गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

अंडे का क्रूर फंडा

सब जानते हैं कि मांसाहार का व्यवसाय क्रूरता और हिंसा पर टिका है। लेकिन जब बात अण्डों की होती है तो कई बार वह क्रूरता और व्यवसायिक हिंसा पर्दे की ओट में छिप जाती है और कुछ लोग अंडे को शाकाहारी बताने के प्रचार को सच मान बैठते हैं।

अंडा किसी भी तरह शाकाहारी नहीं होता

अंडे दो तरह के होते है, एक वे जिसमें से चूजे निकल सकते है तथा दूसरे वे जिनसे बच्चे नहीं निकलते। निषेचित और अनिषेचित। मुर्गे के संसर्ग से मुर्गी अंडे दे सकती है किन्तु बिना संसर्ग के अंडा मात्र मुर्गी के रज-स्राव से बनता है, मासिक-धर्म की भांति ही यह अंडा मुर्गी की आन्तरिक अपशिष्ट का परिणाम होता है। आजकल इन्ही अंडो को व्यापारिक स्वार्थवश लोग अहिंसक, शाकाहारी आदि भ्रामक नामों से पुकारते है। यह अंडे किसी भी तरह से वनस्पति नहीं है।और न ही यह शाक की तरह,  सौर किरणें, जल व वायु से अपना भोजन बनाकर उत्पन्न होते है। अधिक से अधिक इसे मुर्गी का अपरिपक्व मूर्दा भ्रूण कह सकते है।

1962 मॆं यूनिसेफ ने एक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें अंडों को लोकप्रिय बनाने के व्यवसायिक उद्देश्य से अनिषेचित (INFERTILE) अंडों को शाकाहारी अंडे (VEGETARIAN EGG) जैसा मिथ्या नाम देकर भारत के शाकाहारी समाज में भ्रम फैला दिया। 1971 में मिशिगन यूनिवर्सिटी(अमेरिका) के वैज्ञानिक डॉ0 फिलिप जे0 स्केम्बेल ने 'पॉलट्री फीड्स एंड न्युट्रीन' नामक पुस्तक में यह सिद्ध किया कि "संसार का कोई भी अंडा निर्जीव नहीं होता, फिर चाहे वह निषेचित (सेने योग्य) हो या अनिषेचित,  अनिषेचित अंडे में भी जीवन होता है, वह एक स्वतंत्र जीव होता है। अंडे के ऊपरी भाग पर हजारो सूक्ष्म छिद्र होते है जिनमे अनिषेचित अंडे का जीव श्वास लेता है", जब तक श्वासोच्छवास की क्रिया होती है, अंडा सडन-गलन से मुक्त रहता है। यह उसमें जीवन होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है। "यदि ऐसे अंडे में श्वासोच्छवास की क्रिया बंद हो जाए तो अंडा शीघ्र ही सड जाता है।" इसतरह अंडे को निर्जीव और शाकाहार समकक्ष मनवाना बहुत बडी धूर्तता है, यह मात्र उत्पादकों के व्यापारिक स्वार्थ के खातिर प्रचारित भ्रांति से अधिक कुछ भी नहीं है।

हिंसा और अत्याचार की उपज है अंडा !!

बहुधा यह सुनने में आता है की अनिषेचित अंडे अहिंसक होते है। लेकिन यदि यह मालूम हो जाय कि उनके उत्पादन की विधि कितनी क्रूरता से परिपूर्ण है और भारतीय मूल्यों जैसे अहिंसा और करुणा के विपरीत है तो बहुत से लोग अंडा सेवन ही बंद कर देगे। अमेरिका के विश्वविख्यात लेखक जान राबिन्स ने अपनी प्रसिद्द पुस्तक "दैट फार ए न्यू अमेरिका" में लिखा है कि अंडों की फेक्ट्रीयो में स्थापित  पिजरों में, इतनी अधिक मुर्गियां भर दी जाती है कि वे पंख भी नहीं फडफड़ा सकती और तंग जगह के कारण वे आपस में चोचे मारती है, जख्मी होती है, गुस्सा करती है और कष्ट भोगती है।  मुर्गी को  लगातार २४ घंटे लोहे की सलाख पर बैठे रहना पड़ता है, उसी हालात में एक विशेष मशीन से  रात में एक साथ हजारो मुर्गियों की चोचे काट दी जाती है। गरम तपते लाल औजारों से उनके पंख भी कतर दिए जाते है।

मुर्गियां अंडे अपनी स्वेच्छा से नहीं देती, बल्कि उन्हें विशिष्ट हार्मोन्स और एग-फर्म्युलेशन के इन्जेक्शन दिए जाते है। तब जाकर मुर्गीयाँ लगातार अंडे दे पाती है। अंडे प्राप्त होते ही उन्हें इन्क्यूबेटर के हवाले कर दिया जाता है, ताकि चूजा २१ दिन की बज़ाय मात्र १८ दिन में ही निकल आए। बाहर आते ही नर तथा मादा चूजों को अलग-अलग कर दिया जाता है। मादा चूजों को शीघ्र जवान करने के लिए, उन्हें विशेष प्रकार की खुराक दी जाती है। साथ ही इन्हें चौबीसो  घंटे तेज प्रकाश में रखकर, सोने नहीं दिया जाता ताकि वे रात दिन खा-खा कर शीघ्र रज-स्राव कर अंडा देने लायक हो जाय। उसके बाद भी उन्हें लगातार तेज रोशनी में रखा जाता है ताकि खाती रहे और प्रतिदिन अंडा देती रहे।तंग जगह में रखा जाता है कि हिलडुल भी न सके,और अंडे को क्षति न पहुँचे। आप समझ सकते है की जल्दी और  मशीनीकृत तरीके से अंडा उत्पन्न करने की यह व्यवस्था कितनी क्रूर और हिंसात्मक है्।

अंडो से कई बीमारियाँ

हाल ही में हुआ बर्ड फ्ल्यू और साल्मानोला बीमारी ने समस्त विश्व को स्तम्भित कर दिया है कि मुर्गियों को होने वाली कई बीमारियों के कारण अन्डो से यह बीमारियाँ, मनुष्य में भी प्रवेश करती है। अंडा भोजियों  को यह भी नहीं मालूम कि इसमें हानिकारक कोलेस्ट्राल की बहुत अधिक मात्रा होती है। अंडो के सेवन से आंतो में सड़न और तपेदिक  की सम्भावनाएँ बहुत ही बढ़ जाती है। अंडे की सफ़ेद जर्दी से पेप्सीन इन्जाइम के विरुद्ध, विपरित प्रतिक्रिया होती है।

जर्मनी के प्रोफेसर एग्नरबर्ग का मानना है कि अंडा 51.83% कफ पैदा करता है। वह शरीर के पोषक तत्वों को असंतुलित कर देता है।


कैथराइन निम्मो तथा डाक्टर जे एम् विलिकाज ने एक सम्मिलित रिपोर्ट में कहा है कि अंडा ह्रदय रोग और लकवे आदि के लिए एक जिम्मेदार कारक है। यह बात १९८५ इस्वी के नोबल पुरस्कार विजेता, डॉक्टर ब्राउन और डॉ0 गोल्ड स्टाइन ने कही कि अंडों में सबसे अधिक कोलेस्ट्रोल होता है। जिससे उत्पन्न ह्रदय रोग के कारण बहुत अधिक मौते होती है। इंग्लेंड के डाक्टर आर जे विलियम ने कहा है कि जो लोग आज अंडा खाकर स्वस्थ बने रहने की कल्पना कर रहे है, वे कल लकवा, एग्जिमा, एन्जाईना जैसे रोगों के शिकार हो सकते है। फिर अंडे में जरा सा भी फाईबर नहीं होता, जो आंतो में सड़न की रोकथाम में सहायक है। साथ ही कार्बोहाईड्रेट जो शरीर में स्फूर्ति देता है, करीबन शून्य ही होता है।
जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. के.के. अग्रवाल का कहना है कि एक अंडे में 213 मिलीग्राम कॉलेस्ट्रॉल होता है यानी आठ से नौ चम्मच मक्खन के बराबर, क्योंकि एक चम्मच मक्खन में 25 मिलीग्राम कॉलेस्ट्रॉल होता है। इसलिए सिर्फ शुगर, हाई बीपी और हार्ट पेशेंट्स को ही इन्हें दूर से सलाम नहीं करना चाहिए बल्कि सामान्य सेहत वाले लोगों को भी दूर रहना चाहिए। अगर डॉक्टर प्रोटीन की जरूरत भी बताये तो प्रोटीन की प्रतिपूर्ति, शाकाहारी माध्यमों - मूँगफली, सोयाबीन, दालें, पनीर, दूध व मेवे आदि से करना अधिक आरोग्यप्रद है।

इग्लेंड के डॉ0 आर0 जे0 विलियम का निष्कर्ष है कि सम्भव है अंडा खाने वाले भले शुरू में क्षणिक आवेशात्मक चुस्ती-फुर्ती अनुभव करें किंतु बाद में उन्हें हृदय रोग, एक्ज़ीमा, लकवा, जैसे भयानक रोगों का शिकार होना पड़ सकता है।

इंगलैंड के मशहूर चिकित्सक डॉ0 राबर्ट ग्रास तथा प्रो0 ओकासा डेविडसन इरविंग के अनुसार अंडे खाने से पेचिश तथा मंदाग्नि जैसी बिमारियों की प्रबल सम्भावनाएं होती है। जर्मनी के प्रो0 एग्लर वर्ग का निष्कर्ष है कि अंडा 51.83 प्रतिशत कफ पैदा करता है, जो शरीर के पोषक तत्वों को असंतुलित करने में मुख्य घटक है। फ्लोरिडा के कृषि विभाग की हेल्थ बुलेटिन के अनुसार, अंडों में 30 प्रतिशत DDT पाया जाता है । जिस प्रकार पॉल्ट्रीज को रखा जाता है, उस प्रक्रिया के कारण DDT मुर्गी की आंतों में घुल जाता है अंडे के खोल में 15000 सूक्ष्म छिद्र होते हैं जो सूक्ष्मदर्शी यन्त्र द्वारा आसानी से देखे जा सकते हैं उन छिद्रों द्वारा DDT का विष अंडों के माध्यम से मानव शरीर में पहुंच जाता है। जो कैंसर की सम्भावनाएँ कईं गुना बढ़ा देता है। हाल ही में इंगलैंड के डॉक्टरों ने सचेत किया है कि ‘सालमोनेला एन्टरईटिस’, जिसका सीधा संबन्ध अंडों से है, के कारण लाखों लोग इंगलैंड में एक जहरीली महामारी का शिकार हो रहे है। भारत में ऐसी कोई परीक्षण विधि नहीं है कि सड़े अंडों की पहचान की जा सके। और ऐसे सड़े अंडों के सेवन से उत्पन्न होने वाले, भयंकर रोगों की रोकथाम सम्भव हो सके।

पौष्टिकता एवं उर्जा के प्रचार में नहीं है दम

विज्ञापनों के माध्यम से यह भ्रम बड़ी तेजी से फैलाया जा रहा है कि शाकाहारी खाद्यानो की तुलना में, अंडे में अधिक प्रोटीन है। जबकि विश्व स्वास्थ्य संघठन के तुलनात्मक चार्ट से यह बात साफ है कि खनिज, लवण, प्रोटीन, कैलोरी, रेशे और कर्बोहाड्रेड आदि की दृष्टि से शाकाहार ही हमारे लिए अधिक उपयुक्त, पोषक और श्रेष्ठ है।

अंडे से कार्य-क्षमता, केवल क्षणिक तौर पर बढ़ती सी प्रतीत होती है, पर स्टेमिना नहीं बढ़ता। फार्मिंग से आए अंडे तो केमिकल की वजह से ज्यादा ही दूषित या जहरीले हो जाते हैं। सामान्यतया गर्मियों में पाचनतंत्र कमजोर होता है, ऐसे में अंडे ज्यादा कैलरी व गरिष्ठ होने के कारण और भी ज्यादा नुकसानदेय साबित होते हैं।

अमेरिका के डॉ00 बी0 एमारी तथा इग्लेंड के डॉ0 इन्हा ने अपनी विश्व विख्यात पुस्तकों में साफ माना है कि अंडा मनुष्य के लिये ज़हर है।

विशेषज्ञ कहते हैं कि प्रोटीन के लिए,  सभी तरह की दालें, पनीर व दूध से बनी चीजें अंडे का श्रेष्ठ विकल्प होती हैं। अंडों की जगह उनका इस्तेमाल होना चाहिए। दूध या स्किम्ड मिल्क, मूंगफली, मेवे में अखरोट, बादाम, काजू व हरी सब्जियां, दही, सलाद और फल भी ले सकते हैं। उनका कहना है कि जीव-जंतुओं से प्राप्त भोजन से कॉलेस्ट्रॉल अधिक बढ़ता है जबकि पेड़-पौधों से मिलने वाले भोजन से बहुत ही कम।

न हमारे शरीर को अंडे खाना ज़रूरी है और न हमारे मन को जीवहिंसा का सहभागी बनना। हमारा अनुरोध है कि निरामिष भोजन अपनायें और स्वस्थ रहें।

73 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छी जानकारी दी है आपने आभार ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. हे भगवन !! यह तो नयी ही जानकारी है मेरे लिए ... | इतनी क्रूरता ? मैंने तो अपने आसपास झोपड़ियों में रहते लोगों को ही मुर्गियां पालते / अंडे बेचते देखा है यहाँ | पहले नोर्थ में रहती थी, तब सिर्फ खरीदना और खाना - कहाँ से आता है - सोचा तक न था | (उस उम्र में) तो कभी सोचा भी न था इस बारे में | कभी ऐसा लगा ही नहीं की इसमें ऐसा भी होता होगा !!! :(

    हाँ - यह प्रोटीन के बारे में तो मैं भी यही सोचती थी - इन्टरनेट पर भी यही मिलता है - की अंडे से बेहतर प्रोटीन का कोई source है ही नही | जब बाल अधिक गिरने लगते - अंडे खा लो - और बालों के गिरने की रफ़्तार कम हो जाती | कई फ्रेंड्स तो सर में अंडा भी लगाती हैं | परन्तु - इससे तो बाल गिरना ही भला :(

    सुज्ञ भैया - इस जानकारी का लिंक देंगे ? मैं देखना चाहूंगी - जिससे मुझे अपनी इस आदत पर लगाम साधने में सहायता मिलेगी | वैसे - ऐसा ही एक email मैंने kentucky white goose लीवर के बारे में देखा था - उन images को देख कर पता चला था की कैसे इन चिड़ियों को torture किया जाताहै - इसे पाने के लिए |

    आपका आभार यह पोस्ट लिखने के लिए | प्रयास करूंगी की अंडे खाना छोड़ सकूं - और अपनी जबान के चटोरेपन को साधने के लिए तरह तरह के बहाने न खोजती फिरूं |

    उत्तर देंहटाएं
  3. आज की पोस्ट मांसभक्षी राक्षसों को बुरी लगने वाली है, शाकाहारियों को राह पर लाने के लिये बेहतरीन ज्ञान लिखा है।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. Duniya k kisi bhi dharm me hinsa ko stan nhi is liye nonveg pr bandi lana chahiye

      हटाएं
    2. Duniya k kisi bhi dharm me hinsa ko stan nhi is liye nonveg pr bandi lana chahiye

      हटाएं
  4. इतना बड़ा आधार मुझे मिला है कि कह नहीं सकती...

    साधुवाद इस सद्प्रयास हेतु...

    उत्तर देंहटाएं
  5. अंडों में तथा अन्य माँसाहारी उत्पादों में प्रोटीन, स्टैमिना, क्षमता जैसी बातें सिर्फ़ अपने कथन को वजन देने के लिये इस्तेमाल की जाती हैं। रही बात स्वाद की, तो हमारे एक परिचित सरदारजी बहुत सही बात कहते थे कि स्वाद मीट या अंडे में नहीं होता बल्कि मसालों में होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह संजय भाई क्या दमदार बात कहीं है।
    स्वाद मीट या अंडे में नहीं होता, बल्कि मसालों में होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. आइये इसे बहस का रूप देते हैं।
    आपकी हर बात सही लगी कि अण्डे खाने से बीमारियां होती हैं, शाकाहारी नहीं होता, अत्याचार की उपज है, पौष्टिक नहीं है, ऊर्जाहीन है। लेकिन इसमें एक शब्द बडा कन्फ्यूजिंग सा है- जीवहत्या।
    अण्डा फोडने पर आपको जीवहत्या दिखाई देती है जबकि आलू काटने पर जीवहत्या नहीं दिखती????
    बेचारे आलू पर पहला अत्याचार तो तभी होता है जब हम उसे जमीन में से उखाडते हैं। बचा खुचा अत्याचार इसे काटते ही हो जाता है। जहां एक अण्डे में से एक जीच बाहर निकल सकता है वही उतने ही आकार के आलू से कई जीव बन सकते हैं। प्याज का भी यही हाल है, लहसुन भी ऐसा ही है। कई बार तो ये जीव बोरी में पडे पडे, हमारी रसोई में पडे पडे ही अपना संवर्द्धन करना शुरू कर देते हैं। देखा होगा कि प्याज, लहसुन आदि में से हई पत्तियां निकलने लगती हैं। मूली, गन्ना भी इसी श्रेणी में हैं।
    आइये अण्डे के साथ इन दूसरे ‘बेचारों’ को भी बचाने का प्रयास करें। मेरी बातें आपको बेवकूफी भरी लग रही होंगी लेकिन यह सिद्ध हो चुका है कि पौधों में भी जीव होता है, वे भी भावनाओं को महसूस करते हैं।
    अच्छा हां, मैं नियमित अण्डाभक्षी हूं, मांस नहीं खाता हूं। आपको नीचा दिखाने की कोशिश नहीं कर रहा हूं बल्कि चिर पुरातन काल से चली आ रही इस बहस को और बढा रहा हूं। उम्मीद है कि इस ‘जीवहत्या’ शब्द पर आप विस्तार से प्रकाश डालेंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  8. जिनको अंडा खाना हैं वे कोई भी तर्क दे सकते हैं.अंडे की उत्पत्ति का स्थान मुर्गी या पक्षी का का जनन अंग है,आलू का नही.

    सुज्ञ जी, आपने बहुत ही सुन्दर ढंग से अंडे के बारे में जानकारी दी है.
    जब मन में सतोगुण पवित्रता और अहिंसा का संचार होता है तो सहज ही अंडें/माँसाहार से मुक्ति मिलने लगती है.

    सुन्दर प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  9. मित्र श्री नीरज जी,

    बहस नहीं, इसे चर्चा का रूप अवश्य देंगे।
    पर पहले देखते है विद्वान पाठक गण इस विषय पर क्या कहते है।
    यह अच्छा संकेत है कि आपको "हर बात सही लगी कि अण्डे खाने से बीमारियां होती हैं, शाकाहारी नहीं होता, अत्याचार की उपज है, पौष्टिक नहीं है, ऊर्जाहीन है।
    पौधों में जीवन होता है यह आज-कल की सिद्धि नहीं है, भारतीय मनिषा हजारों वर्ष पहले व्याख्या कर चुकी है।
    आपकी पृच्छा कहीं से भी नीचा दिखाने की कोशीश नहीं लगती, और न आपका यह सब कहना बेवकूफी जैसा। विचारशील ही गम्भीर प्रश्न करते है।
    ‘जीवहत्या’ शब्द पर विस्तार से प्रकाश डालने से पूर्व मेरा आपसे एक छोटा सा प्रश्न है, आप नियमित अण्डाभक्षी है, पर मांसाहार नहीं खाते, बताएंगे आप मांसाहार क्यों नहीं लेते? क्या कारण है?

    उत्तर देंहटाएं
  10. अभी तक तो अंडे को कभी करीब देखा या छुआ भी नहीं है..... पोस्ट पढ़कर अच्छा लग रहा है..... बहुत सा धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  11. राकेश भैया - नहीं, जिन्हें खाना है वे कुछ भी तर्क देंगे - इससे मैं सहमत नहीं हूँ |

    जिन्हें न भी खाना हो / छोड़ना भी हो - वे भी तर्क तो करेंगे - क्योंकि यह मन में बसी धारणा की बात है | yadi sirf kahne se chhod bhi diya - to 6 maheene me fir khaana shuru ho jayega aise me - to yah koi solution nahi hai | if we try to shame a person into leaving something - he may leave due to pressure, or speak a lie that he has left, but continue taking it. but if he is convinced - he will leave it forever.... on the other hand - pressurising by shaming may cause a person to run away / escape - which is not the purpose of this blog. :)

    @ prajanan prakriya ke baat - तो फिर तो आप कुछ भी खा नहीं सकते - क्योंकि जमाल साहब के सब तर्क आ जायेंगे यहाँ - की अन्न भी तो पौधों का बीज है न ? प्रजनन तो है ही ? फल क्यों बनते हैं? फूल ? यह सब ही प्रजनन प्रक्रिया की ही बातें हैं | यदि वह अन्न का दाना हम न पकाएं - तो वह नए पौधे को जन्म देगा - इसमें कोई दो राय नहीं हैं |

    मेरा प्रश्न प्रजनन से नहीं - हत्या से जुड़ा है | मैं मांसाहार इसलिए नहीं लेती - की मेरे लिए साफ़ है की इसके लिए मैं एक जीते जागते प्राणी (मुर्गा / बकरा / मछली ) की हत्या करूंगी | यह प्रजनन की संभावना की नहीं - बल्कि एक जीते प्राणी के प्राण को छीन लेने की बात है | यह बात संभावित प्रजनन के साथ नहीं है |

    यदि मैं यह जानूं की अंडा पकाना / खाना / सर में लगाना हत्या है - तो मैं एक पल में इसे छोड़ सकूंगी शायद | उससे पहले - पता नहीं - i am not talking of the "जुगुप्सा" created by the thought of it being the product of the reproductive process. i am talking of the possibility of taking a life which is there - and i am snatching it away.....

    उत्तर देंहटाएं
  12. शिल्पा बहिन,

    मैंने किसी पर भी आक्षेप नही किया है.पशु पक्षी की प्रजनन क्रिया और पेड़ पौधों की प्रजनन क्रिया को आप कैसे भी समझ सकती हैं.
    अंडा खाकर यदि पवित्रता का और सात्विकता का संचार होता है तो मुझे कुछ नही कहना.

    श्रीमद्भगवद्गीता में खाने के तीन भेदों सतो गुणी,रजो गुणी और तमों गुणी खाने में किस के अंतर्गत रखना चाहेंगीं अंडे को,यह फैंसला आप ही कीजिये.मेरी बात से आपको या किसी को भी ठेस पहुंची हो तो क्षमा चाहता हूँ.

    हर बात ही तर्क पर आधारित नही हो सकती है.शाकाहार भी तर्क से ज्यादा भावना पर आधारित होता है.जिस खाने से सतोगुण
    (दया,करुणा,अहिंसा,प्रेम आदि)का संचार हो मन में सुन्दर भाव जगें ,बुद्धि में सकारात्मक विचार आयें और शरीर की भूख शांत होने के अलावा शरीर पुष्ट और दीर्घायु भी हो वही सतोगुणी आहार माना गया है.

    सभी शाकाहारी आहार भी सतोगुणी नही होतें हैं. मसलन बासी,सडा हुआ और बदबूदार शाकाहारी आहार तमो गुणी ही होता है.अंडें और माँसाहार को वैसे तो मैंने तमो गुणी ही पढा या सुना है,फिर भी
    आप अपने विचार व अनुभव बता कर अनुग्रहित कीजियेगा.

    उत्तर देंहटाएं
  13. @ राकेश भैया - किसी पर भी आक्षेप नही .... nahi bhaiya - mujhe aisa lagaa bhi nahi egg है तो तमोगुणी ही - इसमें मैंने कोई शंका नहीं उठाई है |माफ़ी जैसी कोई बात नहीं है - मैं तो मान ही रही हूँ की यह जुगुप्सा का विषय है - मैं यह कह रही हूँ की मैं इसे अभी सिर्फ हत्या है या नहीं, इस सन्दर्भ में समझने चाहती हूँ | and i eat it verrrrrrrrry rarely - it is taken more as a medicine for hairfall and weakness of ligaments/ tendons which i suffer from और मेरे लिए यह यहाँ public मंच पर discuss करना आसान नहीं था - यह चर्चा मैं privetely भी कर सकती थी मेल पर - किन्तु यहाँ होने से सिर्फ मैं ही नहीं - कई और लोग भी इससे लाभ पायेंगे |

    सुज्ञ भैया, अमित जी और अनुराग जी जैसे ज्ञानी लोग यह ब्लॉग लिखते हैं | मैंने साफ़ कहा कि मैं यदि यह समझ सकूं की यह हत्या है - तो मैं इसे पल भर में छोड़ सकती हूँ, किन्तु इसलिए नहीं की यह तमोगुणी है - और भी बहुत सी चीज़ें हैं - जो तमोगुणी हैं - जिन्हें मैं करती हूँ | गीता पढनी ही शुरू इसलिए की - कि बहुत से तमोगुणों / रजोगुणों पर पार पाना था |

    सुज्ञ भैया से सादर निवेदन है कि यदि यह हत्या है, तो मैं आभारी रहूंगी यदि वे इसे मुझे समझा दें | कृपया नाराज़ न हों - यह सिर्फ मेरा ही नहीं - मेरे जैसे कई लोगों का confusion है | और यह आहार सिर्फ जुगुप्सा जगाने से / तमोगुणी मानने से छूटने से रहा | Tv पर रोज़ ad आता है - "Sunday हो या monday , रोज़ खाओ अंडे " | तो यह यदि छुड़वाना हो - तो कन्विंस करना तो है ही | नीरज जी और मैं यहाँ कह रहे हैं - किन्तु कई लोग चुप चाप पढ़ भी रहे हैं |

    यह ब्लॉग उनके लिए उतना नहीं है जो पहले ही से निरामिष हैं | इसका उद्देश्य है उन्हें समझाना जो सामिष लेते हैं - और उन्हें निरामिष बनाना - न कि उन्हें हराना और guilt feeling कराना | इसकी success तब है - जब कोई सामिष से निरामिष पर आये - तब नहीं जब कोई अपमान के डर से यहाँ आना छोड़ कर भाग जाए |

    वे सब लोग जो मांसाहार नहीं लेते और अंडा लेते हैं -वे इसीलिए लेते हैं कि इसे हत्या नहीं मानते हैं | यदि हत्या के लिए राजी होते तो मांसाहार भी ले रहे होते | तो उन्हें समझाइए कि यह हत्या क्यों है - यह नहीं कि यह तमोगुणी क्यों है |

    उत्तर देंहटाएं
  14. मैं आपकी बात से पूर्णतया सहमत हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  15. यदि कोई अपने में सात्विकता का संचार करना चाहता है तो उसके लिए तमों गुणी भोजन चाहे वह शाकाहारी हो या मांसाहारी त्याज्य ही हैं.शबरी भी एक समय माँसाहारी (यहाँ तक कि नरभक्षी) थी.परन्तु मतंग ऋषि के कृपा प्रसाद से वह पूर्णतया शाकाहारी हो परम राम भक्त बनी.मैंने सुना है स्वामी विवेकानन्द जी भी माँसाहारी थे.जैसे जैसे उनमें सात्विकता का संचार हुआ तो उन्होंने माँसाहार छोड़ा ही नही बल्कि उसके निषेध का आग्रह भी किया.

    आपकी बाकी बातों का उत्तर सुज्ञ जी देंगें. मैं तो यही कह सकता हूँ जीव हत्या की दृष्टि से अंडा और माँस त्याज्य ही होने चाहिये.यह मेरी भावना है तर्क नही.क्यूंकि तर्कों का कोई अंत नही.
    आपकी जैसी भावना हो वैसा ही कीजियेगा.

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. All liking for fish and meat disappears when pure Sattva is highly developed, and these are the signs of its manifestation in a soul: sacrifice of everything for others, perfect non-attachment to lust and wealth, want of pride and egotism. The desire for animal food goes when these things are seen in a man.
      Swami Vivekanand (Complete works, 5.403)

      हटाएं
  16. अंडे में प्रोटीन नहीं पोट्टी है, मुर्गी की और कभी-कभी मुर्गा-मुर्गी दोनों की.... जय हो बाबा रामदेव मूर्खों को समझाने के लिए इन शब्दों का प्रयोग किया

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. Please Read Biology - and tell baba ramdev also to read some biology. it is not potty, it is the carrier of the next generation. Do not spread mis-concepts to support your point of view. I agree about your dislike for it but not about mis information

      हटाएं
  17. पता तो शायद सभी को है कि अन्डा मासाहारी है लेकिन कुछ लोग खाने के लिये केवल बहाना ढूँढ कर आत्मा की आवाज को सन्तुष्क़ट करने की कोशिश मे ही खा लेते हैं। आलेख बहुत अच्छा लगा।जीव हत्या को किसी भी तर्क से ज़ायज़ नही ठ्हराया जा सकता। शुभकामनायें।

    उत्तर देंहटाएं
  18. @ “यह ब्लॉग उनके लिए उतना नहीं है जो पहले ही से निरामिष हैं | इसका उद्देश्य है उन्हें समझाना जो सामिष लेते हैं - और उन्हें निरामिष बनाना - न कि उन्हें हराना और guilt feeling कराना | इसकी success तब है - जब कोई सामिष से निरामिष पर आये - तब नहीं जब कोई अपमान के डर से यहाँ आना छोड़ कर भाग जाए |”

    शिल्पा जी,

    इसलिए निरामिष का आशय विवेकपूर्वक सोचने का आग्रह होता है, तर्क-कुतर्क से छुड़वाने का नहीं। इसीलिए हम ‘निरामिष’ को शाकाहार ‘प्रचार’ नहीं कहते, शाकाहार ‘जागृति’ अभियान कहते है। यह ‘मोरल पुलिसिंग’ की तरह नहीं है, कि किसी भी तरह लोगों को निरामिष बनाना, न यह श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति है और न तर्क मात्र से विजय गर्व का लक्ष्य। यहां तथ्य रखकर लोगों के स्वविवेक को चिंतन प्रदान किया जाता है।

    @ “वे सब लोग जो मांसाहार नहीं लेते और अंडा लेते हैं -वे

    इसीलिए लेते हैं कि इसे हत्या नहीं मानते हैं | यदि हत्या के लिए राजी होते तो मांसाहार भी ले रहे होते | तो उन्हें समझाइए कि यह हत्या क्यों है - यह नहीं कि यह तमोगुणी क्यों है |

    शिल्पा जी, नीरज जी,

    सतोगुणी आहार क्या है? राकेश जी नें सत्य कहा कि……(दया,करुणा,अहिंसा,प्रेम आदि)का संचार हो, मन में सुन्दर भाव जगें ,बुद्धि में सकारात्मक विचार आयें और शरीर की भूख शांत होने के अलावा शरीर पुष्ट और दीर्घायु भी हो वही सतोगुणी आहार माना गया है.

    क्या लोग यह समझने का आग्रह नहीं रखेंगे कि कोई भी आहार सतोगुणी ही लेना हितकर और श्रेयस्कर क्यों है? सतोगुणी आहार के सत्वशाली होने का आधार क्या है? उसके पिछे की भावना क्या है?

    जीवहत्या माननें न मानने के प्रश्न से पहले, यह समझना भी आवश्यक है कि जीवहत्या व जीवहिंसा शब्द में भी बहुत अन्तर है। इस पर चर्चा करने के पूर्व मैं निरामिष पर ही प्रकाशित कुछ आलेखों पर एक बार नज़र करने का आग्रह करना चाहुंगा।

    निरामिष: अहिंसा : सहजीवन सरोकार, विवेकी सम्वेदनाएं और संयम ही संस्कृति है
    निरामिष: आहार का चुनाव : शाकाहार से मानसिक करूणा पोषण
    निरामिष: हिंसा का अल्पीकरण करनें का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है

    उत्तर देंहटाएं
  19. बहुत आभार इस पोस्ट के लिए ............... बचपन से ही अंडे के विज्ञापन देखकर यह सोचता था की यह किस शाक की शाख पर लटकते हैं :))
    ***********************
    अंडाप्रेमियों को मेरा एक प्रश्न यह भी होता था की क्या कोई स्त्री/पुरुष अपने वीर्य या रज को पी/खा सकता है क्या ?????? अंडा निषेचित हो या अनिषेचित उसमें भी मुर्गे-मुर्गी के रज-वीर्य तो रहते ही है .................इतना ही पर्याप्त है मुझे अंडे से घृणा करने के लिए .......... आक थू !!
    शान्तं पापं! शान्तं पापं !! शान्तं पापं !!!

    उत्तर देंहटाएं
  20. अमित भाई व पंकज सिंह राजपूत की स्पष्ट टिप्पणी के बाद तो इन अण्डा खाने वालों को अक्ल आ जानी ही चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  21. @ राकेश कुमार जी,
    आप जनन अंग की बात मत कीजिये। जनन अंग से निकला है, इसलिये त्याज्य है- बिल्कुल निराधार तर्क है। जनन अंग से तो मैं भी निकला हूं, आप भी निकले हैं, हम तो त्याज्य नहीं हैं।
    @ अमित शर्मा,
    मतलब पेड पौधे बिना वीर्य-रज के ही बन जाते हैं। भईया, पौधों में भी प्रजनन की बिल्कुल वही क्रिया होती है जो जीवों में होती है। अगर अण्डा वीर्य-रज का सम्मिश्रण है, तो आलू कौन सा कम है? आलू भी तो ऐसे ही बनता है।
    @ सुज्ञ जी,
    मैं मांसाहार क्यों नहीं खाता, इस बात का बिल्कुल सटीक उत्तर शिल्पा मेहता जी ने दे दिया है।
    एक बार सोचिये कि आलू और अण्डे में फरक क्या है? ना तो दोनों में मांस होता है, ना खून होता है, दोनों ही बीज होते हैं यानी वीर्य-रज का सम्मिश्रण होते हैं, लेकिन सांस दोनों लेते हैं, जीव दोनों में होता है। अगर अण्डा खाने से तमोगुण का संचार होता है, तो भईया आलू खाने से भी होना चाहिये। यह सब मन का भ्रम है कि अण्डाभक्षी मांसाहारी होते है और आलूभक्षी शाकाहारी।
    @ सन्दीप पंवार, आपकी तीनों टिप्पणियां देखकर लग रहा है कि आप इस बहस में मजे ले रहे हैं। आपका अपना कोई तर्क नहीं है। आप चाय तक नहीं पीते, आपको तो चाय पीने वाले भी मांसाहारी ही लगते होंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  22. @ पंकज सिंह राजपूत,
    अण्डा जनन अंग से निकलता है या पोट्टी अंग से, सबसे पहले इस बात को क्लियर करके आओ। मेरे ख्याल से जनन अंग से निकलता है। आपको अगर पोट्टी अंग से निकलता हुआ दिखता है तो भईया, मेरी सलाह है कि इस बहस में मत कूदो।

    उत्तर देंहटाएं
  23. शिल्पा जी और नीरज जी ,


    आप दोनों के ही तर्क अच्छे लगे , आपकी ये बात सही प्रतीत होती है की चाहे आलू हो,प्याज हो या फिर अंडे , इन सभी में जीवन संचार की प्रक्रिया है लेकिन इस बात से तो आप भी इनकार नहीं कर सकते की अंडे को प्राप्त करने के लिए निरीह मुर्गियों के साथ जो क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जाता है वो आप में से कोई भी अपने या अपने बच्चों के साथ नहीं करवाना चाहेगा
    इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं की बहुत सी बच्चियों का अपहरण करके उन्हें वैश्यावृति की और धकेला जाता है और आज के समय में तो उनसे कई अश्लील वेबसाइटस पर भी जबरन काम करवाया जाता है ,अब अगर इस पर कोई ये कहे की ये कृत्य तो गलत है लेकिन रात को वो खुद ही उन अश्लील वेबसाइटस को देखे और इस पर ये तर्क दे की उन लड़कियों के साथ मैं थोड़े ही कोई जबरदस्ती कर रहा हूँ तो ये दोगलापन होगा क्यूंकि यही लोग उन लोगों को एक बाजार उपलब्ध करवा रहे हैं जिसकी वजह से वे उन बच्चियों को पकड रहे हैं और नोच रहे हैं क्यूंकि वो इसी से पैसे कमा रहे हैं और वो पैसा उसी ग्राहक की जेब से जा रहा है जो इसे गलत कह रहा है


    ठीक ऐसी ही स्तिथि यहाँ पर भी है ,अगर आप मुर्गियों के प्रति इस निर्दयतापूर्ण व्यवहार को सही नहीं मानते हैं तो आपको अंडे खाने का समर्थन भी नहीं करना चाहिए क्यूंकि उनके साथ ऐसा क्रूर व्यवहार तभी रुक सकता है जब लोग अंडे को खाना छोड़ें ,अगर आप अंडा खा रहे हैं तो इसका मतलब आप मुर्गियों के साथ किये जा रहे उस घिनोने व्यवहार का भी एक प्रकार से मौन समर्थन कर रहे हैं


    अगर इस पर कोई विपरीत विचार हों तो अवश्य बताएं ताकि चर्चा की सार्थकता बढ़ सके

    उत्तर देंहटाएं
  24. शिल्पा जी और नीरज जी ,


    आप दोनों के ही तर्क अच्छे लगे , आपकी ये बात सही प्रतीत होती है की चाहे आलू हो,प्याज हो या फिर अंडे , इन सभी में जीवन संचार की प्रक्रिया है लेकिन इस बात से तो आप भी इनकार नहीं कर सकते की अंडे को प्राप्त करने के लिए निरीह मुर्गियों के साथ जो क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया जाता है वो आप में से कोई भी अपने या अपने बच्चों के साथ नहीं करवाना चाहेगा
    इसे आप ऐसे भी समझ सकते हैं की बहुत सी बच्चियों का अपहरण करके उन्हें वैश्यावृति की और धकेला जाता है और आज के समय में तो उनसे कई अश्लील वेबसाइटस पर भी जबरन काम करवाया जाता है ,अब अगर इस पर कोई ये कहे की ये कृत्य तो गलत है लेकिन रात को वो खुद ही उन अश्लील वेबसाइटस को देखे और इस पर ये तर्क दे की उन लड़कियों के साथ मैं थोड़े ही कोई जबरदस्ती कर रहा हूँ तो ये दोगलापन होगा क्यूंकि यही लोग उन लोगों को एक बाजार उपलब्ध करवा रहे हैं जिसकी वजह से वे उन बच्चियों को पकड रहे हैं और नोच रहे हैं क्यूंकि वो इसी से पैसे कमा रहे हैं और वो पैसा उसी ग्राहक की जेब से जा रहा है जो इसे गलत कह रहा है


    ठीक ऐसी ही स्तिथि यहाँ पर भी है ,अगर आप मुर्गियों के प्रति इस निर्दयतापूर्ण व्यवहार को सही नहीं मानते हैं तो आपको अंडे खाने का समर्थन भी नहीं करना चाहिए क्यूंकि उनके साथ ऐसा क्रूर व्यवहार तभी रुक सकता है जब लोग अंडे को खाना छोड़ें ,अगर आप अंडा खा रहे हैं तो इसका मतलब आप मुर्गियों के साथ किये जा रहे उस घिनोने व्यवहार का भी एक प्रकार से मौन समर्थन कर रहे हैं


    अगर इस पर कोई विपरीत विचार हों तो अवश्य बताएं ताकि चर्चा की सार्थकता बढ़ सके

    उत्तर देंहटाएं
  25. @मित्र नीरज जी,

    आपनें कहा……

    "मैं मांसाहार क्यों नहीं खाता, इस बात का बिल्कुल सटीक उत्तर शिल्पा मेहता जी ने दे दिया है।"

    और शिल्पा जी का कहना है………

    "सब लोग जो मांसाहार नहीं लेते और अंडा लेते हैं -वे इसीलिए लेते हैं कि इसे हत्या नहीं मानते हैं | यदि हत्या के लिए राजी होते तो मांसाहार भी ले रहे होते|"

    शिल्पा जी के कथन का यह आशय है कि प्रत्यक्ष हत्या हो तो आप लोग उसे हिंसा मानते है और उसे ग्रहण नहीं करते, वर्तमान में निर्जीव दृश्यमान वस्तु में हत्या दोष नहीं मानते है।

    नीरज जी, शिल्पा जी के सटीक कथन से आप सहमत होते हुए भी विपरित बात कह रहे है।

    "जीव दोनों में होता है। अगर अण्डा खाने से तमोगुण का संचार होता है, तो भईया आलू खाने से भी होना चाहिये। यह सब मन का भ्रम है कि अण्डाभक्षी मांसाहारी होते है और आलूभक्षी शाकाहारी।"

    आपका आशय यह है कि जीव सभी में होता है, आलू हो या अंडा, जीवहत्या होती ही है। जीवहत्या जैसा कुछ भी नहीं होता। बस कोई भी विधि हो आहार बस आहार होता है।

    आप अपना मत इन दोनों में से किसी एक पर स्थित करें कि

    1-जीवहत्या से बचना चाहिए, या 2-जीवहत्या जैसी किसी बात का अस्तित्व ही नहीं है।

    ताकि किसी एक विषय के केन्द्र में चर्चा आगे बढ़े………

    उत्तर देंहटाएं
  26. एक बात और नीरज जी,

    आलू शाकाहार का शिर्ष प्रतिनिधि नहीं है, कई लोग शाकाहार को और भी सात्विक करने के लिए इन आलू प्याज लहसुन का भी त्याग करते है। शाकाहार के मुख्य आधार, अन्न, दालें, शाक और फल व दुग्ध उत्पाद है। यदि किसी डॉक्टर नें सलाह न दी हो तो आलू और अंडा दोनो ही आपके लिए तजनीय है।

    उत्तर देंहटाएं
  27. शाकाहार वाली हिंसा और मांसाहार वाली हिंसा में अन्तर के लिए, श्री अनुराग शर्माजी के निरामिष कर इस आलेख को अवश्य पढ़ें

    शाकाहार : तर्कसंगत, न्यायसंगत

    उत्तर देंहटाएं
  28. सुज्ञ जी, अनुराग शर्मा लिखते हैं कि:
    पिछले दिनों मैं बीस टमाटर ले चुका हूँ और इसके लिए मैंने उस पौधे की ह्त्या नहीं की है।
    यही बात तो मुर्गी और अण्डे पर लागू होती है। अगर जीते जागते पौधे से टमाटर तोडना और खाना सही है तो अण्डे खाना कैसे गलत हो सकता है?
    और हां, टमाटर है क्या? यह भी तो वीर्य-रज का सम्मिश्रण ही है। गेहूं का पौधा मर भले ही जाता हो, लेकिन उसका दाना तकनीकी रूप से अण्डे के समकक्ष माना जा सकता है।
    बाकी प्रश्नवादी की बात से काफी हद तक सहमत हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  29. नीरज,

    यहाँ बीज और अंडा दोनों की संतति का अंतर महत्वपूर्ण है। निषेचित अंडा एक प्राणी को जन्म देता है जबकि बीज एक पादप को ही जन्म दे सकता है, प्राणी को नहीं। और प्राणी और पादप के जीवन और अनुभूतियों में बहुत अंतर है।

    प्राणी और वनस्पति के इसी अंतर के कारण अंडों की तुलना आलू या टमाटर से करना सही नहीं है। बात लम्बी है और उदाहरण अनेक हैं। जैसे छिपकली की दुम टूटने पर दोबारा उग आती है। उससे छिपकली को कोई हानि नहीं होती। यदि छिपकली की कोई प्रजाति पर्याप्त पोषण देती हो तो क्या केवल इसी कारण से एक शाकाहारी के लिये उसे खाना स्वीकार्य हो जायेगा?

    एक और उदाहरण में यदि कोई व्यक्ति साल में 4-5 बार रक्तदान करता ही है। इस रक्त की उपयोगिता की एक समयसीमा होती है, उसके बाद अप्रयुक्त रक्त को नष्ट कर दिया जाता है। याद रहे कि इस रक्त के उत्पादन में न तो अलग से कोई हिंसा हुई है और न ही इसके भविष्य में उतना भी जीवन है जिसका दावा अंडे (या बीज) के बारे में किया जा सकता है। यदि कोई कानूनी बाधा न हो तो क्या उस रक्त को पोषक तत्व के रूप में प्रयुक्त करना सही होगा?

    जैसा कि प्रश्नवादी ने कहा, यदि आपके हिसाब से अंडे खाने में हिंसा नहीं है तो भी अंडे का व्यवसाय हिंसा का कारक है। व्यवसायिक उत्पादन की क्रूर हिंसा को तो हम सब जानते हैं, घरेलू उत्पादन में भी मुर्गी भले ही बच जाय पर मुर्ग़े मांस के लिये निर्ममता से ज़िबह किये जाते हैं क्योंकि अंडा व्यवसाय की नज़र में वे मुफ़्त का दाना चुगने वाला बोझ हैं।

    आचार्य विनोबा भावे 1951 से 1960 तक तो पदयात्रा करते ही रहे थे। उस पूरे समय में वे केवल दो गिलास दूध और कुछ शहद पर ही जीवित थे। पोषण के लिये न माँस-अंडा खाना ज़रूरी है, न ही रक्त पीना, न आलू-प्याज़ खाना और न बीज खाना। फलाहार, दुग्धाहार, पुष्पाहार आदि पर भलीभांति जिया जा सकता है। बात बस इतनी ही है कि हम हिंसात्मक जीवनशैली से कितनी दूर रहना चाहते हैं।

    लोग ऐसे भी हैं जो चमड़ा भी नहीं वर्तते क्योंकि आज के समय में वह भी हिंसा का परोक्ष कारक है, ऐसी कम्पनियों के शेयर नहीं खरीदते जो पशुहिंसा के बल पर व्यवसाय कर रही हैं। न टैलो वाला सबुन लगाते हैं न अंडे वाला शैम्पू और न ही वे उत्पाद जिनका परीक्षण अन्य प्राणियों पर हुआ हो। कौन क्या करता है, यह काफ़ी हद तक इस बात पर निर्भर है कि हम अपने सिद्धांतों के लिये कितनी असुविधा सह सकते हैं।

    तुमने पूछा है इसलिये ये कुछ विचार रखे हैं। सहमति-असहमति एकदम अलग बात है, लेकिन ईमानदार विचार-विमर्श का अमूल्य है। पोषण का सवाल बहुत पेचीदा है, इसमें बहुत सी कानूनी, सामाजिक, नैतिक, वैचारिक धार्मिक, और परिवेशकृत बारीक सीमायें हैं। किस सीमा के टूटने पर क्या होगा इसे सामान्य परिस्थितियों में देख पाना कई बार सम्भव नहीं होता। इसीलिये कई बार कोई विशिष्ट अपराध होने के बाद ही कानून की सीमा समझ आती है और फिर उसमें सुधार/परिवर्तन की बात होती है।  

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. Smart Indian ji mujhe aap ke vichar achhe lage aap ne bahut hi achhe tarah se samjhaya hai is baat ko

      हटाएं
  30. @ अनुराग जी - आपकी बात सही समझ पड़ रही है | क्रूरता और हिंसा, इन आधारों पर यदि अंडे को त्याज्य माना जाता है - तो यह उचित प्रतीत होता है | किन्तु इस आधार पर नहीं की यह प्रजनन का भाग है , या कि और अनेक अपशब्द जो शब्द हिंसा के रूप में कई लोग प्रयुक्त करते नज़र आ रहे हैं |

    यह समझना हम सभी के लिए ज़रूरी है की सिर्फ इसलिए की हम अंडा / मांसाहार नहीं खाते / चरम उत्पाद / सिल्क आदि नहीं पहनते - तो हमें ईश्वर से यह अधिकार नहीं मिल जाता की जो खाते हों / पहनते हों उनके किये हम अपशब्द कहने योग्य समझने लगें अपने आप को | या स्वयं को उनसे ऊंचा समझें , और उन्हें अपने से नीचा समझें | यह बात सिर्फ अंडे / चमड़े / मांसाहार / रेशम के लिए ही नहीं - हर सन्दर्भ में है | किसी इंसान को कोई अधिकार नहीं की वह दूसरे के खान पान / रहन सहन को लेकर उस दूसरे के लिए अपशब्द प्रयुक्त करे / दूसरे को नीचा दिखाए / माने |

    उत्तर देंहटाएं
  31. नीरज जी, शिल्पा जी,

    एक बात तो यह स्पष्ठ करना चाहता हूं कि राकेश जी की बात को अनावश्यक मोडा जा रहा है।

    राकेश जी नें कहा- "जिनको अंडा 'खाना' हैं वे कोई भी तर्क दे सकते हैं.अंडे की उत्पत्ति का स्थान मुर्गी या पक्षी का का जनन अंग है,आलू का नही."

    इसके प्रत्युत्तर में नीरज जी नें कहा कि- "आप जनन अंग की बात मत कीजिये। जनन अंग से निकला है, इसलिये त्याज्य है- बिल्कुल निराधार तर्क है। जनन अंग से तो मैं भी निकला हूं, आप भी निकले हैं, हम तो त्याज्य नहीं हैं।"

    राकेश जी का आशय केवल 'त्याज्य' नहीं, 'खाने से त्याज्य' था। मनुष्य सहित पशु-पक्षियों के अशुचि द्वार से निकला कोई भी पदार्थ अखाद्य है ऐसा उनका आशय था। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया था कि सात्विकता का संचार चाहने वाले उसे पसंद नहीं करते।

    इसलिए एकांत त्याज्य अर्थ में लेना सही नहीं है, उसे अखाद्य अर्थ में लेना चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  32. शिल्पा जी,

    अमित जी के कथन में अंडे से घृणा व्यक्त की गई है। अंडा सेवन करने वालों से नहीं। देखिए यह कथन "मुझे अंडे से घृणा करने के लिए .......... आक थू !!
    शान्तं पापं! शान्तं पापं !! शान्तं पापं !!!"

    हां, उपर के वाक्य में 'अंडाप्रेमियों' शब्द से उद्बोधित कर एक प्रश्न किया गया है कि क्या उन्हें घृणा नहीं होती।

    इसे अपशब्द मानना अति है।
    जैसे अंडाप्रेमियों के लिए यह भावनात्मक प्रश्न है कि कोई उनके आहार अंडे को घृणास्पद कहे, वैसे ही सात्विक रूचि के लोगो को कोई, उनके अरूचिप्रद जगुप्सा प्रेरक अंडे को ग्रहणीय कहे, भावनात्मक बन जाता है।

    @ "यह समझना हम सभी के लिए ज़रूरी है की सिर्फ इसलिए की हम अंडा / मांसाहार नहीं खाते / चर्म उत्पाद / सिल्क आदि नहीं पहनते - तो हमें ईश्वर से यह अधिकार नहीं मिल जाता की जो खाते हों / पहनते हों उनके किये हम अपशब्द कहने योग्य समझने लगें अपने आप को |"

    ईश्वर से अधिकार!!??
    माननीया, ईश्वर स्वयं बुराई से घृणा और अच्छाई को अपनाने का ही उपदेश देते है। साथ ही हमें स्पष्ट करता है कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं। इसलिए यह तो पाप से भी नहीं, पदार्थ से जगुप्सा है। इस बात को आपको समझना चाहिए।

    इसलिए हिंसा को गलत और अहिंसा को सही कहने का अधिकार तो मासूमों के पास रहने दिजिए,'खान पान / रहन सहन' में ही इन सबका आचरण होता है, अतः 'इन्हें लेकर' इन्हें न बचाने का प्रयास न हो। हां खानकों/पानकों की निंदा न होनी चाहिए। क्योंकि उनमें सम्भावनाएं सदा शेष रहती है।

    उत्तर देंहटाएं
  33. प्रश्नवादी जी,

    आपने हिंसा के आशय को सुपरिभाषित किया है, बहुत ही सार्थक…

    "अगर आप अंडा खा रहे हैं तो इसका मतलब आप मुर्गियों के साथ किये जा रहे उस घिनोने व्यवहार का भी एक प्रकार से मौन समर्थन कर रहे हैं"
    आपका बहुत बहुत आभार!!

    उत्तर देंहटाएं
  34. अनुराग जी,

    आपनें बडी गम्भीरता से चल व अचल जीवन के अन्तर को स्पष्ट किया है। अंडा जब शाकाहारी पदार्थों से तुलना पर आता है तो स्वतः ही वह निर्जीव हुए मांस के टुकडे के साथ भी तुल जाता है।

    आपके इस कथन "इस बात पर निर्भर है कि हम अपने सिद्धांतों के लिये कितनी असुविधा सह सकते हैं। "स्वीकार्य अस्वीकार्य का विवेक प्रदान कर जाता है।

    बहुत आभार इस टिप्पणी के लिए।

    उत्तर देंहटाएं
  35. सुज्ञ जी ,

    आभार तो आपका है जो आपने हम सभी शाकाहार समर्थकों को ये मंच उपलब्ध करवाया जहाँ पर सभी की ज्ञानवृद्धि के साथ-२ एक स्वस्थ संवाद का भी अवसर प्राप्त होता है, बहुत-२ धन्यवाद आपका

    उत्तर देंहटाएं
  36. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  37. इस लेख और चर्चा से काफी सोचने समझने को मिला |
    आभार सुज्ञ जी और चर्चा में शामिल सभी मित्रों का |

    उत्तर देंहटाएं
  38. और हाँ ...... शिल्पा जी के निरामिष परिवार की सदस्यता लेने का इन्तजार रहेगा |

    उत्तर देंहटाएं
  39. अरे वाह गौरव जी - आप कहाँ थे ???? मेरे नए ब्लॉग को देखिएगा - आपके कहे अनुसार सुज्ञ भैया जैसे ही पेज tabs इस्तेमाल किये हैं :)

    मेरी सदस्यता ?? अभी अभी तो छोड़ने का निर्णय लिया ही है - कम से कम एक साल न खाऊँगी - तब तो परीक्षा पूरी होगी - उसके बाद ही सदस्यता मांगने की हिम्मत कर सकूंगी | फिर निरामिष परिवार मुझे स्वीकार करे या नहीं - यह भी पता नहीं ? आखिर - अब भले ही छोड़ भी दिया - तो लेती तो थी ही न ? तो निरामिष तो नहीं हुई न ? :)

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. मेरी प्यारी बहन जी आप ने इसको त्याग दिया है तो एक साल की क्या प्रतीक्षा आज से ही आप को हम अपने निरामिष परिवार में स्वीकार करते हैं|

      हटाएं
    2. अआदरणीय रमन जी।
      मैंने त्याग किया है अनुराग जी की बातों
      (1) मुर्गों को अनावश्यक मान मारा जाना।
      (2) रक्तदान में हिंसा न होते हुए भी उसे पोषक तत्व की तरह लिए जाने का उदाहरण।
      जीव हिंसा।
      दर्द।
      पक्षियों का शारीरिक शोषण बल्कि टॉर्चर।
      इन वजहों से मैंने अंडा त्यागने की बात कही।

      बाकी कारणों से मैं अब भी सहमत नही यह मैंने ऊपर भी कहा है।

      निरामिष परिवार ने इसके बाद भी मुझे अपना हिस्सा माना उसके लिए आभारी हूँ। किन्तु मेरे कारण फिर से बताना आवश्यक लगा मुझे।

      हटाएं
    3. मेरी प्यारी बहन आप ने किसी भी कारण से त्याग किया लेकिन कर तो दिया। इस से ही हम खुश हैं और आशा करते हैं कि हमारे भाई-बहनों की मेहनत से आप जैसे और बहुत से लोग भी इसका त्याग करेंगे।

      हटाएं
  40. Global भाई
    आजकल आप कहाँ रहते हैं.
    आपके ब्लॉग पर जाना नही हो पाता.
    और मेरे ब्लॉग पर आपके दर्शनों को आँखें व्याकुल
    रहतीं हैं.कोई नाराजगी तो नही ?

    शिल्पा बहिन.
    आपके पास तो अति उत्तम माध्यम है
    कान्हा जी से पूछियेगा.जैसा वे कहें मान लीजियेगा.
    आपने मेरी बात को समझा,इसके लिए आपका
    बहुत बहुत आभार.

    सुज्ञ जी,
    आपका मैं दिल से आभारी हूँ कि आपने मेरी बातों
    को बहुत ही अच्छी तरह से स्पष्ट किया. 'निरामिष'
    ब्लॉग का सन्देश आपके निश्छल और पवित्र प्रयास
    से अवश्य सफल होगा और सभी के दिल में अपनी
    जगह बनायेगा .

    उत्तर देंहटाएं
  41. शिल्पा जी,

    बस "निरामिष परिवार" के लेख पढ़ कर आपके ब्लॉग पर ही आ रहा हूँ

    @कम से कम एक साल न खाऊँगी - तब तो परीक्षा पूरी होगी

    पता नहीं क्यों मैं संकल्प शक्ति को टाइम से जोड़ कर नहीं देख पाता , ख़ास तौर से जब आप जैसे विचारशील लोग निर्णय कर लें तब तो बिलकुल नहीं | फिर भी दो - तीन महीने काफी हैं |

    मेरी नज़रों में अब से आप निरामिष हैं |

    उत्तर देंहटाएं
  42. गौरव जी,
    आपका बडे दिनों बाद स्वागत है।

    शिल्पा जी,

    यहां भाव ही महत्वपूर्ण है, सम्वेदनाएं ही दिल को छूती है। आपका कभी भी स्वागत रहेगा। आप निरामिष परिवार में पधार सकती है। हम आपकी भावनाओं की भी कद्र करते है। इसलिए दबाव रहित होकर जो भी आप चाहें।

    उत्तर देंहटाएं
  43. शिल्पा जी ,

    आपका ,अनुराग जी का और नीरज जी का भी बहुत-२ धन्यवाद एक अच्छी एवं तर्कपूर्ण चर्चा करने के लिए

    उत्तर देंहटाएं
  44. विश्लेषण प्रधान वैज्ञानिक व्याख्या की गई है अंडे के गुण दोषों की .बहुत स्तुत्य पोस्ट है यह .आभार .

    उत्तर देंहटाएं
  45. निरामिष समर्थक मित्र यहाँ जाकर (पेज के निचले हिस्से में)
    http://www.blogger-index.com/1823893-
    निरामिष को रेटिंग दे सकते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  46. Well done .

    सभी पाठकों और संरक्षकों को नववर्ष की मंगलकामनायें!

    भाषा और प्रेज़ेन्टेशन सभी कुछ दिलकश !!

    http://shekhchillykabaap.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  47. आपका ब्लॉग पड़कर मेरा तो मासाहार खाना ही बंद हो गया ! मैं पहले से मासाहार को छोडना चाहता था ! लेकिन एसा नहीं कर पा रहा था! धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपके उत्तम संकल्प का स्वागत करते है और आपके मनोबल का अभिनन्दन करते है।

      हटाएं
    2. मेरे प्यारे भाई जी सही अर्थो में भारतीय कहलाने योग्य हो जाओगे आप मासाहार को त्यागने के बाद|

      हटाएं
  48. प्रकृति झूठ नहीं बोलती , प्रकृति ने अंडा हमारे खाने के लिए बनाया हैं ? या हमने अपने भोग के लिए, प्रकृति ने तो अंडा चूजे पैदा करने के लिए बनाया हैं, न की मुर्गो को टार्चर करके इंसान की जुबान के स्वाद के लिए, आलू होने के बाद सड़ने लगता हैं, उससे पहले वो हमारे शरीर का हिस्सा बन जाता हैं, दूध पीने की लिए बना हैं न की खून | प्रकृति ने दूध मैं उपस्थित केसीन प्रोटीन के लिए हमारे पेट मैं रेनिन एंजाइम बनाया हैं जब की मांस जो प्राण हीन होने के कुछ ही सेकण्ड में सड़ जाता हैं हमारे शरीर मैं पचने मैं पेट की ऐसी तैसी कर देता हैं ७ की जगह १० घंटे लेता हैं एसिड बनता हैं बॉडी का ph बिगरता हैं| दुनिया मैं ज्यादातर लाइलाज बीमारी मांसाहारी लोगो ने ईजाद की हैं जानवरो से , बार्ड प्लू, स्वान फ़्ल्य,

    उत्तर देंहटाएं
  49. नमस्कार जी
    में gym करता हु हम लोगो को बताया गया हे की अंडा खूब खाना चाहिए

    उत्तर देंहटाएं
  50. sabse pehle sabhi logo ko namaskar.
    ise chahe aap debate kahe ya apne antraman ki awaaz.... maine b kafi research kiya hai apni life me is debate par...ye question yugo yug se chalta aa raha hai...kyu ki jab se shrushti ki rachna hui hai tabi se ye chal raha hai...kyu ki danav b the aur manav b...

    ab research ki baat...

    maine research ke liye apne aap ko torcher kiya...maine 16 saal ki age se chicken, chicken soup, eggs khane shuru kar diya vo b sirf body banane k liye...bahut jyada taqat aur sakhat sharir bnaya maine...jise aap high protein diet kehte ho vo sab liya maine...muje bahut khushi mili k mai strong hu...muje yakeen ho gya k muje sab nutrition mil raha hai...sab kuch sahi chala...log muje puchte k bai kya khate ho...itne mazboot ho...to mai jhooth bol deta ke mai chicken ya eggs khata hu...ek din maine apne chehre ko mirror me dekha...to mai dekh na paya...itna ganda chehra...us din se mirror dekhna chhor diya...kuch time baad kuch allergy ke reaction shuru hue...

    उत्तर देंहटाएं
  51. jaise haath pairon ka sunn ho jana
    hath pe yellow sa skin
    body ke bahut se parts par allergy like pitt, dane, muhanse aur garr pass se bhare huye...
    sharir me jyada garmi
    weight kabhi loss huya hi nahi, bahut kuch chhora khane ko.
    but strong fir b bahut...

    then maine apna style change kiya socha apni shakal sahi karu apni, to maine research kiya, hamesha jawaan dikhne ke liye kya kru...

    to muje super model diet ka farmula mila.

    white and green diet.
    maine vo apnaya...usme lean protein, eggs, yoghurt, low fat milk, whey, soya milk etc aur green vegeis....

    uske baad to mera kaya kalap hi ho gya...sharir ek dum patla, strong yani lean...but muje bara tarike se khana para..yani kam khana, baar baar khana...sabi muje model kehne lage...sabi puchne lage...but chehra abi b kuch achha nahi tha...

    उत्तर देंहटाएं

  52. ab to zidd pe aa gya...sab kuch chhor diya khana...like wheat, processed vegies, beans etc...aur dirf raw vegies, fruits, and only 3 white eggs daily...bahut improve huya...

    uske baad ayi bari detox ki ...sab kuch band siwaye cucumber, lassi, apples, etc...no eggs and chicken..

    chehra sunder ho gya...but muscles loss ho gaye...koi afsos nahi huya...body ko ek freedom mila....jaise sharir mera saath hai hi nahi....bahut khush....

    lekin muscles bahut jaruri hai toh shudh indian diet pe aa gya...cow milk ghee, alsi, kala channa, green vegies...etc...muscles gain huye hai...but ab light rehta hu...week me ek ya do baar sampuran yoga karta hu...jis se body me safurti aa jati hai...

    उत्तर देंहटाएं
  53. aur ab conclusion...

    ye sab mnc's, corporations, marketing, business aur internet tv par naked body ka kiya kara hai jo logo ko bevkuf bnate hai...hare india me dusre desho ko muqable jyada resources, nutritions hai...agar aap ko bodybuilder ban na hai to aap super body builder ban sakte ho with indian diet....aur aap super model b ban saktd ho...kami sirf gyaan ki hai... aaj hamari har chiz america me patent ho rahi hai...

    ab rahi baat tamsik bhojan ki ya eggs ki...
    toh mera kehna yeh hai ke manushya ke liye sab kuch uplabdh hai...manushya ki location, time, mausam ke hisab se khana chahiye...shashtro aur grantho ko maine study kiya...usme b dono tarah ke khane ka zikar hai...but jab manushya ki aisi halat ho ke use mazburi me khana hi parega tabi voh khaye ye chicken, eggs etc...otherwise dusri chizo me sabse jyada gun aur nutrition hai...

    उत्तर देंहटाएं
  54. so moral....use only fruits, vegs, cereals, milk and milk products acocording to location and time.

    eg...jaise aap khoya garmi me nahi kha sakte...sardi me yogurt nahi kha sakte...hmare yaha 6 mausam hai...uske anusar hi khaye piye...

    eggs bilkul na khaye....eggs hamare mausam aur locaton ke hisaab se zehar hai...maine apne upar research kar ke dekha...

    western culture, western logo ke liye hi bana hai...aur eastern culture eastern logo ke liye..so dont be confused....swadeshi khaye...

    plus point and bonus....there are lots of varaties in indian foods that you will not have time to try out western diet...

    all celebrities, supermodel are going to eastern diet...

    bahut jyada likh diya...
    bahut kuch galat b laga hai aap ko

    us ke liye mai sharminda hu...

    baki sab bhagwaan hi jaante hain....

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपके विस्तृत फ़ीडबैक के लिये धन्यवाद! नहीं, कुछ ज़्यादा नहीं लिखा है। किताबी ज्ञान की अपेक्षा व्यक्तिगत अनुभव से सीखने की बात कुछ और ही है।

      हटाएं