बुधवार, 6 जुलाई 2011

कुछ महत्वपूर्ण जानकारी शाकाहारियों के लिए भी


मित्रों मांसाहार घृणित है, यह अब अधिकतर लोग जानने लगे हैं और शाकाहार अपनाने लगे हैं| यह एक अच्छा संकेत है| किन्तु हम शाकाहारी भी भ्रम में ही हैं कि हम पूर्णत: शाकाहारी हैं| शाकाहार के भ्रम में हम दैनिक जीवन में ऐसी बहुत सी खाद्द वस्तुओं का सेवन कर रहे हैं जिन्हें मांसाहार की श्रेणी में रखा जाना परम आवश्यक है| हम शाकाहारियों को पहले इन सब का त्याग करना होगा|


अधिकतर चॉकलेट Whey Powder से बनाई जाती हैं|  Cheese बनाने की प्रक्रिया में Whey Powder एक सहउत्पाद है| अधिकतर Cheese भी युवा स्तनधारियों के Rennet से बनाया जाता है| Rennet युवा स्तनधारियों के पेट में पाया जाने वाला एंजाइमों का एक प्राकृतिक समूह है, जो माँ के दूध को पचाने के काम आता है| इसका उपयोग Cheese बनाने में होता है| अधिकतर Rennet को गाय के बछड़े से प्राप्त किया जाता है, क्योंकि उसमे गाय के दूध को पचाने की बेहतर प्रवृति होती है|
(मित्रों यहाँ Cheese व पनीर में बहुत बड़ा अंतर है, इसे समझें|)
आजकल हम भी बच्चों के मूंह चॉकलेट लगा देते हैं, बिना यह जाने की इसका निर्माण कैसे होता है?

दरअसल यह सब विदेशी कंपनियों के ग्लैमर युक्त विज्ञापनों का एक षड्यंत्र है| जिन्हें देखकर अच्छे खासे पढ़े लिखे लोग इनके मोह में ज्यादा पड़ते हैं| आजकल McDonald, Pizza Hut, Dominos, KFC के खाद्द पदार्थ यहाँ भारत में भी काफी प्रचलन में हैं| तथाकथित आधुनिक लोग अपना स्टेटस दिखाते हुए इन जगहों पर बड़े अहंकार से जाते हैं| कॉलेज के छात्र-छात्राएं अपनी Birth Day Party दोस्तों के साथ यहाँ न मनाएं तो इनकी नाक कट जाती है| वैसे इन पार्टियों में अधिकतर लडकियां ही होती हैं क्योंकि लड़के तो उस समय बीयर बार में होते हैं|
मैंने भी अपने बहुत से मित्रों व परिचितों को बड़े शौक से इन जगहों पर जाते देखा है, बिना यह जाने कि ये खाद्द सामग्रियां कैसे बनती हैं? यहाँ जयपुर में ही मांस का व्यापार करने वाले एक व्यक्ति से एक बार पता चला कि किस प्रकार वे लोग मांस के साथ साथ पशुओं की चर्बी से भी काफी मुनाफा कमाते हैं| ये लोग चर्बी को काट काट कर कीमा बनाते हैं व बाद में उससे घी व चीज़ बनाते हैं| मैंने पूछा कि इस प्रकार बने घी व चीज़ का सेवन कौन करता है? तो उसने बताया कि McDonald, Pizza Hut, Dominos आदि इसी घी व चीज़ का उपयोग अपनी खाद सामग्रियों में करते हैं व वे इसे हमसे भी खरीदते हैं|

इसके अलावा सूअर के मांस से सोडियम इनोसिनेट अम्ल का उत्पादन होता है, जिससे भी खाने पीने की बहुत सी वस्तुएं बनती हैं| सोडियम इनोसिनेट एक प्राकृतिक अम्ल है जिसे औद्योगिक रूप से सूअर व मछली से प्राप्त किया जाता है| इसका उपयोग मुख्यत: स्वाद को बढाने में किया जाता है|

बाज़ार में मिलने वाले बेबी फ़ूड में इस अम्ल को उपयोग में लिया जाता है, जबकि १२ सप्ताह से कम आयु के बच्चों के भोजन में यह अम्ल वर्जित है|
इसके अतिरिक्त विभिन्न कंपनियों के आलू चिप्स व नूडल्स में भी यह अम्ल स्वाद को बढाने के लिए उपयोग में लाया जाता है| नूडल्स के साथ मिलने वाले टेस्ट मेकर के पैकेट पर इसमें उपयोग में लिए गए पदार्थों के सम्बन्ध में कुछ नहीं लिखा होता| Maggi कंपनी का तो यह कहना था कि यह हमारी सीक्रेट रेसिपी है| इसे हम सार्वजनिक नहीं कर सकते|
चुइंगम जैसी चीज़ें बनाने के लिए भी सूअर की चर्बी से बने अम्ल का उपयोग किया जाता है|

इस प्रकार की वस्तुओं को प्राकृतिक रूप से तैयार करना महंगा पड़ता है अत: इन्हें पशुओं से प्राप्त किया जाता है|

  • Disodium Guanylate (E-627) का उत्पादन सूखी मछलियों व समुद्री सेवार से किया जाता है, इसका उपयोग ग्लुटामिक अम्ल बनाने में किया जाता है|
  • Dipotassium Guanylate (E-628) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग स्वाद बढाने में किया जाता है|
  • Calcium Guanylate (E-629) का उत्पादन जानवरों की चर्बी से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है|
  • Inocinic Acid (E-630) का उत्पादन सूखी मछलियों से किया जाता है, इसका उपयोग भी स्वाद बढाने में किया जाता है|
  • Disodium Inocinate (e-631) का उत्पादन सूअर व मछली से किया जाता है, इसका उपयोग चिप्स, नूडल्स में चिकनाहट देने व स्वाद बढाने में किया जाता है|
इन सबके अतिरिक्त शीत प्रदेशों के जानवरों के फ़र के कपडे, जूते आदि भी बनाए जाते हैं| इसके लिए किसी जानवर के शरीर से चमड़ी को खींच खींच कर निकाला जाता है व जानवर इसी प्रकार ५-१० घंटे तक खून से लथपथ तडपता रहता है| तब जाकर मखमल कोट व कपडे तैयार होते हैं और हम फैशन के नाम पर यह पाप पहने मूंह उठाए घुमते रहते हैं|

यह सब आधुनिकता किस काम की? ये सब हमारे ब्रेनवाश का परिणाम है, जो अंग्रेज़ कर गए|

अधिकतर जानकारी का स्त्रोत यहाँ व यहाँ है...

बंद करो ये अत्याचार


मित्रों एक मित्र ने ये कविता मुझे भेजी...किसने लिखी है पता नहीं, किन्तु जिसकी भी ये कृति है उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद...



बंद करो ये लहूधार का , जीवन का व्यापार
मूक पशू की पीड़ा समझो,अपनाओ शाकाहार

अरे मनुज ने मानवता तज , पशुता का यह मार्ग चुना
नीच कर्म यह महापाप है , सब पापों से कई गुना

दर दर भटके शांति खोजता , मानवता के नारों में
 उलझा तीन टके के पीछे , पशू वध के व्यापारों में

कहाँ सुकून मिलेगा हमको,जब हर घर में चित्कार है
लाल लहू से जीभ रंगी है , अरु हाथों में तलवार है

चोट यदि मुन्ने को लगती , तब कितनी पीड़ा होती है
क्यों कोई फर्क नहीं पड़ता,जब बकरे की अम्मा रोती है

कई माओं की छिपी व्यथा है,तेरी षटरस थाली में
कई वधों की लिखी कथा , तेरे होटों की लाली में

मंदिर में पूजे गोमाता , कब घर में आदर पाती है
दूध पिलाना बंद करे तो , गाय कतल की जाती है

आज यदि पशू रोता है तो , कल तेरी भी बारी है
इन तलवारों की धारों की , नहीं किसी से यारी है

अरे पशू की छोड़ो चिंता , अब अपनी ही बात करो
रहे नहीं जो यदि काम के ,वे बोलेंगे अपघात करो

कहो कहाँ दरकार रही , अब बाहर के शत्रु की
गर्भपात कर करते ह्त्या,खुद अपने शिशुओं की

मेरी तेरी हो या पशुओं की , अरे जान तो जान है
इसमें उसमें जो फर्क करे,वह कायर है,बेईमान है

मांसाहार का दूषण लोगों,नहीं दूर क्षितिज का रहा अन्धेरा
आज द्वार पर दस्तक देता , जाने कब कर लेगा डेरा

अरे अश्रु की धाराओं ने , अपने आशय खो डाले
अरे लहू के लाल रंगों से , खेलें बालक भोले भाले

उनके जीवन में कहाँ दया , क्या प्रेम भावना रह पायेगी
खुद ही आपको लुटा पाओगे , जब बाढ़ खेत को खायेगी

करे शूल का बीजारोपण , उगता पेड़ बबूल का
अनंत काल भुगतोगे दूषण,एक समय की भूल का

इससे पहिले की लुट जाएँ, जाग्रत हो जाना चाहिए
हम भी रहें शाकाहारी , औरों को बनाना चाहिए

अब नेक दयालू युवकों ने , छेड़ दिया अभियान
अरे निरीह पशुओं के प्रति अब,करलो युद्धविराम

तुम खुद भी हो जीव, जीव का रखो तो सम्मान
नहीं बनो कातिल हत्यारे, तुम तो हो भगवान्

अरे! एक जीवन की खातिर, कितने जीवन छीनोगे
अपनी उनकी एक जात है, कब इस सच को चीन्होगे


शनिवार, 2 जुलाई 2011

गैया की पुकार





ए हिंद देश के लोगों, सुन लो मेरी दर्द कहानी।
क्यों दया धर्म विसराया, क्यों दुनिया हुई वीरानी।

जब सबको दूध पिलाया, मैं गौ माता कहलाई,
क्या है अपराध हमारा, जो काटे आज कसाई।
बस भीख प्राण की दे दो, मै द्वार तिहारे आई,
मैं सबसे निर्बल प्राणी, मत करो आज मनमानी॥

जब जाउँ कसाईखाने, चाबुक से पीटी जाती,
उस उबले जल को तन पर, मैं सहन नहीं कर पाती।
जब यंत्र मौत का आता, मेरी रुह तक कम्प जाती,
मेरा कोई साथ न देता, यहाँ सब की प्रीत पहचानी॥

उस समदृष्टि सृष्टि नें, क्यों हमें मूक बनाया,
न हाथ दिए लड़नें को, हिन्दु भी हुआ पराया।
कोई मोहन बन जाओ रे, जिसने मोहे कंठ लगाया,
मैं फर्ज़ निभाउँ माँ का, दूँ जग को ममता निशानी॥

मैं माँ बन दूध पिलाती, तुम माँ का मांस बिकाते,
क्यों जननी के चमड़े से, तुम पैसा आज कमाते।
मेरे बछड़े अन्न उपजाते, पर तुम सब दया न लाते,
गौ हत्या बंद करो रे, रहनें दो वंश निशानी॥

                             --रचनाकार (अज्ञात गौ-प्रेमी)

(लय है, ए मेरे वतन के लोगों…)

बुधवार, 29 जून 2011

प्राकृतिक संसाधनो का संयत उपभोग मानव का कर्तव्य



मानव सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी है। इस नाते, प्रकृति संरक्षण के प्रति उत्तरदायित्व पूर्वक सोचना भी, मानव का कर्तव्य हो जाता है। उससे कमसे कम यह तो अपेक्षा की ही जाती है कि  वह अपना भोजन प्रबंध कुछ इस प्रकार करे कि, आहार की इच्छा होने से लेकर, उस आहार को ग्रहण करने तक, सृष्टि की जीवराशी कम से कम खर्च हो। आहार संयम ही आहार की ‘संस्कृति’ है। जहां तक सम्भव हो वह प्रकृति के आहार उत्पादों का संयत उपभोग करे। हिंसा में संयम रखते हुए जितना भी हिंसा से बच  सके उसे बचना चाहिये। और क्रूरत्तम हिंसा का तो सर्वथा त्याग करना चाहिए। प्रकृति और अर्थशास्त्र में मितव्ययता का सिद्धांत है कि संसाधनो का विवेक पूर्वक और ज्यादा से ज्यादा दक्षता से उपभोग किया जाय। अर्थात् कम से कम संसाधन खर्च कर अधिक से अधिक उसका लाभ प्राप्त किया जाय। मानव के पास ही वह बुद्धिमत्ता और क्षमता है कि वह उपलब्ध संसाधनो का सर्वोत्तम प्रबंध करने में सक्षम है। 
 


इसलिए आहार का चुनाव करते समय हमें अपने विवेक को वैज्ञानिक अभिगम देना होगा। वैज्ञानिक दृष्टिकोण यह है कि सृष्टि में जीवन विकास, सुक्षम एकेन्द्रिय जीव से प्रारंभ होकर क्रमशः पंचेंद्रिय तक पहुँचा है। ऐसे में यदि हमारा जीवन निर्वाह कम से कम विकसित जीवों (एकेन्द्रिय जीव) की हिंसा से हो सकता है तो हमें कोई अधिकार नहीं हम उससे अधिक विकसित जीवों की आहार के लिए अनावश्यक हिंसा करें। विकास के दृष्टिकोण से पूर्ण विकसित ( पशु) की हिंसा,  प्रकृति का जघन्य शोषण है। 

प्रकृति के दोहन के परिपेक्ष्य में देखें तो शाकाहार प्रथम स्टेज का भोजन है क्योंकि वनस्पति सूर्य आदि प्रकृतिक संसाधनों से सीधे और स्वयं अपना भोजन बनाती है और अपने भोजन में शाकाहार लेकर हम प्रथम श्रेणी व स्तर का भोजन प्राप्त कर लेते है। जबकि मांसाहार दूसरे स्टेज का भोजन है। मांसाहार में वनस्पति आदि प्राकृतिक संसाधनो का दोहरा ही नहीं, कईं गुना अधिक उपभोग होता है। एक तो हम सीधे शाकाहार से  ही आवश्यक उर्ज़ा प्राप्त करते है, वहीं मांस प्राप्त करने के लिए लगभग 16 गुना अनाज पशु को खिलाना पडता है इतना ही नहीं, साथ ही कईं गुना पानी,समय और संसाधन उस पर व्यय कर दिए जाते है, तब जाकर 1 किलो माँस का प्रबंध हो पाता है।

यदि सभ्यता विकास और शान्त सुखप्रद जीवन ही मानव का लक्ष्य है तो उसे शाकाहार के स्वरूप में प्रकृति के संसाधनों का कुशल प्रबंध करना ही होगा।

शुक्रवार, 24 जून 2011

आपका धर्म भी तो यही कहता है !

श्रीमद्भगवद गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं----"सर्वभूत हिते रत्ता" अर्थात सम्पूर्ण भूत प्राणियों के हित में रत और सम्पूर्ण प्राणियों का सुह्रद रहो. जो शुभफल प्राणियों पर दया करने से होता है, वह फल न तो वेदों से, समस्त यज्ञों के करने से और न ही किसी तीर्थ, वन्दन अथवा स्नान-दान इत्यादि से होता है.

जीवितुं य: स्वयं चेच्छेत कथं सोन्यं प्रघात्तयेतु !
यद्यदात्मनि चेच्छेत तत्परस्यापि चिन्तयेत !!
जो स्वयं जीने की इच्छा करता है, वह दूसरों को भला कैसे मार सकता है ? प्राणी जैसा अपने लिए चाहता है, वैसा ही दूसरों के लिए भी चाहे. कोई भी इन्सान यह नहीं चाहता कि कोई हिँसक पशु या मनुष्य मुझे, मेरे बाल-बच्चों, इष्टमित्रों वा आत्मीयजनों को किसी प्रकार का कष्ट दे या हानि पहुँचाये अथवा प्राण ले ले या इनका माँस खाये. एक कसाई जो प्रतिदिन सैकडों प्राणियों के गले पर खंजर चलाता है, आप उसको एक बहुत छोटी और बारीक सी सूईं भी चुभोयें, तो वह उसे भी कभी सहन नहीं करेगा. फिर अन्य प्राणियों की गर्दन काटने का अधिकार उसे भला कहाँ से मिल गया ?
मित्रस्य चक्षुणा सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे !!
हम सब प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखें. इस वेदाज्ञानुसार सब प्राणियों को मित्रवत समझकर सेवा करें, सुख दे. इसी में जीवन की सफलता है. इसी से यह लोक और परलोक दोनों बनते हैं.

फिर दूसरों के प्रति हमें वैसा बर्ताव कदापि नहीं करना चाहिए, जिसे हम अपने लिए पसन्द न करें. कहा भी है, कि------"आत्मन प्रतिकूलानि परेषा न समाचरेत". लेकिन देखिए दुनिया में कितना बडा विरोधाभास है, जहाँ एक ओर हम भगवान से "दया के लिए" प्रार्थना करते हैं और वहीं दूसरे प्राणियों के प्रति क्रूर हो जाते हैं-------How is that man who prays for money, is himself not merciful towards other fellow beings.


इस्लामिक धर्मग्रन्थ कुरआन शरीफ का आरम्भ ही "बिस्मिल्लाह हिर रहमान निर रहीम" से होता है. जिसका अर्थ है कि खुदा रहीम अर्थात "सब पर रहम" करने वाला है. इनके अनुनायियों के मुख से भी सदैव यही सुनने को मिलता है कि अल्लाह अत्यन्त कृपाशील दयावान है .वही हर चीज को पैदा करने वाला और उसका निगहबान(Guardian ) है. अब जीभ के स्वाद के चक्कर में मनुष्य उस "निगहबान" की देखरेख में उसी की पैदा की हुई चीज की हत्या करे, तो क्या यह अत्यन्त विचारणीय प्रश्न नहीं ?

श्री अरविन्द कहते रहे हैं कि-----"जो भोजन आप लेते हैं, उसके साथ न्यूनाधिक मात्रा में उस पशु की जिसका माँस आप निगलते हैं, चेतना भी लेते हैं"

भगवान बुद्ध नें "माँस और खून के आहार" को अभक्ष्य और घृणा से भरा और 'मलेच्छों द्वारा सेवित' कहा है.  

सिक्ख धर्म के जनक गुरू नानक देव जी कहते हैं-----"घृणित खून जब मनुष्य पियेगा, तो वह निर्मल चित्त
भला कैसे रह सकेगा."

पारसी धर्म के प्रणेता जोरास्टर नें कसाईखानों को पाप की आकर्षण शक्ति का केन्द्र बताया है और क्रिस्चियन धर्मग्रन्थ बाईबल में कहा गया हैं----" जब तुम बहुत प्रार्थना करते हो, मैं उन्हे नहीं सुनूँगा, क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से रंगे हैं". चीनी विद्वान कन्फ्यूनिस नें भी जहाँ "पशु आहार को संसार का सर्वाधिक अनैतिक कर्म" कहा है, वहीं रामकृष्ण परमहँस का कहना है, कि-----"सात्विक आहार-उच्च विचार मनुष्य को परम शान्ति प्रदान करने का एकमात्र साधन है".

भगवान महावीर नें अहिँसा को "अश्रमों का ह्रदय", "शास्त्रों का गर्भ" (Nucleous) एवं "व्रत-उपवास तथा सदगुणों का पिंडी भूतसार" कहा है. और संसार में जितने प्राणी है, उन सबको जानते हुए या अनजाने में भी कोई कष्ट न देना ही धर्म का एकमात्र मूल तत्व है.

आपने देखा कि मनुष्य जाति के इतिहास में शायद ही कोई ऎसा धर्म अथवा धर्मशास्त्र होगा, जिसमें अहिंसा को सबसे ऊँचा स्थान न दिया गया हो. लेकिन इन्सान, जो कि अपने स्वयं का आसन इस संसार के अन्य समस्त प्राणियों से कहीं ऊँचा समझता है. क्या उस पर बैठकर उसे अपने खानपान का इतना भी विवेक नहीं कि वह सही मायनों में मानव बनना तो बहुत दूर की बात रही, एक पशु से ही कुछ सीख ले सके. एक पशु भी इस बात को अच्छी तरह समझता है कि उसके लिए क्या भक्ष्य है और क्या अभक्ष्य. उसे कोई सिखानेवाला नहीं है, फिर भी वो अपने आहार का उचित ज्ञान रखता है, परन्तु इन्सान पशु से भी इतना नीचे गिर गया है कि दूसरों के द्वारा परामर्श दिए जाने पर भी वह अपने को उसी रूप में गौरवशाली समझता है. क्या एक समझदार आदमी से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो अपना पौरूष अपने से निर्बल प्राणी को मारकर अथवा उसे खाकर ही दिखाये ?. विधाता नें इन्सान के खाने के लिए स्वादु मधुर, पौष्टिक, बुद्धिवर्धक और हितकर इतने पदार्थ बना रखे हैं कि उनको छोडकर एक निकृष्ट अभक्ष्य पदार्थ पर टूट पडना कहाँ तक उचित है ?

यह कहना सर्वथा उचित ही होगा कि माँसाहार को छोड देने वाला व्यक्ति अन्य अनेक प्रकार की बुराईयों से भी स्वत: ही मुक्त हो जायेगा. इसलिए मेरा यही कहना है कि जो लोग इस बुराई से दूर रहे हैं, उनकी अपेक्षा वे लोग कहीं अधिक साहसी माने जायेंगें, जो इस लत को लात मारकर निरीह पशुओं के आँसू पोंछेंगें.
पक्षी और चौपाये सब मार-मार के खाय,
फिर भी सगर्व खुद को इन्सान कहाये !
बन के मर्द बहादुरी, मूक जीवों पर दिखलाये !
क्यूं  तुझे लाज नहीं आये ?

शुक्रवार, 10 जून 2011

हिंसा के क्रूर-अक्रूर आयाम


पशु हिंसा और वनस्पति हिंसा को क्रूरता का एक ही आयाम नहीं दिया जा सकता। 

अधिकतर शाकाहारी पदार्थ, पेड पौधो को सम्पूर्ण खत्म किए बिना ही प्राप्त किए जाते है, जैसे फ़ल,तरकारी आदि वह भी पककर पेड पौधों से अलग हो जाय तो एक पेड की पूर्ण हिंसा नहीं होती। या कुदरती अलग होने के पूर्व काट कर अलग किया जाय तब भी पुरे पेड का नाश नहीं होता। और जब पौधे कुदरती निर्जीव हो जाते है तब अनाज दालें आदि प्राप्त होती है। जबकि मांस जीव को जीवन रहित करके ही प्राप्त किया जा सकता है।

आप गाय, भैंस, बकरी का दूध दुहते हैं तो ये पशु न तो मर जाते हैं और न ही दूध दुहने से बीमार हो जाते हैं। दूध को तो प्रकृति ने बनाया ही भोजन के रूप में है। और वह बछडे के आहार से अतिरिक्त ही होता है।पर किसी भी पशु के जीवन का अन्त कर देना  तो अनेकों धर्मों में इसको बुरा ही माना गया है।

साधारण सी हिंसा तो वनस्पतिजन्य आहार में भी सम्भव है, लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि जब सभी तरह के आहार में हिंसा है, तो जानबुझ कर आहार के लिए सबसे क्रूरत्तम हिंसा का तरीका अपना लिया जाय। यहाँ हमारा विवेक कहता है, जितना हिंसा से बचा जा सके, बचना चाहिये।
जो कोई भी यह कुतर्क देते है वे तो चराचर पशुओं तक में रुह या जीव ही नहीं मानते, और उनकी जीव-हिंसा को हिंसा ही नहीं मानते तो शाकाहार में ‘सुक्ष्म व स्थूल जीवो की हिंसा क्यों करते हो’ यह कुतर्क दुर्भावनापूर्ण है। और यदि सभी तरह के आहार में जीव हिंसा स्वीकार करने के बाद दुष्टता पूर्वक बडे जीव की हिंसा करना तो क्रूरता की इन्तेहा ही कहलाएगा। और जानकर भी सुक्ष्म जीव-हिंसा में सावधानी न बरतना, मूढता की अति है।

हमें यह न भुलना चाहिए, कि एक समान दिखने वाले कांच और हीरे के मूल्य में अंतर होता है। और वह अंतर उनकी गुणवत्ता के आधार पर होता है। उसी प्रकार एक बकरे के जीव और एक केले के जीव के जीवन-मूल्य में भी अंतर है। पशुपक्षी में चेतना जागृत होती है उन्हें मरने से भय भी लगता है। उनमें पाँच इन्द्रिय होती है जीव पाँचो इन्द्रिय से सुख अथवा दुख भोगता है,महसुस करता है। इन्द्रिय अव्यवों के त्रृटिपूर्ण होने पर भी पांच इन्द्रिय जीव मृत्युवेदना सभी इन्द्रिय सम्वेदको से महसुस करता है। इसीलिए जितनी ज्यादा इन्द्रिय समर्थ जीव उतनी ही ज्यादा वेदना-पीडा उसे पहुँचती है।

प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद उद्देश्य से मार खाना क्रूरता का अतिरेक है। मानवीय बे-रहमी की पराकाष्ठा है।

शुक्रवार, 3 जून 2011

आप कितने बुद्धिमान हैं?

नीर-क्षीर विवेक सुलभ होता तो संसार के बहुत से झगडे कब के मिट गये होते। कभी हम सिक्के का एक ही पहलू देख पाते हैं और कभी अपने सीमित अनुभव को ही विशद ज्ञान समझ बैठते हैं। असतो मा सद्गमय का उद्घोष करने वाली भारतीय संस्कृति में कूप-मंडूकता की अपेक्षा वसुधैव कुटुम्बकम को ही महत्व दिया गया है। हमारी संस्कृति ज्ञानमार्गी है। इसमें अहम्  और स्वार्थ के स्थान पर  "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" और प्रियस्कर की जगह श्रेयस्कर को ही चुना गया है। बुद्धिमान अपने-पराये के भेद से ऊपर उठकर सत्य के मार्ग को चुनते हैं विषय चाहे खान-पान या स्वच्छता जैसा व्यक्तिगत आचरण का हो या भाषा, धर्म या नीति जैसा सार्वभौमिक हो।

करुणा और अहिंसा की बात आने पर हममें से शायद ही कोई इनके महत्व को कम आंकेगा परंतु  खान-पान की शुचिता की बात चलते ही कुछ लोग आक्रामक मुद्रा में आ जाते हैं। पक्ष-विपक्ष में तर्क दिये जाते हैं और सामान्य बात भी विवाद में बदल जाती है। मैं तो आमतौर पर ऐसे विषयों पर बात करने से बचता हूँ परंतु जन स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हूँ इसलिये इस विषय में होने वाले वैज्ञानिक अध्ययनों को पढता ज़रूर हूँ और उनसे मिले अमृत को बांटने का प्रयास भी करता हूँ।

ऐसा ही अमृत कलश हाथ लगा है ब्रिटेन में कैथरीन गेल के नेतृत्व में हुए अध्ययन के रूप में। इस अध्ययन में 30 वर्ष की आयु के 8170 लोगों की आहारवृत्ति और बुद्धि अंक की जानकारी ली गयी थी जोकि इस प्रकार के सामान्य अध्ययनों के मुकाबले एक बहुत बडी संख्या है।

विधि
30 वर्ष की आयु के 11,207 लोगों का साक्षात्कार करके उनकी जीवन शैली का अध्ययन किया गया। इनमें से 8,170 लोगों के बुद्धि अंक (IQ) का आंकडा सन् 1970 के स्कूल रिकार्ड में उपलब्ध था। अंतिम विश्लेषण में केवल इन्हीं 8,170 व्यक्तियों को शामिल किया गया।

परिणाम
8,170 में से 9 व्यक्ति वीगन हुए थे, 366 व्यक्ति शाकाहारी हो चुके थे, और 133 कभी-कभार मच्छी-मुर्गी खाने वाले थे। शेष 7,666 व्यक्ति मांसाहारी ही रहे थे। जब इन परिणामों का मिलान इन लोगों के दस वर्ष की आयु के बुद्धि अंकों से किया गया तो पता लगा कि शाकाहारी हो गये बालकों का औसत बुद्धि अंक 106.1 और मांसाहारी बालकों का 100.6 था। बालिकाओं के मामले में यह संख्यायें क्रमशः 104.0 व 99.0 थीं।

निष्कर्ष
बुद्धिमान बच्चो के बडे होने तक शाकाहार अपनाने की सम्भावना सामान्य बच्चो के मुकाबले कहीं अधिक होती है।

अध्ययनकर्ता
इस अध्ययन में लगे लोग ब्रिटेन में रहने वाले अभारतीय और गैर-हिन्दू हैं मतलब यह कि उनकी पृष्ठभूमि मांसाहार की है। ब्रिटिश मूल और राष्ट्रीयता वाले चारों अध्ययनकर्ताओं में से एक शाकाहारी है और एक मांसाहारी जबकि अन्य दो अपने को मांसाहार से बचने वाला सर्वभक्षी कहते हैं। मांसाहारी अध्ययनकर्ता का (दस वर्ष की आयु का) बुद्धि अंक उपलब्ध है पर बताया नहीं गया है जबकि अन्य तीन का बुद्धि अंक दर्ज़ नहीं हुआ था।

व्यवसाय
यद्यपि इस अध्ययन के शाकाहारी व्यक्ति अन्य लोगों से बुद्धिमत्ता, शिक्षा और व्यवसाय, तीनों में ही आगे थे, उनकी आय में कोई विशेष अंतर नहीं पाया गया। उनके व्यवसाय के प्रकार अधिक नैतिक समझे जाने वाले थे, यथा 9% मांसाहारियों की अपेक्षा 17% शाकाहारी शिक्षा के क्षेत्र में थे।

ब्रिटिश मेडिकल जर्नल
IQ in childhood and vegetarianism in adulthood: 1970 British cohort study

Keywords
Catharine R Gale, Ian J Deary, G David Batty, Ingrid Schoon, Benjamin Franklin, George Bernard Shaw, Leonardo di ser Piero da Vinci

मंगलवार, 31 मई 2011

हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है।


हिंसा को कम से कमत्तर (अल्पीकरण) करनें का पुरूषार्थ स्वयं में अहिंसा है। साथ ही यह अहिंसा के मार्ग पर दृढ कदमों से आगे बढने का उपाय भी है अथवा यूँ कहिए कि अल्पीकरण का निरन्तर संघर्ष ही अहिंसा के सोपान है। जब सुक्ष्म हिंसा अपरिहार्य हो, द्वेष व क्रूर भावों से बचते हुए, न्यूनता का विवेक रखना, अहिंसक मनोवृति है। यह प्रकृति-पर्यावरण नियमों के अनुकूल है। बुद्धि, विवेक और सजगता से अपनी आवश्यकताओं को संयत व सीमित रखना अहिंसक वृति की साधना है।

अहिंसा में विवेक के लिये दार्शनिकों ने तीन आयाम प्रस्तुत किए है। पहला आयाम हैं संख्या के आधार पर, जैसे 5 की जगह 10 जीवों की हिंसा दुगुनी हिंसा हुई। दूसरा आयाम है जीव की विकास श्रेणी के आधार पर एक इन्द्रिय, दो इन्द्रिय विकास क्रम के जीवों से क्रमशः तीन, चार अधिक विकसित है और पांच इन्द्रिय जीव पूर्ण विकसित। यह विवेकजन्य व्यवहार, विज्ञान सम्मत और नैतिक अवधारणा से पुष्ट तथ्य है। अत: हिंसा की श्रेणी भी उसी क्रम से निर्धारित होगी। तीसरा आयाम है, हिंस्र भाव के आधार पर। प्रायः अनजाने से लेकर जानते हुए, स्वार्थवश से लेकर क्रूरतापूर्वक तक आदि मनोवृति व भावनाओं की कईं श्रेणी होती है। प्रथम दृष्टि हिंसा पर सोचना होगा कि उसकी भावना करूणा की है, अथवा परमार्थ की?  स्वार्थ की है या अहंपोषण की?  निर्थक उपक्रम है या उद्देश्यपूर्ण?

एक उदाहरण से समझते है- एक लूटेरा घर लूटने के प्रयोजन से, घर के बाहर सुस्ताने बैठे, किसी अन्य व्यक्ति को खतरा मान हत्या कर देता है। दूसरा, एक कारचालक, जिसकी असावधानी से राहगीर उस गाडी के नीचे आ जाता है। तीसरा, एक डॉक्टर, जिसकी ऑपरेशन  टेबल पर जान बचाने के भरसक  प्रयास के बाद भी मरीज दम तोड़ देता है। तीनो किस्सों में मौत तो होती है, पर भावनाएं अलग अलग है। इसलिए दोष भी उन भावों की श्रेणी के अनुसार होना चाहिए। प्रायः न्यायालय में भी, हत्या के आरोपी को स्वबचाव, सहज स्वार्थ और क्रूर घिघौनी मनोवृति के आधार पर सजा निर्धारित होती है।

चित्र: द जैन युनिवर्स
मनोवृति आधारित जैन दर्शन में ‘लेश्या’ का एक अभिन्न दृष्टांत है। छह पदयात्री जा रहे थे। जोर की भूख लगी थी। रास्ते में एक जामुन का पेड़ दिखाई दिया। एक यात्री बोला- ‘अभी इस पेड़ को जड़ से काट कर सभी का पेट भर देता हूँ। इस पर दूसरा बोला-‘जड़ से काटने की जरूरत नहीं, शाखा को काट देता हूँ धराशायी होगी तो सभी फल पा लेंगे। तीसरा  व्यक्ति एक टहनी, तो चौथा फलों के गुच्छे को ही पर्याप्त होने की बात करता है। पाँचवा मात्र गुच्छे से फल चुननें की वकालत करता है तो छठा कहता है पक कर जमीन पर बिखरे पड़े जामुनों से ही हमारा पेट भर सकता है। यह मानव मन की मनोवृतियों का,  क्रूरत्तम से शुभत्तम भाव निश्चित करने का एक श्रेष्ठ और दुर्लभ उदाहरण है।

अतः हिंसा और अहिंसा को उसके संकल्प, समग्र सम्यक् दृष्टिकोण, सापेक्षनिर्भर और परिणाम के सर्वांगिण परिपेक्ष्य से ग्रहण करना आवश्यक है।

रविवार, 29 मई 2011

दुर्गम क्षेत्र में रहने वालों को शाकाहार उपलब्ध नहीं, इसलिए!!

बेशक आहार परिवेश से निर्धारित होता है, किन्तु परिवेश स्वयं भी सभ्यता और संस्कृति से निर्धारित होता है। सहज उपलब्ध में निर्दोष आहार को प्राथमिकता देना ही विवेकशील संस्कृति है। शाक उपज से अभावग्रस्त, दुर्गम, बंजर परिवेश में उपलब्ध आहार ग्रहण करना, उस परिवेश की विवशता हो सकती है। किन्तु उपज समृद्ध, फलद्रुप, सभ्य परिवेश में आहार भी तो सभ्य ही होना चाहिए। सुसंस्कृत मानवों की भोजन निति की तुलना असभ्य मानवों की विवशता निमित अपवाद से करना असंगत है हम सर्वोच्छ विकसित सभ्यता के बीचोंबीच बैठकर यह सोचें कि कहीं आदिम-जंगली व्यवहार अभी भी कायम है। अतः हम सबको भी आदिम-जंगली भक्षण व्यवहार जारी रखना चाहिए, यह सोच तो अपने आप में आदिम हैं। और इस तरह उनकी जंगली आदतों का सभ्य परिवेश में समर्थन करना तो सभ्यता को पुनः आदिम युग में धकेलने समान होगा। 

फ़िर भी यदि आधुनिक यातायात संसाधनो से दुर्गम क्षेत्र के निवासियों को शाकाहार-विकल्प मुहैया करवाया जाय तो निश्चित ही वे हिंसा की दृष्टि से तुलना करते हुए शाकाहार ही स्वीकार करेंगे। आज बंजर धरती को हराभरा बनाया जा सकता है। समुद्र की वनस्पतियाँ बड़े पैमाने पर उपभोग जाती हैं. उनकी खेती भी की जा सकती है। आधुनिक यातायात माध्यमों से, निवास-प्रतिकूल प्रदेशों में भी शाकाहार के व्यापक प्रबंध किए जा सकते हैं।