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सोमवार, 19 मार्च 2012

संतुलित पोषण के लिए शाकाहार का योजनाबद्ध प्रयोग



भारत में प्राच्यकाल से ही अहिंसा, स्वास्थ्य और पोषण के लिए ‘सात्विक आहार गुण' नाम से संतुलित पोषण उपदेशित होता रहा है। भारतीय संस्कृति में शाकाहार शैली एक श्रेष्ठ आहार शैली के रूप में स्थापित है। किन्तु अब पश्चिमी दुनिया में भी शाकाहार सजगता बढ़ी है। अमेरिकन डायटिंग एसोसिएशन और कनाडा के आहारविदों का कहना है कि “जीवन के सभी चरणों में शाकाहार का यदि योजनाबद्ध प्रयोग और पदार्थों का उचित नियोजन किया जाय तो शाकाहार पर्याप्त पोषक और स्वास्थ्यवर्धक है। निसंदेह शाकाहार रुग्णावस्था में परहेज विकल्प तो है ही साथ ही कुछ बीमारियों की रोकथाम और इलाज में असरकारक है।”


पोषण के साधारणतया तीन प्रकार होते है-

(1.) जो शरीर को उर्जा प्रदान करता है: कार्बोहाइड्रेट, वसा युक्त पदार्थ
जैसे- अनाज, कंदमूल, फल, मेवा, गुड़ तेल आदि

(2.) जो शरीर का वृद्धि-विकास और क्षतिपूर्ति करता है: प्रोटीन युक्त पदार्थ
जैसे- दूध, फलीदार अनाज, दालें, सोयाबीन, मूंगफली, मेवे गिरीवाले फल आदि

(3.) जो स्वास्थ्य सुरक्षा करते है: विटामिन खनिज युक्त पदार्थ
जैसे- हरी सब्ज़ी, हरी पत्तेदार सब्ज़ी, दुग्ध पदार्थ, दालें, फलों का रस आदि

आहार विशेषज्ञ शाकाहारी पदार्थों में निम्नानुसार पौष्टिक तत्त्व प्रकाशित करते हैं:-

1. प्रोटीन: यह शारीरिक वृद्धि-विकास, कोषों की क्षतिपूर्ति करता है। यह दालों, अनाज, चना, मटर, सोयाबीन, मूँगफली, काजू, बादाम, हरी सब्जियों, दूध, दही, पनीर, सेव, फल, मेवे आदि में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है।

2. वसा: इसे चिकनाई कह सकते है जो बलवर्धक होती है शरीर में इसका संचय होता है और आपूर्ति के अभाव के समय यही वसा, उर्जा व बल प्रदान करती है। यह दूध, घी, मक्खन, मलाई, सरसों, नारियल तथा तिल के तेल एवं बादाम, अखरोट व अन्य सूखे मेवे आदि से प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है। इसे पचाने के लिये शारीरिक श्रम और व्यायाम आवश्यक है।

3. कार्बोहाइड्रेट्स: यह शरीर में उर्जा, शक्ति,स्फूर्ति और उष्मा पैदा करता है। यह गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, गन्ना, खजूर, दूध, मेवा, मीठे फल, गुड, शक्कर, बादाम, दाल, ताजी सब्जियाँ आदि में बहुतायत से पाया जाता है। कार्बोहाइड्रेटस का पूरा लाभ उठाने के लिये भोजन को खूब चबा कर खाना चाहिये। जितनी लार भोजन में मिलेगी उतना ही अधिक कार्बोहाइड्रेट्स शरीर को प्राप्त होगा।

4. खनिज लवण  

  • (अ.) कैल्शियम : यह हड्डियों और दाँतों को मजबूत बनाता है, बाल घने और मजबूत बनाता है और दिल को भी स्वस्थ रखने में सहयोग करता है। यह हरी सब्जियों, गेहूँ, चावल, दालों, दूध, छाछ, पनीर, बादाम, समस्त मीठे फल, शक्कर, मुरब्बा आदि से प्राप्त होता है।

  • (ब.) फॉस्फोरस: बढते शरीर और दिमाग की ताकत के लिये यह विशेष लाभदायक है और पनीर, दही, गेहूँ, मक्का, दाल, दूध, छाछ, पनीर, बादाम, समस्त मीठे फल, शक्कर, मुरब्बा आदि में पाया जाता है।

  • (स.) आयरन: यह खून बनाता है और हिमोग्लोबिन बढ़ाता है साथ ही शरीर के प्रत्येक तंतु तक ऑक्सीजन पहुँचाता है। इसकी कमी को साधारण तया खून की कमी कहा जाता है, यह हरे पत्तेदार शाक, हरी तरकारी, अनाज, दाल, सेम, मटर, सूखे मेवे, सेव, अनार आदि फल व दूध में पाया जाता है।

  • (द.) मैग्नीशियम: अतिअल्प मात्रा में आवश्यक मैग्नीशियम हमारे रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। यह ताजा सब्ज़ियों से पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है।

5. विटामिन्स

  • विटामिन A- हरी सब्जियों, नीबू, अमरूद, आँवला, संतरा, मौसमी आदि में मिलता है।

  • विटामिन B- हरी पत्तेदार सब्जियों तथा अनाज व दुग्ध पदार्थों में पाया जाता है।

  • विटामिन C- हरी सब्जियों, नीबू, अमरूद, आँवला, संतरा, मौसमी आदि में मिलता है।
  • विटामिन D- यद्यपि इसका प्रमुख प्रेरक स्त्रोत सूर्य की किरणें है । तथापि दुग्ध-पदार्थों तथा पौधों से भी प्राप्त होता है।

  • विटामिन E- यह घी मक्खन में बहुतायत से होता है।

  • विटामिन K- यह हरी सब्जियों से पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो जाता है।

6. आहारीय रेशे: शरीर से विषाणु और प्रतिकूल पदार्थों का विसर्जन करने में सहायक होते है यह शाक फल सब्ज़ी सूखे मेवे साबुत धान्य चोकर आदि में प्रचुरता से प्राप्त होते है।

अपनी रुचि और स्थिति के अनुसार पदार्थों का चयन कर संतुलित पोषक आहार नियोजित किया जा सकता है. मांसाहार की अपेक्षा शाकाहार सस्ता होने के साथ-साथ स्वादिष्ट, रोगप्रतिरोधक क्षमता से भरपूर और शक्तिवर्धक भी होता है। फल सब्जियों व अन्न-दालों से मिलने वाले फाइबर तो अनेक रोगों को दूर रखने में अचूक औषधि का काम करते हैं। जब सभी प्रकार के विटामिन्स, उत्तमप्रकार के प्रोटीन, आवश्यक खनिज आदि पौष्टिक तत्त्व शाकाहार से पूर्ण संतुलित हो सकते है तो जीवित प्राणियों की हत्या से उपार्जित अनैतिक आहार की भ्रमणा में फंसने की क्या आवश्यकता?

कुछ सावधानियाँ-

  1. ज्यादा कैलोरी युक्त वस्तुएं लें तो उसे खर्च करने के लिए श्रम भी करें।
  2. आवश्यक कैलोरी न लेने से आंते कमजोर होती हैं।
  3. हर रोज 6 से 8 घंटे की नींद ब्लड प्रेशर मधुमेह और दिल की बीमारी, हार्मोनल असंतुलन को दूर करती है।
  4. हर रोज सूर्य निकलने से पहले चारपाई छोड़ें और कम से कम 15 से 45 मिनट व्यायाम जरूर करें।
  5. खाने में फल सब्जियां साबित अनाज तनाव दूर करने में सहायक है।
  6.  भोजन में नमक का इस्तेमाल संतुलित करें। मीठी वस्तुएं मोटापा बढ़ाती हैं अति से बचें।
  7. प्रत्येक व्यक्ति का मेटाबोलिज्म स्वभाव भिन्न हो सकता है, संतुलित और पोषक आहार के उपरांत भी शरीर में पदार्थ आवश्यक उर्जा तत्व में परिणित नहीं होते तो अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें और उसी आधार पर सप्लीमेंट ग्रहण करें।
  8. शारिरिक शक्ति के लिए उचित उर्जा चाहिए। शरीर को पुष्ट करने वाली उर्जा और उष्मा के लिए प्रोटीन, शर्करा, विटामीन, खनिज, वसा आदि पदार्थ उचित अनुपात और पर्याप्त मात्रा में चाहिए। उसकी गुणवत्ता हमारे आहार के संयोजन पर निर्भर करती है। किसी तत्व की अधिकता भी प्रतिकूल परिणाम देती है।
  9. भोजन में ऐसे पदार्थ भी होने चाहिए जो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करे। और ऐसे पदार्थों की भी उपस्थिति हो जो शरीर में उपभोग के बाद व्यर्थ बचे खुचे व हानिकारक तत्वों का सहजता से निष्कासन करनें में सहायक हो। भोज्य-पदार्थों में रोगोत्पादक, संक्रमण सम्भाव्य और अनावश्यक हार्मोन रसायन उत्प्रेरक तत्व न हो। और ऐसे उत्तेजक पदार्थ भी न हो जो मानसिक आवेगों को जन्म दे और मानस को असंयमित करने का कार्य करे।

बुधवार, 25 जनवरी 2012

माँसाहार : रोग सम्भावना

आहार ही औषध
दुनिया के आहार विशेषज्ञों ने प्रमाणित कर दिया है कि शाकाहारी मनुष्य अपेक्षाकृत दीर्घजीवी होते है। विविध शोधों से यह सिद्ध हो चुका है कि माँसाहार मानवीय स्वास्थ्य के अनुकूल नहीं है। मांसाहारी लोग शाकाहारियों की तुलना में अधिक बीमार पड़ते हैं। जहाँ माँसाहार अनेक व्याधियों का जन्मदाता है वहीं शाकाहार अनेक कष्टदायक रोगों से बचाता है। चिकित्सा वैज्ञानिकों ने यह भी स्वीकार किया है कि शाकाहारी लोगों की 'रोग प्रतिरोधक क्षमता' अधिक मजबूत होती है।



अलज़ाइमर

मांसाहार से प्राप्त प्रोटीन, कोई एक समस्या नहीं, बल्कि समस्याओं की
कतार ही खड़ी कर देता है। वस्तुतः प्राणीजन्य प्रोटीन, पूर्वसक्रिय और सेच्युरेटेड होता है, जिसके सेवन से मस्तिष्क में बीटा-अमाइलायड (Beta-Amyloid) नामक प्रोटीन संचित होता है, जो अल्जाईमर रोग के लिए जिम्मेदार माना जाता है। जबकि इसके उलट फल और सब्जियों में पॉलीफिनाल पाया जाता है, जो उस बीटा-अमाइलॉयड नामक हानिकर प्रोटीन को जमने से रोकता है। 'गॉलब्लैडर की पथरी' व 'गुर्दे की पथरी' नामक व्याधियों का प्रबल कारण यह हानिकर प्रोटीनहै,  इस प्रोटीन की विखण्ड़न प्रक्रिया में शरीर का संचित कैल्शियम कोष खाली हो जाता है, साथ ही गुर्दे (किडनी ) से अनावश्यक और अत्यधिक श्रम लेकर, उसे बुरी तरह क्षतिग्रस्त भी कर देता है।

पित्ताशय की पथरी (गॉलस्टॉन्स)
नई शोध के अनुसार शाकाहारी होना हमारे शरीर के लिए लाभदायक है। लंदन में हुई एक शोध से ज्ञात हुआ कि उन लोगों में उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) ज्यादा पाया गया जो मांस से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते थे। उच्च रक्तदाब का होना हृदय के लिए खतरनाक स्थिति है।शाकाहार से प्राप्त प्रोटीन में भरपूर एमीनो एसिड पाए जाते है। अनुसंधान से यह निष्कर्ष भी मिला कि विभिन्न मांसाहारी स्रोतों से अतिरिक्त प्रोटीन लेने की कोई आवश्यकता नहीं , आप दिन भर के शाकाहार में अमीनो एसिड का कुछ इस प्रकार सेवन भरण करें कि शरीर में नायट्रोजन की पर्याप्त मात्रा बनी रहे। बस शरीर का मेटाबॉलिज्म शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन की व्यवस्था कर देता है। जैसा कि हम जानते है, बलशाली शाकाहारी जानवर हाथी घोडा बैल आदि शाकाहार से ही विशाल मात्रा में प्रोटीन प्राप्त कर लेते है। आवश्यकता है तो मात्र शाकाहार से पोषण : कार्बोहाइड्रेट और एमीनो एसिड की संतुलित पूर्ति की। एक तुलनात्मक अध्ययन में शाकाहारियों को मांसाहारियों की अपेक्षा उर्ज़ावान और बेहतर मूड का पाया गया है।

आंत्र कैन्सर
मांसाहार का प्रायः  60 प्रतिशत हिस्सा मात्र ही शरीर के लिए उपयोगी होता है। शेष 40 प्रतिशत हिस्से में विषैले (टॉक्सिन्स) तत्व होते हैं। मांसाहार पेट के लिए भारी होता है तथा अम्लीयता (एसिडिटी) पैदा करता है। परिणाम स्वरूप उदर संबंधी कई बीमारियां उत्पन्न होती हैं। मांस में आहार-रेशा (फाइबर) बिलकुल भी नहीं होता।  जबकि आहार-रेशे (फाइबर) शरीर के लिए अत्यंत ही आवश्यक पदार्थ है। आहार से पोषक तत्वों के संश्लेषण में रेशे सहायक होते है। जो लोग रेशेयुक्त आहार करते हैं उनमें हृदय रोग, उदर कैंसर, पाइल्स, मोटापा, डायबिटीज, कब्ज, हार्निया, डायवर्टीकुलाइटिस, इरिटेबल बाउल सिन्ड्रोम, डेन्टल कैवेटिज और गॉलस्टोन्स का खतरा कम रहता है। शाकाहार में ही उपलब्ध आहार-रेशे विषावरोधक ( एंटीऑक्सीडेंट) होते हैं। रेशे आंतो की सफाई में भी सहयोगी है, मांसाहार ठोस व चिकनाई युक्त होता है, जिसके जिद्दी अंश आंतो की दीवारों पर चिपके रह जाते है और सड़न पैदा करते है। परिणाम स्वरूप आंतो के केन्सर की सम्भावनाएं प्रबल हो जाती है।


हृदय-रोग
शाकाहार में 'संतृप्त वसा' (हानिकारक कोलेस्ट्रॉल) का स्तर कम होता  है। साथ ही पोषक तत्व कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, मैग्नीशियम, पोटेशियम, विटामिन सी व ई जैसे एंटीऑक्सीडेंट तथा फाइटोकेमिकल्स आदि उच्च स्तर और बेहतर प्रमाण में होते है। जो एक शाकाहारी के लिए ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह टाइप 2, गुर्दे की बीमारी, अस्थि-सुषिरता (ऑस्टियोपोरोसिस), मनोभ्रंश (अल्जाइमर) आदि बीमारियों की सम्भावनाएँ बहुत ही कम कर देते हैं। इतना ही नहीं शाकाहारी खाद्य पदार्थों में लाभदायक उच्च-घनत्व वाले लायपोप्रोटीन (HDL, कॉलेस्ट्रॉल) की उपस्थिति होती है। जो हानिकर अल्प-घनत्व वाले लायपोप्रोटीन (LDL, कॉलेस्ट्रॉल) को धमनियों में जमने से रोकते हुए उसके निकास को भी सुनिश्चित कर देता है।  उच्च-घनत्व युक्त लायपोप्रोटीन,  रक्तप्रवाह में बाधा, उच्च रक्तचाप समस्या, दिल का दौरा और लकवा जैसे रोगों की रोकथाम करता है। यह कॉलेस्ट्रॉल को संतुलित करने की सुरक्षात्मक भूमिका निभाता है। मुख्यत: "सेचुरेटेड फैट्स" और "कोलेस्ट्रोल" मांस और डेयरी उत्पाद में ज्यादा पाया जाता है, जिसके अत्यधिक सेवन से (एन्जाईना) हृदय के बीमार होने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। आहार रेशे (फाइबर) भी जो संतृप्त रक्त वसा को घटाने में सहायक होते है मात्र शाकाहार (प्लांट फ्रूड्स) में ही पाए जाते है।

गठिया/संधिवात या जोडों का दर्द
एक तथ्य के अनुसार, प्रति एक किलोग्राम मांस में लगभग 12-13 ग्रेन "यूरिक एसिड" पाया जाता है। 'यूरिक एसिड' एक विषाक्त रसायन (टॉक्सीन) है जो मानव स्वास्थ्य के लिए विष का काम करता है। रक्त में इसकी अधिक मात्रा कईं रोगो की जनक है।यूरिक एसिड दिल की बीमारी, लीवर के रोग, टी.बी., रक्ताल्पता, मांसपेशी संबंधी रोग, हिस्टीरिया, कमजोरी जैसे अनेक खतरनाक रोगों की सम्भावनाएँ प्रगाढ़ कर देता है। यूरिक एसिड की वृद्धि के कारण शरीर के सभी अवयव प्रभावित होते है। इसी 'यूरिक एसिड' के कण अस्थि-जोड़ों में इकट्ठा होने लगते हैं जो गठिया, संधिवात (आस्टियो आर्थराइटिस) जैसी समस्या का प्रमुख कारण है।



मधुमेह टाइप-2
माँसाहार से शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन की मात्रा अधिक बनती है। परिणाम स्वरूप मांसाहारी पुरुषों को हृदय रोग के अलावा "प्रोस्टेट कैंसर" तथा मांसाहारी महिलाओं को गर्भाशय, डिम्बाशय (ओवरी) और स्तन कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।
एक शोध के अनुसार मांसाहारियों की तुलना मेंशाकाहारियों को "मेटॉबौलिक सिन्ड्रोम" (बीमारी न्योतक पांच खतरे यथा-उच्च रक्तचाप, लो एच डी एल कोलेस्ट्रोल, हाइ ग्लूकोज लेवल, उच्च ट्राइग्लिसराइड्स, मोटापा)  में से तीन प्रमुख खतरे 36 प्रतिशत कम पाए जाते है। मेटॉबौलिक सिन्ड्रोम ही कार्डियोवस्क्यूलर डिज़िज, डायबिटिज एवं स्ट्रोक का प्रमुख कारक होते है।


वृक्क (गुर्दा) समस्याएँ
इंडियाना विश्वविद्यालय की शेरोन मोई और उनकी टीम द्वारा किए गए एक अध्ययन में, शाकाहार और मांसाहार के प्रभावों पर गौर करने पर पाया कि जो लोग शाकाहार पर रहे उनकी तुलना में मांसाहारी लोगों के मूत्र में फास्फोरस अधिक पाया गया। किडनी की बीमारी से परेशान लोग अगर अपने शरीर में अत्यधिक फास्फोरस जमा होने से परेशान हैं तो शाकाहार अपना लें। अधिक मात्रा में संचित फास्फोरस, गुर्दे के साथ साथ हृदय के लिए भी घातक भी हो सकता है।
एक अध्ययन से यह भी प्रकाश में आया है कि शाकाहारी जानवरों की तुलना में 10 गुना अधिक "हाइड्रोक्लोराइड एसिड" मांसाहारी जानवरों के शरीर में पाया जाता है। यह एसिड उनके माँसाहार को पचाने में योगदान करता है। जबकि मनुष्य के शरीर में भी यह रसायन, उस मात्रा में नहीं पाया जाता। अतः निश्चित है कि मांसाहार मानव पाचन संस्थान के लिए दुपाच्य है। इस भेद से भी सिद्ध होता है कि मानव शरीर  के लिए शाकाहार  ही अनुकूल है।



रोगाणु-विषाणु
माँस साधारणतया दूषित तत्वों जैसे कि अनिष्टकारी हारमोनों, वनस्पतिनाशकों, कीटनाशकों एवं प्रतिजैविकों से भरे होते हैंI चूँकि ये सभी विषाणु वसा में घुलनशील हैं, वे पशुओं के चर्बीदार मांस में संचित हो जाते हैं जो अन्ततः मांस भक्षण करने वाले व्यक्ति के शरीर में सहजता से प्रवेश कर जाते हैं। अनेकानेक बीमारियां उन जीवाणुओं के कारण होती है जो मांसाहार के माध्यम से व्यक्ति के शरीर में प्रवेश करती हैं। जबकि शाकाहार इससे काफी हद तक सुरक्षित होता है। उदाहरण के तौर पर "साल्मोनेला टाइफीमूरियम" नामक जीवाणु अंडे  खाने से शरीर में पहुंचता है, जिसके कारण न्यूमोनिया और ब्रोंकाइटिस होने की संभावना बढ़ जाती है। ऐसा दूषित व संक्रमित माँसाहार विषाणुजनित रोगों के साथ साथ खुरपका, मुंहपका और मैडकाउ जैसी महामारियों का कारण बनता है


कुल मिलाकर सार यह है कि शाकाहार शरीर के क्रियाकलापों के बेहतर संचालन में जहाँ सहयोगी है, वहीं मांसाहार शरीर के व्यवहार और संचालन के प्रतिकूल है, जो अन्ततः बिमारियों का निमन्त्रक है। साथ ही शरीर को अनेकानेक रोगों का शरण स्थल बनाने का मार्ग प्रशस्त करता है। शारिरिक अव्यवों के साथ ही हमारी इन्द्रियों के सुचारू संचालन में भी बाधक बनता है। जब निरामय पोषण उपलब्ध हो तो क्यों खतरों को उठाया जाय? अत: शाकाहारी बनें और स्वस्थ रहें।
स्पष्टीकरण : प्रस्तुत आलेख विशेषज्ञों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। लेखक चिकित्सा विज्ञान का विशेषज्ञ नहीं है। रोगों की  बीटा अमाइलाईड, पॉलिफिनाल, अमीनो एसिड, फुड-फाइबर, कॉलेस्ट्रॉल, यूरिक एसिड, फास्फोरस एवं हानिकर बैकटेरिया, वायरस, परजीवियों की न्यूनाधिक उपस्थिति अनुपस्थिति के आधार पर समीक्षा की गई है। और उसी आधार पर रोगों की अधिक सम्भावना व्यक्त की गई है। उपरोक्त रोगों के अन्यान्य कईं कारण भी सम्भावित है्। रुग्णता निर्णय से पूर्व चिकित्सीय परामर्श अनिवार्य है।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

पौष्टिक, आरोग्यप्रद और रेशा समृद्ध शाकाहार


जीवन का  सेहत भरा तरीका
सभी चोकर सहित अनाज व दालें, ताज़े फल,
मेवे और सब्ज़ियाँ आहार-रेशों के प्रमुख स्रोत है।
पोषण ऐसा विज्ञान है जो प्रकृति एवं भोजन में पौष्टिक तत्वों के वितरण, उनके उपापचयी प्रभाव और अपर्याप्त खाना खाने के परिणामों से संबंधित है। पौष्टिक तत्व भोजन में पाए जाने वाले वे रासायनिक यौगिक हैं जो भोजन में अवशोषित होकर स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं। कुछ ऐसे आवश्यक पौष्टिक तत्व होते हैं जिन्हें हमारा शरीर संश्लिष्ट नहीं कर सकता। उनकी आपूर्ति आहार के द्वारा ही की जानी चाहिए।

आवश्यक पौष्टिक तत्वों में विटामिन, खनिज पदार्थ, एमिनो अम्ल, वसीय अम्ल और ऊर्जा के स्रोत के रूप में कुछ कार्बोहाइड्रेट शामिल हैं। अनावश्यक पौष्टिक तत्व वे होते हैं जो शरीर अन्य यौगिकों से संश्लिष्ट कर सकता है तथापि वे आहार से भी व्युत्पन्न किए जा सकते हैं। पौष्टिक तत्व आमतौर पर वृहत पौष्टिक तत्वों और सूक्ष्म पौष्टिक तत्वों में विभाजित किए जा सकते हैं। वृहत पौष्टिक तत्व आहार और ऊर्जा की आपूर्ति संगठित करने के साथ-साथ शरीर के विकास और उसके विभिन्न क्रियाकलापों के लिए ज़रूरी पौष्टिक तत्व बनाते हैं। कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, सूक्ष्म खनिज तत्व और पानी वृहत पौष्टिक तत्व हैं। सूक्ष्म पोषक तत्वों में विटामिन (पानी और वसा दोनों में घुलनशील) और आवश्यक सूक्ष्म खनिज तत्व शामिल होते हैं। इन पौष्टिक तत्वों की पर्याप्त आपूर्ति अच्छे स्वास्थ्य, कार्यात्मक दक्षता एवं उत्पादकता के लिए बुनियादी मूलभूत ज़रूरत है। पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक भोजन करने से पौषणिक स्थिति बढ़ती है और उसके फलस्वरूप मनुष्यों की सेहत अच्छी रहती है।

पौष्टिक और पर्याप्त भोजन वह होता है जो शरीर की ज़रूरतों के अनुसार सभी पौष्टिक तत्व उपलब्ध कराता है। संतुलित आहार के जरिए अच्छा पोषण मिलता है जिससे आवश्यक और अनावश्यक पौष्टिक तत्व सही व संतुलित रूप में शरीर को मिलते हैं। उच्च स्तर के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए ऐसा होना बहुत ज़रूरी है। पोषण न सिर्फ समुचित शारीरिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि यह पर्याप्त प्रतिरक्षा क्षमता और ज्ञानात्मक विकास भी सुनिश्चित करता है।

शाकाहारी आहार अधिक पौष्टिक होते हैं। पादप उत्पाद जटिल कार्बोहाइड्रेट (आहारीय रेशे), B- कैरोटीन जैसे विटामिन, विटामिन E , एक्रोबिक अम्ल, थियामिन, राइबोफ्लेविन और फोलिक अम्ल तथा अनेक खनिज पदार्थ विशेषरूप से लोहा, कैलशियम, सोडियम, पोटेशियम और आयोडीन का समृध्द स्रोत होते हैं। वे पादप रसायनों और एंटी-ऑक्सीडेंट्स का भी समृध्द स्रोत होते हैं। इसके अतिरिक्त, पादप मूल के ज्यादातर खाद्य पदार्थों में (तेल और तिलहनों को छोड़कर) वसा की अधिक मात्रा नहीं होती है और इनमें मौजूद वसा अपाश्चुरीकृत वसीय अम्लों- MUFAs और PUFAs में समृध्द होते हैं जो अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए भी ज़रूरी होते हैं। उनमें से कुछ आवश्यक वसीय अम्ल के नाम से जाने जाते हैं। शाकाहारी खाद्य पदार्थों में कोलेस्टेरॉल नहीं होता है। शाकाहार रक्त में कोलेस्टेरॉल के स्तर को सामान्य सीमा में रखता है और हृदय धमनी की बीमारियों से बचाने में मदद कर सकता है।

जिगर हमारे शरीर में कोलेस्टेरॉल संश्लेषण का प्रमुख स्थान है। जिगर में संश्लिष्ट कोलेस्टेरॉल का कुछ अंश पित्त अम्लों और पित्त लवणों में मिल जाता है। भोजन को पचाने और उसके अवशोषण में मदद करने के लिए आंत में उपस्थित पित्त भोजन को पचाने में मदद करता है । भोजन के पचने के बाद वह जिगर में जाता है जहां उसे फिर से अवशोषित किया जाता है।आहारीय रेशे इस चक्र को बाधित करते हैं ताकि पित्त लवण को फिर से आंत में अवशोषित होने से बचाया जा सके। इसलिए ये बिना पचे भोजन के साथ मलोत्सर्जित हो जाते हैं। रेशे कोलेस्टेरॉल उत्सर्जन को बढ़ाते हैं और जिगर में कोलेस्टेरॉल की उपलब्धता भी कम करते हैं ताकि संचरित रक्त में कोलेस्टेरॉल समृध्द कण (लाइपोप्रोटीन) मिलाएं जा सकें।

हाल ही में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि आंत्रिक विषाणु के जरिए रेशों का किण्वन होता है जिसके फलस्वरूप शॉर्ट चेन वसीय अम्ल (SFAcs) बनते हैं जो जिगर में कोलेस्टेरॉल संश्लेषण को बाधित कर सकते हैं। इससे इस तथ्य को बल मिलता है कि साबुत अनाज, दलहन (छिलके सहित) और अनेक फल और सब्जियां आहारीय रेशे का समृध्द स्रोत होते हैं। इसके अतिरिक्त फल और सब्जियां बी- कैरोटीन, विटामिन ई, विटामिन सी, और पादप रसायनों का समृध्द स्रोत होते हैं जिनमें एंटीऑक्सीडेंट गुण होते हैं यानी वे रक्त कोलेस्टेरॉल के ऑक्सीकरण को रोकते हैं। यह कोलेस्टेरॉल का मुख्य रूप है जो हमारी धमनियों की भित्तियों में जमा हो जाते हैं। ये कार्डियो प्रोटेक्टिव एजेंट भी मुक्त मूलभूत तत्वों के कारण कोशिका क्षति को रोकते हैं और इसलिए कोशिका का जीवन बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

शाकाहारी आहार मधुमेह के उपचार/नियंत्रण में भी मदद कर सकता है। आहारीय रेशे पित्त से ग्लूकोज अवशोषण की दर को नियंत्रित करते हैं और इस प्रकार भोजन के बाद रक्त ग्लूकोज में अत्यधिक वृध्दि नहीं होने देते। भोजन करने के दौरान रक्त ग्लूकोज में तेजी से कमी को भी रोका जा सकता है क्योंकि रेशे गैस को जल्दी नहीं निकलने देते। क्रोमियम और कुछ विशिष्ट विटामिन संशोधित इंसुलिन क्षमता से संबंधित पाए गए हैं। इस प्रकार, शाकाहारी आहार ग्लूकोज सहनशीलता बढ़ाने और विशिष्ट रोगियों में औष्धियों व इंसुलिन की ज़रूरत को कम करने में मदद करते हैं।

शाकाहारी आहार कैंसर रोग का जोखिम कम करने में भी मदद कर सकता है क्योंकि आहारीय रेशे अनेक रयायनों और विषैले एजेंट से लिपट जाते हैं और फलस्वरूप उनको मलोत्सर्जन के रास्ते बाहर निकाल देते हैं। अनेक विटामिन और खनिज पदार्थ भी कोशिका भित्ति की अखंडता बनाए रखने में मदद करते हैं। वे डीएनए और आरएनए जैसी कोशिका के विभिन्न अवयवों को क्षतिग्रस्त होने से बचाते हैं जिनसे टयूमर बनने की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।

पादप खाद्य पदार्थों का उपभोग उच्च रक्त चाप की आशंका को भी कम करता है। पादप खाद्य पदार्थों में मौजूद रेशे आहारीय सोडियम की कुछ मात्रा से लिपट जाते हैं और फलस्वरूप मलोत्सर्जन के जरिए उसे बाहर निकाल देते हैं। पादप खाद्य पदार्थों में पाश्चुरीकृत वसा कम होती है और कोलेस्टेरॉल नहीं होता इसलिए ये रक्त कोलेस्टेरॉल को बढ़ने से रोकते हैं। अतिकोलेस्टेरॉलरक्तता के फलस्वरूप धमनियों में कोलेस्टेरॉल जमा हो जाता है जो अप्रत्यक्ष रूप से रक्त चाप बढ़ने का कारण बनता है। शाकाहारी भोजन संतृप्ति का पूरा अहसास देता है और यह वजन काबू में रखने में भी मददगार है।

शोध अध्ययनों से संकेत मिलते हैं कि चार सप्ताह की अवधि तक आहार में रोजाना 15 ग्राम ग्वार गम ( क्लस्टर बीन्स के बीज से प्राप्त) जैसे घुलनशील रेशे शामिल करने से कुल कोलेस्टेरॉल को 13 प्रतिशत कम करने तथा भोजनोत्तर रक्त ग्लूकोज को 21 प्रतिशत कम करने में मदद मिल सकती है। गेंहू के आटे के बदले साबुत बंगाली चने के 50 ग्राम बेसन के उपभोग से कुल कोलेस्टेरॉल को 6.2 प्रतिशत कम करने में सहायता मिल सकती है। सोया आटे और जई के चोकर के अनुपूरकों के मामले में भी ऐसे ही सकारात्मक प्रभाव देखे गए हैं।

हालांकि विशुध्द रूप से शाकाहारी आहार ( जिसमें दूध और दूध उत्पाद शामिल न हों ) में प्रोटीन कम होती है। पादप खाद्य पदार्थों में प्रोटीन का प्रमुख स्रोत दलहन और गिरीदार फल हैं। मोटे अनाज सामान्य स्रोत हैं जबकि फल और सब्जियों में बहुत कम प्रोटीन होता है। इसके इसलिए आहार में प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा सुनिश्चित करने के लिए कम से कम 2-3 सर्विंग साबुत दलहन और कुछ गिरी (बादाम) जरूर खानी चाहिए। साबुत दलहनों को अंकुरित करके, मोटे अनाजों और दलहनों को मिलाकर लेने तथा मोटे अनाजों और दलहनों को खमीर उठा कर उपयोग में लाने से प्रोटीन की जैव-उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है और इस प्रकार आहार को संतुलित बनाने में सहायता मिल सकती है। शाकाहारवाद सेहत के लिए कई तरह से फायदेमंद है। मौजूदा रहन सहन और आहार संबंधित त्रुटियों के मद्देनजर अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए शाकाहार को अपनाना अच्छा विकल्प है।
••स्वतंत्र लेखक : डॉ. संतोष जैन पासी