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मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

विटामिन सी के बिना रोगमुक्त होने की कल्पना नहीं

शरीर को रोगमुक्त और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए तमाम तरह के अवयवों की जरूरत होती है, लेकिन इनमें भी विटामिन सी एक ऐसा अवयव है जिसके बिना शरीर को रोगमुक्त रखने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

 विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है और इसकी कमी से स्कर्वी और रक्त अल्पता जैसे कई गंभीर रोग हो सकते हैं।

विटामिन सी की पहचान चार अप्रैल 1932 को हुई थी और तभी से चिकित्सक तथा वैज्ञानिक मानव शरीर पर इसके प्रभावों और महत्व को लेकर शोध करते रहे हैं।

इसे एल एस्कार्बेट या एस्कोर्बिक एसिड (Ascorbic Acid या L-Ascorbate) भी कहा जाता है जो ताजा फलों, सब्जियों, खासकर संतरा और नींबू जैसे खट्टे फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के पूर्व चिकित्सक डॉ.रमेश कुमार के अनुसार विटामिन सी एंटीआक्सीडेंट की तरह काम करता है और आक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाव करता है।

उनके अनुसार विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग हो सकता है, जिसमें शरीर में थकान, मांसपेशियों की कमजोरी, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, मसूढ़ों से खून आना और टांगों में चकत्ते पड़ने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

विटामिन सी शरीर में रोग पैदा करने वाले विषाणुओं से लड़ने की ताकत पैदा करता है और शरीर में इसकी संतुलित मात्रा बने रहने से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहती है।

इसके विपरीत यदि विटामिन सी की कमी हो तो शरीर छोटी छोटी बीमारियों से लड़ने की ताकत भी खो देता है, जिसका नतीजा बीमारियों के रूप में सामने आता है।

बहुत पहले यह बीमारी नाविकों, जलदस्युओं और ऐसे लोगों में आम हुआ करती थी जो लंबे समय तक ताजा फलों और सब्जियों से वंचित रहते थे, लेकिन आज के समय में जंक फूड खाने वालों और पौष्टिक भोजन से मुंह बिसूरने वाले बच्चों पर यदि उचित ध्यान न दिया जाए तो वह इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं।

आहार विशेषज्ञ ऋचा सिंह के अनुसार शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी नहीं मिलने से स्कर्वी के अलावा हृदय रोग, रक्त अल्पता, कैंसर और मोतियाबिन्द जैसी बीमारी भी हो सकती है। विटामिन सी की कमी होने पर जुकाम की समस्या बार बार बनी रहती है।

उनके मुताबिक यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि विटामिन सी का आवश्यकता से अधिक सेवन हजारों मिलीग्राम में नकारात्मक साबित हो सकता है और इससे डायरिया तथा अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

विटामिन सी हासिल करने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। हरी सब्जियों और नींबू, संतरे जैसे खट्टे फलों में यह खूब पाया जाता है। इन्हें अपने रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा बना लीजिए और शरीर में विटामिन सी की कमी न होने दीजिए।

शाकाहारी बनें स्वस्थ रहें!
सम्पादकीय टिप्पणी

आज ४ अप्रेल है - जिस दिन विटामिन सी की खोज हुई थी |

        इस सिलसिले में एक और जानकारी जो शायद कई लोग पहले ही जानते होंगे , फिर भी - जो न जानते हों उनके लिए | गर्मियों में कई बार कई लोगों को नाक से खून बहने की समस्या होती है | इसमें माएं अक्सर बच्चों को प्याज सुंघाती हैं | यदि गर्मी की शुरुआत से पहले विटामिन सी का एक १५ दिन का कोर्स हो - तो यह समस्या नहीं आती | इसके अलावा - सर्दियों में होने वाली खांसी सर्दी से भी निजात दिलाता है विटामिन सी का प्रिवेंटिव कोर्स |

       जामफलों में भी यह है, कई लोग सिट्रिक फल (संतरा आदि ) खाना पसंद नहीं करते - उनके लिए जामफल, आंवला, नीम्बू पानी आदि अच्छे ऑल्टर्नेटिव हैं | गर्मियों में कच्चे आम (कैरी) से बनी लौंजी भी बहुत सहायक होती है | मुरब्बा उतना फायदेमंद नहीं - क्योंकि उसके तैयार होने तक अधिकतर विटामिन सी बिखर जाता है | हर सन्डे को चार बड़ी कच्चे कैरियां छिलकों सहित कूकर में उबालें, फिर ठंडा होने पर हाथ से ही छिलके अलग कर के गूदे को मसल कर एक दूसरी भगोनी में रखें | इसमें मुरब्बे जैसी ही शक्कर और दो चुटकी नमक (नमक पड़ने से कुछ काला रंग आएगा - यह नुकसानदेह नहीं है ) , कुछ जीरा मिला कर कडछी से लगातार घुमाते हुए दस मिनट उबल लें | ठंडा होने पर साफ़ बर्तन में निकाल कर फ्रिज में रख लें | हफ्ते भर आराम से चार लोगों के परिवार में खाने के साथ इसे लिया जा सकता है | इसे बनाने में कोई ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती | इसे शरबत की तरह ठन्डे पानी में मिला कर भी पिया जा सकता है | मेरे घर में यह पूरी गर्मियों में एक आवश्यक फ़ूड आयटम है | :)
 शिल्पा मेहता

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

ऑमेगा 3 व ओमेगा 6 वसीय अम्ल

ऑमेगा 3 (ω−3) व ओमेगा 6 (ω−6) नामक दो वसीय अम्ल (polyunsaturated fatty acid) समूह आजकल काफ़ी चर्चा में हैं। ये दोनों ही हमारे पोषण, विकास और चयापचय (metabolism) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हमारा शरीर बहुत से रसायनों का निर्माण आवश्यकतानुसार कर लेता है परंतु कई रसायन हमें भोजन द्वारा ही प्राप्त होते हैं। यह दोनों ओमेगा अम्ल भी हमें भोजन द्वारा ही प्राप्त होते हैं।

ओमेगा-द्वय कोशिका भित्ति के निर्माण और संरचना के साथ-साथ मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सुचारु संचालन में भूमिका निभाते हैं। ऑमेगा 3 जहाँ सामान्य विकास का सहयोगी है वहीँ ऑमेगा 6 त्वचा और अंतः भित्तियों के संरक्षण के लिये ज़रूरी है। पहले कुछ अध्ययनों में ऐसे संकेत मिले थे कि भोजन में ओमेगा 3 और ओमेगा 6 के बीच एक निश्चित अनुपात होना चाहिये मगर ताज़े अध्ययनों में ऐसी कोई बात सामने नहीं आई है और दोनों को ही समान रूप से उपयोगी पाया गया है। कुछ अध्ययनों से यह भी सिद्ध हुआ है कि ओमेगा 3 मानवों को हृदय रोगों से बचाते हैं। ये घाव जल्दी भरने में और सूजन हरने में भी सहायक होते हैं।

जहाँ इनके लाभ हैं वहीं अति किसी भी चीज़ की हानिप्रद होती है। इनकी अधिकता अधिक रक्तस्राव का कारण बनती है, बुरा कॉलेस्ट्रॉल (LDL = low-density lipoproteins) अधिक बनता है और मधुमेह (diabetes) में शर्करा नियंत्रण (glycemic control) में बाधा उत्पन्न होती है।

मांस उद्योग द्वारा कम समय में अधिक मात्रा के लालच में वध्य पशुओं व मछलियों को क्रमशः घास व प्राकृतिक जलीय शैवाल के बजाय अनाज, मांस, कीड़ों का बुरादा व अनेक प्रकार का प्रसंस्कृत भोजन और ऐंटिबायटिक आदि खिलाये जाते हैं जिससे वे खुद ही अक्सर मोटापे जैसी बीमारियों और ओमेगा 3 की कमी से ग्रसित होते हैं और अपने खाने वालों की समस्याओं को बढाते हैं।

ओमेगा 3 बहुत से बीजों, मेवों और वनस्पति तेलों में पाये जाते हैं। अलसी, मींगें, अखरोट आदि इसके समृद्ध स्रोत हैं। मांसाहार और प्रसंस्कृत (प्रोसेस्ड/रिफ़ाइंड) भोज्य पदार्थों का प्रचलन बढने के कारण आम मानव के भोजन में ओमेगा 3 की मात्रा कम होती जा रही है। जहाँ मांसाहारियों को विशेषकर ओमेगा-3 की कमी का सामना करना पड़ता है, वहीं कुछ विशेष मछलियाँ खाने वालों को ओमेगा-3 मिल तो जाता है पर उसके साथ पारा, सीसा, कैडमियम आदि ज़हरीली धातुयें व अन्य विष भी शरीर में जाते हैं। ओमेगा-6 अलसी, अखरोट, कनोला, सूरजमुखी, मूंगफली, सोयाबीन, सेफ्लावर, मकई ऐवम् अन्य वनस्पति तेलों में प्रचुर मात्रा में होता है।

शाकाहारी भारतीय भोजन में आम तौर पर खाये जाने वाले बीज, मींगें, मेवे, तेल आदि इन वसीय अम्लों के समृद्ध स्रोत हैं।  जहां ओमेगा ६ लगभग सभी वनस्पति तेलों में पाया जाता है, वहीं ओमेगा ३ तुलानात्माक रूप से कम होता है। विभिन्न स्रोतों से ली गयी निम्न सारणी ओमेगा-3 अम्ल के विविध स्रोतों की एक झलक भर दिखाने के उद्देश्य से यहाँ रखी गयी है। शाकाहारी बनें, स्वस्थ रहें!

सारणी 1. 
सामान्य नाम अन्य नाम वैज्ञानिक नाम
अखरोट Walnuts Juglans regia
हेज़लनट Hazel nuts Corylus avellana
सफ़ेद अखरोट Butternuts Juglans cinerea
भिदुरकाष्ठ, पीकन Pecan nuts Carya illinoinensis
पैरीला तेल Perilla, shiso Perilla frutescens
सोयाबीन Soybean Apios americana
अलसी Flax, linseed Linum usitatissimum
गरने, छोटे लाल बेर Cowberry, Lingonberry Vaccinium vitis-idaea
चिया बीज Chia seed, Chia sage Salvia hispanica
कैमेलीना Camelina, Gold-of-pleasure Camelina sativa
घोल, पर्सलेन  Purslane, Portulaca Portulaca oleracea
काली रसभरी Black raspberry Rubus occidentalis
गेहूं का चोकर, तेल Wheat germ oil
तिल Sesame
कपास का तेल Cottonsead oil
अंगूर तेल Grapeseed oil
जैतून Olive oil
पाम आयल Palm oil
सरसों Mustard
धान की भूसी Rice bran
एवोकाडो Avocado
पटसन के बीज Hemp seeds

गुरुवार, 22 दिसंबर 2011

रक्त निर्माण के लिये आवश्यक है विटामिन बी12

संपादकीय नोट: यह जानकारी किसी चिकित्सकीय सलाह का विकल्प नहीं है। किसी भी संशय, बीमारी, लक्षण की स्थिति में अपने चिकित्सक से सलाह अवश्य लीजिये।

दूध, दही, खमीर, अंकुरित दालें, शैवाल
संतुलित भोजन अच्छे स्वास्थ्य की और पहला कदम है। स्वस्थ भोजन में प्रोटीन, शर्करा, वसा, खनिज पदार्थों आदि के अतिरिक्त सूक्ष्म मात्रा में भी बहुत से ऐसे पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है जिन्हें विटामिन कहते हैं। संतुलित शाकाहारी भोजन विभिन्न विटामिनों सहित उपरोक्त सभी तत्वों को प्रदान करने में सक्षम है। तो भी शाकाहार के विरोध में कभी-कभी ऐसे बयान पढने या सुनने में आते हैं जिनसे ऐसी शंका हो सकती है कि निरामिष भोजन में सभी तत्व भरपूर हैं कि नहीं। शाकाहार-विरोधी ऐसे ही प्रचार को ध्यान में रखते हुये निरामिष सम्पादक मण्डल ने समय समय पर शाकाहारी भोजन में उपस्थित पोषक तत्वों की जानकारी देने के उद्देश्य से स्वास्थ्य के लिये आवश्यक खनिजों व विटामिनों के बारे में जानकारीपूर्ण आलेख प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है। पिछले दिनों आपने विटामिन डी सम्बन्धी जानकारी के लिये "विटामिन डी - सूर्य नमस्कार से पोषण" पढा था। इसी शृंखला में आज प्रस्तुत है विटामिन बी 12 के बारे में तथ्यात्मक जानकारी।

विटामिन बी के नाम से पुकारा जाने वाला समूह बहुत से विटामिनों का ऐसा समूह है जिसके अधिकांश घटक शाकाहारी भोजन में निसन्देह प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। केवल एक घटक "बी12" के बारे में कुछ समूह बार-बार यह बात कहते हैं कि यह वनस्पति जगत में नहीं होता। आइये सत्यान्वेषण पर आगे चलने से पहले इस तर्क को परख लिया जाये। यदि बी12 वनस्पति जगत में न बनकर केवल प्राणियों के शरीरों में उत्पन्न होता तब तो उसके लिये चिंता करने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती, क्योंकि तब वह हमारे शरीर में भी आवश्यकतानुसार उत्पन्न होना ही चाहिये था। और तथ्य यह है कि ऐसा होता भी है। अंतर केवल इतना है कि वह मांस का उत्पाद न होकर सूक्ष्म जीवों(Streptomyces griseus, Propionibacterium shermanii, Pseudomonas denitrificans) द्वारा ही उत्पादित पोषक तत्व है। अधिकांश प्राणियों की तरह हमारे शरीर में भी पाचन-तंत्र के कुछ अवयवों में इन्हीं सूक्ष्म जीवों की सहायता से बी 12 की भारी मात्रा उत्पन्न होती है। पशुमांस में भी यह विटामिन जिन अंगों/अवयवों में अधिक मात्रा में पाया जाता है उन भागों को तो अधिकांश मांसाहारी अभक्ष्य ही मानते हैं।
विटामिन बी12 के लिये मांसाहार अनिवार्य नहीं है। शाकाहारी प्राणी अपने शरीर में विटामिन बी 12 की पर्याप्त मात्रा उत्पन्न करते हैं।
यह सच है कि पौधे विटामिन बी12 के महत्वपूर्ण स्रोत हैं या नहीं, इस पर बहुत खोज हुई ही नहीं है। पोषण सम्बन्धी अधिकांश आधुनिक अध्ययन पश्चिमी देशों में हुए हैं जहाँ मांस और दुग्धाहार सामान्य है इसलिये किसी वैकल्पिक स्रोत की जाँच की आवश्यकता नहीं पड़ती। परंतु यह कहना बिल्कुल ग़लत है कि वनस्पति स्रोतों में बी12 का पूर्णाभाव है। हाल के वर्षों में पश्चिम में शाकाहार के बढते प्रचलन के कारण विटामिन बी12 के स्रोतों पर शोधों में भी वृद्धि हुई है। गोबर आदि जैविक खादों से पोषित भूमि में उगाई गयी फसलों में बी12 की जांच योग्य मात्रा पाये जाने के प्रमाण हैं। पशुओं के दूध और दुग्ध-उत्पादों यथा दही, पनीर, खोया, मट्ठा आदि से भी बी12 की पर्याप्त मात्रा प्राप्त होती है। अन्य प्राणियों की तरह ही मानव शरीर भी बी12 को लम्बे समय तक सुरक्षित रखता है और इसके सार को नष्ट किये बिना बारम्बार इसका उपयोग करता है। नई आपूर्ति के बिना भी हमारा शरीर विटामिन "बी12" को 30 वर्षों तक सुरक्षित रख सकता है, ऐसे चिकित्सकीय प्रमाण हैं। इसका कारण यह है कि अन्य विटामिनों के विपरीत, विटामिन बी12 अन्य प्राणियों की तरह हमारी मांसपेशियों और शरीर के अन्य अंगों विशेषकर यकृत में भंडारित रहता है। लेकिन यह वहाँ उत्पन्न नहीं होता है।

घास, चारा, पत्तियाँ और अनाज खाने वाले मवेशियों के मांस और दूध में पाया जाने वाला विटामिन बी12 उनके जठरांत्र संबंधी मार्ग में जहाँ-तहाँ रहते सूक्ष्मजीवों द्वारा संश्लेषित होता है। सच तो यह है कि शाकाहारी प्राणियों में विटामिन बी12 का संश्लेषण मांसाहारी पशुओं के मुकाबले इतना अधिक है कि उनके दूध और मांस ही अधिकांश मानवों के लिये बी12 का स्रोत हैं। वास्तव में यह सारा बी12 उन्हीं सूक्ष्म जीवों बैक्टीरिया द्वारा आया है जो हमारे पाचन-तंत्र में ही निवास करते हैं। संतुलित शाकाहारी भोजन से हम उन सूक्ष्म-जीवों की वृद्धि के लिये अनुकूल वातावरण उत्पन्न करते हैं और इस प्रकार बी12 पर बाह्य निर्भरता को कम कर सकते हैं। विटामिन बी12 के उत्पादक सूक्ष्म जीवों के लिये ऐसा अनुकूलन करने के लिये दूध, दही, पनीर, खमीर उचित आहार है। जानकारी के कुछ स्रोतों के अनुसार सोयाबीन, मूंगफली, दालें और अंकुरित बीज भी अच्छे हैं। समुद्री शैवाल स्पाइरुलिना भी अन्य विटामिनों के साथ बी12 का भी अच्छा स्रोत है। यीस्ट के एक विशिष्ट प्रकार टी 6635+ (Red Star T-6635+) में ऐक्टिव बी12 पाया गया है।
कोबाल्ट का यौगिक विटामिन बी12 मांस या शाक से नहीं बल्कि सूक्ष्मजीव बैक्टीरिया से उत्पन्न होता है।
वयस्कों के लिये बी12 की सुझाई हुई दैनिक मात्रा 2.4 माइक्रोग्राम है। विटामिन बी12 की कमी के बहुत से मामले दरअसल उसके अवशोषण की कमी के मामले होते हैं। चालीस से अधिक वय के लोगों की बी12 अवशोषण की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। बहुत सी दवाइयाँ भी लम्बे समय तक प्रयोग किये जाने पर बी12 के अवशोषण को अस्थाई रूप से या सदा के बाधित करती हैं। इसके अलावा भोजन में नियमित रूप से बी12 की अधिकता होने पर शरीर उसकी आरक्षित मात्रा में कमी कर देता है। आहार में लिये गये विटामिन बी12 का अवशोषण प्राणियों की छोटी आंत के अंत में आंतों की दीवार की कोशिकाओं द्वारा छोड़े गये एक जैव-रासायनिक अणु (intrinsic factor, a glycoprotein) की सहायता से सूक्ष्मजीवों द्वारा होता है। यदि आपके शरीर में इस जैव-रासायनिक अणु की कमी है तो हम भोजन में कितना भी बी12 लें, हमारा शरीर उसे ग्रहण करने में असमर्थ रहता है। इसी प्रकार , कोबाल्ट धातु/खनिज की आपूर्ति या विशिष्ट सूक्ष्मजीवों की अनुपस्थिति में प्राणियों के शरीर में इसका निर्माण संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त भोजन में भले ही बी12 होने का दावा किया जाये, अधिक पकाये हुए भोजन में बी12 नष्ट हो जाता है। ऐसी स्थिति में लम्बे समय तक विटामिन बी12 की कमी रहने पर मस्तिष्क सम्बन्धी गतिविधियाँ और रक्त निर्माण जैसी प्रक्रियाओं पर असर पड़ता है और चिकित्सकों की सलाह से सुइयों या नासिका के द्वारा विटामिन बी की पूरक मात्रा शरीर में पहुँचाई जा सकती है।

भोजन के प्राकृतिक स्रोतों और शरीर के भीतर निर्मित होने वाले विटामिन बी12 के अतिरिक्त हम इसकी आपूर्ति पूरक स्रोतों, जैसे विटामिन की गोलियों द्वारा भी कर सकते हैं। पूरक स्रोतों में पाया जाने वाला विटामिन बी12 प्रयोगशाला में संश्लेषित होता है। इसमें किसी पशु-उत्पाद का प्रयोग नहीं होता है। पश्चिमी देशों में प्रचलित डब्बाबन्द शाकाहारी नाश्ता (फ़ोर्टिफ़ाइड सेरियल) और चिक्की/पट्टी (ग्रेनोला बार) बी12 सहित आवश्यक विटामिनों और खनिजों से भरपूर होता है।

तो देर मत कीजिये। अपने नाश्ते में दूध का गिलास और अंकुरित दालों को शामिल कीजिये, और भोजन में गाहे-बगाहे खमीरी रोटी और स्पाइरुलिना भी ले लिया कीजिये, विशेषकर यदि आप चालीस के निकट हैं या उससे आगे पहुँच चुके हैं। संतुलित भोजन कीजिये और शाकाहारी रहिये, यह आपके लिये तो अच्छा है ही, हमारे पर्यावरण के लिये भी उपयोगी है।

सार:
शरीर को रक्त-निर्माण जैसे कार्यों के लिये विटामिन बी12 (कोबालअमीन) की अत्यल्प मात्रा की आवश्यकता होती है। बी12 को बैक्टीरिया बनाते हैं जो हमारे पाचन-तंत्र के आंतरिक अंगों में रहते हैं। खमीर, अंकुरित दालों, शैवालों, दुग्ध-उत्पादों तथा विशिष्ट शाकाहारी भोजन और इन सूक्ष्म-जीवों की सहायता से बी12 की पर्याप्त मात्रा प्राप्त कर सकते हैं। हमारा शरीर बी12 को लम्बे समय तक आरक्षित रख सकता है। मांसाहार आदि करने वालों में होने वाली अधिक आमद में शरीर बी12 का संचित कोष रखना बन्द कर देता है; अतः, मांस से शाक की ओर आने वालों को दूध आदि न लेने पर नया कोष बनने तक बी12 की कमी हो सकती है जिसे दूध, दही आदि के संतुलित आहार, फोर्टिफाइड फूड, या विटामिन की पूरक गोलियों द्वारा पूरा किया जा सकता है

विटामिन बी12 की सुझाई हुई मात्रा और विभिन्न पदार्थों में पायी जाने वाली मात्रायें माइक्रोग्राम (μg) में निम्न सारणी में अनुसूचित हैं। सामिष भोजन से तुलना के लिये मुर्गी के अंडे की मात्रा भी सूची में है।

वयस्क के लिये2.4
गर्भवती के लिये2.6
======
स्विस पनीर 100 ग्राम3.34
स्किम्ड मॉज़रेला पनीर 100 ग्राम0.7
पूरक गोली 12.4 से 12 तक
T-6635+ एक चम्मच4
आइसक्रीम 1 कप0.6
स्किम्ड दूध 1 पाव1.15
दही 1 पाव1.33
मट्ठा 100 ग्राम2.5
चीज़ पिज़्ज़ा 1 स्लाइस0.53
======
अंडा एक0.5
एक अंडे की सफ़ेदी0.1

सम्बन्धित आलेख
* Reliable Vegan Sources of Vitamin B12
* Vitamin B12 in the Vegan Diet
* विटामिन बी12 - विकीपीडिया
* विटामिन डी

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

विटामिन डी - सूर्य नमस्कार से पोषण

सूर्यकिरण व दुग्ध विटामिन डी के स्रोत हैं
सूर्य नमस्कार एक उत्तम कोटि का व्यायाम है। सूर्य को बारह प्रणाम करते हुए अंग-प्रत्यंग को लाभ मिलता है। लेकिन सूर्य से मिलने वाला एक लाभ और है, और वह लाभ है पोषण का। वैसे तो पृथ्वी पर सारे जीवन के लिये सूर्य का प्रकाश ही ज़िम्मेदार है, प्रत्यक्ष हो या परोक्ष रूप से। सर्दी के मौसम में सूर्य के प्रकाश की कमी एक विशेष प्रकार के अवसाद का कारण भी बनती है। इसके अतिरिक्त सूर्य का प्रकाश हमारे शरीर में विटामिन डी निर्माण में भी सहायक सिद्ध होता है।

विटामिन डी विभिन्न रूपों (विटामर्स = vitamers) में पाया जाता है जिन्हें डी-1 से डी-5 तक के नाम दिये गये हैं। विटामिन डी-2 कुछ कीड़ों, काइयों, व कुकुरमुत्तों पर सूर्य की पराबैंगनी (ultraviolet) किरणों के प्रभाव से बनता है। इसी प्रकार जब सूर्य का प्रकाश सीधे हमारी त्वचा पर पड़ता है तो पराबैंगनी किरणों की सहायता से डी-3 (cholecalciferol) का निर्माण होता है। प्राणियों की त्वचा में प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले प्रो-विटामिन-डी (7-dehydrocholesterol) के अणुओं के प्रकाश संश्लेषण से विटामिन डी-3 में परिवर्तित हो जाते हैं। त्वचा की ही तरह जब दूध पर पराबैंगनी किरणें डाली जायें तो दूध में भी समान क्रिया से विटामिन डी-3 बन जाता है। जल में घुलनशील विटामिनों के विपरीत विटामिन डी तैल व वसा में घुलनशील विटामिन है और दूध के द्वारा उसके वसीय सह-उत्पादों में भी सुरक्षित रूप से पहुँच जाता है।

पराबैंगनी प्रकाश संश्लेषण के अतिरिक्त विटामिन डी के निर्माण का कोई दूसरा तरीका नहीं है। यह सभी रीढधारी प्राणियों की आवश्यकता है और उनके शरीर में कैल्शियम के अवशोषण के लिये आवश्यक है। यह हमारी अस्थियाँ, दाँत आदि की संरचना बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पराबैंगनी किरणों की तीव्रता जब उन्हें मापने के पराबैंगनी सूचक (UV index) पैमाने पर 3 से अधिक हो तब त्वचा में इस विटामिन का निर्माण सम्भव है। पहले यह मान्यता थी कि धुर उत्तर व धुर दक्षिण के क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में पराबैंगनी किरणे वर्ष भर नहीं आती हैं परंतु अब यह तय है कि कैनाडा जैसे उत्तरी देश में भी तीव्र शीत के दो-तीन महीनों के अतिरिक्त शेष समय इतनी पराबैंगनी किरणें मिलती हैं कि वर्ष भर की आवश्यकता पूरी की जा सके। तैलीय विटामिन होने के कारण इसकी अधिकता शरीर में सुरक्षित रहती है। भारत के मैदानी क्षेत्रों में तो इस मामले में ईश्वर की विशेष कृपा रही है। समान परिस्थितियों में गहरे रंग की त्वचा के मुकाबले हल्के रंग की त्वचा में अधिक विटामिन डी बनता है।

वयस्क मनुष्य के लिये प्रतिदिन 10,000 आइ यू (International Unit) की मात्रा काफ़ी है। इस आवश्यक मात्रा के लिये सप्ताह में दो बार 5 से 20 मिनट तक हाथ-पैरों पर सूर्यप्रकाश पाना शरीर की आवश्यकता भर के विटामिन डी के लिये काफ़ी है। वस्त्र या सूर्यावरोधी (सनब्लॉक) क्रीम आदि शरीर में विटामिन डी बनने की प्रक्रिया को बाधित करते हैं। साथ ही सूर्य का अधिक सामना त्वचा कैंसर का कारण भी बन सकता है इसलिये यहाँ भी अति के स्थान पर विवेक का प्रयोग आवश्यक है। सूर्य का प्रकाश तो जीवनदायी है ही, विटामिन डी प्राप्त करने के कुछ अन्य सात्विक साधन निम्न हैं:
  • दुग्ध व दुग्ध उत्पाद
  • खमीर व खमीरी उत्पाद
  • स्पाइरुलिना
  • सूर्य से प्रकाशित पोर्टबेला (portabella) कुकुरमुत्ता

अन्य कई शाकाहारी पदार्थ भी उपयोगी हो सकते हैं परंतु इस बारे में अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। वैसे, पश्चिमी देशों में कुछ संस्थायें भेड़ के बालों में उपस्थित तैल (lanolin) से भी पशु को कोई हानि पहुँचाये बिना विटामिन डी प्रसंस्कृत करती हैं। हिंसा से बचिये, शाकाहारी भोजन मनुष्य के शरीर की सम्पूर्णॅ आवश्यकतायें पूरी करने में सक्षम है।

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