढ रही है। हम सब जानते हैं कि विभिन्न देशकाल में भारत के बाहर भी बहुत से महान कालजयी बुद्धिजीवी शाकाहारी रहे हैं। ऐसे उदाहरणों में अरस्तू, प्लेटो, ज़रथुस्त्र, कन्फ़्यूशियस, लियोनार्दो द विंची, जार्ज बर्नार्ड शा, एच.जी.वेल्स, फ़्रैंज़ कैफ़्का, मार्क ट्वेन, पी.एच.हक्सले, लॉर्ड बायरन, इमर्सन, राबिया अल बसरी, रोज़ा पार्कर, जॉन हार्वी कैलॉग, आइन्सटीन, येहूदी मेनुहिन, पॉल मैककोर्टनी, रिंगो स्टार, जॉर्ज हैरिसन, लियो टॉलस्टॉय, शैली, रूसो, वीना मलिक, मार्टिना नवरातिलोवा जैसे विख्यात नाम शामिल हैं। परंतु भारत अकेला ऐसा राष्ट्र है जहाँ शाकाहार और अहिंसा हज़ारों साल से आम जीवन का हिस्सा बन सकी है।
क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः।
एहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन।।
(ऋग्वेद 10/16/9)
मांसभक्षक या जलाने वाली अग्नि को हम यहाँ से दूर करते हैं, यह पाप का भार ढोने वाली है अतः यमराज के घर जाए। इससे भिन्न जो यह दूसरे सुप्रसिद्ध "जातवेद" अग्निदेव पवित्र और सर्वज्ञ हैं, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ। ये इस हविष्य को देवताओं के समीप पहुँचायेंगे क्योंकि ये सब देवताओं को जानने वाले है।
भारत की इस प्राचीन परम्परा का आदर करते हुए जहाँ अनेक पशु-पक्षियों का शिकार दंडनीय अपराध है वहीं भारतीय संविधान की धारा 51 ए (जी) के अंतर्गत वन, झील,वन्य पशुओं की रक्षा और सभी प्राणियों के प्रति दया प्रत्येक भारतीय नागरिक का मौलिक कर्तव्य है। आइये, हम भी अपनी गर्वीली मानवीय और दैवी परम्परा के वाहक बनें।

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सम्बन्धित कड़ियाँ
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* वेदों में गोमांस? (अग्निवीर)
* शाकाहार और हत्या
* हम क्या शेरों के भोजन के लिये जन्मे हैं?
* आपका धर्म भी तो यही कहता है
* वेद भगवान की वाणी हैं

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

पशु-बलि : प्रतीकात्मक कुरीति पर आधारित हिंसक प्रवृति


ईद त्याग का महान पर्व है, जो त्याग के महिमावर्धन हेतु मनाया जाता है। यह पर्व हमें संदेश देता है कि हर क्षण हमें त्याग हेतु तत्पर रहना चाहिए। त्याग’ की प्रेरणा के लिए हम हज़रत इब्राहीम के महान त्याग की याद करते है। किन्तु उस महान् त्याग से प्रेरणा चिंतन मिलने की जगह, गला रेते जा रहे पशुओं की चीत्कार कानों को चीर डालती है। ईद के त्याग-परहेज रूप उल्हासमय प्रसंग के बीच, विशाल स्तर पर सामूहिक पशु-बलि के बारे में सोचकर ही मन व्यथित हो उठता है। अनुकंपा स्वयं कांप उठती है।

कुर्बानी की यह प्रथा हज़रत इब्राहीम से सम्बंधित है। उनसे सपने में अल्लाह ने त्याग - कुर्बानी चाही थी, हज़रत इब्राहीम ने बेटे इसमाईल को क़ुर्बान करने का फ़ैसला किया, घात पश्चात जब मृत कुर्बानी को देखा तो वहां एक भैडा मरा पडा था।

हज़रत इब्राहीम ज्ञानी और विवेकवान महापुरूष थे, क्या हमारी सोच उस उच्चस्तर को छू सकती है कि हम उनके समान सर्वांग श्रेष्ठ निर्णय ले सकें?, क्या हम अपने आपको उनके समकक्ष रखना चाहते है?  क्या हमारा बौद्धिक स्तर उनका अनुसरण करने के लायक है? एक महापुरूष के सम्मान में भी सच की जगह, झूठ-मूठ के प्रतीक का पालन सही है? क्या यह उनका सम्मान है? क्या हमारे मन इतने निर्मल है कि उनके स्तर के समीप भी पहुंचने में सक्षम हो?  क्या वे यह पसंद करते कि कोई मेरा कुरीति से झूठ-मूठ, दिखावे भर का अनुगमन करे? कदापि नहीं।

भेडें, बक़रे ऊंट आदि ईश्वर की ही सन्तानें है, उनकी उत्पत्ति है और उन्ही की सम्पत्ति है। आप क्या कुर्बान करेंगेईश्वर का दान फिर से ईश्वर पर कुर्बान? क्या किसी बालक को खुश करना है? जबकि ईश्वर ने तो जो दान एक बार दे दिया, वापस लेने की उसे कत्तई चाहना नहीं। ईश्वर दाता है, याचक नहीं।
ईश्वर इस तरह की हिंसा से कभी भी खुश होने वाले नहीं। उन्होंने जगह जगह प्राणियों के साथ रहम की उम्मीद रखी है। वास्त्विकता तो यह है कि यह मात्र हमारी स्वार्थ प्रेरित कुर्बानी है। और इस स्वार्थ में लाखों जानवर बलि चढ जाते है। महाहिंसा का तांडव है यह पशु-बलि की कुरीति।

उपर से तर्क दिया जाता है कि……
विज्ञान के युग में कुर्बानी पर ऐतराज़ क्यों?
क्या विज्ञान नें कुर्बानी जैसी हिंसा को जायज़ ठहरा दिया है?

विवशता की अनुमति और उसका दुरपयोग

  • ऐ लोगों! धरती में जो हलाल और अच्छी-साफ सुथरी चीज़ें है, उन्हें खाओ और शैतान के पदचिन्हों पर न चलो। निस्संदेह वह तुम्हारा खुला शत्रु है (कुरआन 2:168)
  • ऐ ईमान लाने वालो तुम्हारे लिए चौपायों की जाति के जानवर हलाल हैं सिवाय उनके जो तुम्हें बताए जा रहें हैं; लेकिन जब तुम इहराम की दशा में हो तो शिकार को  हलाल न समझना। निस्संदेह अल्लाह जो चाहते है, आदेश देता है (कुरआन 5:1)

इस कथन को ‘जानवरों को खाओ की अनुमति की तरह ले लिया गया है।  पर ईश्वर कहते है- साफ-सुथरी चीजें जो हलाल कर रखी है, उसमें भी विवेक से उपयोग करो’ अविवेक के ईशारों पर न चलो, अविवेक निसंदेह तुम्हारा खुला शत्रु है। शायद परिस्थिति, जगह व उपलब्धता के आधार पर ईश्वर नें छूट दे दी। किन्तु इस अनुमति के लिए अहसानमंद होना चाहिए और उसका अनावश्यक दुरपयोग नहीं करना चाहिए। जब भी सात्विक शुद्ध शाकाहार उपलब्ध हो, हिंसाजनित आहार से परहेज करना चाहिए। ईश्वर ने शाकाहार को कहीं भी हराम नहीं ठहराया है, अंगूर खजूरों की तरफ बार बार ईशारा करके शाकाहार को श्रेष्ठ बताने की कृपा की है। पर हमारी स्वाद्लोलूपता निर्दोष जानवरों की हिंसा से ही तुष्ट होती है। अनुमति का ऐसा अहसानफरामोशी भरा प्रयोग? तब तो ईश्वर नें धूल मिट्टी पत्थर को भी हराम नहीं कहा, पर उसमें स्वाद और अहंतुष्टि कहां?

साफ-सुथरे (पवित्र)का आशय भी साफ है, इहराम की पवित्र दशा में तुम्हें शिकार आदि हिंसा हराम है। अर्थात् पवित्र दशा में जिस कर्म को हलाल समझने से ही मना किया गया हो, वह अन्यत्र भी उचित कैसे हो सकता है। इसलिए अनुमति मात्र आहार के उपलब्ध न होने की मजबूरी तक ही सीमित है।

  • रहे पशु, उन्हें भी उसी ने पैदा किया, जिसमें तुम्हारे लिए ऊष्मा प्राप्त करने का सामान भी है और हैं अन्य कितने ही लाभ। उनमें से कुछ को तुम खाते भी हो (कुरआन 16:5)
  • और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो (कुरआन 23:21)

यहां ईश्वर जानवरों को, ऊन दूध आदि के लिये  पैदा करनें की तो जिम्मेदारी तो लेते है, पर खाने की क्रिया और कर्म की पूरी जवाबदेही बंदे पर ही छोड़ते है। आशय साफ है, ईश्वर कहते है, उन्हें ऊन दूध के लिए हमने पैदा किया, पर 'कुछ को तुम खाते हो'। यह तो अनुमति भी नहीं है, यह सीधे सीधे आपकी आदतों का निर्देश मात्र है। यह ईश्वर का अर्थपूर्ण बयान है।

निशानी

बिलकुल ऐसा ही निर्देश शराब के लिये भी है, जब इस उपदेश के आशय में समझदार होकर, शराब को हेय माना गया है,  तो उसी आशय के रहते, विवेक अपना कर, मांसाहार को हेय क्यों नहीं माना जाता? देखिए यह दोनो तुलनात्मक आयतें…………
  • और निश्चय ही तुम्हारे लिए चौपायों में भी एक शिक्षा है। उनके पेटों में जो कुछ है उसमें से हम तुम्हें पिलाते है। औऱ तुम्हारे लिए उनमें बहुत-से फ़ायदे है और उन्हें तुम खाते भी हो (कुरआन-23:21)
  • और खजूरों और अंगूरों के फलों से से बनी शराब भी, जिससे तुम नशा भी करते हो और अच्छी रोज़ी भी। निश्चय ही इसमें बुद्धि से काम लेने वाले लोगों के लिए एक बड़ी निशानी है (कुरआन-16:67)

शाराब के लिए तो शिक्षा या निशानी निषेधात्मक ग्रहण की गई है पर मांसाहार के लिए निषेध नहीं ? क्यों नहीं? बुद्धि व विवेक से काम लेने वालों के लिए यह भी  एक बड़ी निशानी है

सुनिश्चित है कि कुर्बानी या पशुबलि सच्चा त्याग नहीं हैखुदा को तो इन्द्रिय इच्छाओं और मोह का त्याग प्रिय है। अपनी ही सन्तति – सम्पत्ति की जानें नहीं। जानवर तुम्हें प्रिय होता तो उसकी जान न लेते। और ईश्वर तुम्हें प्रिय होता तो उसके प्रिय जानवर की जान भी न लेते।एक ही दिन लाखों निरीह प्राणियों की हिंसा? कहीं से भी शान्ति-धर्मके योग्य नहीं है।

शान्ति के संदेश (इस्लाम) को हिंसा का पर्याय बना देना उचित नहीं है। इस्लाम, हिंसा का प्रतीक नहीं हो सकता। यह मज़हब मांसाहार का द्योतक नहीं है। यदि इस्लाम शब्द के मायने ही शान्ति है तो वह शान्ति समस्त जगत के चर-अचर जीवों के लिए भी आरक्षित होनी चाहिए। 

करूणावान अल्लाह कहते है-

न उनके मांस अल्लाह को पहुंचते हैं और न उनके रक्त। किंतु उसे तुम्हारा तक्वा (धर्मपरायणता) पहुंचता है। (क़ुरआन-22: 37) (Qur'an 22:37)

धरती में चलने-फिरनेवाला कोई भी प्राणी हो या अपने दो परो से उड़नवाला कोई पक्षी, ये सब तुम्हारी ही तरह के गिरोह है। हमने किताब में कोई भी चीज़ नहीं छोड़ी है। फिर वे अपने रब की ओर इकट्ठे किए जाएँगे (क़ुरआन-6: 38) (Qur'an 6:38)

इस में अल्लाह नें स्पष्ट बयान किया है कि प्राणी (जानवर) और पक्षी मनुष्य के समान ही इसी गिरोह (समुदाय) के ही है। सभी रब की ओर इकट्ठे किए जाएँगे। अर्थात् निर्णायक दिन, सभी समान रूप से ईश्वर के प्रति जवाबदेह होगें। अपने गुनाहों का फल भी भोगेंगे और मनुष्य की तरह न्याय मांगने के अधिकारी होंगे।

हिंसाचार व मांसाहार इस्लाम की पहचान नहीं है। न ही इस्लाम का अस्तित्व, मात्र मांसाहार पर टिका है। इस्लाम का अस्तित्व उसके ईमान आदि सदाचारों से ही मुक्कमल है। हिंसा से तो कदापि नहीं। सच्चा त्याग अथवा कुरबानी, विषय वासनाओं, इच्छाओं और मोह के त्याग में है। मनुष्य होने के कारण पैदा हुई मालिकियत के साथ इस भाव कि - ‘प्राणी के प्राण हमारे हाथ’ की अहंतुष्टि के त्याग में है। क्योंकि यह तृष्णाएं ही हमें सर्वाधिक प्रिय लगती है। इन्ही प्रिय इच्छाओं का त्याग, सच्चे अर्थों में कुरबानी है।

हजरत इब्राहिम में लेश मात्र भी विषय-वासना आदि दुर्गुण नहीं थे। जब दुर्गुण ही नहीं थे तो त्यागते क्या? उन्हें पुत्रमोह था। मज़हब प्रचार के लिए उन्हें पुत्र से अपेक्षा थी इसलिए पुत्र ही उनका प्रियपात्र था।  सो उन्होंने उसे ही त्यागने का निर्णय लिया। पर आज हमारे लिए प्रिय तो हमारे ही दुर्गुण बने हुए है। हिंसाचार, दिखावा, धोखेबाज़ी को ही हमने हमारा प्रिय शगल बना रखा है। यही दुर्गुण त्यागने योग्य है। बलि दुर्गुणों की दी जानी चाहिए। निर्दोष निरीह प्राणियों की नहीं।



  • अन्यत्र सम्बंधित जानकारी

    मंगलवार, 1 नवंबर 2011

    पशुबलि-कुरबानी , शाकाहार-मांसाहार , वैचारिक बहस- फ्री फॉर ऑल धर्मयुद्ध... बीचों-बीच फंसे (प्रवीण शाह) जिनके जेहन से उठते ११ सवाल... और उत्तर देंगे हम।

    ईद का पर्व निकट है। पिछले वर्ष लगभग इन्हीं दिनों कुछ लोगों ने 'ब्लॉगवुड' पर आरोप लगाया कि लोग बकरीद के आसपास 'जीव-दया' पर लिखने लगते है। श्री प्रवीण शाह ने तो ऐसा आरोप लगाते हुए 11 प्रश्नों की एक जटिल प्रश्नावली ही खडी कर दी। जिसे 'हलालमीट' नामक ब्लॉग पर भी प्रमुखता से छापा गया। यदपि प्रवीण शाह साहब की पोस्ट पर कई विद्वान टिप्पणीकारों ने युक्तियुक्त जवाब देकर, इन सारे प्रश्नों के औचित्य को ही निरस्त कर दिया था, और उनके उत्तर-प्रत्युत्तर में युक्तियुक्त निराकरण भी प्रत्यक्ष कर दिया था जिसके परिणाम स्वरूप प्रवीण शाह साहब को चुप्पी ओढ़ लेनी पड़ी थी। किन्तु हिंसावादी आज भी इन प्रश्नो को 'ला-जवाब' मानते हुए, बहुहिंसा के समर्थन में इसका प्रमुखता से प्रयोग करते है।

    हमनें मात्र 'कथनी' से ही इस का उत्तर देने के बजाय, 'करनी' से उदाहरण प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। और मात्र बकरीद के दिन ही नहीं, वर्ष के 365 दिन 'जीव-दया' को प्रोत्साहित करने का लक्ष्य निर्धारित किया। 'शाकाहार जागृति अभियान' के लक्ष्य से  ‘निरामिष’ ब्लॉग के नियमित प्रकाशन-प्रसारण का संकल्प किया गया। इस प्रयास के द्वारा हमने अहिंसा के औचित्य को प्रमाणिक सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। हम यह स्पष्ट कर देना चाहते थे कि हम मात्र हिंसा की निंदा करके इस विषय की इति नहीं मानते, हम अहिंसा के सांगोपांग प्रवर्तक हैं हमें मात्र बकरीद के दिन ही अहिंसा नहीं सूझती बल्कि सदैव ही समस्त जीवजगत और जीवन के प्रति हम गम्भीर है। अहिंसा ही 'निरामिष' का प्रधान पैगाम है, सजगता का सन्देश है। यह प्रयत्न अनवरत जारी है, और तब तक जारी रहेगा जब तक, लोगों के दिलों में करूणा का सागर हिलोरें न लेने लगे।


    यह रहा, Saturday, November 20, 2010 में प्रकाशित प्रवीण शाह साहब की पोस्ट का शीर्षक:--
    “पशुबलि-कुरबानी , शाकाहार-मांसाहार , वैचारिक बहस- फ्री फॉर ऑल धर्मयुद्ध... बीचों-बीच फंसे हम और जेहन से उठते ११ सवाल... क्या उत्तर देंगे आप ?”

    जी हाँ, हम देंगे सभी प्रश्नों के न्यायसंगत, यथोचित और युक्तियुक्त उत्तर...........


    प्रवीण साहब का सवाल नं-1*** क्या यह सही नहीं है कि जीव-दया व मांसाहार निषेध के संबंधित आलेखों की बाढ़ ब्लॉगवुड में बकरीद के आस-पास ही आती है, जबकि थैंक्सगिविंग डे के दिन भी लाखों टर्की पक्षी बाकायदा भूनकर GOD को धन्यवाद देते हुऐ खा लिये जाते हैं बाकायदा customary 'Turkey Song' गाते हुए, और कहीं कोई पत्ता भी नहीं हिलता ?

    उत्तर : यदपि 'थैंक्सगिविंग 'अमेरिका महाद्वीप का स्थानीय पर्व है। तथापि उस पर्व के नाम पर होने वाली हिंसा भी अनुचित ही है। किन्तु, वह हिंसा हमारी अनदेखी हिंसा है। थैंक्सगिविंग की हिंसा हमारे द्वार तक आकर खड़ी नहीं हो गई, शायद इसी कारण ब्लॉगवुड में यह टर्की वाला मामला अभी गम्भीर प्रश्न बन खड़ा नहीं हुआ, अन्यथा विरोध अवश्य होता। अहिंसा और जीव-दया के लिए अगर लोग मुखर होते है, तो यह समस्त जीव जगत के हितार्थ सजग कर्तव्ययुक्त कार्य है । प्राणी कल्याण के इस मत्तम कार्य को मूढ़ बनकर बस हिंसा समर्थन का कोई तुक समझ नहीं आता। यह निर्विवाद है कि कोई भी उत्सव या धर्म क्रिया हिंसार्थक होती ही नहीं है। और न कोई ऐसा पवित्र उपदेश हो सकता है जो यह कह दे कि "हिंसा में धर्म है " अथवा धर्म प्रयोजन से हिंसा की अनुमति हो सकती है। हिंसा को ही अपने धर्म का पर्याय माननें वाला भला कैसा 'धर्म'?
    अब करते है कुर्बानी के अवसर पर ही विरोध की बाढ़ क्यों, तो जनाब यह व्यवारिक है कि जब आग लगती है, बुझाने के प्रयत्न तभी कारगर होते है। उसी तरह जब किसी कर्मकाण्ड में विशेष हिंसा होती है उसका विरोध भी तभी किया जाना चाहिए, अन्यथा बेमौसम की बरसात समान पानी व्यर्थ ही बह जाएगा।
    ज्ञातव्य रहे कि भारत के अनेक देवी मन्दिरों में बलिप्रथा को जन-जागृति से बन्द कराया गया है। तथापि जब 'हिंसा' की आस्था वाला कोई धर्म ही नहीं है तो 'हिंसा-विरोध' को किसी धर्म का विरोध कहकर आरोप ठोक देना असंगत है।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-2*** क्या यह सही नहीं है कि बकरीद के दिन दी जाने वाली बकरे की कुर्बानी और रोजाना हलाल मीट की दुकान पर बिकते बकरे को मारने का तरीका बिलकुल एक जैसा ही है?

    उत्तर : तरीका भले एक सा हो, किन्तु यहाँ अन्तर 'मारी' और 'महामारी' का है। कुर्बानी में करोड़ों जीवों का एक ही दिन कटना, हिंसा का भीषण तांडव होता है,जो कठोर हृदय को भी विषादग्रस्त कर जाता है, करोडों का एक साथ वध देख-जानकर कोई कैसे जड़ बना रह सकता है? क्रूर हत्या का सार्वजनिक भौंडा प्रदर्शन, क्रूर व घातक कुंठा भावों को प्रगाढ़ बनाने का उद्देश्य ही विकृत मानसिकता भरा है। मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों में तो छोटे-बड़े, सुकोमल, नर-नारी का ख्याल किये बिना ,सार्वजनिक स्थलों पर ,अमानवीय तरीकों से कटते, तड़फ़ते, उछलते पशुओं का प्रदर्शन, नालियों में बहता रक्त, कई दिनों तक कूड़े के ढेरों पर पड़े  व्यर्थ (वेस्ट) अंग निश्चित रूप से बच्चों को यही शिक्षा देते हैं कि हिंसा और क्रूरता एक सामान्य सा कृत्य है, ऐसे दूषण साधारण बात है।
    वैसे हलाल (या झटका) मीट की दुकान पर रोज़ बिकने वाला मांस भी सामान्य नागरिक नियमों के अनुसार ओट में ही रखे जाने चाहिये। और पशु-हत्या तो किसी भी सूरत में सरेआम नहीं होनी चाहिये, ऐसा अधिकांश सभ्य समाजों का नियम है।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-3*** क्या यह सही नहीं कि इस तरह के आलेख लिखने वाले महानुभावों का अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में न तो कोई मुस्लिम मित्र होता है न ही मुस्लिम समाज से उनका कोई संबंध होता है, यदि होता तो उन्हे यह ज्ञान हो जाता कि दया, ममता,करूणा आदि सभी मानवीय भावनायें एक मुसलमान के अंदर भी उतनी ही हैं जितनी उनके भीतर, आखिर हैं तो सभी इंसान ही ?

    उत्तर : कैसे भी और किसी भी माँसाहारी को जबरन मित्र बनाए रखने की भी कैसी विवशता? मित्रता में भी समान विचारों का भी तो कोई मूल्य होता है। मुस्लिम मेरे सहपाठी भी रह चुके हैं और मित्र भी हैं। कईं मुस्लिम है जो खाने पीने के मामले में मांसाहार को बिलकुल पसंद नहीं करते। वे अच्छी तरह जानते थे कि मांसाहार उनके परिवेश के साथ रूढ़ताके रूप में जुडा है,इस वास्तविकता के बाद भी वे स्वयं इसकी उपेक्षा करते थे। क्या जरूरी नहीं है मित्रता, माँसाहार को पसंद करने की शर्त पर ही  की जाय? पहले का प्रश्न है, मित्र बनाने का यह अर्थ नहीं होता कि मित्र की बुराईयां भी ज्यों की त्यों ग्रहण की जाय? मित्र के हर अच्छे या बुरे कृत्य का समर्थन ही किया जाय?  यदि हिंसक स्वभावी कोई मनुष्य मित्र न भी बने तो क्या फर्क पड़ना है? एक शाकाहारी को मित्रता के प्रलोभन में माँसाहार की झूठी संस्तुति करनी पडे तो वहाँ मित्रता ही कहाँ रह जाती है। सम्वेदनाहीन निष्ठुर व्यक्ति की मित्रता पर अपनी सहज दया, ममता, करूणा को बलि चढ़ावा चढ़ा देना कहाँ की बुद्धिमानी है। विवेक को सजग रखना नितांत आवश्यक है। जिसमें सम्वेदना, करूणा, अनुकम्पा, वात्सल्य आदि मानवीय गुण नहीं तो रूप - आकार - जाति से 'इन्सान' कहलाने मात्र से क्या होता है?  

    प्रवीण साहब का सवाल नं-4*** क्या यह सही नहीं कि ' फ्राइड चिकन चंक्स ' को बड़े शौक से खाने वाले कुछ लोग चिकन को काटना तो दूर कटते देख भी नहीं सकते क्योंकि उन्हें अपनी पैंट गीली करने का डर रहता है ?

    उत्तर : जो सज्जन कटते हुए प्राणी को नहीं देख सकते ,उनमें निश्चित ही हत्या के प्रति सम्वेदनाओं के ज्ञानतंतु जीवित होते है। और उनमें तो अतिशय कोमल भावनाएँ होती है, जिन्हें कटता देखकर पेंट गीली हो जाने की भीति हो जाय। पापभीरूता करूणा युक्त कोमल मनोभावना की अभिव्यक्ति होती है। 'फ्राइड चिकन चंक्स' को बड़े शौक से खाने वाले भी जो कुछेक लोग चिकन का कटना नहीं देख पा रहे तो समझ लेना कि उनमें दुष्कर्म समझने का विवेक अभी भी निष्क्रीय नहीं हुआ है। उनमें नासूर बनी हुई सम्वेदनाओं में आद्रता अभी शेष है। देर-सबेर ही सही, ऐसे मानवों के हृदय में करूणा के अंकूर अवश्य फूटेंगे। दया के फूल अवश्य फलेंगे फूलेंगे।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-5*** क्या यह सही नहीं है कि आज भी किसी पार्टी या दावत में यदि कोई नॉनवेज पकवान बना होता है तो सर्वाधिक भीड़ उसी काउंटर पर होती है ?

    उत्तर : इससे साबित क्या होता है? अगर ऐसे लोगों की संख्या अधिक है तो क्या अनुकरणीय हो गई? अधिसंख्या उत्तमता का पर्याय नहीं है। जबकि दूसरी तरफ सच्चाई यह है कि सारे संसार में शाकाहार और जीवदया के प्रति जागृति बढ रही है, लोग स्वेच्छा से दूर रहना पसंद करते है। निरामिष पर पहले ही इस विषय में कई तथ्य सामने रखे जा चुके हैं और आगे भी आते रहेंगे।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-6*** क्या यह सही नहीं है कि प्रागैतिहासिक काल, पुरा पाषाण काल से लेकर आधुनिक काल तक मानव जाति अपना वजूद समूह में शिकार कर प्राप्त किया भोजन ग्रहण कर ही बचा पाई है, और इसी सामूहिक शिकार की आवश्यकताओं के कारण भाषा व कालांतर में मानव मस्तिष्क का भी विकास हुआ ?

    उत्तर : नई वैज्ञानिक जानकारियों से यह बात साबित हुई है कि मानव प्रागैतिहासिक काल में भी शाकाहारी था। और विकास के दौर में भी मानव ने सभ्यता के लिए हिंसकता का परित्याग किया है। यदि पूर्व में मानव जाति शिकार द्वारा ही अपना अस्तित्व बचा पाई होती तो आज जब शिकार आदि नहीं हो रहे, मानव जाति कैसे बची रह गई? और अब तो सामुहिक शिकार भी सम्भव नहीं रहा, तो फिर अब तक मानव मस्तिष्क का विकास अवरुद्ध क्यों नहीं हो गया? हिंसा किसी भी काल में विकास का औजार नहीं रही, हिंसा के आधार से इन्सान ने कभी भी विकास नहीं साधा, हिंसा तो एकमात्र अशान्ति का कारण और विनाश का मूल है।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-7*** क्या यह सही नहीं कि आततायी और आक्रमणकारी के द्वारा किये जा रहे रक्तपात को रोकने के लिये भी जवाबी रक्तपात की आवश्यकता होती है ?

    उत्तर : रक्तपात सुरक्षा की गारंटी नहीं है। रक्तपात तो आपस में ही लड़ मरने की, वही आदिम-जंगली शैली है। रक्तपात को कभी भी शान्ति कारक समाधान नहीं माना गया। हिंसा कभी भी, किसी भी समस्या का स्थाई हल नहीं होती और न हो सकती है। चिरस्थाई हल हमेशा चिंतन, मनन, मंथन और समझोतों से ही उपजते हैं।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-8*** क्या यह सही नहीं है कि कुछ मध्यकालीन अहिंसावादी, जीवदयावादी धर्मों-मतों के प्रभाव में आकर भारतीय जनमानस इतना कमजोर हो गया था कि हम कुछ मुठ्ठी भर आक्रमणकारियों का मुकाबला न कर पाये और गुलाम बन गये ?

    उत्तर : मध्यकालीन आक्रांता तो धर्म-कर्म-जात आदि से केवल और केवल आक्रमणकारी ही थे, उनकी कोई नैतिक युद्धनीति नहीं थी। उनका सिद्धांत मात्र बर्बरता ही था। उनका सामना करने की जिम्मेदारी अहिसावाद,जीवदया या करूणा से प्रभावित लोगों की नहीं, बल्कि मांसाहारी राजपूत सामंतो व क्षत्रिय योद्धाओं की थी। जब वे भी सामना न कर पाए तो अहिंसावादी, जीवदयावादीयों को जिम्मेदार ठहराना हिंसावादियों की कायरता छुपाने का उपक्रम है। शौर्य और वीरता कभी भी मांसाहार से नहीं उपजती। न वीरता प्रतिहिंसा से प्रबल बनती है। वीरता तो मात्र दृढ़ मनोबल और साहस से ही पैदा होती है। इतिहास में एक भी प्रसंग नहीं है जब कोई यौद्धा अहिंसा को कारण बता, पिछे हटा हो। यथार्थ तो यह है कि युद्ध-धर्म तो दयावान और करूणावंत भी पूरे उत्तरदायित्व से निभा सकता है। और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आक्रमण और पराजय का खेल केवल भारत में नहीं खेला गया है। सारी दुनिया में कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि वह सदा अजेय रही है। क्या वे सभी जातियाँ शाकाहारी थीं? गुलामी और हार का सम्बन्ध, शाकाहार या अहिंसा से जोड़ने का आपका यह प्रयास आधारहीन है। इस तथ्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ सौ साल की गुलामी से पहले भारत में हज़ारों साल की स्वतंत्र,सभ्य और उन्नत संस्कृति का इतिहास भी रहा है।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-9*** क्या यह सही नहीं है कि आज के विश्व में लगभग सभी विकसित या तेजी से विकसित होने की राह पर बढ़ते देशों व उनके निवासियों में मांसाहार को लेकर कोई दुविधा या अपराधबोध नहीं है ?

    उत्तर : कृपया असत्य पर आधारित ऐसा व्यापक वक्तव्य (जनरल स्टेटमेंट) न दें। यह सही नहीं है कि लगभग सभी विकसित या तेजी से विकसित होने की राह पर बढ़ते देशों व उनके निवासियों में मांसाहार को लेकर कोई दुविधा या अपराधबोध नहीं है। हम एक बहु-विविध विश्व में रहते हैं। अमेरिकी घोड़ा खाना पाप समझते हैं, जापानी साँप खाने को हद दर्ज़े का जंगलीपन मानते हैं, भारतीय मांसाहारी गाय को अवध्य मानते रहे हैं जबकि मुसलमान सुअर नहीं खाते। मतलब यह कि मांसाहार लगभग हर भौगोलिक-सामाजिक क्षेत्र में अनेक प्रकार के अपराधबोधों से ग्रस्त है। और कुछ नहीं तो हलाल-झटका-कुत्ता का ग्लानी भरा झंझट तो व्याप्त है ही। यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे प्रत्येक देश विदेशों में कम ही सही पर कुछ लोग न केवल शाकाहार का समर्थन करते हैं बल्कि वे उसे ही बेहतर मानते हैं। यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि ऐसा वे किसी भारतीय के कहने पर नहीं करते। विख्यात 'द वेजेटेरियन सोसायटी' अस्तित्व में आयी है, बेल्जियम के गेंट नगर ने सप्ताह में एक दिन शाकाहार करने का प्रण लिया है। ब्रिटेन व अमेरिका के अनेक ख्यातनाम व्यक्तित्व न केवल शाकाहारी हैं बल्कि पेटा आदि संगठनों के साथ जुड़कर पूरे दमखम से शाकाहार और करुणा का प्रचार-प्रसार करने में लगे हैं। वीगनिज़्म का जन्म ही भारत के बाहर हुआ है। इथियोपिया से चलकर विश्व में फैले ‘रस्ताफेरियन’ पूर्ण शाकाहारी होते हैं। भारी संख्या में 'सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट' भी शाकाहारी हैं।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-10*** क्या यह सही नहीं है कि आहार विज्ञानी एक मत से यह मानते हैं कि आदर्श संतुलित आहार में शाकाहार व मांसाहार दोनों का समावेश होना चाहिये ?

    उत्तर : यह निष्कर्ष दुर्भावना से गढ़ा गया प्रतीत होता है। ऐसी किसी शोध का अस्तित्व ही नहीं है जिसमें समस्त आहार विज्ञानियों ने एकमत से घोषित किया हो कि सन्तुलन के लिए, उभय आहार यानि शाकाहार व मांसाहार दोनो जरूरी है। शुद्ध शाकाहारी भी सर्वांग सुदीर्घ स्वस्थ जीवन जीते रहे है। और वे मात्र शाकाहार से ही सन्तुलित पोषण प्राप्त करते रहे है। पोषण संतुलन के लिए मांसाहार का तिल भर भी समावेश जरूरी नहीं है। शतायु धावक फौजा सिंह हों चाहे 331 सप्ताह तक विश्व की नंबर एक टेनिस खिलाड़ी रही स्टेफ़ी ग्राफ आदि अनेक शाकाहारियों ने खेल के क्षेत्र में अपने झंडे गाढे हैं। आप शायद सोचते होंगे कि किसी खिलाड़ी के ग़ैर-बौद्ध/जैन/ब्राह्मण होने भर से यह सिद्ध हो गया कि वह मांसाहारी ही होगा। आजकल सारी दुनिया में खिलाड़ियों के पोषण पर बहुत ध्यान दिया जा रहा है और उनका भोजन तेज़ी से शाकाहार की ओर अग्रसर होता जा रहा है।

    प्रवीण साहब का सवाल नं-11*** और क्या यह भी सही नहीं है हम चाहे शाकाहारी हों या मांसाहारी, By birth हों या By choice , दोनों ही स्थितियों में हमें कोई ऐसा ऊंचा नैतिक धरातल नहीं मिल जाता कि हम दूसरे को उसके आहार चयन के कारण उसे सीख दें या उसे अनाप-शनाप, आसुरी स्वभाव वाला या पशुवत कहें ?

    उत्तर : सहमत हूँ, सत्य हो तब भी मर्मभेदी शब्दों का प्रयोग नहीं होना चाहिए, हित प्रियता से बात कहना फलदायक हो सकता है। किन्तु आहार चयन के प्रति जागरूकता के लिए सीख (जानकारी) देना कैसे अनुचित  हो सकता है। अहिंसक जीवन मूल्यों के प्रति क्यों न जागृति भरी सीख दी जाय? शाकाहार सजगता में श्रेष्ठता का भाव नहीं, हितचिंतन के प्रयोजन से कल्याण का भाव है। शाकाहारी व्यक्ति विशेष श्रेष्ठ नहीं, अहिंसा व नैतिकता भाव श्रेष्ठ है। व्यक्ति समाज या धर्म नहीं, करूणा का गुण उत्कृष्ट है। शुभभाव चाहे किसी भी धरातल पर हो,सदैव उँचे और श्रेष्ठ ही रहने है, अहिंसावृति को हमेशा दैवीय सम्मान मिलता है, और मिलता रहेगा। दया करूणा के भावों में, श्रेष्ठता के अस्तित्व को कोई चुनौति नहीं हो सकती।

    समाज को सार्थक योगदान तभी है जब, जहां कहीं भी हिंसा को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन नजर आए, समय रहते हिंसा का पूरजोर विरोध किया जाना चाहिए। क्योंकि ऐसा करना, मानव सभ्यता और शान्ति की दरकार है।

    इस प्रश्नोत्तरी को परिपूर्ण करनें में सहयोग के किए श्री अनुराग शर्मा जी का विशेष आभार!


    गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

    चैम्पियन शतायु धावक का भोजन - शाकाहार

    कुछ भी असम्भव नहीं है - फौजा सिंह
    [चेतावनी: पूरी तरह स्वस्थ हुए बिना मैराथन दौड़ना, किसी भी आयु में, किसी भी भोजनशैली के साथ खतरनाक सिद्ध हो सकता है। पहले स्वस्थ हों, शरीर को तैयार करें, सम्भव हो तो चिकित्सक, स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सलाह लें, फिर लम्बी दौड़ आरम्भ करें।]

    खेल सामग्री निर्माता ऐडीडाज़ ने फ़ुटबाल खिलाड़ी डेविड बैकहम को अपने विज्ञापनों से हटाकर नये पोस्टर बॉय फ़ौजा सिंह को ले लिया है। उनकी जीवनी का शीर्षक "द टर्बन्ड टॉर्नेडो" अर्थात "पगड़ी वाला चक्रवात" है। 173 सेंटीमीटर (5 फ़ुट 11 इंच) और 52 किलो भार वाले मैराथन धावक फ़ौजा सिंह जलन्धर में अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद सन् 1992 में अपने पुत्र के पास रहने लंडन आ गये। 20 वर्ष पहले उनका कृषिकर्म तो बन्द हो गया पर उसके बदले उन्होंने दौड़ना आरम्भ किया। वे ब्रिटेन, अमेरिका व कैनैडा में विभिन्न प्रतियोगिताओं का आकर्षण बने हैं।

    सन 2000 में 89 वर्ष की आयु में उन्होंने लंडन में अपने जीवन की पहली मैराथन में भाग लेकर पाँचवाँ स्थान प्राप्त किया और उसके बाद टोरंटो व न्यूयॉर्क की प्रतियोगिताओं में प्रथम रहे। 90+ के आयुवर्ग मैराथन में वे विश्व रिकॉर्ड धारक हैं। वे अब तक आठ मैराथन दौड़ों के अतिरिक्त 500 से अधिक प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं। उनके प्रशिक्षक हरमिन्दर सिंह के अनुसार अभी उनमें कुछेक और वर्ष तक प्रतियोगिताओं में भाग लेने की क्षमता है।
    फ़ौजा की दृढता हमारे शरीर व मन पर शाकाहार के प्रभाव का उत्कृष्ट उदाहरण है। निरामिष आहार करने से अनेक जानलेवा बीमारियों का खतरा तो कम होता ही है, फ़ौजा सिंह के उदाहरण से यह स्पष्ट है कि शाकाहार हमें दीर्घायु भी बनाता है ~ मीमी बेखेची (पेटा प्रवक्ता)

    मैं शाकाहारी हूँ (Courtesy: PETA)
    1 अप्रैल 1911 को भारत में जन्मे फौजा सिंह, मैराथन जैसी लम्बी दौड़ के लिये आवश्यक जीवट, अपने स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिये अपने शाकाहारी भोजन को ज़िम्मेदार मानते हैं। अधिकांश सिखों की तरह जन्म से शाकाहारी फौजा सिंह का कहना है कि हमें हल्के, संतुलित व संपूर्ण आहार की आवश्यकता है जोकि निरामिष भोजन से प्राप्त होता है। अपने नियमित दाल, सब्ज़ी, फुल्के के भोजन के अतिरिक्त वे दूध, दही और सोंठ भी पसन्द करते हैं। वे पानी पीना पसन्द करते हैं पर चावल के शौकीन नहीं हैं और तली हुई चीज़ें, पराँठे, पकौड़े आदि बिल्कुल नहीं खाते हैं।

    हृदयरोग, मोटापा व कैंसर आदि रोगों से मांसाहार का निश्चित सम्बन्ध पाया गया है। औसत मांसाहारी व्यक्ति के मुकाबले शाकाहारी बांके और चुस्त होते हैं। इसके अतिरिक्त मांसाहार के व्यवसाय के कारण पशु-पक्षियों पर अकल्पनीय अत्याचार तो होते ही हैं, इससे ग्लोबल वार्मिंग जैसे दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं।

    16 अक्टूबर 2011 को फौजा सिंह को शतायु धावक के रूप में वर्ड मास्टर्स ऐथलीटिक्स में शामिल किया गया। सिख धर्म के नियमों को मानने वाले फौजा सिंह को जीवदया में पूर्ण श्रद्धा है। अपने विज्ञापनों से होने वाली आय वे परोपकार संस्थाओं को दान कर देते हैं।

    पॉल मैककॉर्टनी, ब्रायन ऐडम्स और शाहिद कपूर जैसे शाकाहारियों को अपने विज्ञापनों में स्थान देने वाली और पशुओं के प्रति मानवता का व्यवहार करने का अनुरोध करने वाली संस्था पेटा (PETA) ने फ़ौजा सिंह को अपने विज्ञापन में प्रस्तुत किया है, जहाँ वे कहते हैं:
    मैं फ़ौजा सिंह हूँ, और मैं शाकाहारी हूँ! शतायु मैराथन धावक व विश्व रिकॉर्डधारक!
    कृपया शाकाहारी बनिये शतायु धावक फौजा सिंह की भांति अपने जीवन को सफल बनाइये!

    * सम्बन्धित कड़ियाँ *
    * पेटा, यू के
    * आरोग्यप्रद है शाकाहार
    * शाकाहार में है सर्वाधिक सन्तुलित पोषण