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सोमवार, 9 अप्रैल 2012

आहार ही औषध - फ़ल-चिकित्सा


फ़ल-चिकित्सा:फ़लों से करें रोग निवारण.

यह तो प्रायः सभी जानते हैं कि फ़ल और सब्जियां सबसे अच्छे भोज्य पदार्थ हैं।अत: भोजन में इनको ज्यादा से ज्यादा शामिल करना अच्छे स्वास्थ के लिये बेहद जरूरी है। यहां मैं उन लोगों के लिये जो विभिन्न प्रकार के रोगों से संघर्ष करते हुए जीवन जी रहे हैं ,रोगों के अनुसार फ़लों व सब्जियों से चिकित्सा का प्रावधान प्रस्तुत कर रहा हूं। आप आयुर्वेदिक, ऐलोपैथिक, यूनानी जो भी ईलाज ले रहे हों, फ़ल-सब्जी से चिकित्सा का आप अतिरिक्त लाभ उठा सकते हैं। फ़लों और सब्जियों में एन्टिओक्सीडेंट्स पाये जाते हैं। शरीर का इम्यून पॉवर यानी रोग-प्रतिकार क्षमता बढती है।

  • उच्च रक्त चाप:

अंगूर, टमाटर, अखरोट, तरबूज, संतरा, सेवफ़ल, केला, नाशपती, पत्तागोभी, लहसुन, ककडी, नींबू.

  • रक्ताल्पता,एनीमिया,खून की कमी:

टमाटर, संतरा, अंगूर, सेवफ़ल, स्ट्राबेरी,चुकंदर, गाजर, अंजीर, आलूबुखारा, दाख, पालक, शलजम.

  • उच्च कोलेस्टरोल(खराब वाला):

आम, अखरोट, सेवफ़ल, जामुन, गाजर, प्याज, लहसुन, संतरा.

  • हृदय के रोग:

सेवफ़ल, अख्र्रोट, केला, पाएनेपल, तरबूज, नाशपती.

  • लिवर के विकार:

पपीता, नीबू, अंगूर, गाजर, टमाटर, ककडी, चुकंदर.
  • धमनियां कठोर हो जाना:

संतरा, टमाटर, सेवफ़ल, स्ट्राबेरी, अखरोट, केला.

  • मधुमेह,डायबीटीज,शूगर:

टमाटर, तरबूज, नाशपती, अमरूद, खट्टे फ़ल.

  • छोटी आंत में पीडा,मरोड,दर्द:

अंगूर टमाटर, सेवफ़ल, केला, अमरूद, पाईनेपल.

  • खांसी:

अंगूर, सेवफ़ल, स्ट्राबेरी, नाशपती, पाईनेपल, गाजर, नींबू.प्याज, पालक, संतरा.

  • अतिसार,दस्त लगना:

सेवफ़ल.

  • बदहजमी:

पपीता, सेवफ़ल, अंगूर, गाजर, चुकंदर, नीबू,संतरा, पाईनेपल, पालक.

  • बवासीर:

सेवफ़ल, केला, अंगूर, संतरा, पपीता, पाईनेपल, गाजर, पालक, शलजम.

  • संधिवात:

अंगूर, सेवफ़ल, गाजर, नींबू, नाशपाती, ककडी, पाईनेपल, टमाटर, लाल मिर्च, संतरा, चुकंदर, पालक.

  • गठिया:

अनानास(पाईनेपल),ककडी,चुकंदर,पालक,टमाटर.

  • दांत की तकलीफ़:

अंगूर, स्ट्राबेरी.

  • चर्म रोग:

सेवफ़ल, टमाटर, पपीता, अखरोट, स्ट्राबेरी.

  • फ़्लू बुखार:

नींबू, पाईनेपल, लोकाट, स्ट्राबेरी.

  • गर्भवती को उल्टी होना:

नाशपती

  • कमर दर्द: 

तरबूज, नाशपती.

  • पीठ दर्द:

तरबूज, नाशपती.

  • मोटापा:

नीबू, संतरा, अंगूर, पाईनेपल, पपीता, चुकंदर, गोभी, टमाटर।
(सेवफ़ल सप्ताह में एक बार आधा लिटर जूस पीयें।)

  • वातव्याधि:

विटामिन" सी" और एंटी ओक्सेडेंट परिपूर्ण फ़लों का सेवन करं।

  • हार्ट अटेक,स्ट्रोक:

रसभरी फ़ल(रास्पबेरी)
जितना भी पचा सकें ,खाएं। इससे धमनी का रक्त दाब घटता है और कोलेस्टरोल की मात्रा भी संतुलित होती हैं।

  • मुख पाक,मुख के संक्रमण:

सतरा, नाशपती, अमरूद.

  • किडनी फ़ेल्योर रोगी: (जो रोगी डायलिसिस पर चल रहे हों उन्हें ककडी का जूस कई महीने देते रहने से डायलिसिस की जरूरत नहीं रहेगी। किडनी एक्टीवेट करने वाला फ़ल है-)

सेवफ़ल, संतरा, नीबू, गाजर,चुकंदर का रस भी उपयोगी हैं।

  • बुढापा रोकने वाले फ़ल:

सेवफ़ल, पत्तागोभी, ब्रोकली,जामुन, आंवला, लहसुन, अंगूर, मूली, पालक, टमाटर.

  • दमा,अस्थमा:

गाजर, संतरा, नाशपाती, लाल मिर्च.

  • सर्दी,जुकाम:

लहसुन, गाजर, पत्तागोभी, नीबू, प्याज, संतरा,स्ट्रॉबेरी, पाईनेपल.

  • कब्ज:

गाजर, पत्तागोभी, अंजीर, अंगूर, संतरा, पपीता, आलूबुखारा, कद्दू, चुकंदर, सेवफ़ल, शलजम.

  • चेहरे पर कील,मुहासे:

आम, गाजर, अंगूर, संतरा, तरबूज, प्याज, कद्दू, पालक, स्ट्राबेरी.

  • ब्लाडर,मूत्राषय समस्याएं:

नीबू, ककडी, गाजर, सेवफ़ल.

  • नींद की कमी,निद्राल्पता:

नीबू, गाजर, अंगूर, सेवफ़ल.

  • पीलिया:

नीबू, गाजर, नाशपाती, अंगूर, पालक, चुकंदर, ककडी, पपीता.

  • नाडी मंडल का दर्द,न्यूराईटीज:

पाईनेपल, सेवफ़ल, गाजर, चुकंदर, संतरा.

  • मासिक धर्म के विकार:

आलू बुखारा, शलजम, चुकंदर, पालक, अंगूर.

  • एक्जीमा:

गाजर, लाल अंगूर, पालक, ककडी, चुकंदर.

  • सिर दर्द:

नीबू, गाजर, अंगूर, पालक.

  • मिर्गी रोग,एपिलेप्सी:

पालक, अंजीर, गाजर, लाल अंगूर.

  • किडनी विकार:

सेवफ़ल, नीबू,संतरा, ककडी, गाजर, चुक्कंदर.
  • पेट के अल्सर:

अंगूर, गोभी, गाजर.

  • गले के विकार:

नीबू, संतरा, पाईनेपल, गाजर, मूली, पालक, आलूबुखारा, टमाटर, प्याज.

लेखक - डॉ. दयाराम आलोक,
लेखक परिचय  

डॉ. दयाराम आलोक,
एम.ए., आयुर्वेद रत्न,D.I.Hom(London), व्यवसाय-हर्बल चिकित्सा।

आप विशेषत: गुर्दे एवं पित्ताशय की पथरी और प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र बाधा की चिकित्सा में सलग्न है। समाजसेवा के कार्य में विशेष गरीब परिवारों की कन्याओं के लिये स्ववित्तपोषित नि:शुल्क समूह विवाह के आयोजन करते है। आप ‘अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ.’ के संचालक है। इन्टरनेट पर सामाजिक, स्वास्थ्य विषयक एवं कविता के ब्लॉग लिखना इनकी प्रधान रुचियों में से है।
प्रमुख ब्लॉग :

रविवार, 8 जनवरी 2012

शाकाहार क्यों? कुछ विचार

आधुनिक विज्ञान के मुताबिक जब मानव का विकास हुआ (एक कोशिकीय जीव, बहु कोशिकीय जीव और इसी तरह आगे) तब वह सभ्यता-संस्कृति विहीन जीव था। मतलब अन्य प्राणियों की तरह, उसका एक मात्र ध्येय था अपने जीवन की, अपने प्राण की रक्षा। एक ऐसे प्राणी से, जिसके मस्तिष्क में केवल अपने जीवन-यापन हेतु खाने और रहने की समझ है, क्या अपेक्षा की जा सकती है? स्पष्ट है कि जब मानव प्रागैतिहासिक युग में था तो उसके पास खाने को लेकर सीमित विकल्प थे। कालांतर में जैसे जैसे मानव सभ्यता की तरफ बढा, उसने पत्थर से धातु की तरफ कदम रखा, जब उसने आग की खोज की, पहिये का अविष्कार किया और खेती का, तो फिर उसके तौर तरीके भी बदल गए। जहाँ पहले वह प्रकृति के अन्य जीवों की देखादेखी मांस और प्रकृति दत्त कंद मूल पर निर्भर रहता था, अब वह अन्न उपजाने लगा। मतलब यह कि जैसे जैसे मानवीय सभ्यता आगे की तरफ बढ़ी, शाकाहार का प्रचलन बढ़ने लगा।

शिल्पा मेहता जी ने पिछले आलेख में शाकाहार और मांसाहार से जुड़ी तमाम भ्रांतियों पर ज्ञानवर्धक जानकारी दी है। माँसाहार के समर्थन में कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि इन जानवरों को काटा न जाए तो ये पूरी जमीन पर काबिज हों जायेंगे। क्या ऐसा ही कुछ मनुष्यों के बारे में भी कहा जा सकता है? शेर को तो नहीं काटा जाता (यद्यपि शिकार काफी हुआ है) लेकिन फिर भी शेरों की संख्या इतनी नहीं बढ़ गयी कि पूरी पृथ्वी को घेर लेते। भारत के संदर्भ में यही बात मक्खी - मच्छरों के सन्दर्भ में कही जा सकती है। खूब होते हैं लेकिन फिर भी पृथ्वी को इतना न घेर सके कि मानव को रहने के लिए ही जगह न बचे। कुछ दिनों पहले एक चैनल पर एक कार्यक्रम आ रहा था जिसमें भ्रूण (जानवरों के) को भोजन के बतौर प्रयोग के बारे में दिखाया जा रहा था। एक देश के बारे में समाचारपत्र में पढ़ा था कि वहाँ मानव भ्रूण भी बिकते हैं। क्या माँसाहारी व्यक्ति भी अपने साथ ऐसा व्यवहार  स्वीकार कर सकते हैं? कदापि नहीं।

क्या ऐसा भी हो सकता है कि हम अपने ही किसी अंग का प्रयोग आहार हेतु कर लें? नहीं। आपातकाल में भी व्यक्ति क्षुधा से तड़प कर मर तो जाता है लेकिन अपने किसी अंग का प्रयोग आहार बतौर नहीं करता। क्यों? यहाँ तक कि जो नरभक्षी जातियों के बारे में पढ़ रखा है वह यह कि वे भी बाहरी लोगों को ही अपना शिकार बनाती हैं न कि अपने ही लोगों को। तर्क और कुतर्क के बीच में एक बड़ी मामूली सी रेखा होती है और यह मानना पड़ेगा कि कुतर्क करने वाला व्यक्ति हमेशा अधिक तैयारी से आता है.(गो का अर्थ हमेशा गाय नहीं होता, जैसे कि मन का अर्थ मस्तिष्क, और तोलने की इकाई होता है, कर का अर्थ करना, टैक्स और हाथ भी होता है)। जितना विविधता पूर्ण आहार शाक-सब्जियों से प्राप्त होता है उतना माँस से नहीं। पोषक तत्वों की विविधता के बारे में भी निरामिष के पिछले लेखों में बताया ही जा चुका है और फिर इस सब के बाद भी मांसाहारी व्यक्ति को भी अन्न की भी आवश्यकता पड़ती है और अन्य शाक-सब्जियों की भी।

सबसे बड़ी बात है हिंसा की - हत्या की। जो व्यवहार हम एक निरीह पशु-पक्षी के साथ करते हैं, क्या उस व्यवहार की कल्पना भी हम अपने बारे में, अपने प्रिय जनों के बारे में कर सकते हैं। क्या हम सोच सकते हैं कि हम खुद या फिर हमारा कोई प्रिय जन किसी नरभक्षी के हाथों उस का ग्रास बने। नहीं, ऐसा हम सोचना भी पसंद नहीं करते। फिर। जरूरत है एक सेकेण्ड थॉट की, स्वयं  को दूसरे की जगह रखकर सोचने की।

शनिवार, 7 जनवरी 2012

अन्न / फल / फूल / कंद / मूल आदि पर आधारित आहार , और चल प्राणियों से प्राप्त आहारों में मूल फर्क क्या है ?

निरामिष शाकाहार प्रहेलिका 2012 पर अपने उत्तर लिख भेजिए
* तुलना *

१. त्या है या नहीं है इस आधार पर
- शाकाहार में हत्या नहीं है (न फल लेने में / न फूल / न सब्जी - क्योंकि ये वस्तुएं पौधे की हत्या किये बिना ही मिलती हैं | इसी तरह न ही अन्न लेने में भी नहीं - क्योंकि अन्न मिलने के लिए काटे जाने से पहले ही वह पौधा अपना जीवन पूरा कर के सूख चूका होता है )
- मांसाहार में हत्या निश्चित है।

२. जो भाग भोजन के लिए मानव लेता है
- वह दोबारा उग सकता है ?
- शाकाहार में - हाँ |
- मांसाहार में - नहीं |

३. यदि मानव उस भाग को मूल जीव (पौधे या चल प्राणी से ) विलग न करे - तो क्या वह स्वयमेव विलग हो जाने वाला है ही समयक्रम में बिना उस प्राणी की मृत्यु के ? 
 - शाकाहार में (फल / फूल / पत्ते ) - हाँ   (श्री गीता जी में कृष्ण कहते हैं - पत्रं /पुष्पं / फलं / तोयं )
- मांसाहार में - नहीं।

४. क्या उस भाग को विलग किया जाना उस जीव को दर्द की और भय की अनुभूति देगा ?
ध्यान दीजिये - दर्द / भय की अनुभूति के लिए यह तर्क दिया जाता है कि पौधों में भी ठीक वैसा ही तंत्रिका तंत्र (neural system)  है - जिससे वे अनुभूति कर पाते हैं -| यह बात सच नहीं है | पेड़ों की तंत्रिका प्रणाली (nerves) एक रोबोट के संवेदक (sensors) की तरह हैं - उनको दर्द / भय / आदि की अनुभूति (feelings) इसलिये नहीं हो सकतीं - क्योंकि उनमे मस्तिष्क (brain) नहीं है्। हम जो भी महसूस करते हैं - वह सिर्फ इन्दिय अवयव (sense organs) और तंत्रिका (nerves) से नहीं | कान सुनते हैं, तंत्रिका (nerves) उस ध्वनि को दिमाग तक ले जाती हैं, किन्तु शब्द को मस्तिष्क (brain) पहचानता है | इसी तरह आँखों का देखना देखना नहीं है - वे सिर्फ दृश्य को रेटिना पर चिन्हित करती हैं - फिर ऑप्टिक नर्व (optic nerve) इस चिन्हित छवि को दिमाग तक ले जाती है - जहां छवि (image) पहचानी जाती है। यह बात सभी इन्द्रियों पर लागू है।| (sight hearing touch taste smell ) | तो दर्द और भय की अनुभूति सिर्फ तंत्रिका तंतु या nerves द्वारा नहीं हो सकती - इसलिए वे जीव जिनमे मस्तिष्क (brain) न हो - वे पीड़ा और भय आदि महसूस नहीं करते। और मस्तिष्क नन्हे से नन्हे चल प्राणी (जैसे कॉकरोच ) में भी होता है , जबकि विशाल से विशाल अचल प्राणी (जैसे बरगद के पेड़ ) में भी नहीं होता।

५. क्या ईश्वर के सृष्टि नियमो के अनुसार वह जीव ईश्वर के प्रदत्त  सौर उर्ज़ा स्रोत (Solar energy source) से सीधा भोजन तैयार कर रहा है - अपनी निजी आवश्यकता से अधिक मात्रा में - जिससे दूसरे जीवों की आहार आवश्यकता पूरी हो सके ?
- पौधे - हाँ  (क्लोरोफिल संश्लेषण- chlorophyll - photosynthesis )
- चल जीव ( बकरे, मुर्गे आदि ) में - नहीं |
{ इस सिद्धांत का मात्र एक अपवाद (exception) है - गौ माता की पीठ में एक "सूर्य केतु नाडी" है , जो गाय के दूध को अमृत जैसे गुण प्रदान करती है }

६. क्या उस जीव द्वारा दिया गया भोजन एक बार लेने के बाद पुनः बन सकता है ?
-- फल फूल पत्तियां - हाँ ,
-- अन्न, कंद, मूल, मांसाहार - नहीं |

किन्तु - ध्यान दिया जाए कि
अन्न - 
(क) आप न भी लें - तो भी वह पौधा उस समय अपना जीवन काल पूर्ण कर के सूख ही चुका है - आपके अन्न लेने या न लेने से उसके जीवनकाल में कोई बदलाव नहीं आएगा , वह फिर से नहीं जियेगा |

(ख) अन्न देने वाले पौधे - जो मूलतः (basically) घास परिवार के हैं - गेंहू, चावल आदि - ये अपने बीज के रूप में अन्न बनाते हैं |

(ग) किन्तु, ये बीज न तो फल में हैं (आम की तरह ) जो इन्हें खाने वाले प्राणी इनके बीजों को कही और पहुंचा सकें, न इनमे उड़ने की शक्ति है कि ये हवा से फैलें , न ही किसी और तरह की फैलने की क्षमता | पौधों के प्रजनन में बीज के होने का जितना महत्व है, उतना ही उसके फैलने का जिससे वह कही और उग सके, या फिर रोपण का - जिससे वह वहीँ उग सके | ( क्योंकि पौधे अचल हैं, वे स्वयं तो कहीं जा कर अपने बीज रोप ही नहीं सकते ) तो - अन्न के जिस पौधे का जो स्थान है - वहीँ उसके बीज गिरेंगे - यदि मनुष्य न ले तो | तो वहीँ एक पौधे के सिर्फ एक ही बीज के पनपने की संभावना है | बाकी बीज वैसे भी - प्राकृतिक रूप से ही - नहीं पनपेंगे | ये पौधे सिर्फ पुनरुत्पत्ति (reproduction) के ही लिए बीज नहीं बनाते हैं - ये प्रजनन संभावना (reproductive possibility) से कई कई गुणा अधिक बीज बनाते हैं | वह इसलिए - कि ईश्वर ने इन्हें दूसरे प्राणियों को ( जो chlorophyll न होने से स्वयं सूर्य किरणों से भोजन नहीं बना सकते ) भोजन मुहैया कराने को ही ऐसा बनाया है कि ये अपनी प्रजनन (reproductive) ज़रुरत से कई गुणा अधिक बीज बनाएं |

(घ) जब उतनी ही जमीन पर उतने ही पौधे उगने हैं, यदि बीज को इंसान ले / या न ले - तो वह तो बीज अन्न रूप में लेकर भी इंसान कर ही रहा है | उतने बीज तो किसान अगले वर्ष की फसल को उतनी जमीन में फिर से बोयेगा ही - और नयी संतति उन पौधों की उतनी जमीन में उतनी ही संख्या में फिर भी उगेगी - जितनी मनुष्य के न लेने पर उगती |

(च) तथाकथित मांसाहार के समर्थक - जो इस आधार (basis) पर तुलना (comparison) करते हैं, वे भी मांसाहार को अन्न के पूरक की तरह नहीं, बल्कि शाक सब्जी के पूरक की तरह इस्तेमाल करते हैं - वे शाक सब्जियां - जो पौधों में पुनः पुनः फलती ही जाती हैं , और पौधे से बिना हत्या / बिना भय / बिना पीड़ा के प्राप्त होती हैं |

७. वह भोजन प्राप्त करने के लिए क्या किसी न किसी मनुष्य को किसी भी रूप में "हत्या / क्रूरता" ( एक चीखते/ रोते / जीवित रहने का प्रयास करते / तड़पते जीव का सर या गला काटना आदि ) करना पड़ा ?
- पौधों में - नहीं (अन्न के पौधे भी काटे जाते हैं - किन्तु तब जब वे पहले ही निर्जीव हो चुके होते हैं )
- चल प्राणियों में - हाँ |

८. कंद मूल आदि - प्याज / आलू / गाजर आदि तो पौधे को जड़ से उखाड़ कर पाए जाते हैं न ?
हाँ - ये सब इसीलिए शुद्ध सात्विक शाकाहार की श्रेणी में नहीं माने जाते | अनेक परम्परागत भारतीय रसोइयों में लहसुन, प्याज आदि कभी घुस नहीं सके है।

९. क्या किसी एक आहार विकल्प (केवल शाकाहार या केवल मांसाहार) पर निर्भर रहते हुए मनुष्य जीवित रह सकता है ?
- शाकाहार - हाँ
- मांसाहार - नहीं।

१०. क्या यह पूर्ण सन्तुलित आहार (complete balanced diet) है - अर्थात - मोटे तौर पर कार्बोहाइड्रेट, वसा, प्रोटीन, खनिज, विटामिन, रेशे और जल (carbohydrates , fats , proteins , minerals , vitamins , fibre , water) सभी इससे मानव जीवन के लिए पर्याप्त मात्रा में मिल सकते हैं ?
- शाकाहार - सभी पोषक-तत्व संतुलित (nutrients balanced) रूप में मिलते है।|
- मांसाहार - केवल वसा और प्रोटीन (fats and proteins) | अन्य के लिए आपको मांसाहार  के साथ ही शाकाहार लेना ही पड़ेगा | क्योंकि मात्र मांसाहार पर कोई मनुष्य जीवित नहीं रह सकेगा।
ऐसे आहार पर सिर्फ मांसाहारी प्राणी (carnivorous animals) शेर /चीते आदि ही जी सकते हैं , मनुष्य नहीं।

११. क्या इसे पचाने के लिए हमारे पाचन तंत्र (liver / digestive system) पर जोर पड़ता है ? या अन्य प्रणाली - हमारी रक्त धमनियों पर, ह्रदय पर , गुर्दों आदि पर ?
- शाकाहार - नहीं, ये हमारे शारीरिक सिस्टम्स पर बिलकुल अतिरिक्त बोझ नहीं डालता, यह हल्का और सुपाच्य है |
- मांसाहार - हाँ - यह शरीर की हर प्रणाली (system) के लिए भारी है।|
शरीर में कोई भी छोटी बड़ी व्याधि आने पर डॉक्टर्स, खिचड़ी / फलों का रस / नारियल पानी (शाकाहारी पदार्थ) लेने को कहेंगे , उसे भी - जो आमतौर पर ये चीज़ें न खाता हो - क्योंकि ये चीज़ें शरीर की पाचन प्रणाली पर भारी नहीं पड़तीं | इससे उलट देखिये - अंडा / मांस / मछली (मांसाहारी चीज़ें ) यदि साधारण तौर पर व्यक्ति खाता भी हो - तो भी बीमारी ( छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी बीमारी ) में बंद करने को कहा जायेगा - भले ही कुछ ही दिनों को सही - क्योंकि ये चीज़ें हमारे हर प्रणाली (system) पर भारी पड़ती हैं।

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इन सब के अलावा भी - सात्विकता और तामसिकता का फर्क तो है ही।

यह स्थापित सत्य हैं कि जीव हत्या / जीव पीड़ा / जीव उत्पीडन / जीव क्रूरता के बिना मांसाहारी खाद्य पदार्थ प्राप्त किये ही नहीं जा सकते | मांस हर जीव का शरीर अपनी निजी जीवन यापन की आवश्यकता के लिए और उतनी मात्रा में ही बनाता है - दूसरे प्राणियों के लिए अतिरिक्त मात्रा में नहीं बनाता, मांस ले लिए जाने पर भी अपना जीवन निर्बाध रूप से जी ही नहीं सकता | ......... जबकि पौधे सूर्य की किरणों से - अपनी निजी आवश्यकता से कहीं अधिक मात्रा में, पुनः पुनः भोजन बना सकते हैं, और बिना स्वयं के (उस पौधे के) प्रति किसी भी प्रकार की जैविक नकारात्मक साइड इफेक्ट( negative side effects) के वह सूर्य किरणों से बनाया गया भोजन देने के में सक्षम हैं। उनका बनाया भोजन मनुष्य ले या न ले - इससे न उन पौधों के जीवन की अवधि पर असर पड़ता है, और न ही उन्हें किसी प्रकार की कोई पीड़ा महसूस होती है।


लेखक - शिल्पा मेहता