गुरुवार, 14 मार्च 2013

निरामिष परिचय

निरामिष शब्दार्थ व भावार्थ:-

निरामिष : मांसरहित (fleshless)

निरामिष आहार : ऐसा खाद्य पदार्थ या भोजन जिसमें आमिष अर्थात् मांस या सामिष अर्थात् मांस के अंश या मांस स्वरूप अंडा या मछली न मिला हो।

निरामिष व्यक्ति : जो मांस, अंडा, मछली आदि न खाता हो।

अर्थात्, निरामिष आहार एक ऐसा शाकाहार है जिसमें दुग्ध पदार्थ सम्मलित है। शाकाहार के आधुनिक श्रेणी में हम निरामिष आहार को लैक्टो-शाकाहार ( lacto-vegetarian ) कह सकते है। परम्परागत भारतीय संदर्भ में शुद्ध शाकाहार या सात्विक आहार का आशय “निरामिष” आहार से ही है। अर्थात वह आहार जिसमें किसी भी प्रकार के मांस या मांस-व्युत्पन्न पदार्थ, अंडा मछली आदि उत्पाद शामिल न हो।

प्रारंभिक काल से ही निरामिष आहार घनिष्ठ रूप से प्राणियों के प्रति अहिंसा व अनुकम्पा से जुड़ा हुआ है। अहिंसा के जीवन मूल्यों में प्रत्येक जीवन के प्रति आदर व्यक्त हुआ है। अहिंसा में दया का सद्भाव है, जो प्राणीमात्र के लिए शान्ति का मार्ग प्रशस्त करती है।

जीवदया का मार्ग निरामिष आहार से प्रशस्त होता है। मनुष्य के हृदय में तब तक अहिंसा भाव परिपूर्णता से स्थापित नहीं हो सकता जब तक उसमें निरीह जीवों की हत्या कर मांसाहार करने का जंगली संस्कार विद्यमान हो। जब मात्र स्वाद और पेट्पूर्ती के लिए मांसाहार का चुनाव किया जाता है तो मांसाहार के उद्देश्य से प्राणी हत्या, मानस में क्रूर भाव का आरोपण करती है जो निश्चित ही हिंसक मनोवृति के लिए जवाबदार है। मांसाहार द्वारा कोमल सद्भावनाओं का नष्ट होना व स्वार्थ व निर्दयता की भावनाओं का पनपना आज विश्व में बढ़ती हिंसा, घृणा व अपराधों का मुख्य कारण है। जीवदया और करूणा भाव हमारे मन में कोमल सम्वेदनाओं को स्थापित करते है। यही सम्वेदनाएं हमें मानव से मानव के प्रति भी सम्वेदनशील बनाए रखती है। शाकाहार मानवीय जीवन-मूल्यों का संरक्षक है। आज संसार में यदि शान्ति लक्षित है तो समस्त मानव समाज को निरामिष आहार अपना लेना चाहिए। क्योँकि अहिंसा ही शान्ति और सुख का अमोघ उपाय है।

मांसाहार में कोमल भावनाओं के नष्ट होने की संभावनाएं अत्यधिक ही होती है। हर भोजन के साथ उसके उत्पादन और स्रोत पर चिंतन हो जाना स्वभाविक है। हिंसक कृत्यों व मंतव्यो से ही उत्पन्न माँस, हिंसक विचारों को जन्म देता है। ऐसे विचारों का बार बार चिंतवन, अन्ततः परपीड़ा की सम्वेदनाओं को निष्ठुर बना देता है। हिंसक दृश्य, निष्ठुर सोच और परपीड़ा को सहज मानने की मानसिकता, हमारी मनोवृति पर दुष्प्रभाव डालती है। भले यह मात्र सम्भावनाएँ हो, इन सम्भावनाओं देखते हुए,  सावधानी जरूरी है कि घटित होने के पूर्व ही सम्भावनाओं पर ही लगाम लगा दी जाय। विवेकवान व्यक्ति परिणामो से पूर्व ही सम्भावनाओं पर पूर्णविराम लगाने का उद्यम करता है। हिंसा के प्रति जगुप्सा के अभाव में अहिंसा की मनोवृति प्रबल नहीं बन सकती।


“निरामिष” ब्लॉग, शाकाहार के प्रसार, प्रचार और जागृति को समर्पित एक सामुदयिक ब्लॉग है। “निरामिष”, स्वस्थ समाज निर्माण के उद्देश्य के प्रति निष्ठावान है। "निरोगी काया, निर्विकार मन, निरामय समाज।" हमारा नीति – वाक्य है। 'निरामिष ब्लॉग', तथ्यनिष्ठ, प्रमाणिक और विश्वसनीय जानकारी प्रस्तुत करने के लिए प्रतिबद्ध है।

बुधवार, 6 मार्च 2013

मैं शाकाहार क्यों अपनाऊँ ? जब कि मैं हमेशा से मांसाहार लेता रहा हूँ और मुझे वह पसंद भी है?

जब हम शाकाहार का प्रसार करने के प्रयास करते हैं तब अक्सर यह दो प्रश्न उठते हैं :

१. आप शाकाहारी हैं - यह आपका निजी निर्णय हैं । लेकिन मेरा भोजन मेरा निर्णय है । मैं मेरे भोजन को आपकी विचारधारा के अनुरूप क्यों बदलूँ ?

२. मैं आपसे तो आपका भोजन बदलने को नहीं कह रहा / रही । फिर आप मेरे भोजन के पीछे क्यों हाथ धोकर पड़े हुए हैं ?  
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कुछ उत्तरों पर नज़र डालते हैं : ४ कारण 

1. हम लोग "आपके जीवन / आपकी विचारधारा / आपका भोजन" बदलने के प्रयास नहीं कर रहे । 

नहीं । 
हम बदलने का प्रयास कर रहे हैं उन करोड़ों निरीह प्राणियों का जीवन , जो आपके १५ मिनट के "भोजन" के लिए बरसों का दर्दभरा जीवन / दर्द / भय / यातना / लगातार / व्यग्रता / चिंता में जीते हैं - २- ३ साल का नर्क - सिर्फ १० मिनट आपके भोजन के थाली की सज्जा बढाने को  | २ -३ साल का नर्क (और भयानक ह्त्या के रूप में मृत्यु ) - सिर्फ १० - १५ मिनट के भोजन के लिए ? आपको यह उचित लगता है स्वाद / स्वंतत्र विचारधारा / निजी निर्णय के नाम पर ? 

2. फेक्टरी फ़ार्म पर जीवन भयावह है । 

सोच कर देखिये - क्या आप और हम सारी उम्र ( नवजात प्राणी के जन्म से २-३ वर्ष का समय ) १.५' वर्ग जमीन पर खड़े हुए अपना जीवन बिता सकते हैं ? क्योंकि हम इंसान इतनी जगह में खड़े रह सकते हैं न ? अवश्य रह सकते हैं । 

लेकिन क्या सारी उम्र खड़े रह सकते हैं ? क्या कहा ? नहीं ? क्यों नहीं???? - क्योंकि हम मानव हैं - थक जाते हैं - हमें आराम चाहिए ?

लेकिन मनुष्य होने का अर्थ मनुष्यता भी होता है न ?- तो मनुष्यता यह नहीं है कि  अपने भोजन के लिए दुसरे जीव को ऐसा जीवन जीने पर मजबूर किया जाए । ऐसे ही लगातार , सारी उम्र , बिना आराम या जगह के , खड़े रहने पर मजबूर किया  जाए ।  

लेकिन आपके भोजन की थाली में परोसा गया मुर्गा  ऐसे ही खडा रहा है अपनी सारी उम्र - क्योंकि फेक्टरी फ़ार्म कमाई के लिए होते हैं - जानवरों को काटने के लिए पाला जा रहा है उनके ऐशो आराम के लिए नहीं । तो उतनी जगह में जितने अधिक प्राणी रहे , उतना लाभ । बेचारे प्राणी ऐसे ही रहते हैं  वहां । सारी उम्र ऐसे ही ...... जन्म से मृत्यु (ह्त्या) तक ....

कुछ चित्र देखिये :

 







pigs factory farm
                                                                              Cows 

यदि हम खुद 24x7x365 खड़े नहीं रह सकते लेकिन चाहते हैं कि हमारे भोजन के लिए मूक प्राणी ऐसा जीवन जियें , तो क्या हमें खुद को मनुष्य कहने का अधिकार है ?

सूअर,गायें,मछलियाँ, मुर्गियां आदि , जो प्राणी खाए जा रहे हैं , भी सोचने समझने वाले जीव हैं - जो आपकी और हमारी ही तरह भय और दर्द महसूस कर सकते हैं - लगातार भय , लगातार दर्द - पूरे पूरे जीवन :( :(  यदि आप कहते हैं कि  आप फेक्टरी फ़ार्म का मांस नहीं  लेते , तो बताइये कि इतना मांस कहाँ से आता है जो इतने मांसाहारियों को भोजन के लिए पर्याप्त हो ? पता कीजिये - आपके फेवरेट रेस्तराओं में कहाँ से मांस सप्लाय हो रहा है ? 

कृपया जानिये (और याद रखिये ) एक वर्ष में 25,00,00,00,000 से अधिक पशुओं की क्रूर ह्त्या होती है , मानव भोजन के लिए  :(

3. क्रूरता :
जी - हाँ मानती हूँ कि हम में से अधिकाँश लोग पशुओं के प्रति क्रूर नहीं हैं  । हम सड़क चलते बिल्लियों पर, कुत्तों को, पत्थर नहीं मारते । अपने बच्चों को भी मना करते हैं कि ऐसा करना गलत है , उन्हें दर्द होगा । यदि कोई ऐसा करता दिखे तो हमें क्रोध भी आता है । 

फिर फेक्टरी फ़ार्म के पशु इस से अलग किस तरह हैं ? क्या उन्हें भी इस सहानुभूतिपूर्ण रवैये का अधिकार नहीं है ? 

a. 
मुझे इंजेक्शन लगवाना पसंद नहीं । वह भी ऐसे इंजेक्शन जो मेरी सेहत के लिए (अच्छे नहीं हो कर) बुरे हैं । 

लेकिन फेक्टरी फार्मों के पशुओं को हर हफ्ते ग्रोथ हारमोंस के इंजेक्शन दिए जाते हैं - वे कुछ नहीं कर सकते  । यह उन्हें उम्र से जल्दी बड़ा और मोटा करने को दिए जा रहे हैं - क्योंकि ज्यादा मांस अर्थात ज्यादा  पैसा । उन्हे अपने बढ़ते शरीर का बोझ उठाने के लिए हड्डियों के लिए केल्शियम चाहिए - लेकिन कीमत तो हड्डियों की नहीं -  मांस की मिलती है - तो उन्हें केल्श्यम युक्त भोजन नहीं  दिया जाता । कम्जोर (बच्चे) शरीर की हड्डियाँ और परिपक्व से भी बड़े शरीर का भार , और २४ घंटे खड़े रहना ।  ऐसा जैसे एक १ वर्ष का मानव बालक , २ साल तक लगातार , अपने पिता को गोद में उठा कर खडा हो - बिना बैठे , बिना आराम किये -- सोचिये ज़रा । 

उनके पैर सूजे रहते हैं और भयावह रूप से दर्द करते हैं । कई पशु चल भी नहीं पाते और भोजन तक नहीं पहुँच पाने से भीड़ में गिर कर /  भूख से / दब कर .... मर जाते हैं  । उनकी मृत देह वहीँ सडती रहती है और दुसरे पशु उसी सडती हुई देह से सटे खड़े रहने को मजबूर हैं | 

b.
मैं अपने ही मल मूत्र से घिरा सना नहीं जीना चाहूंगा  । किन्तु फेक्टरी फ़ार्म की जीवों के पास कोई चोइस नहीं है :( .. उनके आराम की किसे  फ़िक्र है? वे तो काटे जाने के लिए जी रहे हैं :(

c. 
मैं नहीं चाहूंगी एक लाइन में खड़ी आगे बढती रहूँ जिसमे बारी आने पर आगे वाले को दर्दनाक रूप से काट कर मार दिया जा रहा है ।  लेकिन काटने का समय आने पर इनमे से हर प्राणी ऐसे ही अपनी बारी का इंतज़ार करता है I शायद ऐसी लाइन में खडी रहने पर मैं तो अपनी बारी से पहले ही डर के मारे दिल के दौरे से मर जाऊंगी । :( । लेकिन इसी भयग्रस्त मनःस्थिति में करीब आधे घंटे खड़े आगे धकेली जाते पशु को काटा जा रहा है - और उसके शरीर में भय से होने वाले स्राव अपनी चरम सीमा पर हैं - और वे सब भयग्रस्त स्राव आपकी प्लेट में रखे भोजन में हैं । 

d.
मैं नहीं चाहूंगी कि कोई मुझे जबरदस्ती छुए /  धकेले / फेंके / बांधे / उलटा लटका कर गला रेंत कर तड़पते हुए मरने के लिए खून बहने को छोड़ दे ...आदि I पर यही होता है उन प्राणियों के साथ । उनमे से हर एक के साथ - जो आपकी थाली में परोसा जाता है ...... और आगे लाइन में अपनी अबरी का इंतज़ार कर रहा पशु यह सब देख रहा होता है - भय से तड़पता रहता है - पर क्या करे ? 

e. 
ये फ़ार्म इतने गंदे हैं, इतने कीटाणुओं से भरे , कि सारे जानवर काटने से पहले ही इन्फेक्शन से मर  जाएँ । मल मूत्र, मरे हुए प्राणियों का सड़ता शरीर आदि के कारण । लेकिन उनके ऐसे ही मर जाने से नुक्सान होगा न ? इन्हें जीवित कैसे रखा जाए ? ...... 

उन्हें बड़ी भारी मात्रा में एंटीबायोटिक इंजेक्शन दिए जाते हैं  ।कहने की ज़रुरत ही नहीं की यही एंटीबायोटिक आपके भोजन के साथ आपके शरीर में पहुँच रहे हैं । 

f.
गायों के भोजन की घास में (गाय शाकाहारी है) में मरी हुई गायों की हड्डियां पीस कर मिलाई जाती हैं - दूध बढाने के लिए  । ऐसे ही - रोज अंडे देने के लिए मुर्गियों को तेज़ प्रकाश में रखा जाता है जिससे वे सोये नहीं और रोज़ अंडे दें । 

4. पर्यावरण  

a. जितने समय में , जितनी भूमि में . 20,000 पाउंड आलू उगाये जा सकते हैं, उतनी ही भूमि में उतने ही समय में एक गाय का १ पाउंड मांस तैयार होता है  । भुखमरी से होने वाली कितनी मानव मौतें इससे बच सकती थीं ?

b.
रेंन फोरेस्ट्स काटे जाते हैं मांस के लिए पाले जा रहे पशुओं की चारागाह बनाने के लिए । 257 hamburgers के बनने योग्य मांस के लिए, एक पल में, एक फुटबाल मैदान जितना रेंन फोरेस्ट काटा जा रहा है ।

c.
: प्रदूशण : फेक्टरी फार्मों पर हर्बिसाइड और पेस्टिसाईड का छिडकाव होता है - जो मिटटी को खराब करता है, और नदियों में प्रवेश कर लोगों के पीने के पानी को खराब करता है । इससे केंसर आदि बढ़ रहा है । इसके अलावा सिंथेटिक एन्हान्सर्स जो पशुओं को दिए जाते हैं - उनके कारण भी भयानक केमिकल प्रदूषण फैलता है  | 

d. 
एक कार एक दिन में ३ किलो कार्बन डाई ऑक्साइड बनाती है  । और रेंन फोरेस्ट को काटने में जो मशीन चलती हैं - वे एक दिन में ७५ किलो कार्बन डाई ऑक्साइड बनाती है  । अर्थात  एक हैमबर्गर के लिए 75 किलो कार्बन दाई ऑक्साइड । 

एक पाउंड हैमबर्गर खाना उतना ही प्रदूषण कर रहा है जितना अपनी कार को ३ हफ्ते तक  चलाना ।सोचिये । 
e.
ऊर्जा बहुत लगती है : 5000 गैलन पानी एक पाउंड बीफ के लिए व्यय होता है । 

यह सब पढने के बाद एक बार खुले मन से - सोचिये निरामिष भोजन या सामिष ?

आपका आभार .....

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

जीवदया का अनुरोध - पाकिस्तान में


जहाँ मानवता है वहाँ करुणा, दया और पशुप्रेम की बात होना स्वाभाविक ही है। कभी भारत का अंग रहा पाकिस्तानी भूभाग भले ही अधिकांशतया हिंसक घटनाओं के लिए खबरों में रहता हो, समय के साथ वहाँ भी कुछ सुखद परिवर्तन आ रहे हैं। मुल्तान स्थित "पाकिस्तान पशु रक्षा आंदोलन" इसी प्रकार का सुधार आंदोलन है जो देश भर में प्रेम और दया बढ़ाने को प्रयासरत है। इसी आंदोलन के अध्यक्ष श्री खालिद मुहम्मद कुरैशी की एक अपील का हिन्दी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है।
हम परोपकार चाहते हैं, प्रेम चाहते हैं, तो हमें उसे अपने कर्म में अपनाना पड़ेगा। हम एक दूसरे से प्रेम करें, और एक दूसरे के प्रति, सबके प्रति परोपकार अपनाएं. पशुओं और मानवमात्र के प्रति हिंसा करने का अर्थ तो यही निकलता है कि हमें प्रेम और अनुकंपा नहीं चाहिए, शांति नहीं चाहिए। प्रकृति का नियम है कि यदि हम हत्या करते हैं, यदि हम अन्य जीवों के प्रति हिंसा करते हैं तो हम अपनी आत्मिक श्रेष्ठता नष्ट कराते हैं। हम जितना अधिक जीव-भक्षण करते हैं, अपनी आत्मिक श्रेष्ठता में उतने ही निर्धन होते जाते हैं, हमारा आत्म-बल नष्ट होता जाता है। और जब हमारा आत्म-बल चुकने लगता है, तो उसका मूल्य हम अपने और अपने परिवारजनों के स्वास्थ्य, मानसिक शांति और भाग्य से चुकाते हैं। बात यहीं नहीं रुकती, अपनी और परिजनों की मानसिक शांति चुकने के बाद पहले हमारे परिवेश की और फिर संसार की शांति को खतरा उत्पन्न होता है। खाने के नाम पर पशु हत्या करने पर हम मानो धरती की ही हत्या करते हैं, और इस तरह एक प्रकार से हम हत्यारे बनते हैं। हत्यारे नहीं, नायक बनिए। भक्षक नहीं, रक्षक बनिए। धरती ग्रह की रक्षा कीजिये। पशु हत्या और पशु भक्षण के क्रूरकर्म में भागीदार न बनें ...

खालिद मुहम्मद कुरैशी.
अध्यक्ष,
पाकिस्तान पशुरक्षा आन्दोलन
1094/2 हुसैन अगाही, मुल्तान-60000
दूरभाष +92 300 7368557

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

शाकाहार (निरामिष) ही क्यों ?


शान्ति का समुचित उपाय,  अहिंसा

सम्पूर्ण जगत में प्रत्येक जीव के लिए सुख का आधार शान्ति ही है। शान्ति का लक्ष्य अहिंसा से ही सिद्ध किया जा सकता है। संसार में आहार पूर्ती के लिए सर्वाधिक हिंसा होती है। जीवदया का मार्ग सात्विक आहार से ही प्रशस्त होता है। सुक्ष्म हिंसा तो कईं सजीव पदार्थों में भी सम्भव है, किन्तु शाकाहार, अपरिहार्य हिंसा का भी अल्पीकरण है जो अपने आप में अहिंसाभाव है। जबकि जो लोग मात्र स्वाद और पेटपूर्ती के स्वार्थवश, दूसरे जीवों को पीड़ा देकर किंचित भी आहत नहीं होते। जो निसंकोच हिंसा और मांसाहार करते है, वे हिंसा और निर्दयता को महज साधारण भाव से ग्रहण करने लगते है। फिर भी मन की सोच पर आहार का स्रोत हावी ही रहता है,यदि वह स्रोत क्रूरता प्रेरित है तो उसका चिंतन हमारी सम्वेदनाओं का क्षय कर देता है। हमारी कोमल भावनाओं को निष्ठुर बना देता है। अन्ततः इस अनैतिक कार्य के प्रति एक सहज वृति  पनपती है। मांसाहार के लिए प्राणहरण, मानस में क्रूर भाव का आरोपण करता है जो हिंसक मनोवृति के लिए जवाबदार है। मांसाहार द्वारा कोमल सद्भावनाओं का नष्ट होना व स्वार्थ व निर्दयता की भावनाओं का पनपना आज विश्व में बढ़ती हिंसा, घृणा व अपराधों का मुख्य कारण है। पृथ्वी पर शान्ति, शाकाहार से ही सम्भव है। जीवदया और करूणा भाव हमारे मन में कोमल सम्वेदनाओं को स्थापित करते है। यही सम्वेदनाएं हमें मानव से मानव के प्रति भी सम्वेदनशील बनाए रखती है। शाकाहार मानवीय जीवन-मूल्यों का संरक्षक है। इसलिए अहिंसा ही शान्ति और सुख का अमोघ उपाय है।  

धर्म-दर्शन अभिप्रायः

लगभग सभी धार्मिक सामाजिक परम्पराओं में 'जीवन' के प्रति आदर व्यक्त हुआ है, परंतु "अहिंसा परमो धर्मः" या “दया धर्म का मूल है” का सिद्धांत भारतीय संस्कृति की एकमेव विलक्षण विशेषता है। चाहे कोई भी धर्मग्रंथ हो, हिंसा के विधान किसी भी अपौरूषेय वाणी में नहीं है। आर्षवचन के भव्य प्रासाद, सदैव ही अहिंसा, करुणा, वात्सल्य और नैतिक जीवन मूल्यों की ठोस आधारशीला पर रखे जाते हैं। सारे ही उपदेश जीवन को अहिंसक बनाने के लिए ही गुंथित है और अहिंसक मनोवृति का प्राथमिक कदम शाकाहार है।  

सभ्यता और संस्कृति

शाकाहार की प्रसंशा करना शुद्धता या पवित्रता का दंभ नहीं है। शाकाहार अपने आप में स्वच्छ और सात्विक है। इसलिये शुद्धता और पवित्रता सहज अभिव्यक्त होती है। आहार की शुचिता भारतीय संस्कृति एवं चेतना के समस्त प्रवाहों का केन्द्र रही है जो शाकाहार को मात्र भोजन के आयाम पर अभिकेन्द्रित नहीं करती, वरन् इसे समस्त दर्शन और सहजीवन के सौहार्द से सज्जित, जीवन-पद्धति के रूप में आख्यादित करती है। शाकाहार, क्रूरता विहीन जीवन संस्कृति की बुनियाद है, जिसमें सह अस्तित्व के प्रति अनुकम्पा, वात्सल्य, और करूणा के स्वर अनुगुन्जित होते है। भले ही मानव अभक्ष्य आहार की आदत डाल ले अभ्यास से आदतें बनना सम्भव है पर मानव शरीर की प्रकृति शाकाहार के ही अनुकूल है। यदपि मनुष्य अपनी उत्पत्ती से  शाकाहारी ही रहा है, प्रागैतिहासिक मानव शाकाहार करता था यह प्रमाणित है। तथापि सभ्यता की मांग होती है जंगली जीवन से सुसभ्य जीवन की ओर उत्थान करना, विकृत आहार त्याग कर सुसंस्कृत आहारी बनना। शाकाहार, आदिमयुग से सभ्यता की विकासगामी धरोहर है। यह मानवीय जीवन-मूल्यों का प्रेरकबल है। सभ्यता, निसंदेह शान्ति की वाहक होती है। शाकाहार शैली सुसभ्य संस्कृति है।

 प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण

यदि सभ्यता विकास और शान्त सुखप्रद जीवन ही मानव का लक्ष्य है तो उसे शाकाहार के स्वरूप में प्रकृति के संसाधनों का कुशल प्रबंध करना ही होगा। वन सम्पदा में पशु-पक्षी आदि, प्राकृतिक सन्तुलन के अभिन्न अंग होते है। प्रकृति की एक समग्र जैव व्यवस्था होती है। उसमें मानव का स्वार्थपूर्ण दखल पूरी व्यवस्था को विचलित कर देता है। मनुष्य को कोई अधिकार नहीं प्रकृति की उस नियोजित व्यवस्था को अपने स्वाद, सुविधा और सुन्दरता के लिए खण्डित कर दे। मानव के पास ही वह बुद्धिमत्ता है कि वह उपलब्ध संसाधनो का सर्वोत्तम प्रबंध करे। अर्थार्त कम से कम संसाधन खर्च कर अधिक से अधिक उसका लाभ प्राप्त करे। जीवहिंसा से पर्यावरण संतुलन विखंडित होता है, जो प्राकृतिक आपदाओ का प्रेरकबल बनता है। शाकारहार अपने आप में सृष्टि का मितव्ययी उपभोग है, प्राकृतिक संसाधनो के संरक्षण में प्रथम योगदान है।सृष्टि के प्रति हमारा सहजीवन उत्तरदायित्व है कि वह जीवों का विनाश न करे यह प्रकृति की बहुमूल्य निधि है। जीवराशी का यथोचित संरक्षण शाकाहार से ही सम्भव है, प्राकृतिक संसाधनो का संयमपूर्वक उपभोग अर्थात् शाकाहार। धरा की पर्यावरण सुरक्षा शाकाहार में आश्रित है। वैश्विक भूखमरी का निदान भी शाकाहार है। वैश्विक खाद्य समस्या का सर्वोत्तम विकल्प शाकाहार है। यह तो मज़ाक ही है कि शाकाहार से अभावग्रस्त, दुरूह क्षेत्र की आहार शैली का सम्पन्न क्षेत्र में भी अनुकरण किया जाय। अधिसंख्यजन यदि इसके आदी है तो उनका अनुकरण किया जाय। यह न्यायोचित विवेक नहीं है। अपरिहार्य सुक्ष्म हिंसा में भी विवेक जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य भी शाकाहार में निहित है। कुल मिलाकर पर्यावरण का अचुक उपचार एकमात्र शाकाहार शैली को अपनाना है।  

संतुलित पोषण आधार

आधुनिकता की होड़ में, हमारी संस्कृति, हमारे आचार- विचार आदि  को दकियानूसी कहने वाले, इस झूठी घारणा के शिकार हो रहे है कि शाकाहारी भोजन से उचित मात्रा में प्रोटीन और पोषक तत्व प्राप्त नहीं होते। जबकि आधुनिक विशेषज्ञों और शरीर वैज्ञानिकों की शोध से यह भलीभांति प्रमाणित है कि शाकाहारी आहार में न केवल उच्च कोटि के प्रोटीन होते है, अपितु सभी आवश्यक पोषक तत्व जैसे- विटामिन्स, वसा और कैलॉरी पूर्ण संतुलित,  गुणवत्ता युक्त, सपरिमाण मात्रा में प्राप्त होते है। विशेषतया खनिज तो शाकाहारी पदार्थों में पर्याप्त मात्रा में  उपलब्ध होते ही है। उससे बढ़कर, आन्तरिक शरीर को 'निर्मल' और 'निरोग' रखनें में सहायक निरामय ‘रेशे’ (फ़ाइबर्स) तो मात्र, शाकाहार से ही प्राप्त किए जा सकते है। शाकाहार संतुलित पोषण का मुख्य स्रोत है, शाकाहार से प्रथम श्रेणी की प्राथमिक उर्जा प्राप्त की जाती है। शाकाहार, उर्ज़ा और शारिरिक प्रतिरक्षा प्रणाली  का प्रमुख आधार है।  

आरोग्य वर्धक

शाकाहार में  आहार-रेशे पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते है। आहार-रेशों की विध्यमानता से पाचन तंत्र की कार्य-प्रणाली सुचारू संचालित होती है। निरामिष भोजन में न हानिकर कोलेस्ट्रॉल की अति होती है न प्राणीजन्य प्रोटीन का संकलन। परिणाम स्वरूप  व्यक्ति, मनोभ्रंश (अल्जाइमर), गॉल्ब्लैडर की पथरी (गॉलस्टॉन), मधुमेह (डायबिटीज टाइप-2) , अस्थि-सुषिरता (ऑस्टियोपोरोसिस), संधिवात (आस्टियो आर्थराइटिस), उदर समस्या (लीवर प्रॉबलम), गुर्दे की समस्या (किड़नी प्रॉबलम), मोटापा, ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप, दंतक्षय (डेन्टल कैवेटिज), आंतो का केन्सर, कब्ज कोलाइटिस, बवासीर जैसी बिमारियों से काफी हद तक बचा रहता है। इस दृष्टि से शाकाहार पूर्णतःआरोग्यप्रद है। विश्व स्वास्थ्य समस्यांए शाकाहार से समाधान पा सकती है। शाकाहारी पदार्थों में वे तत्व बहुलता से पाए जाते हैं जो हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करते है।
मानव कल्याण भावना से सादर

रविवार, 6 जनवरी 2013

भारतीय धर्म-दर्शन संस्कृति और हिंसा?

भारतीय सनातन संस्कृति में हिंसा व माँसभक्षण की न तो कोई आज्ञा है और न कोई अनुमति। यह बात अलग है कि कभी क्षेत्र के कारण तो कभी अज्ञानता में या कभी देखा देखी जन साधारण में इस कुरीति का अस्तित्व रहा है। किन्तु आर्ष ग्रंथों में या उपदेशों में किंचित भी पशु-हिंसा का अनुमोदन या मांसभक्षण की अनुज्ञा, अनुमति का कोई अस्तित्व नहीं है। भारतीय संस्कृति अहिंसा प्रधान संस्कृति है।

सनातन संस्कृति के वेदों से ही अहिंसा की अजस्र धारा प्रवाहित रही है। 

वैसे तो सभी धर्म जीवों के प्रति करूणा को महत्व देते है। 

किन्तु कईं बाहरी संस्कृतियों में पशु हिंसा की प्रतीकात्मक कुरीतियाँ रूढ़ हो चुकी है। 

जबकि भारतीय संस्कृति के सभी ग्रंथ जीव हत्या को स्पष्ट अधर्म बताते है। 

भारतीय संस्कृति की तो आधारशिला में ही अहिंसा का सद्भाव रहा है।

इसलिए,वैदिक संस्कृति में माँसाहार का स्पष्ट निषेध है।

वस्तुत: वैदिक यज्ञों में पशुबलि---एक भ्रामक दुष्प्रचार है

भला यज्ञ हो तो हिंसा कैसे हो सकती है?

ऋषभक बैल नहीं, ऋषभ कंद है।- ऋषभक का परिचय


इसलिए यदि 'धर्म' के परिपेक्ष्य चिंतन करें तो उसमें हिंसा और हिंसा के प्रोत्साहक माँसाहार का अस्तित्व भला कैसे हो सकता है। पशुहत्या का आधार मानव की कायर मानसिकता है, जब शौर्य व मनोबल क्षीण होता है तो क्रूर-कायर मनुष्य, दुस्साहस व धौंस दर्शाने के लिए पशुहिंसा व मांसाहार का आसरा लेता है। लेकिन पशुहिंसा से क्रूरता व कायरता को कोई आधार नहीं मिलता। निर्बल निरीह पशु पर अत्याचार को भला कौन बहादुरी मानेगा। क्रूरता से कायरता छुपाने के प्रयत्न विफल ही होते है।

शनिवार, 5 जनवरी 2013

शाकाहार या माँसाहार - इस वीडियो को देखने के बाद निर्णय करें.

मेरे एक मित्र श्री गौरव जी गुप्ता ने फेसबुक पर एक वीडियो लिंक शेयर किया है. इसे देखने के बाद स्वयं निर्णय लीजिये कि क्या मांसाहार वाकई उचित है.

जगुप्सा पैदा करने वाले दृश्य है लेकिन विवशता है कि  क्रूरता की हद जाने बिना हम सहजता से अहिंसा के महत्व को भी नहीं जान पाते। आहत-मन से इस वास्तविकता को प्रस्तुत किया जा रहा है।
-निरामिष



सोमवार, 31 दिसंबर 2012

निरामिष निष्कर्ष

"निरामिष"सामूहिक ब्लॉग के दो वर्ष सम्पन्न. प्रस्तुत है विभिन्न आलेखोँ के प्रकाश में निरामिष निष्कर्ष.....
"निर्जर निरामिष" - अमृत है शाकाहार
"निरोगी निरामिष" - स्वास्थ्यप्रद है शाकाहार
"निर्विकार निरामिष" - विकार रहित है शाकाहार
"निरापद निरामिष" - आपदा रहित है शाकाहार
"निसर्गमित्र निरामिष" - पर्यावरण मित्र है शाकाहार
"निर्मल निरामिष" - शुद्ध सात्विक है शाकाहार
आरोग्य वर्धक (स्वास्थ्यप्रद शाकाहार) 
  1. स्वस्थ व दीर्घ जीवन का आधार है शाकाहार। 
  2. आरोग्य संवर्धक है शाकाहार। 
  3. विश्व स्वास्थ्य शाकाहार में निहित है। 
  4. रोगप्रतिरोध शक्तिवर्धक है शाकाहार। 
सभ्य-खाद्याचार (सुसंस्कृत सभ्य आहार) 
  1. अप्राकृतिक भोज्य विकृति का सुसंस्कृत रूप है शाकाहार । 
  2. आदिमयुग से विकास और सभ्यता की धरोहर है शाकाहार। 
  3. शाकाहारी संस्कृति का संरक्षण ही हमारी सुरक्षा है। 
  4. मानवीय जीवन-मूल्यों का संरक्षक है शाकाहार। 
तर्कसंगत-विकल्प (सर्वांग न्यायसंगत) 
  1. प्रागैतिहासिक मानव, प्राकृतिक रूप से शाकाहारी ही था। 
  2. मनुष्य की सहज वृति और उसकी कायिक प्रकृति दोनो ही शाकाहारी है।
  3. मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल। 
  4. शाक से अभावग्रस्त, दुर्गम क्षेत्रवासी मानवो का अनुकरण मूर्खता!!
  5. सभ्यता व विकास मार्ग का अनुगमन या भीड़ का अंधानुकरण? 
  6. यदि अखिल विश्व भी शाकाहारी हो जाय, सुलभ होगा अनाज!!
  7. भुखमरी को बढाते ये माँसाहारी और माँस-उद्योग!!
  8. शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल !!! 
  9. प्राणी से पादप : हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है। 
  10. प्रोटीन प्रलोभन का भ्रमित दुष्प्रचार।
  11. प्रोटीन मात्रा, प्रोटीन यथार्थ
  12. विटामिन्स का दुष्प्रचार।
  13. विटामिन बी12, विटामिन डी, विटामिन 'सी'।
  14. उर्ज़ा व शक्ति का दुष्प्रचार। 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

भ्रांति मिटाने के नाम पर मांसाहार प्रचार का भ्रमजाल

सलीम खान ने कभी अपने ब्लॉग पर यह '14 बिन्दु' मांसाहार के पक्ष में प्रस्तुत किये थे। असल में यह सभी कुतर्क ज़ाकिर नाईक के है, जो यहां वहां प्रचार माध्यमों से फैलाए जाते है। वैसे तो इन फालतू कुतर्को पर प्रतिक्रिया टाली भी जा सकती थी, किन्तु  इन्टरनेट जानकारियों का स्थायी स्रोत है यहाँ ऐसे भ्रामक कुतर्क अपना भ्रमजाल फैलाएँगे तो लोगों में संशय और भ्रम स्थापित होंगे। ये कुतर्क यदि निरूत्तर रहे तो भ्रम, सच की तरह रूढ़ हो जाएंगे, इसलिए जालस्थानों में इन कुतर्कों का यथार्थ और तथ्ययुक्त खण्ड़न  उपलब्ध होना नितांत ही आवश्यक है।

मांसाहार पर यह प्रत्युत्तर-खण्ड़न, धर्मिक दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि अहिंसा और करूणा के दृष्टिकोण से प्रस्तुत किए जा रहे है। मांसाहार को भले ही कोई अपने धर्म का पर्याय या प्रतीक मानता हो, जीव-हत्या किसी भी धर्म का उपदेश या सिद्धांत नहीं हो सकता। इसलिए यह खण्ड़न अगर निंदा है तो स्पष्ट रूप से यह हिंसा, क्रूरता और निर्दयता की निंदा है। गोश्तखोरी प्रायोजित हिंसा सदैव और सर्वत्र निंदनीय ही होनी चाहिए, क्योंकि इस विकार से बनती हिंसक मनोवृति समाज के शान्त व संतुष्ट जीवन ध्येय में मुख्य बाधक है।

निश्चित ही शारीरिक उर्जा पूर्ति के लिए भोजन करना आवश्यक है। किन्तु सृष्टि का सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के नाते, मानव इस जगत का मुखिया है। अतः प्रत्येक जीवन के प्रति, उत्तरदायित्व पूर्वक सोचना भी मानव का कर्तव्य है। सृष्टि के सभी प्राणभूत के अस्तित्व और संरक्षण के लिए सजग रहना, मानव की जिम्मेदारी है। ऐसे में आहार से उर्जा पूर्ति का निर्वाह करते हुए भी, उसका भोजन कुछ ऐसा हो कि आहार-इच्छा से लेकर, आहार-ग्रहण करने तक वह संयम और मितव्ययता से काम ले। उसका यह ध्येय होना चाहिए कि सृष्टि की जीवराशी  कम से कम खर्च हो। साथ ही उसकी भावनाएँ सम्वेदनाएँ सुरक्षित रहे, मनोवृत्तियाँ उत्कृष्ट बनी रहे। प्रकृति-पर्यावरण और स्वभाव के प्रति यह निष्ठा, वस्तुतः उसे मिली अतिरिक्त बुद्धि के बदले, कृतज्ञता भरा अवदान है। अस्तित्व रक्षा के लिए भी अहिंसक जीवन-मूल्यों को पुनः स्थापित करना मानव का कर्तव्य है। सभ्यता और विकास को आधार प्रदान के लिए सौम्य, सात्विक और सुसंस्कृत भोजन शैली को अपनाना जरूरी है।

सलीम खान के मांसाहार भ्रमजाल का खण्ड़न।

1 - दुनिया में कोई भी मुख्य धर्म ऐसा नहीं हैं जिसमें सामान्य रूप से मांसाहार पर पाबन्दी लगाई हो या हराम (prohibited) करार दिया हो.

खण्ड़न- इस तर्क से मांसाहार ग्रहणीय नहीं हो जाता। यदि यही कारण है तो  ऐसा भी कोई प्रधान धर्म नहीं, जिस ने शाकाहार पर प्रतिबंध लगाया हो। प्रतिबंध तो मूढ़ बुद्धि के लिए होते है, विवेकवान के लिए संकेत ही पर्याप्त होते है। धर्म केवल हिंसा न करने का उपदेश करते है एवं हिंसा प्रेरक कृत्यों से दूर रहने की सलाह देते है। आगे मानव के विवेकाधीन है कि आहार व रोजमर्रा के वे कौन से कार्य है जिसमें हिंसा की सम्भावना है और उससे विरत रहकर हिंसा से बचा जा सकता है। सभी धर्मों में, प्रकट व अप्रकट रूप से सभी के प्रति अहिंसा के उद्देश्य से ही दया, करूणा, रहम आदि को उपदेशित किया गया है। पाबन्दीयां, मायवी और बचने के रास्ते निकालने वालों के लिए होती है, विवेकवान के लिए तो दया, करूणा, रहम, सदाचार, ईमान में अहिंसा ही गर्भित है।

2 - क्या आप भोजन मुहैया करा सकते थे वहाँ जहाँ एस्किमोज़ रहते हैं (आर्कटिक में) और आजकल अगर आप ऐसा करेंगे भी तो क्या यह खर्चीला नहीं होगा?

खण्ड़न- अगर एस्किमोज़ मांसाहार बिना नहीं रह सकते तो क्या आप भी शाकाहार उपलब्ध होते हुए एस्किमोज़ का बहाना आगे कर मांसाहार चालू रखेंगे? खूब!! एस्किमोज़ तो वस्त्र के स्थान पर चमड़ा पहते है, आप क्यों नही सदैव उनका वेश धारण किए रहते? अल्लाह नें आर्कटिक में मनुष्य पैदा ही नहीं किये थे,जो उनके लिये वहां पेड-पौधे भी पैदा करते, लोग पलायन कर पहुँच जाय तो क्या कीजियेगा। ईश्वर नें बंजर रेगीस्तान में भी इन्सान पैदा नहीं किए। फ़िर भी स्वार्थी मनुष्य वहाँ भी पहुँच ही गया। यह तो कोई बात नहीं हुई कि  दुर्गम क्षेत्र में रहने वालों को शाकाहार उपलब्ध नहीं, इसलिए सभी को उन्ही की आहार शैली अपना लेनी चाहिए। आपका यह एस्किमोज़ की आहारवृत्ति का बहाना निर्थक है। जिन देशों में शाकाहार उपलब्ध न था, वहां मांसाहार क्षेत्र वातावरण की अपेक्षा से मज़बूरन होगा और इसीलिए उसी वातावरण के संदेशकों-उपदेशकों नें मांसाहार पर उपेक्षा का रूख अपनाया होगा। लेकिन यदि उपलब्ध हो तो, सभ्य व सुधरे लोगों की पहली पसंद शाकाहार ही होता है। जहां सात्विक पौष्ठिक शाकाहार प्रचूरता से उपलब्ध है वहां जीवों को करूणा दान या अभयदान दे देना चाहिए। सजीव और निर्जीव एक गहन विषय है। जीवन वनस्पतियों आदि में भी है, लेकिन प्राण बचाने को संघर्षरत पशुओं को मात्र स्वाद के लिये मार खाना तो क्रूरता की पराकाष्ठा है। आप लोग दबी जुबां से कहते भी हो कि "मुसलमान, शाकाहारी होकर भी एक अच्छा मुसलमान हो सकता है" फ़िर मांसाहार की इतनी ज़िद्द ही क्यों?, और एक 'अच्छा मुसलमान' बनने से भला इतना परहेज भी क्यों ?

3 - अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनमें भी जीवन होता है.
4 - अगर सभी जीव/जीवन पवित्र है पाक है तो पौधों को क्यूँ मारा जाता है जबकि उनको भी दर्द होता है.
5 - अगर मैं यह मान भी लूं कि उनमें जानवरों के मुक़ाबले कुछ इन्द्रियां कम होती है या दो इन्द्रियां कम होती हैं इसलिए उनको मारना और खाना जानवरों के मुक़ाबले छोटा अपराध है| मेरे हिसाब से यह तर्कहीन है.

खण्ड़न- इस विषय पर जानने के लिए शाकाहार मांसाहार की हिंसा के सुक्ष्म अन्तर  को समझना होगा। साथ ही हिंसा में विवेक  करना होगा। स्पष्ट हो जाएगा कि जीवहिंसा प्रत्येक कर्म में है, किन्तु हम विवेकशील है,  हमारा कर्तव्य बनता है, हम वह रास्ता चुनें जिसमे जीव हिंसा कम से कम हो। किन्तु आपके तर्क की सच्चाई यह है कि वनस्पति हो या पशु-पक्षी, उनमें जान साबित करके भी आपको किसी की जान बचानी नहीं है। आपको वनस्पति जीवन पर करूणा नहीं उमड़ रही, हिंसा अहिंसा आपके लिए अर्थहीन है, आपको तो मात्र सभी में जीव साबित करके फिर बडे से बडे प्राणी और बडी से बडी हिंसा का चुनाव करना है।

"एक यह भी कुतर्क दिया जाता है कि शाकाहारी सब्जीयों को पैदा करनें के लिये आठ दस प्रकार के जंतु व कीटों को मारा जाता है।"

खण्ड़न- इन्ही की तरह कुतर्क करने को दिल चाहता है………
भाई, इतनी ही अगर सभी जीवों पर करूणा आ रही है,और जब दोनो ही आहार हिंसाजनक है तो दोनो को छोड क्यों नहीं देते?  दोनो नहीं तो पूरी तरह से किसी एक की तो कुर्बानी(त्याग) करो…॥ कौन सा करोगे????


"ऐसा कोनसा आहार है,जिसमें हिंसा नहीं होती।"

खण्ड़न- यह कुतर्क ठीक ऐसा है कि 'वो कौनसा देश है जहां मानव हत्याएं नहीं होती?' इसलिए मानव हत्याओं को जायज मान लिया जाय? उसे सहज ही स्वीकार कर लिया जाय? और उसे बुरा भी न कहा जाय? आपका आशय यह है कि, जब सभी में जीवन हैं, और सभी जीवों का प्राणांत, हिंसादोष है तो सबसे उच्च्तम, क्रूर, घिघौना बडे जीव की हत्या का दुष्कर्म ही क्यों न अपनाया जाय? यह तो सरासर समझ का दिवालियापन है!!

तर्क से तो बिना जान निकले पशु शरीर मांस में परिणित हो ही नहीं सकता। तार्किक तो यह है कि किसी भी तरह का मांस हो, अंततः मुर्दे का ही मांस होगा। उपर से तुर्रा यह है कि हलाल तरीके से काटो तो वह मुर्दा नहीं । मांस के लिये जीव की जब हत्या की जाती है, तो जान निकलते ही मख्खियां करोडों अंडे उस मुर्दे पर दे जाती है, पता नहीं जान निकलनें का एक क्षण में मख्खियों को कैसे आभास हो जाता है। उसी क्षण से वह मांस मख्खियों के लार्वा का भोजन बनता है, जिंदा जीव के मुर्दे में परिवर्तित होते ही लगभग 563 तरह के सुक्ष्म जीव उस मुर्दा मांस में पैदा हो जाते है। और जहां यह तैयार किया जाता है वह जगह व बाज़ार रोगाणुओं के घर होते है, और यह रोगाणु भी जीव ही होते है। यानि एक ताज़ा मांस के टुकडे पर ही हज़ारों मख्खी के अंडे, लाखों सुक्ष्म जीव, और हज़ारों रोगाणु होते है। कहो, किसमें जीव हिंसा ज्यादा है।, मुर्दाखोरी में या अनाज दाल फ़ल तरकारी में?

रही बात इन्द्रिय के आधार पर अपराध की तो जान लीजिए कि हिंसा तो अपराध ही है बस क्रूरता और सम्वेदनाओं के स्तर में अन्तर है। जिस प्रकार किसी कारण से गर्भाधान के समय ही मृत्यु हो जाय, पूरे माह पर मृत्यु हो जाय, जन्म लेकर मृत्यु हो, किशोर अवस्था में मृत्यु हो जवान हो्कर मृत्यु हो या शादी के बाद मृत्यु हो होने वाले दुख की मात्रा व तीव्रता बढ़ती जाती है। कम से अधिकतम दुख महसुस होता है क्योंकि इसका सम्बंध भाव से है। उसी तरह अविकसित से पूर्ण विकसित जीवन की हिंसा पर क्रूर भाव की श्रेणी बढती जाती है। बडे पशु की हिंसा के समय अधिक विकृत व क्रूर भाव चाहिए। सम्वेदना भी अधिक से अधिक कुंदओ जानी चाहिए। आप कम इन्द्रिय पर अधिक करूणा की बात करते है न, क्या विकलेन्द्रिय भाई के अपराध के लिए इन्द्रिय पूर्ण भाई को फांसी दे देना न्यायोचित होगा? यदि दोनो में से किसी एक के जीवन की कामना करनी पडे तो किसके पूर्ण जीवन की कामना करेंगे? विकलेन्द्रिय या पूर्णइन्द्रिय?

6 -इन्सान के पास उस प्रकार के दांत हैं जो शाक के साथ साथ माँस भी खा/चबा सकता है.

7 - और ऐसा पाचन तंत्र जो शाक के साथ साथ माँस भी पचा सके. मैं इस को वैज्ञानिक रूप से सिद्ध भी कर सकता हूँ | मैं इसे सिद्ध कर सकता हूँ.

खण्ड़न- मानते है इन्सान कुछ भी खा/चबा सकता है, किन्तु प्राकृतिक रूप से वह शिकार करने के काबिल हर्गिज नहीं है।  वे दांत शिकार के अनुकूल नहीं है। उसके पास तेज धारदार पंजे भी नहीं है। मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल है। मानव प्रकृति से शाकाहारी ही है। खाने चबाने को तो हमने लोगों को कांच चबाते देखा है, जहर और नशीली वस्तुएँ पीते पचाते देखा है। मात्र खाने पचाने का सामर्थ्य हो जाने भर से जहर, कीचड़, कांच मिट्टी आदि उसके प्राकृतिक आहार नहीं हो जाते। ‘खाओ जो पृथ्वी पर है’ का मतलब यह नहीं कि कहीं निषेध का उल्लेख न हो तो धूल, पत्थर, जहर, एसीड आदि भी खा लिया जाय। इसलिए ऐसे किसी बेजा तर्क से मांसहार करना तर्कसंगत सिद्ध नहीं हो जाता।

8 - आदि मानव मांसाहारी थे इसलिए आप यह नहीं कह सकते कि यह प्रतिबंधित है मनुष्य के लिए | मनुष्य में तो आदि मानव भी आते है ना.

खण्ड़न- हां, देखा तो नहीं, पर सुना अवश्य था कि आदि मानव मांसाहारी थे। पर नवीनतम जानकारी तो यह भी मिली कि प्रगैतिहासिक मानव शाकाहारी था। यदि फिर भी मान लें कि वे मांसाहारी थे तो बताईए शिकार कैसे करते थे? अपने उन दो छोटे भोथरे दांतो से? या कोमल नाखूनो से? मानव तो पहले से ही शाकाहारी रहा है, उसकी मां के दूध के बाद उसकी पहली पहचान फलों - सब्जियों से हुई होगी। जब कभी कहीं, शाकाहार का अभाव रहा होगा तो पहले उसने हथियार बनाए होंगे फ़िर मांसाहार किया होगा। यानि हथियारों के अविष्कार के पहले वह फ़ल फ़ूल पर ही आश्रित था।

लेकिन फिर भी इस कुतर्क की जिद्द है तो, आदि युग में तो आदिमानव नंगे घुमते थे, क्या हम आज उनका अनुकरण करें? वे अगर सभ्यता के लिए अपनी नंगई छोड़ कर परिधान धारी बन सकते है तो हम आदियुगीन मांसाहारी से सभ्ययुगीन शाकाहारी क्यों नहीं बन सकते? हमारे आदि पूर्वजों ने इसी तरह विकास साधा है हम क्या उस विकास को आगे भी नहीं बढ़ा सकते?

9 - जो आप खाते हैं उससे आपके स्वभाव पर असर पड़ता है - यह कहना 'मांसाहार आपको आक्रामक बनता है' का कोई भी वैज्ञानिक आधार नहीं है.

खण्ड़न- इसका तात्पर्य ऐसा नहीं कि हिंसक पशुओं के मांस से हिंसक,व शालिन पशुओं के मांस से शालिन बन जाओगे।

इसका तात्पर्य यह है कि जब आप बार बार बड़े पशुओं की अत्यधिक क्रूरता से हिंसा करते है तब ऐसी हिंसा, और हिंसा से उपजे आहार के कारण, हिंसा के प्रति सम्वेदनशीलता खत्म हो जाती है। क्रूर मानसिकता पनपती है और हिंसक मनोवृति बनती है। ऐसी मनोवृति के कारण आवेश आक्रोश द्वेष सामान्य सा हो जाता है। क्रोधावेश में हिंसक कृत्य भी सामान्य होता चला जाता है। इसलिए आवेश आक्रोश की जगह कोमल संवेदनाओं का संरक्षण जरूरी है। जैसे- रोज रोज कब्र खोदने वाले के चहरे का भाव कभी देखा है?,पत्थर की तरह सपाट चहरा। क्या वह मरने वाले के प्रति जरा भी संवेदना या सहानुभूति दर्शाता है? वस्तुतः उसके बार बार के यह कृत्य में सलग्न रहने से, मौत के प्रति उसकी सम्वेदनाएँ मर जाती है।

10 - यह तर्क देना कि शाकाहार भोजन आपको शक्तिशाली बनाता है, शांतिप्रिय बनाता है, बुद्धिमान बनाता है आदि मनगढ़ंत बातें है.

खण्ड़न- हाथ कंगन को आरसी क्या?, यदि शाकाहारी होने से कमजोरी आती तो मानव कब का शाकाहार और कृषी छोड चुका होता। कईं संशोधनों से यह बात उभर कर आती रही है कि शाकाहार में शक्ति के लिए जरूरी सभी पोषक पदार्थ है। बाकी शक्ति सामर्थ्य के प्रतीक खेलो के क्षेत्र में अधिकांश खिलाडी शाकाहार अपना रहे है। कटु सत्य तो यह है कि शक्तिशाली, शांतिप्रिय, बुद्धिमान बनाने के गुण मांसाहार में तो बिलकुल भी नहीं है।

11 - शाकाहार भोजन सस्ता होता है, मैं इसको अभी खारिज कर सकता हूँ, हाँ यह हो सकता है कि भारत में यह सस्ता हो. मगर पाश्चात्य देशो में यह बहुत कि खर्चीला है खासकर ताज़ा शाक.

खण्ड़न- भाड में जाय वो बंजर पाश्चात्य देश जो ताज़ा शाक पैदा नहीं कर सकते!! भारत में यह सस्ता और सहज उपलब्ध है तब यहां तो शाकाहार अपना लेना बुद्धिमानी है। सस्ते महंगे की सच्चाई तो यह है कि पशु से 1 किलो मांस प्राप्त करने के लिए उन्हें 13 किलो अनाज खिला दिया जाता है, उपर से पशु पालन उद्योग में बर्बाद होती है विशाल भू-सम्पदा, अनियंत्रित पानी का उपयोग निश्चित ही पृथ्वी पर भार है। मात्र  भूमि का अन्न उत्पादन के लिए प्रयोग हो तो निश्चित ही अन्न सभी जगह अत्यधिक सस्ता हो जाएगा। बंजर निवासियों को कुछ अतिरिक्त खर्चा करना पडे तब भी उनके लिए सस्ता सौदा होगा।

12 - अगर जानवरों को खाना छोड़ दें तो इनकी संख्या कितनी बढ़ सकती, अंदाजा है इसका आपको.

खण्ड़न- अल्लाह का काम आपने ले लिया? अल्लाह कहते है इन्हें हम पैदा करते है।

जो लोग ईश्वरवादी है, वे तो अच्छी तरह से जानते है, संख्या का बेहतर प्रबंधक ईश्वर ही है।

जो लोग प्रकृतिवादी है वे भी जानते है कि प्रकृति के पास जैव सृष्टि के संतुलन का गजब प्लान है।

करोडों साल से जंगली जानवर और आप लोग मिलकर शाकाहारी पशुओं को खाते आ रहे हो, फ़िर भी जिस प्रजाति के जानवरों को खाया जाता है, बिलकुल ही विलुप्त या कम नहीं हुए। उल्टे मांसाहारी पशु अवश्य विलुप्ति की कगार पर है। सच्चाई तो यह है कि जो जानवर खाए जाते है उनका बहुत बडे पैमाने पर उत्पादन होता है। जितनी माँग होगी उत्पादन उसी अनुपात में बढता जाएगा। अगर नही खाया गया तो उत्पादन भी नही होगा।

13 -कहीं भी किसी भी मेडिकल बुक में यह नहीं लिखा है और ना ही एक वाक्य ही जिससे यह निर्देश मिलता हो कि मांसाहार को बंद कर देना चाहिए.

खण्ड़न- मेडिकल बुक किसी धार्मिक ग्रंथ की तरह 'अंतिम सत्य' नहीं है। वह इतनी इमानदार है कि कल को यदि कोई नई शोध प्रकाश मेँ आए तो वह अपनी 'बुक' में इमानदारी से परिवर्तन-परिवर्धन कर देगी। शाकाहार के श्रेष्ठ विकल्प पर अभी तक गम्भीर शोध-खोज नहीं हुई है। किन्तु सवाल जब मानव स्वास्थ्य का है तो कभी न कभी यह तथ्य अवश्य उभर कर आएगा कि मांसाहार मनुष्य के स्वास्थ्य के बिलकुल योग्य नहीं है। और फिर माँसाहार त्याग का उपाय सहज हो,अहानिकर हो तो माँसाहार से निवृति का स्वागत होना चाहिए। मेडिकल बुक में भावनाओं और सम्वेदनाओं पर कोई उल्लेख या निर्देश नहीं होता, तो क्या भावनाओं और सम्वेदनाओं की उपयोगिता महत्वहीन हो जाती है? यह भी ध्यान रहे भावोँ के कईं तथ्य और तत्व इस मेडिकल बुक में नहीं है, उस दशा में उस अन्तिम बुक को निरस्त कर देँगे जिस में किसी भी तरह का परिवर्तन ही सम्भव नहीं?

14 - और ना ही इस दुनिया के किसी भी देश की सरकार ने मांसाहार को सरकारी कानून से प्रतिबंधित किया है.

खण्ड़न- सरकारें क्यों प्रतिबंध लगायेगी? जबकि उसके निति-नियंता भी इसी समाज की देन है, यहीं से मानसिकता और मनोवृतियां प्राप्त करते है। लोगों का आहार नियत करना सरकारों का काम नहीं है।यह तो हमारा फ़र्ज़ है, हम विवेक से उचित को अपनाएं, अनुचित को दूर हटाएं। उदाहरण के लिए झुठ पर सरकारी कानून से प्रतिबंध कहीं भी नहीं लगाया गया है। फिर भी सर्वसम्मति से झूठ को बुरा माना जाता है। किसी प्रतिबंध से नहीं बल्कि नैतिक प्रतिबद्धता से हम झूठ का व्यवहार नहीं करते। कानून सच्च बोलने के लिए मजबूर नहीं कैसे कर पाएगा?  इसीलिए सच पाने के लिए अदालतों को धर्मशास्त्रों शपथ दिलवानी पडती है। ईमान वाला व्यक्ति इमान से ही सच अपनाता है और झूठ न बोलने को अपना नैतिक कर्तव्य मानकर बचता है। उसी तरह अहिंसक आहार को अपना नैतिक कर्तव्य मानकर अपनाना होता है।

हर प्राणी में जीवन जीने की अदम्य इच्छा होती है, यहां तक की कीट व जंतु भी कीटनाशक दवाओं के प्रतिकार की शक्ति उत्पन्न कर लेते है। सुक्ष्म जीवाणु भी कुछ समय बाद रोगप्रतिरोधक दवाओं से प्रतिकार शक्ति पैदा कर लेते है। यह उनके जीनें की अदम्य जिजीविषा का परिणाम होता है। सभी जीना चाहते है मरना कोई नहीं चाहता।

इसलिए, 'ईमान' और 'रहम' की बात करने वाले 'शान्तिपसंद' मानव का यह फ़र्ज़ है कि वह जीए और जीने दे।

रविवार, 23 दिसंबर 2012

मांसाहार प्रचारकों के कुतर्की जाल का खण्ड़न।

मांसाहारी प्रचारक:- - "हिन्दू मत अन्य धर्मों से प्रभावित"

“हालाँकि हिन्दू धर्म ग्रन्थ अपने मानने वालों को मांसाहार की अनुमति देते हैं, फिर भी बहुत से हिन्दुओं ने शाकाहारी व्यवस्था अपना ली, क्यूंकि वे जैन जैसे धर्मों से प्रभावित हो गए थे.”

प्रत्युत्तर : वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है, यह देखिए-

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

- मारने की अनुमति देने, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिए लेने और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले - ये आठों प्रकार के मनुष्य घातक, हिंसक अर्थात् ये सब एक समान पापी हैं ।

इस स्पष्ट  सच्चाई को जानने के बाद, मात्र जैन-मार्ग से प्रभावित मानने का प्रश्न ही नहीं उठता। हां, अवार्चिन में, आगे चलकर बहुत बाद में प्रवर्तित, यज्ञों में पशुबलि रूप कुरीति का विरोध अवश्य जैन मत या बौद्ध मत नें किया होगा, लेकिन वह मात्र परिमार्जन था। फिर भी अगर प्रभावित भी हुआ हो तो वह अपने ही सिद्धान्तों का जीर्णोद्धार था । सुसंस्कृति अगर किसी भी संसर्ग से प्रगाढ होती है तो उसमें बुरा क्या है? क्या मात्र इसलिये कि अहिंसा आपकी अवधारणाओं से मेल नहीं खाती? धर्म का मूल अहिंसा, सर्वे भवन्तु सु्खिनः सूक्त के लिए एक आवश्यक सिद्धांत है। यह भारतीय संस्कृति का यथार्थ है।

मांसाहारी प्रचारक:- - "पेड़ पौधों में भी जीवन"

“कुछ धर्मों ने शुद्ध शाकाहार अपना लिया क्यूंकि वे पूर्णरूप से जीव-हत्या से विरुद्ध है. अतीत में लोगों का विचार था कि पौधों में जीवन नहीं होता. आज यह विश्वव्यापी सत्य है कि पौधों में भी जीवन होता है. अतः जीव हत्या के सम्बन्ध में उनका तर्क शुद्ध शाकाहारी होकर भी पूरा नहीं होता.”

प्रत्युत्तर : अतीत में ऐसे किन लोगों का मानना था कि पेड़-पौधो में जीवन नहीं है? ऐसी 'ज़ाहिल' सभ्यताएं कौन थी? आर्यावर्त में तो सभ्यता युगारम्भ में ही पुख्त बन चुकी थी, अहिंसा में आस्था रखने वाली आर्य सभ्यता न केवल वनस्पति में बल्कि पृथ्वी, वायु, जल और अग्नी में भी जीवन को प्रमाणित कर चुकी थी, जबकि विज्ञान को अभी वहां तक पहुंचना शेष है। अहिंसा की अवधारणा, हिंसा को न्यून से न्यूनत्तम करने की है और उसके लिए शाकाहार ही श्रेष्ठ माध्यम है।

मांसाहारी प्रचारक:- - "पौधों को भी पीड़ा होती है"

“वे आगे तर्क देते हैं कि पौधों को पीड़ा महसूस नहीं होती, अतः पौधों को मारना जानवरों को मारने की अपेक्षा कम अपराध है. आज विज्ञान कहता है कि पौधे भी पीड़ा महसूस करते हैं …………अमेरिका के एक किसान ने एक मशीन का अविष्कार किया जो पौधे की चीख को ऊँची आवाज़ में परिवर्तित करती है जिसे मनुष्य सुन सकता है. जब कभी पौधे पानी के लिए चिल्लाते तो उस किसान को तुंरत ज्ञान हो जाता था. वर्तमान के अध्ययन इस तथ्य को उजागर करते है कि पौधे भी पीड़ा, दुःख-सुख का अनुभव करते हैं और वे चिल्लाते भी हैं.”

प्रत्युत्तर : हाँ, उसके बाद भी सूक्ष्म हिंसा कम अपराध ही है, इसी में अहिंसक मूल्यों की सुरक्षा है। एक उदा्हरण से समझें- यदि प्रशासन को कोई मार्ग चौडा करना हो, उस मार्ग के एक तरफ विराट निर्माण बने हुए हो, जबकि दूसरी तरफ छोटे साधारण छप्परनुमा अवशेष हो तो प्रशासन किस तरफ के निर्माण को ढआएगा? निश्चित ही वे साधारण व कम व्यय के निर्माण को ही हटाएंगे।  जीवन के विकासक्रम की दृष्टि से अविकसित या अल्पविकसित जीवन की तुलना में अधिक विकसित जीवों को मारना बड़ा अपराध है। रही बात पीड़ा की तो, अगर जीवन है तो पीडा तो होगी ही, वनस्पति जीवन को तो छूने मात्र से उन्हे मरणान्तक पीडा होती है। पर बेहद जरूरी उनकी पीडा को सम्वेदना से महसुस करना। सवाल उनकी पीड़ा से कहीं अधिक, हमारी सम्वेदनाओं को पहुँचती चोट की पीडा का है।जैसे कि, किसी कारण से बालक की गर्भाधान के समय ही मृत्यु हो जाय, पूरे माह पर मृत्यु हो जाय, जन्म लेकर मृत्यु हो, किशोर अवस्था में मृत्यु हो, जवान हो्कर मृत्यु हो या शादी के बाद मृत्यु हो। कहिए किस मृत्यु पर हमें अधिक दुख होगा? निश्चित ही अधिक विकसित होने पर दुख अधिक ही होगा। छोटे से बडे में क्रमशः  हमारे दुख व पीडा महसुस करने में अधिकता आएगी। क्योंकि इसका सम्बंध हमारे भाव से है। जितना दुख ज्यादा, उसे मारने के लिए इतने ही अधिक क्रूर भाव चाहिए। अविकसित से पूर्ण विकसित जीवन की हिंसा करने पर क्रूर भाव की श्रेणी बढती जाती है। बडे पशु की हिंसा के समय अधिक असम्वेदनशीलता की आवश्यकता रहती है, अधिक विकृत व क्रूर भाव चाहिए। इसलिए प्राणहीन होते जीव की पीड़ा से कहीं अधिक, हमारी मरती सम्वेदनाओं की पीड़ा का सवाल है।

मांसाहारी प्रचारक:- - "दो इन्द्रियों से वंचित प्राणी की हत्या कम अपराध नहीं !!!"

“एक बार एक शाकाहारी ने तर्क दिया कि पौधों में दो अथवा तीन इन्द्रियाँ होती है जबकि जानवरों में पॉँच होती हैं| अतः पौधों की हत्या जानवरों की हत्या के मुक़ाबले छोटा अपराध है.”

"कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, दुसरे मनुष्य के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं. वह जवान होता है और कोई उसकी हत्या कर देता है तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह हत्या करने वाले (दोषी) को कम दंड दें क्यूंकि आपके भाई की दो इन्द्रियाँ कम हैं. वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे. वास्तव में आपको यह कहना चाहिए उस अपराधी ने एक निर्दोष की हत्या की है और न्यायधीश को उसे कड़ी से कड़ी सज़ा देनी चाहिए."

प्रत्युत्तर : एकेन्द्रिय  और पंचेन्द्रिय को समझना आपके बूते से बाहर की बात है, क्योकि आपके उदाहरण से ही लग रहा है कि उसे समझने का न तो दृष्टिकोण आपमें है न वह सामर्थ्य। किसी भी पंचेन्द्रिय प्राणी में, एक दो या तीन इन्द्रिय कम होने से, वह चौरेन्द्रिय,तेइन्द्रिय,या बेइन्द्रिय नहीं हो जाता, रहेगा वह पंचेन्द्रिय ही। वह विकलांग (अपूर्ण इन्द्रिय) अवश्य माना जा सकता है, किन्तु पाँचो इन्द्रिय धारण करने की योग्यता के कारण वह पंचेन्द्रिय ही रहता है। उसका आन्तरिक इन्द्रिय सामर्थ्य सक्रिय रहता है। जीव के एकेन्द्रीय से पंचेन्द्रीय श्रेणी मुख्य आधार, उसके इन्द्रिय अव्यव नहीं बल्कि उसकी इन्द्रिय शक्तियाँ है। नाक कान आदि तो उपकरण है, शक्तियाँ तो आत्मिक है।और रही बात सहानुभूति की तो निश्चित ही विकलांग के प्रति सहानुभूति अधिक ही होगी। अधिक कम क्या, दया और करूणा तो प्रत्येक जीव के प्रति होनी चाहिए, किन्तु व्यवहार का यथार्थ उपर दिए गये पीड़ा व दुख के उदाहरण से स्पष्ट है। भारतीय संसकृति में अभयदान देय है, न्यायाधीश बनकर सजा देना लक्ष्य नहीं है।क्षमा को यहां वीरों का गहना कहा जाता है, भारतिय संसकृति को यूँ ही उदार व सहिष्णुता की उपमाएं नहीं मिल गई। विवेक यहाँ साफ कहता है कि अधिक इन्द्रीय समर्थ जीव की हत्या, अधिक क्रूर होगी।

आपको तो आपके ही उदाह्रण से समझ आ सकता है………

कल्पना करें कि अगर आप का भाई पैदाईशी गूंगा और बहरा है, आप के दूसरे भाई के मुक़ाबले उनमें दो इन्द्रियाँ कम हैं। वह जवान होता है, और वह किसी आरोप में फांसी की सजा पाता है ।तो क्या आप न्यायधीश से कहेंगे कि वह उस भाई को छोड दें, क्यूंकि इसकी दो इन्द्रियाँ कम हैं, और वह सज़ा-ए-फांसी की पीड़ा को महसुस तो करेगा पर चिल्ला कर अभिव्यक्त नहीं कर सकता, इसलिए यह फांसी उसके बदले, इस दूसरे भाई को दे दें जिसकी सभी इन्द्रियाँ परिपूर्ण हैं, यह मर्मान्तक जोर से चिल्लाएगा, तडपेगा, स्वयं की तड़प देख, करूण रुदन करेगा, इसे ही मृत्यु दंड़ दिया जाय। क्या आप ऐसा करेंगे? किन्तु वास्तव में आप ऐसा नहीं कहेंगे। क्योंकि आप तो समझदार(?) जो है। ठीक उसी तरह वनस्पति के होते हुए भी बड़े पशु की घात कर मांसाहार करना बड़ा अपराध है।

यह यथार्थ है कि हिंसा तो वनस्पति के आहार में भी है। पर विवेक यह कहता है कि जितना हिंसा से बचा जाये, बचना चाहिये। न्यून से न्यूनतम हिंसा का विवेक रखना ही हमारे सम्वेदनशील मानवीय जीवन मूल्य है। वनस्पति आदि सुक्ष्म को आहार बनाने के लिए हमें क्रूर व निष्ठुर भाव नहीं बनाने पडते, किन्तु पंचेन्द्रिय प्राणी का वध कर अपना आहार बनाने से लेकर,आहार ग्रहण करने तक, हमें बेहद क्रूर भावों और निष्ठुर मनोवृति की आवश्यकता होती है। अपरिहार्य हिंसा में भी द्वेष व क्रूर भावों के दुष्प्रभाव से  अपने मानस को सुरक्षित रखना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए । यही तो भाव अहिंसा है। अहिंसक मनोवृति के निर्माण की यह मांग है कि बुद्धि, विवेक और सजगता से हम हिंसकभाव से विरत रहें और अपरिहार्य हिंसा को भी छोटी से छोटी बनाए रखें, सुक्ष्म से सुक्ष्मतर करें, न्यून से न्यूनत्तम करें, अपने भोग को संयमित करते चले जाएं।

अब रही बात जैन मार्ग की तो, जैन गृहस्थ भी प्रायः जैसे जैसे त्याग में समर्थ होते जाते है, वैसे वैसे, योग्यतानुसार शाकाहार में भी, अधिक हिन्साजन्य पदार्थो का त्याग करते जाते है। वे शाकाहार में भी हिंसा त्याग बढ़ाने के उद्देश्य से कन्दमूल, हरी पत्तेदार सब्जीओं आदि का भी त्याग करते है।और इसी तरह स्वयं को कम से कम हिंसा की ओर बढ़ाते चले जाते है।

जबकि मांसाहार में, मांस केवल क्रूरता और प्राणांत की उपज ही नहीं, बल्कि उस उपजे मांस में सडन गलन की प्रक्रिया भी तेज गति से होती है। परिणाम स्वरूप जीवोत्पत्ति भी तीव्र व बहुसंख्य होती है।सबसे भयंकर तथ्य तो यह है कि पकने की प्रक्रिया के बाद भी उसमे जीवों की उत्पत्ति निरन्तर जारी रहती है। अधिक जीवोत्पत्ति और रोग की सम्भावना के साथ साथ यह महाहिंसा का कारण है। अपार हिंसा और हिंसक मनोवृति के साथ क्रूरता ही मांसाहार निषेध का प्रमुख कारण है।

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

फलों में पोषक तत्व

फल : आम

(इनमें केवल वे पोषक तत्व सूचीबद्ध है जो उल्लेखनीय मात्रा में उपस्थित होते हैं।)

 एक मध्यम आकार(कप परिमाण)के आम में 1.06 grams प्रोटीन, 135 केलरीज, और 3.7 grams खाद्य रेशे होते है।

खनिज राशी अन्तर्विष्ट 

Potassium - 323 mg 

Phosphorus - 23 mg 

Magnesium - 19 mg 

Calcium - 21 mg 

Sodium - 4 mg 

Iron - 0.27 mg 

Selenium 1.2 mcg 

Manganese - 0.056 mg 

Copper - 0.228 mg 

Zinc - 0.08 mg 

Also contains small amounts of other minerals. 

विटामिन राशी अन्तर्विष्ट 

Vitamin A - 1584 IU 

Vitamin B1 (thiamine) - 0.12 mg 

Vitamin B2 (riboflavin) - 0.118 mg 

Niacin - 1.209 mg 

Folate - 29 mcg 

Pantothenic Acid - 0.331 mg 

Vitamin B6 - 0.227 mg 

Vitamin C - 57.3 mg 

Vitamin E - 2.32 mg 

Vitamin K - 8.7 mcg 

Contains some other vitamins in small amounts.

फल : स्ट्रॉबेरी
(इनमें केवल वे पोषक तत्व सूचीबद्ध है जो उल्लेखनीय मात्रा में उपस्थित होते हैं।)

एक कप परिमाण की स्ट्रॉबेरी में 0.96 grams प्रोटीन, 46 केलरीज, और 2.9 grams खाद्य रेशे होते है।
खनिज राशी अन्तर्विष्ट
Potassium - 220 mg
Phosphorus - 35 mg
Magnesium - 19 mg
Calcium - 23 mg
Sodium - 1 mg
Iron - 0.59 mg
Selenium 0.6 mcg
Manganese - 0.556 mg
Copper - 0.069 mg
Zinc - 0.2 mg
Also contains small amounts of other minerals.

विटामिन राशी अन्तर्विष्ट
Vitamin A - 17 IU
Vitamin B1 (thiamine) - 0.035 mg
Vitamin B2 (riboflavin) - 0.032 mg
Niacin - 0.556 mg
Folate - 35 mcg
Pantothenic Acid - 0.18 mg
Vitamin B6 - 0.068 mg
Vitamin C - 84.7 mg
Vitamin E - 0.42 mg
Vitamin K - 3.2 mcg
Contains some other vitamins in small amounts.

फल : संतरा

(इनमें केवल वे पोषक तत्व सूचीबद्ध है जो उल्लेखनीय मात्रा में उपस्थित होते हैं।)



एक मध्यम आकार के संतरे में 1.23 grams प्रोटीन, 62 केलरीज, और 3.1 grams खाद्य रेशे होते है। 
खनिज राशी अन्तर्विष्ट 
Potassium - 237 mg
Phosphorus - 18 mg
Magnesium - 13 mg
Calcium - 52 mg
Iron - 0.13 mg
Selenium 0.7 mcg
Manganese - 0.033 mg
Copper - 0.059 mg
Zinc - 0.09 mg
Also contains small amounts of other minerals.


विटामिन राशी अन्तर्विष्ट 
Vitamin A - 295 IU
Vitamin B1 (thiamine) - 0.114 mg
Vitamin B2 (riboflavin) - 0.052 mg
Niacin - 0.369 mg
Folate - 39 mcg
Pantothenic Acid - 0.328 mg
Vitamin B6 - 0.079 mg
Vitamin C - 69.7 mg
Vitamin E - 0.24 mg
Contains some other vitamins in small amounts.

फल : टमाटर

(इनमें केवल वे पोषक तत्व सूचीबद्ध है जो उल्लेखनीय मात्रा में उपस्थित होते हैं।)



एक मध्यम आकार के टमाटर में 1.08 grams प्रोटीन, 22 केलरीज, और 1.5 grams खाद्य रेशे होते है। 
खनिज राशी अन्तर्विष्ट 
Potassium - 292 mg
Phosphorus - 30 mg
Magnesium - 14 mg
Calcium - 12 mg
Sodium - 6 mg
Iron - 0.33 mg
Manganese - 0.14 mg
Copper - 0.073 mg
Zinc - 0.21 mg
Also contains small amounts of other minerals.

विटामिन राशी अन्तर्विष्ट 
Vitamin A - 1025 IU
Vitamin B1 (thiamine) - 0.046 mg
Vitamin B2 (riboflavin) - 0.023 mg
Niacin - 0.731 mg
Folate - 18 mcg
Pantothenic Acid - 0.109 mg
Vitamin B6 - 0.098 mg
Vitamin C - 15.6 mg
Vitamin E - 0.66 mg
Vitamin K - 9.7 mcg
Contains some other vitamins in small
फल : स्ट्रॉबेरी
(इनमें केवल वे पोषक तत्व सूचीबद्ध है जो उल्लेखनीय मात्रा में उपस्थित होते हैं।)

एक कप परिमाण की स्ट्रॉबेरी में 0.96 grams प्रोटीन, 46 केलरीज, और 2.9 grams खाद्य रेशे होते है।
खनिज राशी अन्तर्विष्ट
Potassium - 220 mg
Phosphorus - 35 mg
Magnesium - 19 mg
Calcium - 23 mg
Sodium - 1 mg
Iron - 0.59 mg
Selenium 0.6 mcg
Manganese - 0.556 mg
Copper - 0.069 mg
Zinc - 0.2 mg
Also contains small amounts of other minerals.

विटामिन राशी अन्तर्विष्ट
Vitamin A - 17 IU
Vitamin B1 (thiamine) - 0.035 mg
Vitamin B2 (riboflavin) - 0.032 mg
Niacin - 0.556 mg
Folate - 35 mcg
Pantothenic Acid - 0.18 mg
Vitamin B6 - 0.068 mg
Vitamin C - 84.7 mg
Vitamin E - 0.42 mg
Vitamin K - 3.2 mcg
Contains some other vitamins in small amounts.

फल :खरबूजा

(इनमें केवल वे पोषक तत्व सूचीबद्ध है जो उल्लेखनीय मात्रा में उपस्थित होते हैं।)

एक मध्यम आकार खरबूजे की चीरी में 0.58 grams प्रोटीन, 23 केलरीज, और 0.6 grams खाद्य रेशे होते है।

खनिज राशी अन्तर्विष्ट
Potassium - 184 mg
Phosphorus - 10 mg
Magnesium - 8 mg
Calcium - 6 mg
Sodium - 11 mg
Iron - 0.14 mg
Selenium 0.3 mcg Manganese - 0.028 mg
Copper - 0.028 mg
Zinc - 0.12 mg
Also contains small amounts of other minerals.

विटामिन राशी अन्तर्विष्ट
Vitamin A - 2334 IU
Vitamin B1 (thiamine) - 0.028 mg
Vitamin B2 (riboflavin) - 0.013 mg
Niacin - 0.506 mg
Folate - 14 mcg
Pantothenic Acid - 0.072 mg
Vitamin B6 - 0.05 mg
Vitamin C - 25.3 mg
Vitamin E - 0.03 mg
Vitamin K - 1.7 mcg
Contains some other vitamins in small amounts.

फल : अंगूर 

(इनमें केवल वे पोषक तत्व सूचीबद्ध है जो उल्लेखनीय मात्रा में उपस्थित होते हैं।)




कप परिमाण के अंगूरों में 1.09 grams प्रोटीन, 104 केलरीज, और 1.4 grams खाद्य रेशे होते है।

खनिज राशी अन्तर्विष्ट
Potassium - 288 mg
Phosphorus - 30 mg
Magnesium - 11 mg
Calcium - 15 mg
Sodium - 3 mg
Iron - 0.54 mg
Selenium 0.2 mcg
Manganese - 0.107 mg
Copper - 0.192 mg
Zinc - 0.11 mg
Also contains small amounts of other minerals.

विटामिन राशी अन्तर्विष्ट
Vitamin A - 100 IU
Vitamin B1 (thiamine) - 0.104 mg
Vitamin B2 (riboflavin) - 0.106 mg
Niacin - 0.284 mg
Folate - 3 mcg
Pantothenic Acid - 0.076 mg
Vitamin B6 - 0.13 mg
Vcg 
Contains some other vitamins in small amounts.