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शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

जीवों की हत्या करना ही अधर्म है।


  • जीवो जीवितुमिच्छति। (योग-शास्त्र)

  ===  प्राणी मात्र जीने की इच्छा करते है।

 

  • सर्वो जीवितुमिच्छति। (योग-वशिष्ठ)

  ===   सभी जीना चाहते है।

 

  • अहिंस्रः सर्वभूतानां यथा माता यथा पिता। (अनुशासन पर्व, महाभारत)

  ===   सभी प्राणियों की इस प्रकार रक्षा करें जैसे माता पिता की करते हैं।

 

  • जीवितं जीवरक्षात्। (बृहस्पति स्मृति)

  ===   जीवरक्षा से जीवन बढ़ता है।

 

  • धर्मस्य दया मूलम्। (प्रशम रति)

  ===   दया ही धर्म की जड़ है।

 

  • न दया सदृशं ज्ञानम्। (प्रशम रति)

  ===   दया सदृश कोई ज्ञान नहीं।

 

  • दया दानाद्विशिष्यते। (वशिष्ठ-स्मृति)

  ===   दान की अपेक्षा दया महिमावान है।

 

  • सर्वभूतदया तीर्थम्। (महाभारत)

  ===   प्राणी मात्र पर दया ही सर्वोत्तम तीर्थ है।

 

  • न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्। (मनु स्मृति)

  ===   प्राणिवध किसी भी दशा में स्वर्ग नहीं दिला सकता अतः उसकी वर्जना करनी चाहिए।

 

  • घ्नन्ति जन्तून् गतघृणा घोराम् ते यान्ति दुर्गतिम्। (योग शास्त्र, द्वितीय प्रकाश)

  ===   जो घृणा व खिन्नता रहित होकर जीव घात करते है वे निश्चय ही दुर्गति में जाते है।

 

  • दया च भूतेषु दिवं नयन्ति। (पद्म-पुराण)

  ===   जीवों पर की जाने वाली दया स्वर्ग ले जाती है।

 

  • वधको नैव शुद्धयति। (देवी भागवत)

  ===   प्राणी-वध करने वाले कभी पवित्र नहीं हो सकते।

 

  • शोधकौ तु दयादमौ। (शुभचन्द्राचार्य)

  ===   जीवदया व इन्द्रिय दमन से आत्म शुद्ध-पवित्र बनता है।

 

  • क्षीणा नरा निष्करूणा भवन्ति। (काव्य –रवि मंड़ल)

  ===   शक्तिहीन पुरूष दया-हीन होते है।

 

  • यस्य जीवदया नास्ति सर्वमेतन्निरर्थकम्। (शान्तिपर्व,महाभारत)

  ===   जिनके कार्य में जीवदया नहीं है उनकी सारी क्रियाएँ ही निर्थक है।

 

  • दया मांसाशिनः कुतः? (काव्य –रवि मंड़ल)

  ===   मांसभक्षी को दया कैसे उत्पन्न हो सकती है?

 

  • को धर्मः कृपया विना? (धर्म-बिन्दु)

  ===   जीवदया बिना कैसा धर्म? 

 

  • अधर्मश्च प्राणिनाम् वधः (शन्ति-पर्व महाभारत) 

  ===   जीवों की हत्या करना ही अधर्म है।

 

  • हिंसा नाम भवेद् धर्मो न भूतो न भविष्यति। (पूर्व मीमांसा) 

  ===  “हिंसा को धर्म कहें?” ऐसा न कभी भूतकाल मेँ था न कभी भविष्य मेँ होगा।