शनिवार, 7 जनवरी 2012

अन्न / फल / फूल / कंद / मूल आदि पर आधारित आहार , और चल प्राणियों से प्राप्त आहारों में मूल फर्क क्या है ?

निरामिष शाकाहार प्रहेलिका 2012 पर अपने उत्तर लिख भेजिए
* तुलना *

१. त्या है या नहीं है इस आधार पर
- शाकाहार में हत्या नहीं है (न फल लेने में / न फूल / न सब्जी - क्योंकि ये वस्तुएं पौधे की हत्या किये बिना ही मिलती हैं | इसी तरह न ही अन्न लेने में भी नहीं - क्योंकि अन्न मिलने के लिए काटे जाने से पहले ही वह पौधा अपना जीवन पूरा कर के सूख चूका होता है )
- मांसाहार में हत्या निश्चित है।

२. जो भाग भोजन के लिए मानव लेता है
- वह दोबारा उग सकता है ?
- शाकाहार में - हाँ |
- मांसाहार में - नहीं |

३. यदि मानव उस भाग को मूल जीव (पौधे या चल प्राणी से ) विलग न करे - तो क्या वह स्वयमेव विलग हो जाने वाला है ही समयक्रम में बिना उस प्राणी की मृत्यु के ? 
 - शाकाहार में (फल / फूल / पत्ते ) - हाँ   (श्री गीता जी में कृष्ण कहते हैं - पत्रं /पुष्पं / फलं / तोयं )
- मांसाहार में - नहीं।

४. क्या उस भाग को विलग किया जाना उस जीव को दर्द की और भय की अनुभूति देगा ?
ध्यान दीजिये - दर्द / भय की अनुभूति के लिए यह तर्क दिया जाता है कि पौधों में भी ठीक वैसा ही तंत्रिका तंत्र (neural system)  है - जिससे वे अनुभूति कर पाते हैं -| यह बात सच नहीं है | पेड़ों की तंत्रिका प्रणाली (nerves) एक रोबोट के संवेदक (sensors) की तरह हैं - उनको दर्द / भय / आदि की अनुभूति (feelings) इसलिये नहीं हो सकतीं - क्योंकि उनमे मस्तिष्क (brain) नहीं है्। हम जो भी महसूस करते हैं - वह सिर्फ इन्दिय अवयव (sense organs) और तंत्रिका (nerves) से नहीं | कान सुनते हैं, तंत्रिका (nerves) उस ध्वनि को दिमाग तक ले जाती हैं, किन्तु शब्द को मस्तिष्क (brain) पहचानता है | इसी तरह आँखों का देखना देखना नहीं है - वे सिर्फ दृश्य को रेटिना पर चिन्हित करती हैं - फिर ऑप्टिक नर्व (optic nerve) इस चिन्हित छवि को दिमाग तक ले जाती है - जहां छवि (image) पहचानी जाती है। यह बात सभी इन्द्रियों पर लागू है।| (sight hearing touch taste smell ) | तो दर्द और भय की अनुभूति सिर्फ तंत्रिका तंतु या nerves द्वारा नहीं हो सकती - इसलिए वे जीव जिनमे मस्तिष्क (brain) न हो - वे पीड़ा और भय आदि महसूस नहीं करते। और मस्तिष्क नन्हे से नन्हे चल प्राणी (जैसे कॉकरोच ) में भी होता है , जबकि विशाल से विशाल अचल प्राणी (जैसे बरगद के पेड़ ) में भी नहीं होता।

५. क्या ईश्वर के सृष्टि नियमो के अनुसार वह जीव ईश्वर के प्रदत्त  सौर उर्ज़ा स्रोत (Solar energy source) से सीधा भोजन तैयार कर रहा है - अपनी निजी आवश्यकता से अधिक मात्रा में - जिससे दूसरे जीवों की आहार आवश्यकता पूरी हो सके ?
- पौधे - हाँ  (क्लोरोफिल संश्लेषण- chlorophyll - photosynthesis )
- चल जीव ( बकरे, मुर्गे आदि ) में - नहीं |
{ इस सिद्धांत का मात्र एक अपवाद (exception) है - गौ माता की पीठ में एक "सूर्य केतु नाडी" है , जो गाय के दूध को अमृत जैसे गुण प्रदान करती है }

६. क्या उस जीव द्वारा दिया गया भोजन एक बार लेने के बाद पुनः बन सकता है ?
-- फल फूल पत्तियां - हाँ ,
-- अन्न, कंद, मूल, मांसाहार - नहीं |

किन्तु - ध्यान दिया जाए कि
अन्न - 
(क) आप न भी लें - तो भी वह पौधा उस समय अपना जीवन काल पूर्ण कर के सूख ही चुका है - आपके अन्न लेने या न लेने से उसके जीवनकाल में कोई बदलाव नहीं आएगा , वह फिर से नहीं जियेगा |

(ख) अन्न देने वाले पौधे - जो मूलतः (basically) घास परिवार के हैं - गेंहू, चावल आदि - ये अपने बीज के रूप में अन्न बनाते हैं |

(ग) किन्तु, ये बीज न तो फल में हैं (आम की तरह ) जो इन्हें खाने वाले प्राणी इनके बीजों को कही और पहुंचा सकें, न इनमे उड़ने की शक्ति है कि ये हवा से फैलें , न ही किसी और तरह की फैलने की क्षमता | पौधों के प्रजनन में बीज के होने का जितना महत्व है, उतना ही उसके फैलने का जिससे वह कही और उग सके, या फिर रोपण का - जिससे वह वहीँ उग सके | ( क्योंकि पौधे अचल हैं, वे स्वयं तो कहीं जा कर अपने बीज रोप ही नहीं सकते ) तो - अन्न के जिस पौधे का जो स्थान है - वहीँ उसके बीज गिरेंगे - यदि मनुष्य न ले तो | तो वहीँ एक पौधे के सिर्फ एक ही बीज के पनपने की संभावना है | बाकी बीज वैसे भी - प्राकृतिक रूप से ही - नहीं पनपेंगे | ये पौधे सिर्फ पुनरुत्पत्ति (reproduction) के ही लिए बीज नहीं बनाते हैं - ये प्रजनन संभावना (reproductive possibility) से कई कई गुणा अधिक बीज बनाते हैं | वह इसलिए - कि ईश्वर ने इन्हें दूसरे प्राणियों को ( जो chlorophyll न होने से स्वयं सूर्य किरणों से भोजन नहीं बना सकते ) भोजन मुहैया कराने को ही ऐसा बनाया है कि ये अपनी प्रजनन (reproductive) ज़रुरत से कई गुणा अधिक बीज बनाएं |

(घ) जब उतनी ही जमीन पर उतने ही पौधे उगने हैं, यदि बीज को इंसान ले / या न ले - तो वह तो बीज अन्न रूप में लेकर भी इंसान कर ही रहा है | उतने बीज तो किसान अगले वर्ष की फसल को उतनी जमीन में फिर से बोयेगा ही - और नयी संतति उन पौधों की उतनी जमीन में उतनी ही संख्या में फिर भी उगेगी - जितनी मनुष्य के न लेने पर उगती |

(च) तथाकथित मांसाहार के समर्थक - जो इस आधार (basis) पर तुलना (comparison) करते हैं, वे भी मांसाहार को अन्न के पूरक की तरह नहीं, बल्कि शाक सब्जी के पूरक की तरह इस्तेमाल करते हैं - वे शाक सब्जियां - जो पौधों में पुनः पुनः फलती ही जाती हैं , और पौधे से बिना हत्या / बिना भय / बिना पीड़ा के प्राप्त होती हैं |

७. वह भोजन प्राप्त करने के लिए क्या किसी न किसी मनुष्य को किसी भी रूप में "हत्या / क्रूरता" ( एक चीखते/ रोते / जीवित रहने का प्रयास करते / तड़पते जीव का सर या गला काटना आदि ) करना पड़ा ?
- पौधों में - नहीं (अन्न के पौधे भी काटे जाते हैं - किन्तु तब जब वे पहले ही निर्जीव हो चुके होते हैं )
- चल प्राणियों में - हाँ |

८. कंद मूल आदि - प्याज / आलू / गाजर आदि तो पौधे को जड़ से उखाड़ कर पाए जाते हैं न ?
हाँ - ये सब इसीलिए शुद्ध सात्विक शाकाहार की श्रेणी में नहीं माने जाते | अनेक परम्परागत भारतीय रसोइयों में लहसुन, प्याज आदि कभी घुस नहीं सके है।

९. क्या किसी एक आहार विकल्प (केवल शाकाहार या केवल मांसाहार) पर निर्भर रहते हुए मनुष्य जीवित रह सकता है ?
- शाकाहार - हाँ
- मांसाहार - नहीं।

१०. क्या यह पूर्ण सन्तुलित आहार (complete balanced diet) है - अर्थात - मोटे तौर पर कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, खनिज, विटामिन, रेशे और जल (carbohydrates , fats , proteins , minerals , vitamins , fibre , water) सभी इससे मानव जीवन के लिए पर्याप्त मात्रा में मिल सकते हैं ?
- शाकाहार - सभी पोषक-तत्व संतुलित (nutrients balanced) रूप में मिलते है।|
- मांसाहार - केवल वसा और प्रोटीन (fats and proteins) | अन्य के लिए आपको मांसाहार  के साथ ही शाकाहार लेना ही पड़ेगा | क्योंकि मात्र मांसाहार पर कोई मनुष्य जीवित नहीं रह सकेगा।
ऐसे आहार पर सिर्फ मांसाहारी प्राणी (carnivorous animals) शेर /चीते आदि ही जी सकते हैं , मनुष्य नहीं।

११. क्या इसे पचाने के लिए हमारे पाचन तंत्र (liver / digestive system) पर जोर पड़ता है ? या अन्य प्रणाली - हमारी रक्त धमनियों पर, ह्रदय पर , गुर्दों आदि पर ?
- शाकाहार - नहीं, ये हमारे शारीरिक सिस्टम्स पर बिलकुल अतिरिक्त बोझ नहीं डालता, यह हल्का और सुपाच्य है |
- मांसाहार - हाँ - यह शरीर की हर प्रणाली (system) के लिए भारी है।|
शरीर में कोई भी छोटी बड़ी व्याधि आने पर डॉक्टर्स, खिचड़ी / फलों का रस / नारियल पानी (शाकाहारी पदार्थ) लेने को कहेंगे , उसे भी - जो आमतौर पर ये चीज़ें न खाता हो - क्योंकि ये चीज़ें शरीर की पाचन प्रणाली पर भारी नहीं पड़तीं | इससे उलट देखिये - अंडा / मांस / मछली (मांसाहारी चीज़ें ) यदि साधारण तौर पर व्यक्ति खाता भी हो - तो भी बीमारी ( छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारी ) में बंद करने को कहा जायेगा - भले ही कुछ ही दिनों को सही - क्योंकि ये चीज़ें हमारे हर प्रणाली (system) पर भारी पड़ती हैं।

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इन सब के अलावा भी - सात्विकता और तामसिकता का फर्क तो है ही।

यह स्थापित सत्य हैं कि जीव हत्या / जीव पीड़ा / जीव उत्पीडन / जीव क्रूरता के बिना मांसाहारी खाद्य पदार्थ प्राप्त किये ही नहीं जा सकते | मांस हर जीव का शरीर अपनी निजी जीवन यापन की आवश्यकता के लिए और उतनी मात्रा में ही बनाता है - दूसरे प्राणियों के लिए अतिरिक्त मात्रा में नहीं बनाता, मांस ले लिए जाने पर भी अपना जीवन निर्बाध रूप से जी ही नहीं सकता | ......... जबकि पौधे सूर्य की किरणों से - अपनी निजी आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में, पुनः पुनः भोजन बना सकते हैं, और बिना स्वयं के (उस पौधे के) प्रति किसी भी प्रकार की जैविक नकारात्मक साइड इफेक्ट( negative side effects) के वह सूर्य किरणों से बनाया गया भोजन देने के में सक्षम हैं। उनका बनाया भोजन मनुष्य ले या न ले - इससे न उन पौधों के जीवन की अवधि पर असर पड़ता है, और न ही उन्हें किसी प्रकार की कोई पीड़ा महसूस होती है।


लेखक - शिल्पा मेहता 

21 टिप्‍पणियां:

  1. शिल्पा जी,
    शाकाहार और मांसाहार के अंतर को इंतने स्पष्ट विस्तार से व्याख्यायित करने के लिये आभार। निरामिष पर आपका यह आपका पहला आलेख पढना एक सुखद अनुभव है। आशा है जीवदया के विषय में आपकी लेखनी की प्रखरता का अनुभव भविष्य में भी होता रहेगा। स्वागत और आभार!

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  2. बढ़िया प्रस्तुति...
    आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 09-01-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

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  3. इस बेहद अच्छे आलेख के लिए धन्यवाद.
    मुझे यह डर है कि ऐसे मांसाहारी, जो अभी मानवीय भ्रूण तक खा लेते हैं, कहीं आगे चलकर जीवन के आखिरी दौर में आये हुए अपने ही सम्बन्धियों को ग्रास बनाने लगें यह कहकर कि शरीर का नाश तो होना ही है, तो ऐसे में इन्हें खा लेने में दिक्कत क्या है या फिर लोगों की जनसँख्या बहुत बढ़ रही है लोग रहेंगे कहाँ.
    सवाल यह है कि यदि हम ऐसे तर्कों को स्वीकार कर लेते हैं तो फिर आदमखोर जातियों को लेकर एक अलग व्यवहार क्यों.

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  4. शिल्पा जी,

    बहुत ही सरल सुगम और स्पष्ट विवेचन है। बधाई स्वीकार करें।
    पादप तंत्रिका तंत्र का मिलान रॉबोटिक सेंसर से सटीक सार्थक उदाहरण है।
    सभी 11 बिन्दु न्यायसंगत है। आभार इस लेख की प्रस्तुति के लिए!!

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  5. बरेली से… श्री वत्स जी,

    सही कहा आपनें
    इसीलिए, प्राणहर भक्षण मनोवृति स्वयं मानव अस्तित्व के लिए खतरनाक है। मानव में सम्वेदानाओं का स्थायित्व और करूणा के विकास के लिए शाकाहारी आहार संस्कृति पर संयमित रहना आवश्यक है।

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  6. @ निरामिष जी, स्मार्ट इंडियन जी - इसे शामिल करने, और पसंद करने के लिए आभार आपका |

    @बरेली से श्री वत्स जी, सुज्ञ जी , बिलकुल सच कह रहे हैं | आवश्यक है की हम अपनी संवदनाओं को - मानवीय संवेदनाओं को - जीवित रखें | जीव हिंसा, क्रूरता और हत्या जैसे कृत्यों का सामान्यीकरण करने का अमानवीय प्रयास न करें | आवश्यक है की हम अपनी पूरी शक्ति के साथ इन प्रवृत्तियों को अस्वीकार करें, इनका विरोध करें और इन्हें ह्रदय से धिक्कारें | यह भी की सात्विक आहार और संयम करें |

    @ प्रवीण पाण्डेय जी - आपका बहुत आभार | आपको बहुत समय से पढ़ती आ रही हूँ, किन्तु यह पहली बार आपकी टिप्पणी मिलने का सौभाग्य हुआ है | :) |

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  7. आपने विज्ञानं के नियमों पर आधारित सार्थक लेख के माध्यम से कुछ बेहद प्रचलित भ्रांतियों को दूर किया है उसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है. आपको इस लेख के लिए साधुवाद, आभार!
    एक बात और .... पिछली पोस्ट 'निरामिष शाकाहार प्रहेलिका २०१२' में मेरा नाम बड़े सम्मान के साथ लिए गया है. इसके लिए भी निरामिष टीम को ह्रदय से आभार. निरामिष टीम को वर्ष २०१२ के लिए बधाई और शुभकामनाएं . ईश्वर आपकी कोशिशों को सफल बनाएं. ऐसी कामना है. धन्यवाद!

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  8. शाकाहार हमेशा से मांसाहार पर भारी है . सार्थक पोस्ट.

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  9. शाकाहार और मांसाहार पर तार्किक विश्लेषण अच्छा लगा .
    वैसे मैंने पढ़ा था की पेड़ पौधे भी जब उनको काटा जाता है तो कांपते हैं ..और जब पानी दिया जाता है तो खुश होते हैं .. भले ही उनके पास दिमाग ( ब्रेन ) नहीं है ..

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  10. इतनी बारीकी से आपने अंतर स्पष्ट किये हैं कि उन्हें कहीं से भी कुतर्क की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता.. जैसा कि लोग निरामिषों के विरोध में देते आये हैं!!

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  11. पेड पौधे भी हमारी तरह डर, खुशी और भय महसूस करते हैं, यह बात आज से बीसियों साल पहले डॉ0 जगदीश चंद्र बसु प्रमाणित कर चुके हैं। क्रेस्‍कोग्राफ के द्वारा उनकी संवेदानाओं को भलीभांति देखा और परखा जा सकता है। मैंने इसी आधार पर दो विज्ञान कथाएं भी लिखी हैं। यदि आप कहें तो आपको मेल कर सकता हूं।

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    मुई दिल्‍ली की सर्दी..
    ... बुशरा अलवेरा की जुबानी।

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  12. डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ जी,

    अगर उपलब्ध करवा सकते है तो 'विज्ञान कथा' नहीं, आपके कहे अनुसार "पेड पौधे भी 'हमारी तरह' डर, खुशी और भय महसूस करते है" इस शोध को जो मान्यवर महान वनस्पतिशास्त्री डॉ0 जगदीश चंद्र बसु नें की हो, और विज्ञान द्वारा मान्यताप्राप्त व प्रमाणीक हो वह शोध-पत्र उपलब्ध करवाएँ। ध्यान रहे वह शोध नहीं जिसमें मात्र साबित किया गया है कि "पेड-पौधों में भी जीवन होता है" यह तथ्य तो मान्य है। हमें "पेड-पौधे भी खुशी, भय व सम्वेदनाएँ महसुस करते है" यह विज्ञान प्रमाणीक शोध-पत्र वांछित है। और सम्भव हो तो क्रेस्‍कोग्राफ की कार्यविधि और परिणामों की विज्ञान स्वीकार्यता पर प्रकाश डालें।

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  13. उनको दर्द / भय / आदि की अनुभूति (feelings) इसलिये नहीं हो सकतीं - क्योंकि उनमे मस्तिष्क (brain) नहीं है्।

    यह सही तर्क नही है। केंचुए मे मस्तिष्क नही होता, लेकिन उसे दर्द / भय / आदि की अनुभूति होती है। अमीबा, बैक्टेरीया जैसे एक कोशीय जीव मे मस्तिष्क नही होता लेकिन उनपर यह तर्क लागु नही कर सकते !

    जगदिशचंद्र बोस के कार्यो से संबधित कड़ीया
    http://www.archive.org/stream/sirjagadisbose00geddrich#page/146/mode/2up
    http://www.archive.org/stream/sirjagadisbose00geddrich#page/96/mode/2up

    मेरी टिप्पणी को मांसाहार के समर्थन मे ना लीया जाये!

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  14. @यह सही तर्क नही है। केंचुए मे मस्तिष्क नही होता, लेकिन उसे दर्द/ भय/ आदि की अनुभूति होती है। अमीबा, बैक्टेरीया जैसे एक कोशीय जीव मे मस्तिष्क नही होता लेकिन उनपर यह तर्क लागु नही कर सकते!

    आपका आशय समझते हुए मैं इतना ही जोड़ना चाहूंगा कि मस्तिष्क वाला बिन्दु इस आलेख में वर्णित अन्य बिन्दुओं जितना सार्वभौमिक भले न हो, अपनी सीमाओं के भीतर सही है - शिल्पाजी का आशय शायद यही है कि पौधों की संकेत प्रक्रिया जंतुओं के तंत्रिका तंत्र व मस्तिष्क आदि से बनी सम्वेदना से पूर्णतया भिन्न है और इन दोनों की तुलना करके मांसाहार व शाकाहार को नैतिकता के धरातल पर समान रखने का दावा सही नहीं है। यह सच है कि केंचुए को दर्द/भय आदि की अनुभूति होती है लेकिन उसमें मस्तिष्क होता है भले ही प्रिमिटिव हो। इसी प्रकार अमीबा और बैक्टीरिया इस तर्क-क्षेत्र से इस अर्थ मे बाहर हैं क्योंकि हमारा भोजन नहीं है - हम अपने भोजन के लिये आलू, गोभी की तरह अमीबा/बैक्टीरिया आदि खरीदते, पकाते या खाते नहीं हैं। [हाँ, इस एकाकी रूप से प्रयोग करके तर्क का दुरुपयोग किया जा सकता है, यह सच है - लेकिन वैसा करने वाले तो स्पष्ट कुतर्कों का प्रयोग भी वैज्ञानिक सिद्धांतों जैसे कर रहे हैं।]

    @
    http://www.archive.org/stream/sirjagadisbose00geddrich#page/146/mode/2up

    http://www.archive.org/stream/sirjagadisbose00geddrich#page/96/mode/2up

    बोस के कार्य-प्रबन्ध की कड़ियों के लिये आभार। हमारे बहुत से पाठक इससे लाभ उठा सकेंगे। उन्होने वनस्पतियों में जीवन की बात कही थी परंतु उनके द्वारा प्रस्तावित हर बात सही हो यह ज़रूरी नहीं। उनके अध्ययन में पौधों की आत्मा और निर्जीव तत्वों की सम्वेदना भी शामिल थी।

    @मेरी टिप्पणी को मांसाहार के समर्थन मे ना लीया जाये!
    जी, बिल्कुल ठीक। हम तो आपको पहचानते हैं :)

    आपके आने का धन्यवाद!

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  15. इतनी स्‍पष्‍ट जानकारी के धन्‍यवाद.
    शाकाहार- प्रकृति में शीघ्र अपघटित हो जाता है.
    मांसाहार- प्रकृति में शीर्घ अप‍घटित नहीं होता है. अन्‍य माध्‍यम की आवश्‍यकता पड़ती है

    वैसे भी कुल मिलाकर शाकाहार जिसमें कम से कम कष्‍ट हो. जबकि मांसाहार में अधिकतम कष्‍ट होता है

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  16. कुछ भी हो - मांसाहार मनुष्यो के लिए नहीं है. दुर्गा सप्तशती में भी माँ दुर्गा ने बताया है की होंठ से पानी पिने वाले जीव जैसे गाय हिरन मानव आदि मांसाहारी नहीं होने चाहिए। जबकि जीभ से चाटकर पानी पिने वाले ( शेर, कुत्ता, बिल्ली आदि) मांसाहारी जानवर होते है। यदि इसका ध्यान सभी जीव रखें तो प्रकृति का संतुलन बना रहेगा .

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  17. जानकारीपूर्ण लेख... साधुवाद

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