शुक्रवार, 18 मई 2012

पादप एवं जंतु -1: शारीरिक संरचना में अन्तर


पौधों और जंतुओं में शारीरिक संरचना में फर्क : एक वैज्ञानिक तुलना 
कई बार, कई जगह, कई लोगों को, कहते सुना है कि - 
पौधों में भी जीव है / शाकाहार में भी हिंसा है / श्री बोस ने प्रमाणित किया है ..... आदि आदि | इस ही सम्बन्ध में यह पोस्ट लिख रही हूँ | एक वैज्ञानिक तुलना, कि क्या दोनों प्रकार के आहार सामान्य / बराबरी से हिंसाकारक कहे जा सकते हैं ?

पौधों और जंतुओं के ऊतक (tissues) और कोशिकाएं (cells ) एक सामान नहीं होते हैं | ncert की पाठ्य पुस्तिकाएं देखिये - आठवी ओर नवी कक्षा की विज्ञान की किताबें - ऑनलाइन उपलब्ध है (कड़ियाँ नीचे दी गयी हैं ) 

यहाँ कोशिकाओं और ऊतकों के बारे में समझाते हुए कहा गया है कि एक समान आकृति की कोशिकाएं (cells) एक समूह में एक ऊतक (tissue ) बनाती हैं जो एक प्रकार का कार्य करते हैं | वहां से कुछ जानकारी 

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क्या पौधों और जंतुओं की संरचनाएं समान हैं? नहीं | दोनों में स्पष्ट अंतर है |

पौधे स्थिर होते हैं - विचरण नहीं करते | सो इनके अधिकाँश ऊतक सहारा देने वाले होते हैं | ये पौधे को संरचनात्मक शक्ति देते हैं | ऐसे अधिकाँश ऊतक मृत होते हैं | ये मृत ऊतक जीवित ऊतकों के ही सामान यांत्रिक शक्ति (mechanical strength ) देते हैं, और इन्हें संरक्षण की आवश्यकता कम है |

 जंतु विचरण करते हैं इसलिए उनकी ऊर्जा उतनी अधिक व्यय होती है जितना भार अधिक हो | तो मृत ऊतकों को ढोना अतिरिक्त ऊर्जा व्यय करेगा - सो अधिकतर जीवित ऊतक हैं |
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किस किस तरह की ऊतक हैं पौधों और जंतुओं में ? इनमे भी classes हैं | 

१  पेशीय कोशिका (muscle ) - फैलने सिकुड़ने का काम - विचरण के लिए | जाहिर है कि पौधों को विचरण नहीं करना, सो पेशियों की आवश्यकता नहीं है | इसलिए इस तरह के ऊतक जंतुओं में होते हैं, किन्तु पौधों में नहीं होते । 

२. तंत्रिका कोशिका (nerves ) सन्देश ले जाने के लिए - दो तरह के सन्देश - एक शरीर  के विभिन्न अंगों से मस्तिष्क की ओर, ओर दूसरे मस्तिष्क से अंगों की ओर | {जैसे आपने कहीं जलते तवे पर हाथ रखा - तो पहले तरह की nerves यह सन्देश ले जायेंगी कि दर्द हुआ, और फिर दूसरी nerves दिमाग से हाथ को यह सन्देश लायेंगी कि पेशियाँ सिकुडें और हाथ तुरंत हटाया जाए |} | 

    शोध चल रही है कि पौधों में भी दर्द आदि के अनुभव करने के लिए तंत्रिका ऊतक हैं - परन्तु शोध अधूरी ही है | मस्तिष्क की खोज तो हुई ही नहीं है | किन्तु वैज्ञानिकों का मानना है कि इलेक्ट्रोनिक यंत्रों में जिस प्रकार "सेंसर" और "फीडबैक" होता है, सिस्टम को असामान्य स्थिति में स्वयं को विनष्ट होने से बचाने के लिए (जैसे यदि स्टील बनाने के लिए आयरन ओर  पिघलाने वाली फर्नेस का तापमान अधिक हो रहा है तो सेंसर यह फीडबैक माइक्रो कंट्रोलर को देंगे, जो तुरंत यंत्र को बचने के लिए बिजली बंद करेगा आदि) इसी तरह हमारे शरीर में nervous system दर्द की अनुभूति करता कराता है हमें चोट से बचाने के लिए | जब तंत्रिकाएँ दर्द के स्त्रोत का अनुभव करती हैं , वे मस्तिष्क तक यह खबर ले जाती हैं, और मस्तिष्क पेशियों को आदेश देता है कि चोट की जगह से दूर हटा जाए | 

    क्योंकि पौधे हट तो सकते नहीं (पेशियाँ नहीं हैं ) तो सिर्फ एकतरफा दर्द का अनुभव उनकी फीडबैक लूपको पूर्ण नहीं होने देता । और अधूरा लूप - सिर्फ सेंसर्स का होना, मस्तिष्क और पेशियों का अभाव कुछ लोजीकल नहीं लगता | फिर से कहूँगी - शोध चकल रही है - नतीजे नहीं हैं - किन्तु लोजिकल दृष्टि से यही प्रतीत होता है । 

३. वाहक/संयोजक कोशिकाएं - जंतुओं के शरीर में रक्त ओर धमनियां ओर दिल - ये शरीर में हजम हुआ भोजन, ओक्सिजन, आदि इधर से उधर ले जाने लाने का काम करते हैं । दिल रक्त को पम्प करता है - और धमनियों में बहता हुआ रक्त, फेफड़ों (lungs) से ऑक्सीजन , अंतड़ियों से पचा हुआ भोजन आदि शरीर में प्रवाहित करता है ।  
   
   धमनियों जैसी कोशिकाएं पौधों में भी हैं | जैसे हमारे शरीर में रक्त धमनियां (arteries and veins ) हैं, पौधों में xylem  (जाइलेम) ओर phloem (फ्लोएम ) हैं | ये दो काम करती हैं । एक तो ये (जाइलेम) जड़ों द्वारा जमीन से सोखा हुआ पानी और खनिज (minerals ) ऊपर को ले जाती हैं, दूसरा (फ्लोएम पत्तियों में बना भोजन पौधे के अन्य भागो को ले जाती हैं ।  इनमे अधिकतर मृत कोशिकाओं के रेशे हैं । 

   ध्यान देने वाली बात है कि  पौधे में दिल नहीं होता - न रक्त होता है । इनमे ऊपर जाने वाला द्रव्य ऊपर जाने की प्रक्रिया कुछ लम्बी है - साधारण शब्दों में यह (जाइलेम) ऐसे काम करती है :
   
   capilary action का अर्थ है - बहुत ही पतली ट्यूबों में द्रव्य का खुद बी खुद प्रवाहित होंना - यह surface tension से होता है । कुछ वैसा ही जैसे कपडा एक जगह पानी में या स्याही में छू जाए - तो वह स्याही/ पानी  खुद ही ऊपर को चढ़ता है - उसे पम्प करने की आवश्यकता नहीं होती । तो इस प्रक्रिया से पानी जड़ों से ऊपर को चढ़ने लगता है । इसके अलावा एक और phenomenon  इसमें योगदान करता है - जिसे कहते हैं transpiration  । इसका अर्थ है - पत्तियों के बेहद महीन छेदों से पानी का भाप बन कर सूखना - जिससे ऋणात्मक दबाव बनता है और पानी नीचे की तरफ से ऊपर की और खिंचता है ।

     और बने हुए भोजन को दुसरे भागों तक ले जाने का काम करती है फ्लोएम - जो osmosis  (जैसे की आजकल reverse  osmosis वाले water purifiers में होता है ) से काम करती हैं । 

४. वृद्धि (growth / merismatic) कोशिकाएं  जहां एक ओर पादपों के शरीर की कुछ ही कोशिकाएं वृद्धि करती हैं (जैसे टहनी का अंतिम भाग, जड़ का अंतिम भाग ) इसे merismatic tissue (विभज्योतक ऊतक ) कहते हैं | वहीँ जंतुओं के शरीर की हर कोशिका जीवित है ओर बढती है (cell division ) | 
नीचे कोशिकाओं के चित्र हैं - ncert से साभार |
   


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आप देख सकते हैं कि पादप कोशिका का अधिक भाग vacuole (रिक्तिका) है - जो पौधे द्वारा बनाए अतिरिक्त भोजन को सहेज कर रखने का स्थान देता है | 

जैसा पहले भी कहा गया है - क्योंकि पौधे विचरण नहीं करते - उनके अधिकाँश ऊतक मृत हैं - जो उसे यांत्रिक शक्ति तो देते हैं - किन्तु उन्हें संरक्षण की आवश्यकता नहीं होती ।

५. फिर जंतुओं के शरीरों की कई अंग प्रणालियाँ हैं - जैसे digestive system (पाचन तंत्र) , respiratory system (श्वसन प्रणाली) , excretary system (उत्सर्जन संबंधी) आदि | इनमे से हर प्रणाली पादपों में नहीं होती क्योंकि उन्हें इसकी आवश्यकता ही नहीं होती | हाँ प्रजनन तंत्र (reproductory system पादपों और जंतुओं दोनों में है, और करीब करीब एक सा ही है - जिसके हिस्से हैं पादपों के बीज (जिनमे अन्न भी हैं ) , फल और फूल | जिन पौधों से फल लिया जाता है - उनके बारे में भी कहा जाता है कि हम फल लेकर पौधे को "दर्द" दे रहे हैं, क्रूरता या हिंसा कर रहे हैं | इस विषय में इस तीन पोस्ट्स की शृंखला की आगे की पोस्टस  में विस्तार से बात करूंगी | यहाँ इस सिलसिले में इतना ही कहूँगी : अन्न देने वाले पौधे अन्न के तैयार होने तक अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर चुके होते हैं | पौधे को काटने में कोई हिंसा नहीं होती क्योंकि वह जीवन विहीन हो ही चुका होता है (याद दिला दूं कि पौधों में सिर्फ बढ़ते स्थान पर जीवित merismatic tissue है, बाकी की कोशिकाएं पहले ही मृत कोशिकाएं हैं - सो जो पौधा काटा जा रहा है अन्न लेने के लिए - वह पहले ही मृत है )

तो जैविक वैज्ञानिक तौर पर किये अध्ययन भी यही दिखाते हैं कि पौधों की संरचना में कुछ ऊतक (जैसे फलों का गूदा ) पौधे द्वारा बनाया अतिरिक्त भोजन जमा करने और दूसरे प्राणियों को भोजन देने के ही लिए ख़ास तौर पर specialised है, जबकि जंतुओं के बारे में ऐसा नहीं है |

शायद इस जानकारी से आपको निर्णय लेने में सहायता मिले कि शाकाहारी भोजन हमारे लिए बेहतर choice है , या मांसाहारी भोजन |  आभार ।

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सम्बंधित कड़ियाँ - ( कोशिकाएं और ऊतक - cells and tissues )

16 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही लिखा आपने
    इसे भी पढ़ें
    http://cbmghafil.blogspot.com/2012/05/blog-post_17.html

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  2. बहुत नई जानकारियां मिलीं.आभार.

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    लिंक आपका है यहीं, मगर आपको खोजना पड़ेगा!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  4. पत्तियों की तरह हम अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते इसलिये जीने के लिये कुछ तो आहार लेना ही पड़ेगा। जंतु और वनस्पति दोनो में ही प्राण के लक्षण हैं..वनस्पतियों में तंत्रिका तंत्र उतना विकसित तो नहीं होता तथापि विवेक और प्रतिक्रिया क्षमता के मामले में प्राणी उनसे विशिष्ट हैं। अतः हिंसा-अहिंसा में भी भेद का यही आधार है। और ठेठ बोली में कहें तो कटु वचन भी हिंसा है और गोली मार देना भी ..तो क्या सबको गोली मार दी जाय? और भी ठेठ कहें तो इलेक्शन में खड़े सभी दुष्टों में से किसी कम दुष्ट को वोट देना ही अधिक उचित है। इसलिये मुर्गी- बकरा खाने की अपेक्षा रोटी-सब्ज़ी खाना कहीं अधिक उचित है।

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  5. रोचक जानकारी है। जितना भी कोई समझा ले मगर जिसने मास खाना है वो कोई न कोई तर्क तो निकाल ही लेगा।स्वार्थ के लिये दया भावना करुणा सब भूल जाता है।

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  6. कल 20/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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    1. यशवन्त जी आपका बहुत बहुत आभार!!

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  7. बहुत बढ़िया किया है आपने विषय का प्रतिपादन .जीव हिंसा के बाद मांस भक्षण करना और फिर उसे न्यायिक ठहराना शाका हार से तुलना करके एक बचकाना बात है .पेड़ तो देते ही देतें हैं साल दर साल और अंत में खुद अपनी ही खाद बन जातें हैं .कार्बन चक्र को चलाये रहतें हैं .वायुमंडल को प्राणित करते रहतें हैं .

    पशु इन पर आश्रित हैं .आश्रित जीवों की हिंसा को कैसे भी युक्ति युक्त नहीं ठहराया जा सकता .

    पादप जीवन के रक्षक हैं .वर्षा के संरक्षक ,भू -जल को बनाए रहतें हैं पेड़ न हों तो एक्विफायार्स तमाम रीत जाएँ .मिटटी की गुणवत्ता को बनाए रहतें हैं .पशु इन्हें अपने मल मूत्र से खाद मुहैया करवातें हैं .दोनों परस्पर सम्बद्ध हैं .यहाँ खून खराबा नहीं हैं .परस्पर सहजीवन संवर्धन है .बढ़िया पोस्ट .

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  8. रही बात बात जीवन की तो जो जड़ में है वही चेतन में है पार्माणुविक स्तर पर भी यह बात खरी है .पौधों में संवेदना है उनके दिल की धड़कन को Crescograph से बांचा जा सकता है .जगदीश चंद बासु ने यही यंत्र रोयल सोशायटी के सामने प्रस्तुत किया था .सितार की लय पर थिरकतें हैं पौधे .प्रकृति के संगीत से भी उनका नजदीकी रिश्ता जो है .वह गाते हैं गुनगुनाते हैं हवाओं के संग .

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  9. इस जानकारी के लिये शिल्पा जी का आभार! जीवन की श्रेणियों का अंतर शायद वे भी जानते हैं जो मांसाहार के पक्ष में तर्क करते रहते हैं। ऐसे एक मशहूर हक़ीम तो स्वास्थ्य कारणों से खुद शाकाहारी हैं फिर भी ....। इस हैंडी जानकारी के लिये साधुवाद! शुभकामनायें!

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  10. अच्‍छी प्रस्‍तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  11. अच्छा विश्लेषण है। वैज्ञानिक और बोधगम्य।

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  12. इस महत्वपूर्ण जानकारी के प्रकाशन के लिए शिल्पाजी का आभार !

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  13. @निरामिष जी
    @अनुराग शर्मा जी
    @ सुज्ञ जी

    इस श्रंखला को कहीं और एक ग्रुप ब्लॉग पर पोस्ट करना चाहूंगी।।अनुमति दीजियेगा?

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