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शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

शाकाहार सम्बन्धी कुछ भ्रम और उनका निवारण -2

आज कई मांसाहार प्रचारक अपने निहित स्वार्थों, व्यवसायिक हितों, या धार्मिक कुरीतियों के वशीभूत होकर अपना योजनाबद्ध षड्यंत्र चला रहे हैं। वस्तुतः अब कुसंस्कृतियाँ सामिष आहार प्रचार के माध्यम से ही विकार पैर पसारने को तत्पर है। इस प्रचार में,  न केवल विज्ञान के नाम पर भ्रामक और आधी-अधूरी जानकारियाँ दी जा रही हैं, बल्कि इस उद्देश्य से धर्मग्रंथों की अधार्मिक व्याख्यायें प्रचार माध्यमों द्वारा फैलाई जा रही हैं। यह सब हमारी अहिंसक और सहिष्णु संस्कृति को दूषित  और विकार युक्त करने का कुटिल प्रयोजन है।

ऐसे ही 7 भ्रमों  का निवारण  निरामिष पर पहले प्रस्तुत  किया गया था, अब प्रस्तुत है भ्रम-निवारण 8 से 12……  

भ्रम # 8 अहिंसावादी, जीवदयावादी व शाकाहारियों के प्रभाव से भारतीय जनमानस कमजोर और कायर हो गया था।

उत्तर : मध्यकालीन आक्रांता तो धर्म-कर्म-जात आदि से केवल और केवल आक्रमणकारी ही थे, उनकी कोई नैतिक युद्धनीति नहीं थी। उनका सिद्धांत मात्र बर्बरता ही था। उनका सामना करने की जिम्मेदारी अहिसावाद,जीवदया या करूणा से प्रभावित लोगों की नहीं, बल्कि मांसाहारी राजपूत सामंतो व क्षत्रिय योद्धाओं की थी। जब वे भी सामना न कर पाए तो अहिंसावादी, जीवदयावादीयों को जिम्मेदार ठहराना हिंसावादियों की कायरता छुपाने का उपक्रम है। शौर्य और वीरता कभी भी मांसाहार से नहीं उपजती। न वीरता प्रतिहिंसा से प्रबल बनती है। वीरता तो मात्र दृढ़ मनोबल और साहस से ही पैदा होती है। इतिहास में एक भी प्रसंग नहीं है जब कोई यौद्धा अहिंसा को बहाना बना पिछे हटा हो। यथार्थ तो यह है कि युद्ध-धर्म तो दयावान और करूणावंत भी पूरे उत्तरदायित्व से निभा सकता है। और हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आक्रमण और पराजय का खेल केवल भारत में नहीं खेला गया है। सारी दुनिया में कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि वह सदा अजेय रही है। क्या वे सभी जातियाँ शाकाहारी थीं? गुलामी और हार का सम्बन्ध, शाकाहार या अहिंसा से जोड़ने का आपका यह प्रयास आधारहीन है। इस तथ्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि कुछ सौ साल की गुलामी से पहले भारत में हज़ारों साल की स्वतंत्र,सभ्य और उन्नत संस्कृति का इतिहास भी रहा है।

इसलिए यदि 'धर्म' के परिपेक्ष्य चिंतन करें तो उसमें हिंसा और हिंसा के प्रोत्साहक माँसाहार का अस्तित्व भला कैसे हो सकता है। पशुहत्या का आधार मानव की कायर मानसिकता है, जब शौर्य व मनोबल क्षीण होता है तो क्रूर-कायर मनुष्य, दुस्साहस व धौंस दर्शाने के लिए पशुहिंसा व मांसाहार का आसरा लेता है। लेकिन पशुहिंसा से क्रूरता व कायरता को छुपने का कोई आश्रय नहीं मिलता। निर्बल निरीह पशु पर अत्याचार को भला कौन बहादुरी मानेगा। इसीलिए क्रूरता से कायरता छुपाने के प्रयत्न सदैव विफल ही होते है।

यह लेख दृष्टव्य है - "जहाँ निष्ठुरता आवश्यक है……………"


भ्रम # 9 सुरक्षा के लिए भी रक्तपात आवश्यक है।

उत्तर : रक्तपात सुरक्षा की गारंटी नहीं है। रक्तपात तो आपस में ही लड़ मरने की, वही आदिम-जंगली शैली है। रक्तपात को कभी भी शान्ति स्थापक समाधान नहीं माना गया। हिंसा कभी भी, किसी भी समस्या का स्थाई हल नहीं होती और न हो सकती है। चिरस्थाई हल हमेशा चिंतन, मनन, मंथन और समझोतों से ही उपजते हैं।

भ्रम # 10 मांसाहार एक आहार विकल्प है, शाकाहार या मांसाहार जिसकी जो मर्जी हो खाए।

नहीं!, मांसाहार आहार का विकल्प नहीं है। वह मात्र एक मसाला सामग्री की तरह स्वाद विकल्प मात्र है। पोषण उद्देश्य के लिए तो शाकाहार अपने आप में सम्पूर्ण है। मनुष्य शाकाहार के विकल्प के रूप में मांसाहार का प्रयोग नहीं करता। क्योंकि मात्र मांसाहार को वह अपना सम्पूर्ण आहार नहीं बना सकता, उसके लिए भी मांसाहार के साथ शाकाहार सामग्री का प्रयोग अनिवार्यता है। केवल मांस खाकर इन्सान जिन्दा नहीं रह सकता। इस लिए विकल्प की तरह चुनाव की बात करना मतिभ्रम है। स्वादलोलुपता की धूर्तता के कारण इसे विकल्प की तरह पेश किया जाता है। वस्तुतः मांसाहार आहार में आया एक विकार है। किसी जीव ने अपने जिन्दा रहने के लिए शाकाहार करके अपने शरीर की मांस मज्जा बनाई और आप उसके अपने जीवन भर के श्रम के अर्जन को निर्दयता से छीन कर अपना पेट भरें वह भी उसकी जिन्दगी ही लेकर? इस मर्जी को क्या कहेंगे।

कोई कैसे मनमर्जी खा सकता है मामला जब क्रूरता या असंवेदनशीलता का हो? अहिंसा प्राणीमात्र के लिए शान्ति का मार्ग प्रशस्त करती है। स्पष्ट है कि किसी भी जीव को हानि पहुँचाना, किसी प्राणी को कष्ट देना अनैतिक है। जीवदया का मार्ग सात्विक आहार से प्रशस्त होता है। इसीलिए अहिंसा भाव का प्रारंभ भी आहार से ही होता है और हम अपना आहार निर्वध्य रखते हुए सात्विक निर्दोष आहार की ओर बढते हैं तभी हमारे जीवन में संवेदनशीलता और अन्तः सात्विकता प्रगाढ होती है। नशीले पदार्थ का भोग व्यक्ति की अपनी मर्जी होने के बाद भी सभ्य समाज उसे सही नहीं ठहराता उसी तरह चुनाव की आजादी के उपरांत भी हिंसा को सही ठहराने वाले लोग मांसाहारियों में भी कम ही मिलते हैं।

दृष्टव्य: भोजन का चुनाव व्यक्तिगत मामला मात्र नहीं है।
दृष्टव्य: मानव के भोजन का उद्देश्य

भ्रम # 11 दुनिया भर में मांसाहार को लेकर कोई अपराधबोध नहीं है?

यह सही नहीं है कि लगभग सभी विकसित या तेजी से विकसित होने की राह पर बढ़ते देशों व उनके निवासियों में मांसाहार को लेकर कोई दुविधा या अपराधबोध नहीं है। हम एक बहु-विविध विश्व में रहते हैं। अमेरिकी घोड़ा खाना पाप समझते हैं, जापानी साँप खाने को हद दर्ज़े का जंगलीपन मानते हैं, भारतीय मांसाहारी गाय को अवध्य मानते रहे हैं जबकि मुसलमान सुअर नहीं खाते। मतलब यह कि मांसाहार लगभग हर भौगोलिक-सामाजिक क्षेत्र में अनेक प्रकार के अपराधबोधों से ग्रस्त है। और कुछ नहीं तो हलाल-झटका-कुत्ता का ग्लानी भरा झंझट तो व्याप्त है ही। यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे प्रत्येक देश विदेशों में कम ही सही पर कुछ लोग न केवल शाकाहार का समर्थन करते हैं बल्कि वे उसे ही बेहतर मानते हैं। यहाँ यह भी स्पष्ट कर दूँ कि ऐसा वे किसी भारतीय के कहने पर नहीं करते। विख्यात 'द वेजेटेरियन सोसायटी' अस्तित्व में आयी है, बेल्जियम के गेंट नगर ने सप्ताह में एक दिन शाकाहार करने का प्रण लिया है। ब्रिटेन व अमेरिका के अनेक ख्यातनाम व्यक्तित्व न केवल शाकाहारी हैं बल्कि पेटा आदि संगठनों के साथ जुड़कर पूरे दमखम से शाकाहार और करुणा का प्रचार-प्रसार करने में लगे हैं। वीगनिज़्म का जन्म ही भारत के बाहर हुआ है। इथियोपिया से चलकर विश्व में फैले ‘रस्ताफेरियन’ पूर्ण शाकाहारी होते हैं। भारी संख्या में 'सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट' भी शाकाहारी हैं।

भ्रम # 12 यह जरूरी नहीं है कि सभी मांसाहारी क्रूर प्रकृति के ही हो।

मांसाहार में कोमल भावनाओं के नष्ट होने की संभावनाएं अत्यधिक ही होती है। हर भोजन के साथ उसके उत्पादन और स्रोत पर चिंतन हो जाना स्वभाविक है। हिंसक कृत्यों व मंतव्यो से ही उत्पन्न माँस, हिंसक विचारों को जन्म देता है। ऐसे विचारों का बार बार चिंतवन, अन्ततः परपीड़ा की सम्वेदनाओं को निष्ठुर बना देता है। हिंसक दृश्य, निष्ठुर सोच और परपीड़ा को सहज मानने की मनोवृति हमारी मानसिकता पर दुष्प्रभाव डालती है। ऐसा दुष्प्रभाव यदि सम्भावनाएँ मात्र भी हो, तब बुद्धिमानी यह है कि सम्भावनाओं को अवसर ही क्यों दिया जाय। वस्तुतः कार्य गैर जरूरी हो और दुष्परिणाम की सम्भावनाएं भले एक प्रतिशत भी हो घटने के पर ही लगाम लगा दी जाय। विवेकवान व्यक्ति परिणामो से पूर्व ही सम्भावनाओं पर पूर्णविराम लगाने का उद्यम करता है।

मनुष्य के हृदय में सहिष्णुता का भाव परिपूर्णता से स्थापित नहीं हो सकता जब तक उसमें निरीह जीवों पर हिंसा कर मांसाहार करने का जंगली संस्कार विद्यमान हो। जब मात्र स्वाद और पेट्पूर्ती के उद्देश्य से मांसाहार का चुनाव किया जाता है तब ऐसी प्राणी हत्या, मानस में क्रूर भाव का आरोपण करती है जो निश्चित ही हिंसक मनोवृति के लिए जवाबदार है। मांसाहार द्वारा कोमल सद्भावनाओं का नष्ट होना व स्वार्थ व निर्दयता की भावनाओं का पनपना, आज विश्व में बढ़ती हिंसा, घृणा, आतंक और अपराधों का मुख्य कारण है। हिंसा के प्रति जगुप्सा के अभाव में अहिंसा की मनोवृति प्रबल नहीं बन सकती। जीवदया और करूणा भाव हमारे मन में कोमल सम्वेदनाओं को स्थापित करते है और यही सम्वेदनाएं हमें मानव से मानव के प्रति भी सहिष्णु बनाए रखती है।

दृष्टव्य: दिलों में दया भाव का संरक्षक शाकाहार

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

शाकाहार (निरामिष) ही क्यों ?


शान्ति का समुचित उपाय,  अहिंसा

सम्पूर्ण जगत में प्रत्येक जीव के लिए सुख का आधार शान्ति ही है। शान्ति का लक्ष्य अहिंसा से ही सिद्ध किया जा सकता है। संसार में आहार पूर्ती के लिए सर्वाधिक हिंसा होती है। जीवदया का मार्ग सात्विक आहार से ही प्रशस्त होता है। सुक्ष्म हिंसा तो कईं सजीव पदार्थों में भी सम्भव है, किन्तु शाकाहार, अपरिहार्य हिंसा का भी अल्पीकरण है जो अपने आप में अहिंसाभाव है। जबकि जो लोग मात्र स्वाद और पेटपूर्ती के स्वार्थवश, दूसरे जीवों को पीड़ा देकर किंचित भी आहत नहीं होते। जो निसंकोच हिंसा और मांसाहार करते है, वे हिंसा और निर्दयता को महज साधारण भाव से ग्रहण करने लगते है। फिर भी मन की सोच पर आहार का स्रोत हावी ही रहता है,यदि वह स्रोत क्रूरता प्रेरित है तो उसका चिंतन हमारी सम्वेदनाओं का क्षय कर देता है। हमारी कोमल भावनाओं को निष्ठुर बना देता है। अन्ततः इस अनैतिक कार्य के प्रति एक सहज वृति  पनपती है। मांसाहार के लिए प्राणहरण, मानस में क्रूर भाव का आरोपण करता है जो हिंसक मनोवृति के लिए जवाबदार है। मांसाहार द्वारा कोमल सद्भावनाओं का नष्ट होना व स्वार्थ व निर्दयता की भावनाओं का पनपना आज विश्व में बढ़ती हिंसा, घृणा व अपराधों का मुख्य कारण है। पृथ्वी पर शान्ति, शाकाहार से ही सम्भव है। जीवदया और करूणा भाव हमारे मन में कोमल सम्वेदनाओं को स्थापित करते है। यही सम्वेदनाएं हमें मानव से मानव के प्रति भी सम्वेदनशील बनाए रखती है। शाकाहार मानवीय जीवन-मूल्यों का संरक्षक है। इसलिए अहिंसा ही शान्ति और सुख का अमोघ उपाय है।  

धर्म-दर्शन अभिप्रायः

लगभग सभी धार्मिक सामाजिक परम्पराओं में 'जीवन' के प्रति आदर व्यक्त हुआ है, परंतु "अहिंसा परमो धर्मः" या “दया धर्म का मूल है” का सिद्धांत भारतीय संस्कृति की एकमेव विलक्षण विशेषता है। चाहे कोई भी धर्मग्रंथ हो, हिंसा के विधान किसी भी अपौरूषेय वाणी में नहीं है। आर्षवचन के भव्य प्रासाद, सदैव ही अहिंसा, करुणा, वात्सल्य और नैतिक जीवन मूल्यों की ठोस आधारशीला पर रखे जाते हैं। सारे ही उपदेश जीवन को अहिंसक बनाने के लिए ही गुंथित है और अहिंसक मनोवृति का प्राथमिक कदम शाकाहार है।  

सभ्यता और संस्कृति

शाकाहार की प्रसंशा करना शुद्धता या पवित्रता का दंभ नहीं है। शाकाहार अपने आप में स्वच्छ और सात्विक है। इसलिये शुद्धता और पवित्रता सहज अभिव्यक्त होती है। आहार की शुचिता भारतीय संस्कृति एवं चेतना के समस्त प्रवाहों का केन्द्र रही है जो शाकाहार को मात्र भोजन के आयाम पर अभिकेन्द्रित नहीं करती, वरन् इसे समस्त दर्शन और सहजीवन के सौहार्द से सज्जित, जीवन-पद्धति के रूप में आख्यादित करती है। शाकाहार, क्रूरता विहीन जीवन संस्कृति की बुनियाद है, जिसमें सह अस्तित्व के प्रति अनुकम्पा, वात्सल्य, और करूणा के स्वर अनुगुन्जित होते है। भले ही मानव अभक्ष्य आहार की आदत डाल ले अभ्यास से आदतें बनना सम्भव है पर मानव शरीर की प्रकृति शाकाहार के ही अनुकूल है। यदपि मनुष्य अपनी उत्पत्ती से  शाकाहारी ही रहा है, प्रागैतिहासिक मानव शाकाहार करता था यह प्रमाणित है। तथापि सभ्यता की मांग होती है जंगली जीवन से सुसभ्य जीवन की ओर उत्थान करना, विकृत आहार त्याग कर सुसंस्कृत आहारी बनना। शाकाहार, आदिमयुग से सभ्यता की विकासगामी धरोहर है। यह मानवीय जीवन-मूल्यों का प्रेरकबल है। सभ्यता, निसंदेह शान्ति की वाहक होती है। शाकाहार शैली सुसभ्य संस्कृति है।

 प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण

यदि सभ्यता विकास और शान्त सुखप्रद जीवन ही मानव का लक्ष्य है तो उसे शाकाहार के स्वरूप में प्रकृति के संसाधनों का कुशल प्रबंध करना ही होगा। वन सम्पदा में पशु-पक्षी आदि, प्राकृतिक सन्तुलन के अभिन्न अंग होते है। प्रकृति की एक समग्र जैव व्यवस्था होती है। उसमें मानव का स्वार्थपूर्ण दखल पूरी व्यवस्था को विचलित कर देता है। मनुष्य को कोई अधिकार नहीं प्रकृति की उस नियोजित व्यवस्था को अपने स्वाद, सुविधा और सुन्दरता के लिए खण्डित कर दे। मानव के पास ही वह बुद्धिमत्ता है कि वह उपलब्ध संसाधनो का सर्वोत्तम प्रबंध करे। अर्थार्त कम से कम संसाधन खर्च कर अधिक से अधिक उसका लाभ प्राप्त करे। जीवहिंसा से पर्यावरण संतुलन विखंडित होता है, जो प्राकृतिक आपदाओ का प्रेरकबल बनता है। शाकारहार अपने आप में सृष्टि का मितव्ययी उपभोग है, प्राकृतिक संसाधनो के संरक्षण में प्रथम योगदान है।सृष्टि के प्रति हमारा सहजीवन उत्तरदायित्व है कि वह जीवों का विनाश न करे यह प्रकृति की बहुमूल्य निधि है। जीवराशी का यथोचित संरक्षण शाकाहार से ही सम्भव है, प्राकृतिक संसाधनो का संयमपूर्वक उपभोग अर्थात् शाकाहार। धरा की पर्यावरण सुरक्षा शाकाहार में आश्रित है। वैश्विक भूखमरी का निदान भी शाकाहार है। वैश्विक खाद्य समस्या का सर्वोत्तम विकल्प शाकाहार है। यह तो मज़ाक ही है कि शाकाहार से अभावग्रस्त, दुरूह क्षेत्र की आहार शैली का सम्पन्न क्षेत्र में भी अनुकरण किया जाय। अधिसंख्यजन यदि इसके आदी है तो उनका अनुकरण किया जाय। यह न्यायोचित विवेक नहीं है। अपरिहार्य सुक्ष्म हिंसा में भी विवेक जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य भी शाकाहार में निहित है। कुल मिलाकर पर्यावरण का अचुक उपचार एकमात्र शाकाहार शैली को अपनाना है।  

संतुलित पोषण आधार

आधुनिकता की होड़ में, हमारी संस्कृति, हमारे आचार- विचार आदि  को दकियानूसी कहने वाले, इस झूठी घारणा के शिकार हो रहे है कि शाकाहारी भोजन से उचित मात्रा में प्रोटीन और पोषक तत्व प्राप्त नहीं होते। जबकि आधुनिक विशेषज्ञों और शरीर वैज्ञानिकों की शोध से यह भलीभांति प्रमाणित है कि शाकाहारी आहार में न केवल उच्च कोटि के प्रोटीन होते है, अपितु सभी आवश्यक पोषक तत्व जैसे- विटामिन्स, वसा और कैलॉरी पूर्ण संतुलित,  गुणवत्ता युक्त, सपरिमाण मात्रा में प्राप्त होते है। विशेषतया खनिज तो शाकाहारी पदार्थों में पर्याप्त मात्रा में  उपलब्ध होते ही है। उससे बढ़कर, आन्तरिक शरीर को 'निर्मल' और 'निरोग' रखनें में सहायक निरामय ‘रेशे’ (फ़ाइबर्स) तो मात्र, शाकाहार से ही प्राप्त किए जा सकते है। शाकाहार संतुलित पोषण का मुख्य स्रोत है, शाकाहार से प्रथम श्रेणी की प्राथमिक उर्जा प्राप्त की जाती है। शाकाहार, उर्ज़ा और शारिरिक प्रतिरक्षा प्रणाली  का प्रमुख आधार है।  

आरोग्य वर्धक

शाकाहार में  आहार-रेशे पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होते है। आहार-रेशों की विध्यमानता से पाचन तंत्र की कार्य-प्रणाली सुचारू संचालित होती है। निरामिष भोजन में न हानिकर कोलेस्ट्रॉल की अति होती है न प्राणीजन्य प्रोटीन का संकलन। परिणाम स्वरूप  व्यक्ति, मनोभ्रंश (अल्जाइमर), गॉल्ब्लैडर की पथरी (गॉलस्टॉन), मधुमेह (डायबिटीज टाइप-2) , अस्थि-सुषिरता (ऑस्टियोपोरोसिस), संधिवात (आस्टियो आर्थराइटिस), उदर समस्या (लीवर प्रॉबलम), गुर्दे की समस्या (किड़नी प्रॉबलम), मोटापा, ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप, दंतक्षय (डेन्टल कैवेटिज), आंतो का केन्सर, कब्ज कोलाइटिस, बवासीर जैसी बिमारियों से काफी हद तक बचा रहता है। इस दृष्टि से शाकाहार पूर्णतःआरोग्यप्रद है। विश्व स्वास्थ्य समस्यांए शाकाहार से समाधान पा सकती है। शाकाहारी पदार्थों में वे तत्व बहुलता से पाए जाते हैं जो हमारी रोगप्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करते है।
मानव कल्याण भावना से सादर

रविवार, 6 जनवरी 2013

भारतीय धर्म-दर्शन संस्कृति और हिंसा?

भारतीय सनातन संस्कृति में हिंसा व माँसभक्षण की न तो कोई आज्ञा है और न कोई अनुमति। यह बात अलग है कि कभी क्षेत्र के कारण तो कभी अज्ञानता में या कभी देखा देखी जन साधारण में इस कुरीति का अस्तित्व रहा है। किन्तु आर्ष ग्रंथों में या उपदेशों में किंचित भी पशु-हिंसा का अनुमोदन या मांसभक्षण की अनुज्ञा, अनुमति का कोई अस्तित्व नहीं है। भारतीय संस्कृति अहिंसा प्रधान संस्कृति है।

सनातन संस्कृति के वेदों से ही अहिंसा की अजस्र धारा प्रवाहित रही है। 

वैसे तो सभी धर्म जीवों के प्रति करूणा को महत्व देते है। 

किन्तु कईं बाहरी संस्कृतियों में पशु हिंसा की प्रतीकात्मक कुरीतियाँ रूढ़ हो चुकी है। 

जबकि भारतीय संस्कृति के सभी ग्रंथ जीव हत्या को स्पष्ट अधर्म बताते है। 

भारतीय संस्कृति की तो आधारशिला में ही अहिंसा का सद्भाव रहा है।

इसलिए,वैदिक संस्कृति में माँसाहार का स्पष्ट निषेध है।

वस्तुत: वैदिक यज्ञों में पशुबलि---एक भ्रामक दुष्प्रचार है

भला यज्ञ हो तो हिंसा कैसे हो सकती है?

ऋषभक बैल नहीं, ऋषभ कंद है।- ऋषभक का परिचय


इसलिए यदि 'धर्म' के परिपेक्ष्य चिंतन करें तो उसमें हिंसा और हिंसा के प्रोत्साहक माँसाहार का अस्तित्व भला कैसे हो सकता है। पशुहत्या का आधार मानव की कायर मानसिकता है, जब शौर्य व मनोबल क्षीण होता है तो क्रूर-कायर मनुष्य, दुस्साहस व धौंस दर्शाने के लिए पशुहिंसा व मांसाहार का आसरा लेता है। लेकिन पशुहिंसा से क्रूरता व कायरता को कोई आधार नहीं मिलता। निर्बल निरीह पशु पर अत्याचार को भला कौन बहादुरी मानेगा। क्रूरता से कायरता छुपाने के प्रयत्न विफल ही होते है।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

निरामिष निष्कर्ष

"निरामिष"सामूहिक ब्लॉग के दो वर्ष सम्पन्न. प्रस्तुत है विभिन्न आलेखोँ के प्रकाश में निरामिष निष्कर्ष.....
"निर्जर निरामिष" - अमृत है शाकाहार
"निरोगी निरामिष" - स्वास्थ्यप्रद है शाकाहार
"निर्विकार निरामिष" - विकार रहित है शाकाहार
"निरापद निरामिष" - आपदा रहित है शाकाहार
"निसर्गमित्र निरामिष" - पर्यावरण मित्र है शाकाहार
"निर्मल निरामिष" - शुद्ध सात्विक है शाकाहार
आरोग्य वर्धक (स्वास्थ्यप्रद शाकाहार) 
  1. स्वस्थ व दीर्घ जीवन का आधार है शाकाहार। 
  2. आरोग्य संवर्धक है शाकाहार। 
  3. विश्व स्वास्थ्य शाकाहार में निहित है। 
  4. रोगप्रतिरोध शक्तिवर्धक है शाकाहार। 
सभ्य-खाद्याचार (सुसंस्कृत सभ्य आहार) 
  1. अप्राकृतिक भोज्य विकृति का सुसंस्कृत रूप है शाकाहार । 
  2. आदिमयुग से विकास और सभ्यता की धरोहर है शाकाहार। 
  3. शाकाहारी संस्कृति का संरक्षण ही हमारी सुरक्षा है। 
  4. मानवीय जीवन-मूल्यों का संरक्षक है शाकाहार। 
तर्कसंगत-विकल्प (सर्वांग न्यायसंगत) 
  1. प्रागैतिहासिक मानव, प्राकृतिक रूप से शाकाहारी ही था। 
  2. मनुष्य की सहज वृति और उसकी कायिक प्रकृति दोनो ही शाकाहारी है।
  3. मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल। 
  4. शाक से अभावग्रस्त, दुर्गम क्षेत्रवासी मानवो का अनुकरण मूर्खता!!
  5. सभ्यता व विकास मार्ग का अनुगमन या भीड़ का अंधानुकरण? 
  6. यदि अखिल विश्व भी शाकाहारी हो जाय, सुलभ होगा अनाज!!
  7. भुखमरी को बढाते ये माँसाहारी और माँस-उद्योग!!
  8. शाकाहार में भी हिंसा? एक बड़ा सवाल !!! 
  9. प्राणी से पादप : हिंसा का अल्पीकरण करने का संघर्ष भी अपने आप में अहिंसा है। 
  10. प्रोटीन प्रलोभन का भ्रमित दुष्प्रचार।
  11. प्रोटीन मात्रा, प्रोटीन यथार्थ
  12. विटामिन्स का दुष्प्रचार।
  13. विटामिन बी12, विटामिन डी, विटामिन 'सी'।
  14. उर्ज़ा व शक्ति का दुष्प्रचार। 

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

विश्व अहिंसा दिवस 2012

विश्वं समित्रिणं दह
(ऋग्वेद 1/36/2/14)
सर्वभक्षी रोगाग्नि में जलते हैं
"जिसकी लाठी उसकी भैंस" का मुहावरा जंगल राज में सही साबित होता है। किसी कानूनी व्यवस्था के अभाव में बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है। लेकिन सभ्यता और संस्कृति की बात ही कुछ और है। समाज जितना अधिक सभ्य होता जाता है असहायों को अपनी रक्षा की निरंतर चिंता करने की आवश्यकता उतनी ही कम होती जाती है। सभ्यता के विस्तार के साथ ही समाज में अहिंसा भी व्यापक होती जाती है। आज यदि हम विश्व पर एक नज़र दौड़ायें तो स्पष्ट हो जायेगा कि अविकसित समाजों में आज भी हिंसा का बोलबाला है जबकि विकास और अहिंसा हाथ में हाथ डाले नज़र आते हैं।

क्यूबैक का एक परिवार गांधी जी के साथ 
सभी जानते हैं कि भारतीय सभ्यता उन प्रारम्भिक सभ्यताओं में से एक है जिन्होंने अहिंसा को सर्वोपरि सद्गुणों में स्थान दिया। योग, साँख्य, जैन, बौद्ध, सिख आदि सभी भारतीय दर्शनों में अहिंसा का एक विशिष्ट स्थान है। हमारे इसी विचार को आज सम्पूर्ण संसार की स्वीकृति प्राप्त हो रही है। अहिंसा के वैश्विक अध्याय में एक नया पृष्ठ 15 जून 2007 को तब लिखा गया था जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिन को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस (International Day of Non-Violence) की मान्यता दी थी।

अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, और भूटान ने इस प्रस्ताव को अपनी सम्मति देकर अहिंसा के महत्व को स्वीकारा ही, भारत उपमहाद्वीप से बाहर के प्रमुख राष्ट्रों जैसे रूस, चीन, ब्रिटेन, फ़्रांस और जर्मनी आदि ने भी इस प्रस्ताव का दिल खोलकर स्वागत किया था। कुल 120 राष्ट्रों की सहमति से पारित हुआ "वैश्विक अहिंसा" का यह प्रस्ताव पिछले पाँच वर्षों से लगातार दुनिया भर के लोगों को अहिंसा और प्रेम का सन्देश दे रहा है।

आइये आज 2 अक्टूबर को एक बार फिर प्रण करें कि अपने जीवन से क्रूरता को बाहर करके मन वचन कर्म से अहिंसा, भूतदया और प्रेम का मार्ग अपनायेंगे, न हिंसा करेंगे और न ही उसमें प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग करेंगे।

अहिंसा परमो धर्मः!

बुधवार, 15 अगस्त 2012

मांस का मूल्य - बोध कथा


मगध के सम्राट् श्रेणिक ने एक बार अपनी राज्य-सभा में पूछा कि - "देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे सस्ती वस्तु क्या है?"

मंत्रि-परिषद्  तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये। चावल, गेहूं, आदि पदार्थ तो बहुत श्रम बाद मिलते हैं और वह भी तब, जबकि प्रकृति का प्रकोप न हो। ऐसी हालत में अन्न तो सस्ता हो नहीं सकता। शिकार का शौक पालने वाले एक अधिकारी ने सोचा कि मांस ही ऐसी चीज है, जिसे बिना कुछ खर्च किये प्राप्त किया जा सकता है।

उसने मुस्कराते हुए कहा, "राजन्! सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ तो मांस है। इसे पाने में पैसा नहीं लगता और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है।"

सबने इसका समर्थन किया, लेकिन मगध का प्रधान मंत्री अभय कुमार चुप रहा।

श्रेणिक ने उससे कहा, "तुम चुप क्यों हो? बोलो, तुम्हारा इस बारे में क्या मत है?"

प्रधान मंत्री ने कहा, "यह कथन कि मांस सबसे सस्ता है, एकदम गलत है। मैं अपने विचार आपके समक्ष कल रखूंगा।"

रात होने पर प्रधानमंत्री सीधे उस सामन्त के महल पर पहुंचे, जिसने सबसे पहले अपना प्रस्ताव रखा था। अभय ने द्वार खटखटाया।

सामन्त ने द्वार खोला। इतनी रात गये प्रधान मंत्री को देखकर वह घबरा गया। उनका स्वागत करते हुए उसने आने का कारण पूछा।

प्रधान मंत्री ने कहा,- "संध्या को महाराज श्रेणिक बीमार हो गए हैं। उनकी हालत खराब है। राजवैद्य ने उपाय बताया है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाय तो राजा के प्राण बच सकते हैं। आप महाराज के विश्ववास-पात्र सामन्त हैं। इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय का दो तोला मांस लेने आया हूं। इसके लिए आप जो भी मूल्य लेना चाहें, ले सकते हैं। कहें तो लाख स्वर्ण मुद्राएं दे सकता हूं।"

यह सुनते ही सामान्त के चेहरे का रंग फीका पड़ गया। वह सोचने लगा कि जब जीवन ही नहीं रहेगा, तब लाख स्वर्ण मुद्राएं भी किस काम आएगी!

उसने प्रधान मंत्री के पैर पकड़ कर माफी चाही और अपनी तिजौरी से एक लाख स्वर्ण मुद्राएं देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें।

मुद्राएं लेकर प्रधानमंत्री बारी-बारी से सभी सामन्तों के द्वार पर पहुंचे और सबसे राजा के लिए हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ। सबने अपने बचाव के लिए प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख और किसी ने पांच लाख स्वर्ण मुद्राएं दे दी। इस प्रकार एक करोड़ से ऊपर स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधान मंत्री सवेरा होने से पहले अपने महल पहुंच गए और समय पर राजसभा में प्रधान मंत्री ने राजा के समक्ष एक करोड़ स्वर्ण मुद्राएं रख दीं।

श्रेणिक ने पूछा, "ये मुद्राएं किसलिए हैं?"

प्रधानमंत्री ने सारा हाल कह सुनाया और बो्ले,- " दो तोला मांस खरीदने के लिए इतनी धनराशी इक्कट्ठी हो गई किन्तु फिर भी दो तोला मांस नहीं मिला। अपनी जान बचाने के लिए सामन्तों ने ये मुद्राएं दी हैं। अब आप सोच सकते हैं कि मांस कितना सस्ता है?"

जीवन का मूल्य अनन्त है। हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी होती है, उसी तरह सबको अपनी जान प्यारी होती है।

(Price Versus Cost of Meat - English translation of this article is available at Niramish English)

सोमवार, 11 जून 2012

लाभदायक शाकाहार

शाकाहार में लाभ ही लाभ है। प्रथम तो शाकाहार सस्ता और सर्व सुलभ होता है। मानव शरीर के उर्जा व शक्ति के लिए जरूरी ऐसा कोई पौष्टिक तत्व नहीं है, जो वनस्पतियों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। शाकाहार अपने आप में पूर्ण संतुलित पोषक आहार है बशर्ते विभिन्न प्रकार के वनस्पति आधारित पदार्थों का सुनियोजित सेवन किया जाए। शाकाहार पचने मे आसान होता है।

 

शाकाहार मे बीमारी के कीटाणु आ जाने की संभावना कम रहती है। शाकाहार से व्यक्ति औसतन कम बीमार पड़ता है। शाकाहार से उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदयरोग तुलनात्मक कम होते है शाकाहार से व्यक्ति अधिक शक्तिशाली होता है और अधिक समय तक जीता है। शाकाहार से पेट की समस्याएँ कम से कम होती है। जबकि माँसाहार से हानियाँ ही अधिक सम्भावित है जैसे माँसाहार पचने मे अधिक समय लाते है और उस से गॅस और पेट संबंधी शिकायते बढ़ जाती है माँसाहार को पचाने मे अधिक उर्जा लगती है। माँसाहार में उपस्थित कीटाणु अधिकत्तम तापमान पर भी नष्ट नही होते। पशु की हत्या के समय उसके शरीर में बड़े पैमाने पर विषैले रसायनों का अन्तर्स्राव होता है जो मानव स्वास्थ्य के लिए घातक होते है एवं कई बिमारियों को जन्म देते है।

 

ईश्वर ने हमारा पाचन तंत्र शाकाहार के ही अनुकूल बनाया है। माँसाहार से जीवों की क्रूर हत्या होती है जो मानव के शान्ति लक्ष्य के विरूद्ध है। शाकाहार से मानव के लिए आहार श्रंखला और उर्जाचक्र सुनियोजित रहता है। जबकि माँसाहार से पर्यावरण में गम्भीर असंतुलन पैदा होता है।

 

माँसाहार से आपराधिक प्रवृत्ति की ओर रूझान देखा गया है इसका चिंतन ही आवेश आक्रोश और हिंसा में वृद्धि करता है। हम विचार करें, तो हमें अनुभूति होगी कि जो खाना हम खाते हैं, उसका हमारे शरीर, भावना तथा मानसिक स्थिति पर अप्रत्यक्ष किन्तु एक निश्चित प्रभाव पङता है। करूणा व अहिंसा के भाव शाकाहारी भोजन का आधार हैं। यदि हम अहिंसा और दया से पूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, यदि हम अधिक गंभीर शांत और संतुष्ट होना चाहते हैं, यदि हम अपने मन और इंद्रियों पर संयम रखना चाहते हैं, तब हमें स्वाभाविक रुप से ऐसा आहार ग्रहण करना होगा, जो कि हमें हमारे ध्येय की प्राप्ति में सहायक हो। शान्त सुखमय संतोषी जीवन ही हमारा लक्ष्य है। शाकाहार उस लक्ष्य का सहज सरल मार्ग है।

गुरुवार, 10 मई 2012

मांसाहार और स्वास्थ्य से जुडी दस बातें , कुछ जानकारियाँ

शाकाहारी बनें, स्वस्थ रहें, ज़िम्मेदार रहें 
१. मांसाहारी सिर्फ पशु कोशिकाएं एवं वसा ही नहीं, बल्कि वेस्ट प्रोडक्ट भी ग्रहण करते हैं | जैसे पशुओं को खिलाये जाने वाले रासायनिक भोज्य। उन्हें इंजेक्शन द्वारा दिए गए ड्रग्स जिससे वे जल्दी मोटे/बड़े हों । उन्हें बड़ी संख्या में बिना लड़े, झगडे, हिले डुले, कम जगह में स्थिर रखने के लिए दिए गए नशीले पदार्थ (जिस से व्यायाम न होने और कैलारीज़ न जलने से ये जल्दी मोटे हों) । पशु को मारने के बाद रासायनिक रंग, और मांस व खाल को नर्म रखने वाले स्प्रे आदि।

२. हैमबर्गर गाय के मांस (beef) से बनता है - परन्तु कौन सी गाय? the 4 d's - dead, dying, disabled, diseased. इसी वजह से कुछ लोग हैमबर्गर खाने से मृत्यु के कगार तक पहुँच जाते हैं (कुछ को बचाया भी नहीं जा पात़ा)। अभी भी एक ऐसा कोर्ट केस न्यूज़ में चर्चा में बना हुआ है।

३. मांसाहारियों को अपक्षय (degenerative) बीमारियाँ - जैसे आर्थ्राइटिस, गाउट (arthritis, gout) आदि, ज्यादा होती हैं।

४ . पशु को मारते समय (slaughter house में), कई विषाक्त रसायन ( उसके शरीर से न निकल पाए वेस्ट ) खून से पेशियों में सोख लिए जाते है (जैसे यूरिक एसिड, ऐड्रिनलिन - जिन्हें मृत्यु हो जाने के कारण गुर्दे बाहर नहीं निकाल पाते)। यह सब कुछ उस मासाहारी मनुष्य के पेट में जाता है, जो उसे खायेगा। मारे जा रहे पशु के भय, दर्द, बदले की भावना, और नफरत के कारण, के खून में कई होरमोन आते हैं जैसे एपिनेफ्रिन, नोरेपिनफ्रिन और स्टीरॉइड्स। ये सब विष उस मृत पशु को खाने वाले मनुष्य के पेट में पहुँचते हैं। मनुष्य के शरीर को इस सब से छुटकारा पाने के लिए १५ गुणा अधिक काम करना पड़ता है - फिर भी ये सब पूरी तरह नहीं निकल पाते।

५. अंधापन, गर्भपात, पीलिया रोग और नर्वस बीमारियों को ट्रिगर करने करने वाले परजीवी (पेरासाईट = parasites) भी मांस के माध्यम से शरीर में प्रविष्ट हो सकते हैं।

६. समुद्री भोज्य - मछली, झींगा (प्रॉन) आदि को जीवित रखने के लिए पानी के टैंकों में बोरिक एसिड का प्रयोग होता है। जाहिर है यह उनके शरीर में घुलेगा ही। यह यकृत पर हमला करता है और मस्तिष्क पर भी - और कई बार कोमा की भी स्थिति आ सकती है। इसके विपरीत - यदि इसे फलों और सब्जियों पर स्प्रे किया भी जाए तो भी इनमे वे हॉर्मोन, एंटीबायोटिक आदि नहीं पाए जाते जो मांस में पाए जाते हैं।

७. सूअर (pig) में ट्रिकिनोसिस जीवाणु (trichinosis bacteria) है - जो पेट और अंतड़ियों की दीवारों से चिपक जाता है, और मृत्यु तक हो सकती है।

८. बीफ और पोर्क से तीक्ष्ण एसिडिटी बनती है।

९. मांसाहार से सोडियम इंटेक अधिक होती है - जिससे हाइपरटेंशन (हाई ब्लड प्रेशर) होता है।

१०. टाइप २ का मधुमेह (डाईबिटिज़) मांसाहार की जटिल शर्करा (काम्प्लेक्स कार्बोहाईड्रेट) से अतिशीघ्र और उग्र रूप लेकर भड़क उठता है।

यह जानकारी सभी पाठकों से शेअर कर रही हूँ - आभार।

[शिल्पा मेहता]

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

अहिंसा की गंगोत्री



अक्सर लोगों द्वारा दुर्भावनाओं के वशीभूत, हिन्दुत्व पर हिंसक और माँसाहारी होने के आरोपण किए जाते है। किन्तु हिन्दुत्व अपने आदि-काल से ही अहिंसा प्रधान धर्म रहा है।अहिंसा परमो धर्मः ही इसका आदि-अनादि परम् उपदेश उपदेश रहा है। उतरोत्तर निम्न काल  प्रभाव से कुछ विकृतियों का पनपना सामान्य है पर इस दर्शन की यह विशेषता है कि सिद्धांतो को प्रमुखता देकर यह स्व-सुधार में सक्षम है। जैसे गंगा अपने उद्भव पर परम शुद्ध रहते हुए अपने परिचालन मार्ग में अस्वच्छ हो जाती है। किन्तु इसका जल अपनी पावनता सुरक्षित रखता है। उसी तरह वैदिक धर्म के मूल सिद्धान्त  पावन और प्रवर्तमान रहते है। यही अहिंसा का मूल  सिद्धांत वेद-उपदेशों में ग्रंथित है।  अर्थात अहिंसा गुण ही वेदों की गंगोत्री है। देखें परम् पवित्र वेदों से प्रवाहित अहिंसा की गंगोत्री……

अहिंसा को पुष्ठ करते वेदमंत्र और शास्त्र श्रलोक :-----

ऋग्वेद- 

 अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वत: परि भूरसि स इद देवेषु गच्छति (ऋग्वेद- 1:1:4)

 -हे दैदीप्यमान प्रभु ! आप के द्वारा व्याप्त ‘हिंसा रहित’ यज्ञ सभी के लिए लाभप्रद दिव्य गुणों से युक्त है तथा विद्वान मनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है |

ऋग्वेद संहिता के पहले ही मण्डल के प्रथम सुक्त के चौथे ही मंत्र में यह साफ साफ कह दिया गया है कि यज्ञ हिंसा रहित ही हों। ऋग्वेद में सर्वत्र यज्ञ को हिंसा रहित कहा गया है इसी तरह अन्य तीनों वेदों में भी अहिंसा वर्णित हैं | फिर यह कैसे माना जा सकता है कि वेदों में हिंसा या पशु वध की आज्ञा है ?

अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय (ऋग्वेद- 1:164:26)

 -अघ्न्या गौ- हमारे लिये आरोग्य एवं सौभाग्य लाती हैं |

सूयवसाद भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम 
अद्धि तर्णमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती (ऋग्वेद 1:164:40)

-अघ्न्या गौ- जो किसी भी अवस्था में नहीं मारने योग्य हैं, हरी घास और शुद्ध जल के सेवन से स्वस्थ रहें जिससे कि हम उत्तम सद् गुण,ज्ञान और ऐश्वर्य से युक्त हों।

सुप्रपाणं भवत्वघ्न्याभ्य: (ऋग्वेद- 5:83:8)

-अघ्न्या गौ के लिए शुद्ध जल अति उत्तमता से उपलब्ध हो |

क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः । 
एहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन ।। (ऋग्वेद- 7:6:21:9)

-"मैं मांस भक्षी या जलाने वाली अग्नि को दूर हटाता हूँ, यह पाप का भार ढोने वाली है ; अतः यमराज के घर में जाए. इससे भिन्न जो यह दूसरे पवित्र और सर्वज्ञ अग्निदेव है, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ. ये इस शक्तिशाली हविष्य को देवताओं के समीप पहुँचायें ; क्योंकि ये सब देवताओं को जानने वाले है."

आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु (ऋग्वेद 7:56:17)

-ऋग्वेद गौ- हत्या को जघन्य अपराध घोषित करते हुए मनुष्य हत्या के तुल्य मानता है और ऐसा महापाप करने वाले के लिये दण्ड का विधान करता है |

वैदिक कोष निघण्टु में गौ या गाय के पर्यायवाची शब्दों में अघ्न्या, अहि- और अदिति का भी समावेश है। निघण्टु के भाष्यकार यास्क इनकी व्याख्या में कहते हैं -अघ्न्या – जिसे कभी न मारना चाहिए। अहि – जिसका कदापि वध नहीं होना चाहिए | अदिति – जिसके खंड नहीं करने चाहिए। इन तीन शब्दों से यह भलीभांति विदित होता है कि गाय को किसी भी प्रकार से पीड़ित नहीं करना चाहिए । प्राय: वेदों में गाय इन्हीं नामों से पुकारी गई है।

घृतं वा यदि वा तैलं, विप्रोनाद्यान्नखस्थितम ! 
यमस्तदशुचि प्राह, तुल्यं गोमासभक्षण: !! 
माता रूद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि: ! 
प्र नु वोचं चिकितुपे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट !! (ऋग्वेद- 8:101:15)

अर्थात- रूद्र ब्रह्मचारियों की माता, वसु ब्रह्मचारियों के लिए दुहिता के समान प्रिय, आदित्य ब्रह्मचारियों के लिए बहिन के समान स्नेहशील, दुग्धरूप अमृत के केन्द्र इस (अनागम) निर्दोष (अदितिम) अखंडनीया (गाम) गौ को (मा वधिष्ट) कभी मत मार. ऎसा मैं (चिकितेषु जनाय) प्रत्येक विचारशील मनुष्य के लिए (प्रनुवोचम) उपदेश करता हूँ.

यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः 
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च (ऋग्वेद-10:87:16)

-मनुष्य, अश्व या अन्य पशुओं के मांस से पेट भरने वाले तथा दूध देने वाली अघ्न्या गायों का विनाश करने वालों को कठोरतम दण्ड देना चाहिए |

ऋग्वेद के ६ वें मंडल का सम्पूर्ण २८ वां सूक्त गाय की महिमा बखान रहा है –

१.आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु

-प्रत्येक जन यह सुनिश्चित करें कि गौएँ यातनाओं से दूर तथा स्वस्थ रहें |

२.भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने

-गाय की देख-भाल करने वाले को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है |

३.न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति

-गाय पर शत्रु भी शस्त्र का प्रयोग न करें |

४. न ता अर्वा रेनुककाटो अश्नुते न संस्कृत्रमुप यन्ति ता अभि

-कोइ भी गाय का वध न करे |

५.गावो भगो गाव इन्द्रो मे अच्छन्

-गाय बल और समृद्धि लातीं हैं |

६. यूयं गावो मेदयथा

-गाय यदि स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगी तो पुरुष और स्त्रियाँ भी निरोग और समृद्ध होंगे |

७. मा वः स्तेन ईशत माघशंस:

-गाय हरी घास और शुद्ध जल क सेवन करें | वे मारी न जाएं और हमारे लिए समृद्धि लायें |

अथर्ववेद-

वत्सं जातमिवाघ्न्या (अथर्ववेद- 3:30:1)

-आपस में उसी प्रकार प्रेम करो, जैसे अघ्न्या – कभी न मारने योग्य गाय – अपने बछड़े से करती है |

ब्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम् एष वां भागो निहितो 
रत्नधेयाय दान्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च (अथर्ववेद- 6:140:2)

-हे दंतपंक्तियों! चावल, जौ, उड़द और तिल खाओ। यह अनाज तुम्हारे लिए ही बनाये गए हैं| उन्हें मत मारो जो माता–पिता बनने की योग्यता रखते हैं|

शिवौ ते स्तां ब्रीहीयवावबलासावदोमधौ ! 
एतौ यक्ष्मं विबाधेते एतौ मुण्चतौ अंहस: !! (अथर्ववेद- 8:2:18)

-हे मनुष्य ! तेरे लिए चावल, जौं आदि धान्य कल्याणकारी हैं. ये रोगों को दूर करते हैं और सात्विक होने के कारण पाप वासना से दूर रखते हैं.

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: ! 
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अनागोहत्या वै भीमा कृत्ये मा नो गामश्वं पुरुषं वधीः (अथर्ववेद-10:1:29)

-निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है | हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार |

धेनुं सदनं रयीणाम् (अथर्ववेद- 11:1:4)

-गाय सभी ऐश्वर्यों का उद्गम है |

"मा हिंस्यात सर्व भूतानि "

-किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे.

पुष्टिं पशुनां परिजग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम ! 
पय: पशुनां रसमोषधीनां बृहस्पति: सविता मे नियच्छात !! (अथर्ववेद- 19:31:5)

इस मन्त्र में भी यही कहा है कि- मैं पशुओं की पुष्टि वा शक्ति को अपने अन्दर ग्रहण करता हूं और धान्य का सेवन करता हूँ. सर्वोत्पादक ज्ञानदायक परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बनाया है कि (पशुनां पय:) गौ, बकरी आदि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण किया जाये न कि मांस तथा औषधियों के रस का आरोग्य के लिए सेवन किया जाए. यहां भी "पशुनां पयइति बृहस्पति: मे नियच्छात:" अर्थात- ज्ञानप्रद परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बना दिया है कि मैं गवादि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण करूँ, स्पष्टतया मांसनिषेधक है !

यजुर्वेद-

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

पशूंस्त्रायेथां (यजुर्वेद- 6:11)

-पशुओं का पालन करो |

ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे (यजुर्वेद-11:83)

-सभी दो पाए और चौपाए प्राणियों को बल और पोषण प्राप्त हो |

विमुच्यध्वमघ्न्या देवयाना अगन्म (यजुर्वेद-12:73)

-अघ्न्या गाय और बैल तुम्हें समृद्धि प्रदान करते हैं |

घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ने मा हिंसी: (यजुर्वेद-13:49)

-सदा ही रक्षा के पात्र गाय और बैल को मत मार |

द्विपादव चतुष्पात् पाहि (यजुर्वेद-14:8)

-हे मनुष्य ! दो पैर वाले की रक्षा कर और चार पैर वाले की भी रक्षा कर |

अन्तकाय गोघातं (यजुर्वेद-30:18)

-गौ हत्यारों का अंत हो |

यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत: 
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत: (यजुर्वेद- 40:7)

-जो सभी भूतों में अपनी ही आत्मा को देखते हैं, उन्हें कहीं पर भी शोक या मोह नहीं रह जाता क्योंकि वे उनके साथ अपनेपन की अनुभूति करते हैं | जो आत्मा के नष्ट न होने में और पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों, वे कैसे यज्ञों में पशुओं का वध करने की सोच भी सकते हैं ? वे तो अपने पिछले दिनों के प्रिय और निकटस्थ लोगों को उन जिन्दा प्राणियों में देखते हैं |

वेदों में पशुओं की हत्या का विरोध तो है ही बल्कि गौ- हत्या पर तो तीव्र आपत्ति करते हुए उसे निषिद्ध माना गया है | यजुर्वेद में गाय को जीवनदायी पोषण दाता मानते हुए गौ हत्या को वर्जित किया गया है |

महाभारत ---

अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो तपः। 
अहिंसा परमो सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो दमः। 
अहिंसा परम दानं, अहिंसा परम तपः॥ 
अहिंसा परम यज्ञः अहिंसा परमो फलम्‌। 
अहिंसा परमं मित्रः अहिंसा परमं सुखम्‌॥ (महाभारत/अनुशासन पर्व-115:23/116:28,29)

"अहिंसा सकलो धर्मः।" (अनुशासन पर्व- महाभारत) 
भावार्थ:- सभी प्रकार की धार्मिक और सात्विक प्रवृत्तियों का समावेश केवल अहिंसा में हो जाता है।


अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान्मतो मम । 
अनृतं वा वदेद्वाचं न हिंस्यात्कथं च न ॥ (कर्णपर्व-69:23)

-मैं प्राणियों को न मारना ही सबसे उत्तम मानता हूँ । झूठ चाहे बोल दे, पर किसी की हिंसा न करे ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् । 
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

मनुस्मृति में माँसाहार निषेध-

यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च ।
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन ॥ (मनुस्मृति- 5:47)

-ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित ।
न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत् ॥ (मनुस्मृति- 5:48)

-किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है इसलिए यह निश्चित है कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों को मांस भक्षण वर्जित करना चाहिए।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । 
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

अर्थ - अनुमति = मारने की आज्ञा देने, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिए लेने और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले - ये आठों प्रकार के मनुष्य घातक, हिंसक अर्थात् ये सब एक समान पापी हैं

मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद् म्यहम्। 
एतत्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ (मनुस्मृति- 5:55)

अर्थ – जिस प्राणी को हे मनुष्य तूं इस जीवन में खायेगा, अगामी जीवन मे वह प्राणी तुझे खायेगा।

"अहिंसया च भूतानानमृतत्वाय कल्पते।" (मनु-स्मृति) 
भावार्थ:- अहिंसा के फल स्वरूप, प्राणियों को अमरत्व पद की प्राप्ति होती है।

अन्य ग्रंथ-

"अहिंसा परमं दानम्।" (पद्म-पुराण) 
 भावार्थ:- अहिंसा स्वरूप अभयदान ही परम दान है। 

"अहिंसा परमं तपः।" (योग-वशिष्ट) 
 भावार्थ:- अहिंसा ही सबसे बड़ी तपस्या है। 

"अहिंसा परमं ज्ञानम्।" (भागवत-स्कंध) 
 भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। 

"अहिंसा परमं पदम्।" (भागवत-स्कंध) 
भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वोत्तम आत्मविकास अवस्था है। 

"अहिंसा परमं ध्यानम्।" (योग-वशिष्ट) 
भावार्थ:- अहिंसा की परिपालना ही उत्कृष्ट ध्यान है।

"अहिंसैव हि संसारमरावमृतसारणिः।" (योग-शास्त्र) 
भावार्थ:- अहिंसा ही संसार रूप मरूस्थल में अमृत का मधुर झरना है। 

"रूपमारोग्यमैश्वर्यमहिंसाफलमश्नुते।" (बृहस्पति स्मृति) 
भावार्थ:- सौन्दर्य, नीरोगता एवं ऐश्वर्य सभी अहिंसा के फल है। 


"ये न हिंसन्ति भूतानि शुद्धात्मानो दयापराः।" (वराह-पुराण) 
भावार्थ:- जो प्राण-भूत जीवों की हिंसा नहीं करते, वे ही आत्माएं पवित्र और दयावान है।

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

सब्जी-फ़लों के रोग निवारक गुण


गाजर के गुण:
             गाजर मे प्रचुर मात्रा में विटामिन ए होता है। यह विटामिन बीटा केरोटीन (beta carotene) के रूप में मौजूद रहता है। लिवर में बीटा केरोटीन विटामिन ए में बदल जाता है।गाजर के रस में कैंसर विरोधी तत्व पाये जाते हैं। अनुसंधान में पाया गया है कि गाजर में कैंसर को ठीक करने के गुण विद्यमान हैं। यह फ़ेफ़डे, स्तन और बडी आंत के कैंसर से बचाव करता है।चर्म विकृतियों में भी गाजर का उपयोग लाभप्रद रहता है। चेहरे पर कांति के लिये गाजर का उपयोग किया जाना चाहिये।
                  गाजर हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक  क्षमता को बढाता है। इसे टोनिक के रूप में व्यवहार करना चाहिये। यह नेत्रों के लिये बेहद फ़ायदेमंद है।बुढापे में आने वाले मोतियाबिंद की रोकथाम करता है। गाजर हमारे शरीर के सेल्स को तंदुरस्त रखते हुए बुढापा आने की गति को धीमा करता है।शरीर की खरोंच, घाव ठीक करने के लिये गाजर को कूटकर लगाना चाहिये। गाजर को मेश करके उसमे थोडा सा शहद मिलाकर फ़ेस पेक की तरह इस्तेमाल करने से चेहरे की खूबसूरती में इजाफ़ा होता है।इसमें संक्रमण (इन्फ़ेक्शन) विरोधी तत्व होते हैं। गाजर में अल्फा केरोटीन और ल्युटीन (lutein) तत्व होने की वजह से हृदय रोगों से भी बचाव करता है। शरीर को स्वच्छ और विजातीय पदार्थों से मुक्त रखने में गाजर की महती भूमिका हो सकती है।यह लिवर की सहायता करके पित्त दोष का निवारण करता है और चर्बी घटाता है।

सेब के गुण:
               सेब में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते हैं। इसमें खनिज तत्व और विटामिन अधिक मात्रा में मौजूद रहते है। सेब में उपस्थित लोह तत्व से शरीर में नया खून बनने में मदद मिलती है। गुर्दे की पथरी वाले रोगियों को नियमित रूप से सेवफ़ल इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। सेब में कब्ज तोडने की अद्भुत शक्ति है। कच्चे सेब के नियमित उपयोग से कब्ज का स्थाई इलाज हो जाता है। उबले सेब  खाने से बच्चों के अतिसार(दस्त लगने) में लाभ होता है।

                हृदय-रोगों में सेब गुणकारी सिद्ध हुआ है। उच्च रक्तचाप में इसका उपयोग लाभदायक है। इसमें अच्छी मात्रा में पोटेशियम और फ़ास्फ़ोरस पाया जाता और सोडियम न के बराबर होता है। यही कारण है कि  सेब  हृदय रोगों में इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। इसमे पेक्टीन (pectin) होता है जो कोलेस्टरोल(LDL) को घटाता है। दो सेब  नित्य खाने से कोलेस्टरोल १६ % तक कम हो जाता है।  सेब  में उपस्थित पेक्टीन शरीर मे गेलेक्टेरुनिक एसिड (galacturonic acid) उत्पन्न करता है जिससे इन्सुलिन की जरूरत कम हो जाती है। इस प्रकार  सेब  डायबीटीज में हितकारी है। इसीलिये तो कहते हैं "an apple a day keeps doctor away."

चुकंदर के गुण:
        
               
 पारंपरिक रूप से चुकंदर शरीर में नया खून बनाने वाले मूल के रूप में जाना जाता है। चुकंदर लिवर, पित्ताशय, तिल्ली, और गुर्दे के विकारों में लाभप्रद पाया गया है। इन अंगों के दूषित तत्वों को बाहर निकालने की शक्ति चुकंदर में पाई गई है। चुकंदर में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। केल्शियम, फ़ास्फ़ोरस और लोह तत्व भी खूब होता है। इसमें पाये जाने वाले लोहे से कब्ज नहीं होती है। चुकंदर अपने क्षारीय तत्वों की वजह से अम्लपित्त(एसिडिटी) में उपयोगी रहता है।

कटहल के गुण: 
               कटहल के फल में कई प्रकार के महत्वपूर्ण प्रोटीन्स, कार्बोहाईड्रेट्स और विटामिन्स पाये जाते हैं। सब्जी के तौर पर इस्तेमाल किये जाने वाले कटहल से अचार और पापड भी बनाये जाते हैं। कटहल की पत्तियों की राख में अल्सर को ठीक करने के गुण होते हैं। पके हुए कटहल का गूदा निकालकर भली प्रकार मेश करें, फ़िर उबालकर ठंडा करें,यह मिश्रण पीना जबर्दस्त स्फ़ूर्तिदायक होता है। यह मिश्रण शरीर में टानिक का काम करता है।

               कटहल के छिलकों से निकलने वाले दूध को गांठनुमा सूजन, कटी-फटी त्वचा अथवा घाव पर लगाने से लाभ होता है। कटहल की कोंपलों को कूटकर गोली बनालें। इनको चूसने से स्वर भंग और गले के रोगों में फ़ायदा होता है। इसकी पत्तियों का रस शूगर रोगियों और उच्च रक्तचाप में लाभ पहुंचाता है।

केला के गुण: 
               केला संसार भर में सबसे विस्तृत क्षेत्र में उपयोग होने वाला फल है। इसे छिलका उतारकर या छिलका सहित खाया जा सकता है। इसमें सोडियम की मात्रा कम और पोटेशियम ज्यादा होने से उच्च रक्तचाप में लाभप्रद फल  है। हाई ब्लड प्रेशर की जटिलताओं को भी नियंत्रित करता है। केले में पाया जाने वाला रेशा भी इसमें सहायता करता है। केले में उपस्थित पोटेशियम के प्रभाव से गुर्दों के जरिये केल्शियम की कम हानि होती है और इस प्रकार केला अस्थि-क्षरण रोग में लाभ देता है।

                अतिसार रोग मे केला अत्यंत हितकारी है। इससे इलेक्ट्रोलाईट्स की पूर्ति होती है और पौषक तत्वों का शरीर में संचय होता है। केले में अम्लता विरोधी तत्वों की मौजूदगी से पेप्टिक अल्सर के रोगियों को केला खाने की सलाह दी जा सकती है। केले में उपस्थित पेक्टीन से आंतों की कार्यकुशलता बढती है और कब्ज रोग में फ़ायदा होता है। कच्चा केला शुगर रोगियों के लिये बेहद लाभप्रद है। केले के अंदर केरोटोनाईड होता है,इससे विटामिन ए की पूर्ति होती है और रात्रि-अंधत्व रोग में इस्तेमाल करना प्रयोजनीय है। पर्यात मात्रा में केले का सेवन करते रहने से किडनी के  कैंसर से बचाव हो सकता है लेकिन प्रोसेस्ड जूस ज्यादा उपयोग करने से किडनी के कैंसर की संभावना बढ जाती है।

पाईनेपल(अनानास) के गुण:
              वैसे तो सभी ताजा फ़लों में प्रचुर मात्रा में एन्जाईम्स होते हैं लेकिन अनानास में एक अद्भुत एन्जाईम होता है जिसे ब्रोमेलैन (bromelain) कहा जाता है।ब्रोमेलैन की उपस्थिति से यह फ़ल शरीर के किसी भाग में आई सूजन में लाभकारी है और पीडानाशक भी है। इसमें विटामिन सी का भंडार है।  अनानास  चोंट, खरोंच, मोच, मांसपेशी तनाव, शोथ में हितकारी फ़ल माना गया है। इसके सूजन विरोधी गुण से संधिवात और गठिया रोगी लाभान्वित हो सकते हैं। शल्य क्रिया के बाद की सूजन ठीक करने में भी इसका व्यवहार उपयोगी है। ब्रोमैलेन प्रोटीन पचाने में भी सहयोगी रहता है। यहां यह भी बताना उचित होगा कि एन्जाईम्स ताप से नष्ट हो जाते हैं, इसलिये  अनानास या जूस को उबालना लाभप्रद नहीं है।   

जामुन के गुण:

1) जामुन की गुठली चिकित्सा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी मानी गई है। इसकी गुठली के अंदर की गिरी में 'जंबोलीन' नामक ग्लूकोसाइट पाया जाता है। यह स्टार्च को शर्करा में परिवर्तित होने से रोकता है। इसी से मधुमेह के नियंत्रण में सहायता मिलती है।
२)जामुन के कच्चे फलों का सिरका बनाकर पीने से पेट के रोग ठीक होते हैं। अगर भूख कम लगती हो और कब्ज की शिकायत रहती हो तो इस सिरके को ताजे पानी के साथ बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह और रात्रि, सोते वक्त एक हफ्ते तक नियमित रूप से सेवन करने से कब्ज दूर होती है और भूख बढ़ती है।
३) इन दिनों कुछ देशों में जामुन के रस से विशेष औषधियों का निर्माण किया जा रहा है, जिनके माध्यम से सिर के  बाल सफेद होना बंद हो जाएँगे।
४) गले के रोगों में जामुन की छाल को बारीक पीसकर सत बना लें। इस सत को पानी में घोलकर 'माउथ वॉश' की तरह गरारा करना चाहिए। इससे गला तो साफ होगा ही, साँस की दुर्गंध भी दूर हो जाएगी और मसूढ़ों की बीमारी से भी राहत मिलेगी।
५)  जामुन यकृत को शक्ति प्रदान करता है और मूत्राशय में आई असामान्यता को सामान्य बनाने में सहायक होता है।
६) जामुन के रस को शहद, आँवले या गुलाब के फूल का रस बराबर मात्रा में मिलाकर एक-दो माह तक प्रतिदिन सुबह के वक्त सेवन करने से रक्त की कमी एवं शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। यौन तथा स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।
७) जामुन के एक किलोग्राम ताजे फलों का रस निकालकर ढाई किलोग्राम चीनी मिलाकर शरबत जैसी चाशनी बना लें। इसे एक ढक्कनदार साफ बोतल में भरकर रख लें। जब कभी उल्टी-दस्त या हैजा जैसी बीमारी की शिकायत हो, तब दो चम्मच शरबत और एक चम्मच अमृतधारा मिलाकर पिलाने से तुरंत राहत मिल जाती है।
८)  जामुन और आम का रस बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से मधुमेह के रोगियों को लाभ होता है।
९) गठिया के उपचार में भी जामुन बहुत उपयोगी है। इसकी छाल को खूब उबालकर बचे हुए घोल का लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में आराम मिलता है।

                जामुन स्वाद में खट्टा-मीठा होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। इसमें उत्तम किस्म का शीघ्र अवशोषित होकर रक्त निर्माण में भाग लेने वाला तांबा पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। यह त्वचा का रंग बनाने वाली रंजक द्रव्य मेलानिन कोशिका को सक्रिय करता है। साथ ही यह रक्तहीनता तथा ल्यूकोडर्मा की उत्तम औषधि है। इतना ध्यान रहे कि अधिक मात्रा में जामुन खाने से शरीर में जकड़न एवं बुखार होने की सम्भावना भी रहती है। इसे कभी खाली पेट नहीं खाना चाहिए और न ही इसके खाने के बाद दूध पीना चाहिए।

संतरा (नारंगी) के गुण:
             नारंगी रंग का दिखने वाला संतरा ठंडा, तन और मन को प्रसन्नता देने वाला फल है। यह जितना खाने में स्वादिष्ट होता है उतना ही स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होता है। एक व्यक्ति को जितनी विटामिन ‘सी’ की आवश्यकता होती है, वह एक संतरें को प्रतिदिन खाते रहने से पूरी हो जाती है। संतरे के सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है, चुस्ती-फुर्ती बढ़ती है, त्वचा में निखार आता है तथा सौंदर्य में वृद्धि होती है। प्रस्तुत है इसके कुछ प्रयोग- औषधीय गुण:
1. संतरे का सेवन जहाँ जुकाम में राहत पहुँचाता है, वहीं सूखी खाँसी में भी फायदा करता है। यह कफ को पतला करके बाहर निकालता है।
2. संतरे में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, लोहा और पोटेशियम काफी होता है। संतरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें विद्यमान फ़्रक्टोज़, डेक्स्ट्रोज, खनिज एवं विटामिन, शरीर में पहुंचते ही ऊर्जा देना प्रारंभ कर देते हैं।
3. संतरे का एक गिलास रस तन-मन को शीतलता प्रदान कर थकान एवं तनाव दूर करता है, हृदय तथा मस्तिष्क को नई शक्ति व ताजगी से भर देता है।
4. पेचिश की शिकायत होने पर संतरे के रस में बकरी का दूध मिलाकर लेने से काफी फायदा मिलता है।
5. संतरे का नियमित सेवन करने से बवासीर की बीमारी में लाभ मिलता है। रक्तस्राव को रोकने की इसमें अद्भुत क्षमता है।
6. तेज बुखार में संतरे के रस का सेवन करने से तापमान कम हो जाता है। इसमें उपस्थित साइट्रिक अम्ल मूत्र रोगों और गुर्दा रोगों को दूर करता है।
7. दिल के मरीज को संतरे का रस शहद मिलाकर देने से आश्चर्यजनक लाभ मिलता है।
8. संतरे के सेवन से दाँतों और मसूड़ों के रोग भी दूर होते हैं।
9. छोटे बच्चों के लिए तो संतरे का रस अमृततुल्य है। उन्हें स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए दूध में चौथाई भाग मीठे संतरे का रस मिलाकर पिलाने से यह एक आदर्श टॉनिक का काम करता है।
10. जब बच्चों के दाँत निकलते हैं, तब उन्हें उल्टी होती है और हरे-पीले दस्त लगते हैं। उस समय संतरे का रस देने से उनकी बेचैनी दूर होती है तथा पाचन शक्ति भी बढ़ जाती है।
11. पेट में गैस, अपच, जोड़ों का दर्द, उच्च रक्तचाप, गठिया, बेरी-बेरी रोग में भी संतरे का सेवन बहुत कुछ लाभकारी होता है।
12. गर्भवती महिलाओं तथा यकृत रोग से ग्रसित महिलाओं के लिए संतरे का रस बहुत लाभकारी होता है। इसके सेवन से जहाँ प्रसव के समय होने वाली परेशानियों से मुक्ति मिलती है, वहीं प्रसव पीड़ा भी कम होती है। बच्चा स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट पैदा होता है|
13. संतरे के सूखे छिलकों का महीन चूर्ण गुलाब जल या कच्चे दूध में मिलाकर पीसकर आधे घंटे तक लेप लगाने से कुछ ही दिनों में चेहरा साफ, सुंदर और कांतिमान हो जाता है। कील मुँहासे-झाइयों व साँवलापन दूर होता है।
14. संतरे के ताजे फूल को पीसकर उसका रस सिर में लगाने से बालों की चमक बढ़ती है। बाल जल्दी बढ़ते हैं और उसका कालापन बढ़ता है।

आम के गुण:
           आम सिर्फ स्वाद में ही नम्बर वन नहीं है, यह अनेक गुणों का भी खजाना है। आइये जानते हैं कि आम किन-किन घातक बीमारियों में मिटाने में हमारी मदद कर सकता है:

1. शहद के साथ पके आम के सेवन से क्षयरोग एवं प्लीहा के रोगों में लाभ होता है तथा वायु और कफ दोष दूर होते हैं।
2. यूनानी चिकित्सकों के अनुसार, पका आम आलस्य को दूर करता है तथा मूत्र संबंधी रोगों का सफाया करता है।
3. प्राकृतिक रूप से पका हुआ आम क्षयरोग यानी टीबी को मिटाता है, गुर्दे एवं बस्ति (मूत्राशय) की खोई हुई शक्तियों को लौटाता है।
4. जिन लोगों को शुक्रप्रमेह शारीरिक विकारों और वात यानी वायु संबंधी दोषों के कारण संतानोत्पत्ति न होती हो उनके लिए पका आम किसी वरदान से कम नहीं है। मतलब कि संतान सुख से वंचित दंपत्ती के लिये आम बेहद लाभदायक होता है।
5. प्राकृतिक रूप से पके हुए ताजे आम के सेवन से पुरूषों में शुक्राणुओं की कमी, नपुंसकता, दिमागी कमजोरी आदि रोग दूर होते हैं।
6. कच्चे और पके दोनों तरह के आम कई तरह की किस्मों में मिलते हैं । कच्चे आम में गैलिक एसिड (gallic acid) के कारण खटास होती है। आम के पकने के साथ उसका रंग भी सफेद से पीला हो जाता है। यही पीले रंग का कैरोटीन हमारे शरीर में जाकर विटामिन 'ए' में परिवर्तित हो जाता है। इसमें विटामिन 'सी' भी काफी होता है।

कच्चा आम-
            कच्चे आम में बहुत से गुण पाए जाते हैं। कच्चे आम को आग में भूनकर पानी में मसलकर आम का पन्ना बनाते हैं। फिर इसमे भुना हुआ जीरा, सेंधानमक और कालीमिर्च डालते हैं। इस पन्ना को पीने से लू लगने के रोग में आराम आता है। आम के पन्ना को शरीर पर मलने से ठण्डक मिलती है।
7. पका आम-
मीठे और पके आम शरीर में वीर्य को बढ़ाने वाले, ताकत पैदा करने वाले, त्वचा को निखारने वाले, ठंडे और पित्त को सन्तुलित रखने वाले होते हैं।
8. आमरस-
आम का रस भारी- ताकत बढ़ाने वाला, वात को हरने वाला, दस्त लाने वाला, प्यास को कम करने वाला और शरीर में कफ की मात्रा को बढ़ाने वाला होता है। अगर आम के रस को निकालकर उसमे बराबर मात्रा में दूध और सफेद बूरा या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर कपड़े में छानकर इस्तेमाल किया जाए तो ये बहुत ही स्वादिष्ट आम का रस बन जाता है।
9. दूध और मिश्री मिला हुआ आम का रस शरीर के अन्दर से पित्त को समाप्त करता है। ये पुष्टिदायक, रुचिकारक और वीर्य तथा बल को बढ़ाने वाला होता है। ये आम का रस स्वाद में मीठा और तासीर में ठंडा होता है। आम का रस यक्ष्मा (टी.बी) के रोगियों के लिए बहुत ही लाभकारी है। इसको पीने से बुखार तथा खांसी जैसे रोग दूर हो जाते हैं। यक्ष्मा (टी.बी ) के रोगी की सांस जब चढ़ने लगती है, बलगम में खून आता हो तो ऐसे समय में रोगी को आम का रस देने से बहुत लाभ होता है।
कब न खाएँ :
भूखे पेट आम न खाएँ। इसके अधिक सेवन से रक्त विकार, कब्ज और पेट में गैस बनती है। कच्चा आम अधिक खाने से गला दर्द, अपच, पेट दर्द हो सकता है। कच्चा आम खाने के तुरंत बाद पानी न पिएँ। मधुमेह के रोगी आम से परहेज करें। खाने से पहले आम को ठंडे पानी या फ्रिज में रखें, इससे इसकी गर्मी निकल जाएगी।

करेला के गुण:
            एक असाध्य बीमारी है मधुमेह ‘डायबिटीज’ । करेला मधुमेह के रोगियों के लिए ‘अमृत’ तुल्य है। 100 मिली. के रस में इतना ही पानी मिलाकर दिन में तीन बार लेने से लाभ होता है और प्रात: चार किलोमीटर टहलना चाहिए तथा मिठाई खाने से परहेज रखना चाहिए। करेला मधुमेह के अलावा अन्य शारीरिक तकलीफों में भी लाभदायक है। कब्ज: नित्य करेला सेवन करने से कब्ज दूर होता है। यह एक अनुपम सब्जी है और इसमें ज्यादा तेल-मसाले नहीं डालने चाहिए। पीलिया: ताजा करेले का रस सुबह-शाम पीने से लाभ होता है। दमा: दमा के मरीज भी करेले का रस सुबह खाली पेट लेकर राहत पा सकते हैं। सब्जी भी ज्यादा खानी चाहिए। पथरी: पथरी गुर्दे की हो या मूत्राशय की, इसे तोड़कर बाहर निकालने की क्षमता करेला रखता है। करेले का रस दिन में दो बार और दोनों समय भोजन में करेले की सब्जी खानी चाहिए। खूनी बवासीर : मस्से फटने से रक्तस्राव होता है जिसे खूनी बवासीर कहा जाता है। रोगी नित्य दिन में दो समय करेले के रस में दो चम्मच शक्कर मिलाकर पिये तो लाभ होगा। पाचन शक्ति : यदि पाचन शक्ति कमजोर हो तो किसी भी प्रकार करेले का नित्य सेवन करने से पाचन शक्ति मजबूत होती है। करेला स्वयं भी शीघ्र पचता है। रक्त शुद्धि : करेला खून की शुद्धि करने में पूरी तरह सक्षम है। यदि त्वचा-रोग हो तो भी रक्त-शुद्धि हेतु करेले का रस कुछ दिनों तक आधा-आधा कप पीना लाभदायक है। इस प्रकार कड़ुवा करेला अनेकों रोगों में औषधि रूप में काम आ सकता है बशर्ते उसे उसी रूप में लिया जाये- रस या सब्जी बनाकर।

लौकी के गुण:
            सब्जी के रुप में खाए जाने वाली लौकी हमारे शरीर के कई रोगों को दूर करने में सहायक होती है। यह बेल पर पैदा होती है और कुछ ही समय में काफी बड़ी हो जाती है। वास्तव में यह एक औषधि है और रोगियों पर इसका उपयोग  सलाद के रूप में अथवा रस निकालकर या सब्जी के रुप में एक लंबे समय से किया जाता रहा है। लौकी को कच्चा भी खाया जाता है, यह पेट साफ करने में भी बड़ा लाभदायक साबित होती है और शरीर को स्वस्थ और शुद्ध भी बनाती है। लंबी तथा गोल दोनों प्रकार की लौकी वीर्य वर्धक , पित्त तथा कफनाशक और धातु को पुष्ट करने वाली होती है। आइए इसके औषधीय गुणों पर एक नज़र डालते हैं-
1. हैजा होने पर 25 एम.एल. लौकी के रस में आधा नींबू का रस मिलाकर धीरे-धीरे पिएं। इससे मूत्र बहुत आता है।
2. खांसी, टीबी, सीने में जलन आदि में भी लौकी बहुत उपयोगी होती है।
3. हृदय रोग में, विशेषकर भोजन के पश्चात एक कप लौकी के रस में थोडी सी काली मिर्च और पुदीना डालकर पीने से हृदय रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
4. लौकी में श्रेष्ठ किस्म का पोटेशियम प्रचुर मात्रा में मिलता है, जिसकी वजह से यह गुर्दे के रोगों में बहुत उपयोगी है और इससे पेशाब खुलकर आता है।
5. लौकी श्लेष्मा रहित आहार है। इसमें खनिज लवण अच्छी मात्रा में मिलते है।
6. लौकी के बीज का तेल कोलेस्ट्रॉल को कम करता है तथा हृदय को शक्ति देता है। यह रक्त की नाडि़यों को भी तंदुरस्त बनाता है। लौकी का उपयोग आंतों की कमजोरी, कब्ज, पीलिया, उच्च- रक्त्चाप, हृदय रोग, मधुमेह, शरीर में जलन या मानसिक उत्तेजना आदि में बहुत उपयोगी है।

टमाटर के गुण:
           टमाटर स्वादिष्ट होने के साथ पाचक भी होता है। पेट के रोगों में इसका प्रयोग औषधि की तरह किया जा सकता है। जी मिचलाना, डकारें आना, पेट फूलना, मुँह के छाले, मसूढ़ों के दर्द में टमाटर का सूप अदरक और काला नमक डालकर लिया जाए तो तुरंत फायदा होता है।

           टमाटर के सूप से शरीर में स्फूर्ति आती है। पेट भी हल्का रहता है। सर्दियों में गर्मागर्म सूप जुकाम इत्यादि से बचाता है। अतिसार, अपेंडिसाइटिस और शरीर की स्थूलता में टमाटर का सेवन लाभदायक है। रक्ताल्पता में इनका ‍निरंतर प्रयोग फायदा देता है। टमाटर की खूबी है कि इसके विटामिन गर्म करने से भी नष्ट नहीं होते। बेरी-बेरी, गठिया तथा एक्जिमा में इसका सेवन आराम देता है। ज्वर के बाद की कमजोरी दूर करने में इससे अच्छा कोई विकल्प नहीं। मधुमेह के रोग में यह सर्वश्रेष्ठ पथ्य है।

               टमाटर में विटामिन 'सी' होता है, जो कि इम्युनिटी के स्तर को बढ़ाता है जिससे साधारण सर्दी और कफ की शिकायत नहीं होती। गॉलस्टोन और लिवर कन्जेशन में भी टमाटर का सेवन कारगर है। हम कह सकते हैं कि टमाटर पोषक तत्वों का खजाना है, क्योंकि इसमें पाए जाने वाला विटामिन 'ए' आँखों और त्वचा के लिए व पोटेशियम मांसपेशियों में होने वाली ऐंठन में भी फायदा पहुँचाता है।

               टमाटर में जो लाल रंग का तत्व होता, उसे लायकोपिन (lycopene) कहते हैं,यह तत्व शरीर को विषैले पदार्थों (toxins) से मुक्त करने में सहायक है। लायकोपिन शरीर को फ़्री रेडिकल्स से मुक्त करने के मामले में बीटा केरोटीन से भी आगे है।

              अनुसंधान में पाया गया है कि टमाटर के नियमित सेवन से प्रोस्टेट कैंसर से बचाव होता है। इसराईल के वैज्ञनिकों के अनुसार टमाटर फ़ेफ़डे, बडी आंत और गर्भाशय के कैंसर से बचाव करता है। और सबसे सुखप्रद तथ्य ये कि टमाटर सेवन करने से व्यक्ति लंबे समय तक बुढापे की चपेट मे नहीं आता है।

 पपीता के गुण:
                पपीता न केवल एक स्वादिष्ट फ़ल है बल्कि इसमे उपस्थित औषधीय गुणों का विशेष महत्व है। पपीते में उच्च मात्रा में पोटेशियम तत्व पाया जाता है और इसके गूदे में भरपूर विटामिन" ए " मिलता है। पपीता के बीज और पत्तियां अपने कीटाणुनाशक गुणों के चलते आंतों में निवास करने वाले किटाणुओं को मारने के लिये प्रयोग किये जा सकते हैं। इसके नियमित उपयोग से कब्ज रोग का ईलाज हो जाता है। इसमें पाये जाने वाले पापैन(Papain, या papaya proteinase I) का हमारे शरीर के पाचन संस्थान को चुस्त-दुरस्त रखने का उत्तरदायित्व है। पपीते का जूस नियमित पीने से बडी आंत की सफ़ाई होती है और उसमें स्थित संक्रमण,श्लेष्मा और पीप का निष्कासन होने लगता है। ऐसे घाव जो अन्य चिकित्सा से ठीक न हो रहे हों पपीता का छिलका उन घावों पर कुछ रोज लगाकर अच्छे परिणाम की उम्मीद की जा सकती है। पपीता में सूजन विरोधी और केंसर से बचाने के गुण मौजूद हैं। इस सूजन विनाशक गुण के चलते पपीता उन लोगों के लिये फ़ायदेमंद है जो शोथ,संधिवात ,गठिया रोग से पीडित है।

                पपीता उदर रोगों में लाभकारी है। आमाशय को स्वच्छ करता है। एक ताजा अध्ययन का निष्कर्ष है कि ३-४ रोज सिर्फ़ पपीता खाने से आमाशय और आंतों को आशातीत लाभ मिलता है। कच्चा पपीता खाने से मासिक धर्म के विकार नष्ट होते हैं। मासिक धर्म खुलकर और नियमित आने लगता है। पपीता उन लोगों के लिये अमृत समान है जो सर्दी,खासी,फ़्लु से बार-बार परेशान रहते हैं। पपीता का उपयोग करने से हमारे शरीर का इम्युन सिस्टम मजबूत होता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफ़ा होता है।गर्भवतियों में सुबह की मिचली नियंत्रित करने के लिये पपीता का सेवन हितकारी है।

               धमनियों के कठोर होने के दोष को निवारण करने में पपीता उपयोगी है। शूगर रोगियों की हृदय की बीमारियों में पपीता अत्यंत हितकारी है। पपीता का रेशा खराब कोलेस्टरोल (एल डी एल) का स्तर घटाता है और इस प्रकार हृदय की सुरक्षा करता है। इसके नियमित सेवन से अंगों और ग्रंथियों में केंसर की रोकथाम और बचाव होता है।

कद्दू(काशीफ़ल) के गुण:
           कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और संतरी कद्दू में केरोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। बीटा केरोटीन एंटीऑक्सीडेंट होता है जो शरीर में फ्री रैडिकल से निपटने में मदद करता है। कद्दू ठंडक पहुंचाने वाला होता है। इसे डंठल की ओर से काटकर तलवों पर रगड़ने से शरीर की गर्मी खत्म होती है। कद्दू लंबे समय के बुखार में भी असरकारी होता है। इससे बदन की हरारत या उसका आभास दूर होता है।

                कद्दू के बीज भी बहुत गुणकारी होते हैं। कद्दू व इसके बीज विटामिन सी और ई, आयरन, कैलशियम मैग्नीशियम, फॉसफोरस, पोटैशियम, जिंक, प्रोटीन और फाइबर आदि के भी अच्छे स्रोत होते हैं। यह बलवर्धक, रक्त एवं पेट साफ करता है, पित्त व वायु विकार दूर करता है और मस्तिष्क के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। प्रयोगों में पाया गया है कि कद्दू के छिलके में भी एंटीबैक्टीरिया तत्व होता है जो संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं से रक्षा करता है।

               कद्दू का रस भी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। यह मूत्रवर्धक होता है और पेट संबंधी गड़बड़ियों में भी लाभकारी रहताहै। यह खून में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने में सहायक होता है और अग्नयाशय को भी सक्रिय करता है। इसी वजह से चिकित्सक मधुमेह के रोगियों को कद्दू के सेवन की सलाह देते हैं।
               प्रोस्टेट ग्रंथि बढने के रोग में ३० ग्राम कद्दू के बीज(छिलका रहित) तवे पर सेक लें और खाएं। ऐसा दिन में तीन बार करें। इन बीजों में फ़ायटोस्टरोल तत्व की उपस्थिति से प्रोस्टेट ग्रंथि सिकुडकर मूत्र बिना रुकावट खुलकर आने लगता है।

लेखक परिचय  
डॉ. दयाराम आलोक,
एम.ए., आयुर्वेद रत्न,D.I.Hom(London), व्यवसाय-हर्बल चिकित्सा।

आप विशेषत: गुर्दे एवं पित्ताशय की पथरी और प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र बाधा की चिकित्सा में सलग्न है। समाजसेवा के कार्य में विशेष गरीब परिवारों की कन्याओं के लिये स्ववित्तपोषित नि:शुल्क समूह विवाह के आयोजन करते है। आप ‘अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ.’ के संचालक है। इन्टरनेट पर सामाजिक, स्वास्थ्य विषयक एवं कविता के ब्लॉग लिखना इनकी प्रधान रुचियों में से है।

प्रमुख ब्लॉग :
रोगों की सरल चिकित्सा 
जटिल रोगों की सरल चिकित्सा.

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

विटामिन सी के बिना रोगमुक्त होने की कल्पना नहीं

शरीर को रोगमुक्त और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए तमाम तरह के अवयवों की जरूरत होती है, लेकिन इनमें भी विटामिन सी एक ऐसा अवयव है जिसके बिना शरीर को रोगमुक्त रखने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

 विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है और इसकी कमी से स्कर्वी और रक्त अल्पता जैसे कई गंभीर रोग हो सकते हैं।

विटामिन सी की पहचान चार अप्रैल 1932 को हुई थी और तभी से चिकित्सक तथा वैज्ञानिक मानव शरीर पर इसके प्रभावों और महत्व को लेकर शोध करते रहे हैं।

इसे एल एस्कार्बेट या एस्कोर्बिक एसिड (Ascorbic Acid या L-Ascorbate) भी कहा जाता है जो ताजा फलों, सब्जियों, खासकर संतरा और नींबू जैसे खट्टे फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के पूर्व चिकित्सक डॉ.रमेश कुमार के अनुसार विटामिन सी एंटीआक्सीडेंट की तरह काम करता है और आक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाव करता है।

उनके अनुसार विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग हो सकता है, जिसमें शरीर में थकान, मांसपेशियों की कमजोरी, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, मसूढ़ों से खून आना और टांगों में चकत्ते पड़ने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

विटामिन सी शरीर में रोग पैदा करने वाले विषाणुओं से लड़ने की ताकत पैदा करता है और शरीर में इसकी संतुलित मात्रा बने रहने से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहती है।

इसके विपरीत यदि विटामिन सी की कमी हो तो शरीर छोटी छोटी बीमारियों से लड़ने की ताकत भी खो देता है, जिसका नतीजा बीमारियों के रूप में सामने आता है।

बहुत पहले यह बीमारी नाविकों, जलदस्युओं और ऐसे लोगों में आम हुआ करती थी जो लंबे समय तक ताजा फलों और सब्जियों से वंचित रहते थे, लेकिन आज के समय में जंक फूड खाने वालों और पौष्टिक भोजन से मुंह बिसूरने वाले बच्चों पर यदि उचित ध्यान न दिया जाए तो वह इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं।

आहार विशेषज्ञ ऋचा सिंह के अनुसार शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी नहीं मिलने से स्कर्वी के अलावा हृदय रोग, रक्त अल्पता, कैंसर और मोतियाबिन्द जैसी बीमारी भी हो सकती है। विटामिन सी की कमी होने पर जुकाम की समस्या बार बार बनी रहती है।

उनके मुताबिक यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि विटामिन सी का आवश्यकता से अधिक सेवन हजारों मिलीग्राम में नकारात्मक साबित हो सकता है और इससे डायरिया तथा अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

विटामिन सी हासिल करने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। हरी सब्जियों और नींबू, संतरे जैसे खट्टे फलों में यह खूब पाया जाता है। इन्हें अपने रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा बना लीजिए और शरीर में विटामिन सी की कमी न होने दीजिए।

शाकाहारी बनें स्वस्थ रहें!
सम्पादकीय टिप्पणी

आज ४ अप्रेल है - जिस दिन विटामिन सी की खोज हुई थी |

        इस सिलसिले में एक और जानकारी जो शायद कई लोग पहले ही जानते होंगे , फिर भी - जो न जानते हों उनके लिए | गर्मियों में कई बार कई लोगों को नाक से खून बहने की समस्या होती है | इसमें माएं अक्सर बच्चों को प्याज सुंघाती हैं | यदि गर्मी की शुरुआत से पहले विटामिन सी का एक १५ दिन का कोर्स हो - तो यह समस्या नहीं आती | इसके अलावा - सर्दियों में होने वाली खांसी सर्दी से भी निजात दिलाता है विटामिन सी का प्रिवेंटिव कोर्स |

       जामफलों में भी यह है, कई लोग सिट्रिक फल (संतरा आदि ) खाना पसंद नहीं करते - उनके लिए जामफल, आंवला, नीम्बू पानी आदि अच्छे ऑल्टर्नेटिव हैं | गर्मियों में कच्चे आम (कैरी) से बनी लौंजी भी बहुत सहायक होती है | मुरब्बा उतना फायदेमंद नहीं - क्योंकि उसके तैयार होने तक अधिकतर विटामिन सी बिखर जाता है | हर सन्डे को चार बड़ी कच्चे कैरियां छिलकों सहित कूकर में उबालें, फिर ठंडा होने पर हाथ से ही छिलके अलग कर के गूदे को मसल कर एक दूसरी भगोनी में रखें | इसमें मुरब्बे जैसी ही शक्कर और दो चुटकी नमक (नमक पड़ने से कुछ काला रंग आएगा - यह नुकसानदेह नहीं है ) , कुछ जीरा मिला कर कडछी से लगातार घुमाते हुए दस मिनट उबल लें | ठंडा होने पर साफ़ बर्तन में निकाल कर फ्रिज में रख लें | हफ्ते भर आराम से चार लोगों के परिवार में खाने के साथ इसे लिया जा सकता है | इसे बनाने में कोई ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती | इसे शरबत की तरह ठन्डे पानी में मिला कर भी पिया जा सकता है | मेरे घर में यह पूरी गर्मियों में एक आवश्यक फ़ूड आयटम है | :)
 शिल्पा मेहता

बुधवार, 21 मार्च 2012

पश्चिम में प्रकाश - भारत के बाहर शाकाहार की परम्परा


बात सभ्यता की हो, अध्यात्म की, योग की या शाकाहार की, भारत का नाम ज़ुबान पर आना स्वाभाविक ही है। सच है कि इन सभी क्षेत्रों में भारत अग्रणी रहा है। वैदिक ऋषियों, जैन तीर्थंकरों, बौद्ध मुनियों और सिख गुरुओं ने अपने आचरण और उपदेश में वीरता, त्याग, प्रेम, करुणा और अहिंसा को अपनाया है मगर शाकाहार का प्रसार छिटपुट ही सही, भारत के बाहर भी रहा अवश्य होगा ऐसा सोचना भी नैसर्गिक ही है।

निरामिष पर एक पिछली पोस्ट में हमने इंग्लैंड में हुए एक अध्ययन के हवाले से देखा था कि वहाँ सर्वोच्च बुद्धि-क्षमता वाले अधिकांश बच्चे 30 वर्ष की आयु तक पहुँचने से पहले ही शाकाहारी हो गये थे। इसी प्रकार बेल्जियम के नगर घेंट में नगर प्रशासन ने सप्ताह के एक दिन को शाकाहार अनिवार्य घोषित करके शाकाहार के प्रति प्रतिबद्धता का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया था। पश्चिम जर्मनीअमेरिका में बढते शाकाहार की झलकियाँ भी हम निरामिष पर पिछले आलेखों में देख चुके हैं। शाकाहार के प्रति वैश्विक आकर्षण कोई नई बात नहीं है। आइये आज इस आलेख में हम यह पड़ताल करते हैं कि भारत के बाहर शाकाहार के बीज किस तरह पड़े और निरामिष प्रवृत्ति ने वहाँ किस प्रकार एक आन्दोलन का रूप लिया।
पायथागोरस इतने बुद्धिमान थे कि उन्होंने कभी मांस नहीं खाया और मांसाहार को सदा पाप कहा
~ पायथागोरस की जीवनी खंड 23
आज के भारत में शाकाहारी होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमारे पास भूतदया, करुणा और शाकाहार की इतनी पुरानी और सुदृढ परम्परा है कि शाकाहार पर नहीं, आश्चर्य तो मांसाहार पर होना चाहिये। लेकिन सरसरी तौर पर देखने से पश्चिमी जगत में शाकाहार के लिए पर्याप्त उदाहरण, उपदेश और प्रेरणाएं नज़र नहीं आतीं बल्कि वह कुछ असाधारण व्यक्तियों के हृदय में स्वतः ही उत्पन्न हुआ लगता है। निश्चित रूप से इसके पीछे अच्छे स्वास्थ्य की कामना और पर्याप्त ज्ञान तो है ही, जीवदया और करुणा का महत्व भी कम नहीं है।

जिन लोगों ने आरम्भिक गणित पढा होगा उन्हें धर्मसूत्र के रचनाकार के रूप मे प्रसिद्ध बौधायन (800 ईसा पूर्व) की समकोण त्रिकोण प्रमेय (Pythagoras theorem) को पश्चिम में स्वतंत्र रूप से सिद्ध करने वाले पाइथागोरस (इटली 570 - 495  ईसा पूर्व) की याद तो होगी ही। एक समय में पायथागोरस और उनका गणित इतना आदरणीय था कि उनके वैसे ही अनेक अनुसरणकर्ता बन गये थे जैसे कि किसी धर्मगुरु के अनुयायी होते हैं। किमाश्चर्यम् कि घनघोर मांसाहारी यूरोप का यह प्रसिद्ध गणितज्ञ और विचारक पूर्णतया शाकाहारी था। वैसे पायथागोरस को पुनर्जन्म में भी न केवल विश्वास था बल्कि उनका दावा यह था कि उन्हें अपने चार पिछले जन्मों की बातें याद हैं। पायथागोरस के प्रमुख शिष्यों ने भी शाकाहारी जीवन अपनाया। ये लोग न केवल मछली, अंडा आदि खाने के विरोधी थे बल्कि धर्म के बहाने से की जाने वाली पशुहत्या को भी अमानवीय मानते थे।

होमर के ग्रंथों में कमलपोषित कहकर उत्तरी अफ़्रीका की शाकाहारी प्रजातियों के और इथोपिया के शाकाहारियों के सन्दर्भ आये हैं। पाँचवीं शताब्दी  ईसा पूर्व के दार्शनिक एम्पेडोक्लीज़ भी अपने शाकाहार के लिये जाने गये थे। उस समय के यूरोप के शाकाहारी विद्वानों और मांसाहारी आमजनों के बीच अनेक शास्त्रार्थ होने के बावजूद उनमें इस बात पर सहमति थी कि एक आदर्श समाज में जीवहत्या, शिकार आदि के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये, ऐसी जानकारी प्लेटो, हेसोइड व ओविड आदि दार्शनिकों के आलेखों से ज्ञात है। प्लेटो और उसके अनुयायी भी पूर्णतः शाकाहारी थे। इनसे इतर विचारधारा का दार्शनिक स्टोइक यद्यपि स्वयं शाकाहारी नहीं था पर उसके प्रसिद्ध शिष्य सेनेका शाकाहारी थे।

विश्व भर में विभिन्न चैम्पियन खिलाड़ियों ने शाकाहार अपनाकर अपने को शिखर पर बनाये रखा है। मगर पश्चिम में भी क्षमतावान होने के लिये शाकाहार का यह प्रयोग कोई नई बात नहीं है। सिकन्दर के विश्वविजयी सैनिकों को युद्धकाल में शाकाहारी रहने के निर्देश थे। अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि रोम के विश्वविख्यात ग्लैडियेटर्स अधिक शक्ति, स्फूर्ति व गति के लिये न केवल शाकाहारी बल्कि वीगन हुआ करते थे।

यूरोप में ईसाई धर्म के प्रसार के साथ विद्वानों व संतों के बीच शाकाहार की अनिवार्यता समाप्त हो गयी तथापि अनेक ईसाई संत या तो शाकाहारी रहे या शाकाहार के साथ मत्स्याहारी। परंतु धीरे-धीरे चर्च और विद्वानों के बीच टकराव बढता गया। शक्तिशाली चर्च ने विद्वानों के दमन की नीति अपनाई। यहाँ तक कि कई विद्वानों, विचारकों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों को धर्मविरोधी होने के आरोप में मार दिया गया। ऐसे अन्धकारमय काल के यूरोपीय जीवन में  हिंसा और मांसाहार सामान्य सा हो गया। इंग्लैंड में तो कई समूह यह दावा करते दिखते थे कि पशुओं को ईश्वर ने उनके आहार के लिये ही बनाया है। यूरोप के पुनर्जागरण के काल (रेनेसां = Renaissance) में एक लगभग पूर्ण मांसाहारी यूरोप में जन्मी विभूतियों जैसे लियोनार्दो दा विंची (1452–1519) और पियरे गासेन्दी (1592–1655) ने शाकाहार अपनाकर उसे फिर से विद्वानों के भोजन की प्रतिष्ठा दिलाई। इनके कुछ समय बाद इंग्लिश लेखक टॉमस ट्रायन (1634–1703) ने इंग्लैंड में शाकाहार की वकालत की।

अमेरिका में शाकाहार का जन्म मेरे वर्तमान राज्य पेंसिल्वेनिया में 1732 में योहान कॉनराड द्वारा स्थापित एफ़्राटा क्लॉइस्टर (Ephrata Cloister) समुदाय में हुआ। तत्कालीन इंगलैंड में अनेक कवि, लेखक, विचारक और विद्वान शाकाहार अपना रहे थे। सन 1809 में विलियम काउहर्ड द्वारा शाकाहारी सिद्धांतों पर आधारित बाइबल क्रिस्चियन चर्च की स्थापना हुई। 1838 में लंडन के पास खुले कंकॉर्डियम स्कूल ने मांसाहार को पूर्णतः प्रतिबन्धित कर दिया। भारत के बाहर शाकाहार के आधुनिक इतिहास में एक प्रमुख घटना 30 सितम्बर 1847 को घटी जब 140 अंग्रेज़ों ने एक स्वयंसेवी संस्था "वेजीटेरियन सोसायटी" को पंजीकृत कराया। इसके बाद तो शाकाहार की ऐसी धूम मची कि सन 1853 में 889 सदस्यों की संस्था में सन 1897 तक 5,000 सदस्य थे। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, महात्मा गान्धी और पॉल मैककॉर्टनी जैसे महानुभाव इस संस्था के सदस्य रह चुके हैं। वेजीटेरियन सोसायटी आज भी कार्यरत है और अन्य ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ विभिन्न आहारों को शाकाहारी प्रमाणित करने का काम भी करती है। जिलेटिन और पशु रेनेट (animal rennet) युक्त खाद्य पदार्थों को भोजन से हटाने या स्पष्टतः मांसाहार के रूप में लिखे जाने का दवाब बनाना जैसे कार्य भी इसकी सूची में हैं।

जीवदया के उद्देश्य से सन 1980 में स्थापित संस्था पीटा (PETA = People for the Ethical Treatment of Animals) अपने तीस लाख सदस्यों के साथ शायद इस समय संसार की सबसे बड़ी पशु संरक्षक संस्था है जिसका एक सहयोगी उद्देश्य शाकाहार को बढावा देना भी है। पीटा का मुख्यालय नॉर्फ़ोक वर्जिनिया (अमेरिका) में है।

इस प्रकार हमने देखा कि विश्व भर में अलग-अलग बिखरे हुए विद्वानों व बुद्धिजीवियों द्वारा अपनाई जाने वाली निरामिष आहार शैली किस प्रकार जनमानस के सामान्यजीवन का अंग बनी। भारत में भी यही सब लगभग इसी प्रकार से हुआ होगा। हाँ इतना अवश्य है कि इस मामले में हम शेष विश्व से कई हज़ार साल आगे निकल आये थे और इसीलिये आज भी भारत शाकाहारियों के लिये स्वर्ग है। प्रसन्नता की बात है कि विज्ञान की प्रगति और नित नये अध्ययनों के आधार पर शाकाहार के संतुलित और सम्पूर्ण होने का ज्ञान विद्वानों से आगे बढकर आम जनता तक पहुँच रहा है।

इंसानियत तो दुनियाभर में शाकाहार की प्रगति का मुख्य कारण है ही परंतु मांस उद्योग द्वारा किये जा रहे पर्यावरण प्रदूषण, संसाधन हानि और मानव स्वास्थ्य पर मांस द्वारा पड़ने वाले दुष्प्रभावों के कारण भी विदेश में शाकाहार का प्रचलन बढ रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने आधुनिक विश्व में अहिंसा के पुरोधा महात्मा गान्धी के जन्मदिन को अंतर्राष्ट्रीय शाकाहार दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। ब्रिटेन में 1985 मे जहॉ कुल जनसंख्या का 2.6 प्रतिशत शाकाहारी था वही आज बढ़कर 7 प्रतिशत से अधिक हो गया है। परम्परागत रूप से मांसाहारी ताइवान में पिछले वर्ष पर्यावरण संरक्षण के लिये "नो मीट नो हीट" अभियान में लगभग दस लाख नागरिकों ने शाकाहार अपनाने की शपथ ली जिसमें ताइवान की संसद के प्रमुख और ताइपेइ तथा काओस्युंग के मेयर भी शामिल हैं।

शाकाहार के सम्बन्ध में यदि आपको कोई भी जानकारी अपेक्षित हो तो आप इन संस्थाओं (वेजीटेरियन सोसायटी व पीटा) से सीधे भी सम्पर्क कर सकते हैं और यदि उचित समझें तो हमसे भी पूछ सकते हैं। इस विषय में आपकी सहायता करने में हमें हार्दिक प्रसन्नता होगी।
   * सम्बन्धित कड़ियाँ * 
* पायथागोरस एवम पशु अधिकार
* वेजीटेरियन सोसायटी
* पीटा