रविवार, 1 जुलाई 2012

भोजन में क्रूरता: 1. प्रस्तावना - फ़ोइ ग्रा

[आलेख: शिल्पा मेहता]

सभी जीवदया युक्त बंधुओं को बधाई! क्यों? क्योंकि आज, एक जुलाई 2012, से अमेरिका के केलिफोर्निया ( California USA ) प्रदेश में "Foie gras" [फोई ग्रा] यानी कलहंस और बत्तख़ (goose और duck) पक्षी को बेहद दर्दनाक बीमारी वसीय यकृत व्याधि (fatty liver disease) से बीमार बना कर, उनके सूजे हुए यकृत (लीवर liver) से बनाया जाने वाला स्पेशल "स्वादिष्ट व्यंजन", प्रतिबन्धित कर दिया जाएगा। 

इससे पहले ब्रिटेन, जर्मनी, जेक रिपब्लिक, इजरायल, इटली और स्वितज़रलैंड आदि 16 देशों में यह प्रतिबन्धित किया जा चुका था। दुर्भाग्य से यह अब तक भारत में प्रतिबन्धित नहीं है।

यह श्रंखला ख़ास तौर पर सामिष मित्रों के लिए बना रही हूँ, वे कृपया इसे पढ़ें। यदि इसे पढ़ कर भी आप अपना भोजन न बदलना चाहें, तो कोई बात नहीं। परंतु यह जान तो लीजिये कि यह भोजन बन कैसे रहा है? जो पहले से निरामिष हैं - उनसे यहाँ की जानकारी अपने अपने सामिष मित्रों तक पहुंचाने की प्रार्थना करती हूँ। 

यह विडियो या चित्र देखना दुखदायी हो सकता है - इसे पढना भी - किन्तु याद रखिये - भारत में यह अभी तक प्रतिबन्धित नहीं हुआ है, यदि हमें यह रुकवाना है - तो पहले इस प्रक्रिया को जान लेना आवश्यक है। यह पढ़ कर आपको जो तकलीफ होगी, उसके लिए क्षमा कीजियेगा मुझे। लिखने में मुझे भी उतनी ही तकलीफ हो रही है। यदि यह पोस्ट पढ़ कर एक भी व्यक्ति आज से यह तथाकथित "delicacy" खाना छोड़ देगा, तो यह लिखना सफल हो जाएगा मेरे लिए। 

इस मौके पर मैं यह कहना चाहूंगी कि प्रतिबन्ध का यह कदम अचानक नहीं उठाया गया। आठ साल से यह क़ानून बन गया था कि यह बंद हो, सन 2004 में यह क़ानून पारित हुआ था। रेस्त्रौं मालिकों आदि को आठ साल का समय दिया गया इसे बंद कर के वैकल्पिक डिशेज़ डेवलप करने के लिए। एक जुलाई के बाद यह परोसने पर रेस्त्रौं मालिक को हर दिन 1000 डॉलर का जुर्माना भरना होगा।

लेकिन यह निर्णय लिया क्यों गया? यह हम निरामिष सदस्यों के लिए भी जानना आवश्यक है, और अपने सामिष मित्रों तक पहुंचाना भी आवश्यक है - कि  यह प्रतिबन्धित किया क्यों गया?

यह प्रतिबन्धित इसलिए किया गया कि यह "स्वादिष्ट व्यंजन"  प्राप्त करने के लिए बेचारी बेबस चिड़ियों (ducks and geese) पर इतनी अधिक क्रूरता होती है - कि हम कंस आदि को इसके मुकाबले शायद दयालु कहें :(

यह प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि वह चिड़िया "fatty liver disease " से ग्रस्त हो। उसका यकृत हम मनुष्यों को होने वाली श्वेत पीलिया (white jaundice) जैसी ही एक बीमारी से खराब हो कर सूज जाए - और उस बीमारी के भयानक दर्द में भी वह बेचारी तड़पती चिड़िया तब तक जीवित रहे जब तक उसका लीवर सूजते-सूजते इतना बड़ा न हो जाए, कि हमें अपनी "पसंदीदा स्वादिष्ट डिश" में परोसे जाने योग्य मात्रा में मांस मिले :( । इस पूरे आलेख में कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, बल्कि साधारण शब्दों में उस "normal" प्रक्रिया का वर्णन है जो इसे प्राप्त करने के लिए होती है।)

तो यह कैसे किया जाता है? (यहाँ एक  लिंक भी दे रही हूँ, यूट्यूब का - जिसमे यह प्रक्रिया दिखाई गयी है।) चेतावनी है - यदि आप यह विडियो या चित्र भी देखेंगे, तो शायद आप 2-3 रातों तक सो न सकें। जो यह विडियो नहीं देखना चाहें - वे चाहें तो यहाँ (इस लिंक पर) कुछ चित्र देख सकते हैं। जो चित्र भी न देखना चाहें,  वे यहाँ नीचे दिए शब्दों को पढ़ कर उन तड़पती हुई हजारों लाखों चिड़ियों के दर्द को समझने के प्रयास करें, और मैं प्रार्थना करूंगी कि इस श्रंखला में "मांसाहारी भोजन की प्राप्ति" पर मैं जो जानकारी दूं - वह अपने सामिष मित्रों तक पहुंचाएं। अनेक मांसाहारी लोग जानते ही नहीं कि हो क्या रहा है परदे के पीछे। इस श्रंखला के हर लेख में मैं अलग अलग मांसाहारी भोजन के बारे में बात करूंगी। चिकन (अंडे भी), बीफ, पोर्क, फिश आदि।

Foie Gras Recipe, फोई ग्रा बनाने की विधि

 जैसा कि हम जानते ही हैं, हम में से अधिकतर लोगों ने देखा है - बत्तख (ducks) खुले वातावरण में कैसे जीते हैं। ये उड़ना पसंद करते हैं, तैरते हैं, झुण्ड में एक दूसरे से बातें करते सामाजिक व्यवहार करते है, अपनी चोंच से अपने आप को साफ़ रखते हैं, और यहाँ तक कि अपने घोंसले भी बिलकुल साफ़ रखते हैं। लेकिन इन्हें इन  "Foie gras" के farms पर कैसा जीवन जीना पड़ता है - आइये समझते हैं। PETA के लोग इसे प्रतिबन्धित करने के लिए ताज और ओबेरॉय जैसे बड़े होटलों से अनुरोध करते आ रहे हैं। यदि आप चाहें तो गूगल सर्च में "Foie gras india" भर कर खोज करें, जानकारी मिलेगी। वहां इसे बंद कराने की याचिका (petition) हस्ताक्षरित करने के लिंक भी मिलेंगे आपको। मदद करना चाहें तो याचिका हस्ताक्षरित करें।

1.
एक तो बत्तख़ों को इस बीमारी से ग्रस्त कराने के लिए इन्हें इनकी पाचन शक्ति से कई गुना अधिक खाना खिलाना आवश्यक है।  जाहिर है - अपने मन से तो ये नहीं खायेंगे - तो इन्हें - पैदाइश के 6-8 हफ्ते बाद से ही - बिलकुल नन्ही नन्ही चिडियाओँ को - दिन में तीन बार, एक धातु की नली (metal pipe ) गले के अन्दर डाल कर करीब तीन से पांच पाउंड वसा व अनाज (fat and grain ) सीधे इनके पेट में पम्प किया जाता है। इनके बदन के वजन से एक तिहाई वजन अन्न - सीधे पेट में।

इसे ऐसे समझें - 5 पौंड यानी कितना? एक नवजात मानव शिशु का जन्म वजन करीब 5-6 पौंड होता है। सोचिये - इतना भोजन एक नन्ही सी बत्तख को - जो अभी सिर्फ 2 महीने की है - रोज़ जबरदस्ती खिलाया जाना, कितना दर्दनाक होगा?  इन्सान के शरीर का वजन यदि 60 किलो है, तो समझिये 20 किलो पास्ता या कोई अन्य भारी (हमारे पाचन यंत्र के लिए भारी - उन पक्षियों के लिए यह उतना ही भारी भोजन है) बिना चबाये सीधे पेट में पम्प किया जा रहा है - हर दिन - फिर अगले दिन - फिर अगले दिन। हम तो नूडल्स खाने में भी कहते हैं, कि मैदा है, पेट दुखेगा। और कितना खाते हैं हम नूडल्स? दिन में शायद 200 ग्राम - और वह भी शायद हफ्ते में एक बार। 

लेकिन इन बेचारी चिड़ियों को तो यह खिलाया ही इसलिए जा रहा है, कि उनका पेट दुखे, न सिर्फ दुखे, बल्कि तड़पने की हद तक दुखे।

परन्तु यदि ये तड़पते हुए हिलेंगी, तो व्यायाम होगा और इनकी बीमारी उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ेगी, तो इन्हें इतने छोटे छोटे पिंजरों में रखा जाता है - कि ये हिल भी न सकें। दर्द से तड़पें, परन्तु हिल न पाएं। सोचिये - हमारा पेट दुखता है - तो हम पूरी तरह झुक कर मुड़ जाते हैं, या मुड़े हुए लेट जाते हैं करवट पर अक्सर - परन्तु ये बेचारी चिड़ियाँ वह भी नहीं कर सकती। :(

2. 
यह मेटल ट्यूब अन्दर घुसाना ठीक वैसे ही किया जाता है जैसे आप ऑफिस को लेट होते हुए जल्दी जल्दी अपने मोज़े में पाँव डालते हैं। बत्तख की लम्बी चोंच से, उसकी लम्बी गर्दन से होते हुए पेट तक सीधी मेटल पाइप। और यह पूरा "force feed "सिर्फ 10-15 सेकण्ड में होता है - कितनी तेज़ी से उसे पकड़ा जाता होगा, पाइप घुसाई जाती होगी, किस वेग से वह अन्न उसके नन्हे से पेट में गिराया जाता होगा, और ट्यूब निकाल भी ली जाती होगी। सिर्फ 15 सेकण्ड में यह सब।

अंतर इतना है कि मोज़े को दर्द नहीं होता, चोट नहीं आती, क्योंकि आपका पैर धातु का नहीं बना है, और मोजा एक जीवित प्राणी नहीं है। जिन्होंने कभी भी एंडोस्कोपी (endoscopy)  कराई होगी, वे जानते हैं कि एक ट्यूब को गले से भीतर पेट तक उतारा जाना कितना कष्टकर है। जबकि हमारे डॉक्टर पूरा ध्यान रखते हैं कि हमें दर्द न हो। किन्तु जो वर्कर इन चिड़ियों के मुंह में यह पाइप घुसा रहा है - उसे दिन में हज़ारों बार यह करना है, 10-15 सेकण्ड में एक चिड़िया। तो उसे क्या इनके दर्द का ध्यान रह सकता है?

3.
यह करते हुए उस चिड़िया के गले, मुँह और खाद्य नलिका में चोटें आती हैं, जिससे कई के मुंह से लगातार खून बहता है। और यह चोट ठीक कैसे हो? अगले 6-8 घंटे बाद फिर से एक और पाइप डाली जायेगी, और फिर से, और फिर से, और फिर से .... करीब 40 दिन तक लगातार अत्याचार, torture ... 

गनीमत है की इतने समय में ये इतनी बीमार हो चुकी होती हैं कि इन्हें काटा जाए, मौत तो शायद एक वरदान होती होगी उस स्थिति में। इनका लीवर तब तक अपने normal  आकार से दस गुना तक सूज जाता है - यह चित्र देखिये - साधारण और बीमार लीवर - आकार और रंग दोनों। करीब तीन महीने की उम्र में इन्हें निर्दयता से काट दिया जाता है - और लीवर ले लिए जाता है यह "व्यंजन" बनाने के लिए। तीन महीने का भयानक जीवन!
बढे हुए बीमार यकृत की तुलना स्वस्थ यकृत से
 4. 
इन्हें तंग पिंजरों में बंद कर के रखा जाता है ताकि ये हिल डुल कर व्यायाम न पा सकें और इनके बदन में विषाक्त पदार्थ (toxins) अधिक बनें जिससे ये जल्दी से जल्दी वसीय यकृत व्याधि (fatty liver disease) से ग्रस्त हों। ये उड़ने तैरने की शौक़ीन निरीह चिड़ियाँ - अपने जीवन भर एक बार भी पंख नहीं फैला सकतीं, खुली हवा, और धूप नहीं देख सकतीं। 

5. 
लीवर शरीर की विषाक्त पदार्थों (toxins) को बाहर निकालने के काम में मदद करता है। यदि विषाक्त पदार्थ सफ़ाई की उसकी क्षमता से अधिक हों - तो वह ख़राब होने लगता है। यह बीमारी बहुत दर्दनाक होती है। लीवर सूजते सूजते अपने नोर्मल आकार से दस गुना तक सूज जाता है। यह इतना भारी हो जाता है कि चिड़िया हिल भी नहीं पातीं। इसके अलावा जब लीवर अपना काम करना बंद कर दे, तो इनके शरीर से विषाक्त पदार्थ निकालने की प्रक्रिया ठीक से नहीं हो पाती। विषाक्त पदार्थों की यह वृद्धि अन्य अनेक बीमारियों का कारण बनती है। कई पक्षी इतने भयानक दर्द में होते हैं कि जहां (गले और छाती) तक इनकी चोंच पहुंचे, वहां के पंख उखाड़ देते हैं (जैसे इंसान परेशानी में अपने बाल नोचता है), लेकिन तंग पिंजरे में इनकी गर्दन इनके पूरे शरीर तक नहीं पहुँच सकती। 

6.
अत्यधिक और अस्वाभाविक भोजन करने, और व्यायाम न होने से इन्हें कब्ज होता है, और इनके मलद्वार (anus) सूज कर खून बहने लगता है। अपने साधारण जीवन में साफ़ सफाई से रहने वाली ये चिड़ियाँ (यदि पिंजरे जमीन पर हैं) अपने ही मलमूत्र से सनी हुई एक नन्हे से दुर्गन्धयुक्त पिंजरे में बंद अपना "जीवन (?)" जीती हैं। दूसरे तरह की स्थिति भी है - जहां पिंजरे जाली के हैं (पिंजरे की ज़मीन भी) और हवा में लटके हैं, जिससे मलमूत्र जाली के पार नीच फर्श पर गिरता रह सके। नीचे ज़मीन पर मल मूत्र की ठहरी हुई नदी से हो जाती है, जिसकी उठती दुर्गन्ध में ये सफाई पसंद पक्षी जीते(?) हैं।

7. 
इनके बदन गंदे हो जाते हैं। खुजली भी होती है और कीड़े भी लग जाते हैं। परन्तु पिंजरे में इतनी जगह नहीं कि  ये अपनी चोंच से खुद को साफ़ रख सकें, उन कीड़ों के काटने से खुद को बचा सकें।

8. 
लगातार तारों पर (जमीन पर नहीं - तारों की जाली wire mesh पर) खड़े रहने का जीवन - पंजे ख़राब और दर्दीले हो जाते हैं (हम कभी कभी पथरीली सड़क पर बिना चप्पल पहने जाते हैं - कुछ पलों के लिए) याद रखिये, स्वाभाविक जीवन में बत्तख पानी में तैरते हैं- तो इनके पैर webbed होते हैं, मुर्गी के पंजों की तरह नहीं, बल्कि नाज़ुक झिल्लियों से जुड़े पंजे। और ये तार पर खड़े रहने के लिए नहीं बने हैं।   याद रखिये - इनकी उम्र तीन महीने से भी कम है, अभी ये चूजे ही होते साधारण जीवन में। एक वयस्क पक्षी जितने मजबूत नहीं हुए हैं इनके पैर, परतु इनका वजन एक परिपक्व पक्षी से अधिक है - क्योंकि लीवर सूजा हुआ है। और दिन में चौबीस घंटे खड़े ही रहना है, न चलना है, न उड़ना, न तैरना - तो तारों पर टिके नन्हे पंजों से यह बोझ कभी नहीं हटता।

9. 
ये बुरी तरह बीमार हैं, लीवर इतना भारी है कि  ये हिल भी नहीं सकतीं। चूहे इनके खुले हुए जख्मो को काटते हैं - तो ये मुड़ कर उनसे अपने आप को बचा भी नहीं सकतीं (इस विडिओ में यह दृश्य दिखाया गया है कि एक चूहा पक्षी को काट रहा है - 5-6 सेकण्ड तक, और वह चिड़िया हिली तक नहीं । उसके पेट का दर्द शायद उस चूहे के काटने के दर्द से भी असह्य रहा हो - सोचिये ।

10. 
गले से बहते हुए खून से दम घुट कर यदि चिड़िया मर गयी - और यदि लीवर अभी अच्छे दामों में बेचने योग्य बड़ा न हुआ - तो मालिक का नुकसान होगा न? तो जिनके मुंह से ज्यादा ही खून आ रहा हो (पाइप से की गयी force feeding से आई चोट के कारण) उन्हें पंजो से बाँध कर उल्टा लटका दिया जाता है, जिससे खून साँस को न रोके - बाहर गिरे। लेकिन पाइप डाल कर force feeding अब भी दिन में तीन बार जारी रहती है। यह उसे कितना दर्द देगा - यह सोचने का समय किसी के पास नहीं। यह चोंच से टपकता हुआ खून नीचे की दूसरी चिड़ियों को भिगोता रहता है। :(

11. 
आखिर 3 महीने, सिर्फ 3 महीने की उम्र तक आते आते ये इतनी बीमार हो चुकी होती हैं, कि इन्हें काटा जा सके। तब इन्हें उल्टा लटका कर - पूरे होश में - इनका गला रेता (काटा नहीं - सिर्फ रेता) जाता है - और खून बह कर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, क्योंकि यदि गर्दन काट दी तो वह मर जायगी और दिल नहीं धड़केगा, तो लीवर में खून बचा रहेगा। तब भी शायद यह दर्द कम से कम, रोज़ रोज़ के torture का तो अंत ला ही रहा है इनके लिए :(। 

तीन महीने की उम्र में, अंडे से व्यंजन बनने तक का दर्दनाक सफ़र - ख़त्म हो जाता है। जिस उम्र तक साधारण तौर पर ये अपनी माँ के साथ किसी तालाब आदि में तैरते होते (साधारण परिवेश में अब तक शायद ये उड़ना सीखना शुरू करने वाले होते अपने माँ से)।

अब भी क्या हम कह सकते हैं कि नर्क नहीं होते??

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अगले भाग में - चिकन, अंडे, और पोल्ट्री फार्म पर बात करूंगी।

आप सभी का आभार, और यह पोस्ट पढ़ते हुए आपके मन को जो तकलीफ पहुंचाई, उसके लिए पुनः क्षमा याचना करती हूँ। यदि चाहें - तो  आप भी "Foie gras india" गूगल सर्च कर भारत में इसे बंद करवाने के प्रयासों का हिस्सा बन सकते हैं, online petition sign कर के।

आभार।

गुरुवार, 28 जून 2012

जीवरक्षा क्यों?

“जीव जीवस्य भोजनम्”, (हर जीव, जीव का भोजन है)


हर जीव किसी दूसरे जीव का भोजन है। एक दृष्टि से यह बात यथार्थ प्रतीत होती है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि अविवेक से जो भी सीधा सहज पशु मिला, उस जीव को अपना भोजन बना लेना चाहिए। मनुष्य स्वयं जंगली माँसाहारी पशुओं का भोजन हो सकता है तो क्या मनुष्य खुद को उन जंगली दरिंदो के आगोश में परोस दे? जैसे मनुष्य को जंगली पशुओं का आहार बनते हुए आतंक महसुस होता है, मनुष्य को सोचना चाहिए कि भयभीत पशुओं को अविवेक से सहज ही अपना आहार बना लेना कहाँ का न्याय है। विवेक को यहाँ सारथी बनाना चाहिए।


“परस्परग्रहो जीवानाम्” (प्रत्येक जीवन परस्पर एक दूसरे पर निर्भर है)


माँसाहारी लोग अपने भोजन के रूप में जिन पशुओं के माँस का सेवन करते हैं वे पशु भी घास आदि खाकर शाकाहार से ही अपना भोजन लेते हैं। यानी पशु जिस भोजन से सीधे तौर पर उर्जा लेते हैं माँसाहारी लोग उसी उर्जा को अप्रत्यक्ष व अनेकगुना क्षय अपव्यय के बाद पाते हैं।उस पर कलंक यह कि कोई जीव जान से चला जाता है। सुखरूप जीना है तो दूसरे जीवों के जीवन का का मार्ग सहज सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी हो जाती है।


"द्विपादव चतुष्पात् पाहि" (अपने अस्तित्व के लिए दो पांव वालों के साथ ही चार पांवो वालो की भी रक्षा कर) "मा हिंस्यात सर्व भूतानि" (किसी भी भूत-प्राणी की हिंसा ना करे.)


भोजन शृंखला में भी पर्यावरण मुख्य मुद्दा है। वास्तव में पर्यावरण की सुरक्षा हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी है। और शाकाहार शैली पर्यावरण सुरक्षा में गहन गम्भीर और अन्तिम उपाय है। अगर हम जीवन शृंखला की बात करते है तो पहले हमें पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान देना होगा। और पर्यावरण विभिन्न संकेतो से हमें चेतावनी दे रहा है कि हमें समय रहते शाकाहारी हो जाना चाहिए।


"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत् ।।" 

(सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े ।)

गुरुवार, 21 जून 2012

देखो कैसे प्राण बचाते है


शाक, सब्जियों, फलों को पौधे 
पर - आहार के लिए बनाते हैं
जब आते हैं फल पेड़ो पर
देखो वे झुक जाते हैं 

जितने फल लीजै पेड़ों से
फिर उतने उग आते हैं
फलों से लदे वृक्ष देखो कैसे 
ख़ुशी से झूमते जाते हैं

किन्तु जंतु बदन को अपने
निज के लिए बनाते हैं
हर इक अंग, तन का अपने 
हर चोट से, हरपल, बचाते हैं

कोई भी अंग चोटिल हो जाए तो 
दर्द से तड़प वे जाते हैं
और कोई अंग जो खो जाए तो 
सदा को अपंग हो जाते हैं

पौधे जब फल सृजन करते हैं
खुशबू बिखेर बुलाते हैं
जो फल लेने कोई न आये 
तो फल भूमि पर गिराते हैं

जंतुओं का मांस लेने जाओ
देखो कैसे प्राण बचाते है
सारी जीवनी शक्ति पावों में भर 
सरपट दौड़े जाते हैं 

जो हत्यारा फांस ही ले उनको 
बेबस वे हो जाते हैं
असहाय अश्रुपूर्ण कातर आँखों से
देखते हैं - अपने प्राण कैसे जाते हैं


और उस निर्मम को वे बस 

भोजन भर नज़र आते हैं ???

शनिवार, 16 जून 2012

मनुष्य की बढती स्वार्थपरता का निर्दयी खेल

यह बात तो हर कोई जानता है कि माँस कैसे प्राप्त किया जाता है. जीवन हर जीव को उतना ही प्रिय है, जितना कि हम सब को. अपनी खुशी से कोई पशु मरना नहीं चाहता. अत: उसे मारने से पूर्व अनेक क्रूर और अमानुषिक यातनाएं दी जाती हैं. जब वह वध स्थान पर खडा किया जाता है तो उसकी करूण पुकार से दिल पसीजने लगता है. मरने से पूर्व जैसे उसके मनोभाव रहते हैं, उसका ठीक वैसा ही प्रभाव उसके माँस पर भी पडता है. अब वही माँस जो कोई खायेगा, तो उन मनोभावों का प्रभाव उस पर पडे बिना भला कैसे रह सकता है. इसी से अपने देश में यह कहावत प्रचलित है, कि " जैसा खाये अन्न, वैसा होये मन " अर्थात हमारा भोजन जैसा होगा, हमारा मन भी ठीक वैसा ही होता जायेगा.
भोजन पर हमारा केवल शारीरिक स्वास्थय ही निर्भर नहीं है, अपितु वह मानसिक स्वास्थ्य का भी कारक है. सही मायनों में एक पूर्ण स्वस्थ्य मनुष्य उसे ही कहा जायेगा, जिसका कि शरीर और मन दोनों ही स्वस्थ हों. स्वस्थ शरीर जहाँ रोगों से हमारी रक्षा करता हैं, वहीं स्वस्थ मन दुर्वासनाओं और दुर्विचारों से हमें बचाता है.
इसलिए माँसभक्षण न तो शरीर के लिए ही स्वास्थयकर है और न ही मन के लिए.
देखा जाये तो आज विश्व में चहुँ ओर जो इतनी अशान्ति दिखाई पडती है, उसके पीछे का एक कारण समाज में फैली माँसभक्षण की ये प्रवृति भी है. माँसाहार नें मानवी प्रवृति को एक दम से तामसिक बना छोडा है. अत: ऎसा मनुष्य केवल दूसरों के विनाश की ही बात सोच सकता है, न कि सृजन की. मुख से भले ही शान्ति-शान्ति चिल्लाते रहें, लेकिन उपाय ऎसे खोजे जा रहे हैं, जिनसे कि केवल अशान्ती ही बढती जा रही है.
किन्तु इस चीज का इन्सान इतना अभ्यस्त हो चुका है कि उसे माँस भक्षण करते हुए यह ख्याल तक नहीं आता कि जो पदार्थ हम खा रहे हैं, उसके लिए किसी को अपनी जान गँवानी पडी है. दूसरों के प्रति इतनी निर्दयता और स्वार्थीपन नें ही आज मनुष्य को मनुष्य के प्रति निष्ठुर बना दिया है. आज जो पशु के रक्त का प्यासा है, कल वो इन्सान के रक्त का प्यासा क्यूँ न होगा ? दरअसल प्यास तो सिर्फ रक्त की है, आज जो प्यास पशु के रक्त से बुझ सकती है, उसके लिए पशु का खूब बहाया जाता है. और कल को यही प्यास इन्सानी रक्त से बुझ सकेगी तो उसके लिए इन्सानी खून ही बहाया जायेगा.
यह तो मनुष्य की बढती हुई स्वार्थपरता का खेल है कि, वह प्रकृति से शाकाहारी होते हुए भी, प्रकृति प्रदत्त तरह-तरह के स्वास्थयकर पदार्थों के सहज सुलभ होने पर भी दूसरे की जान की कीमत नहीं आँकता और दूसरे के रक्त-माँस से अपनी भूख प्यास मिटाने में जुटा है.
माँस के निमित से रोजाना कितने लाखों पशु-पक्षियों को मार डाला जाता है और उससे समू़चे विश्व को कितनी बडी आर्थिक और स्वास्थ्य-विषयक क्षति उठानी पडती है, ये तो आप स्वयं ही सोच सकते हैं. यहाँ तो केवल इतना ही बतलाना है कि माँसाहार पूर्णत: अनैतिक है, जो कि मानवी सभ्यता को अनैतिकता की ओर लिए जा रहा है. मनुष्य की कोमल वृतियों को मसल, उसे निर्दयी, अकृतज्ञ और दुराचारी बनाने में जुटा है......!!!
दरअसल, मनुष्य की कोमल वृतियां ही मानव समाज की सुरक्षा का एक आवश्यक कचव है. उनके मर जाने पर समाज भी हरगिज जीवित नहीं रह सकता. अत: न केवल आहार अपितु औषधी, व्यवसाय अथवा मनोविनोद इत्यादि चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो, पशु-पक्षियों का निर्दयतापूर्वक वध रुकना ही चाहिए. इसी में विश्व का कल्याण है............  

सोमवार, 11 जून 2012

लाभदायक शाकाहार

शाकाहार में लाभ ही लाभ है। प्रथम तो शाकाहार सस्ता और सर्व सुलभ होता है। मानव शरीर के उर्जा व शक्ति के लिए जरूरी ऐसा कोई पौष्टिक तत्व नहीं है, जो वनस्पतियों से प्राप्त नहीं किया जा सकता। शाकाहार अपने आप में पूर्ण संतुलित पोषक आहार है बशर्ते विभिन्न प्रकार के वनस्पति आधारित पदार्थों का सुनियोजित सेवन किया जाए। शाकाहार पचने मे आसान होता है।

 

शाकाहार मे बीमारी के कीटाणु आ जाने की संभावना कम रहती है। शाकाहार से व्यक्ति औसतन कम बीमार पड़ता है। शाकाहार से उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदयरोग तुलनात्मक कम होते है शाकाहार से व्यक्ति अधिक शक्तिशाली होता है और अधिक समय तक जीता है। शाकाहार से पेट की समस्याएँ कम से कम होती है। जबकि माँसाहार से हानियाँ ही अधिक सम्भावित है जैसे माँसाहार पचने मे अधिक समय लाते है और उस से गॅस और पेट संबंधी शिकायते बढ़ जाती है माँसाहार को पचाने मे अधिक उर्जा लगती है। माँसाहार में उपस्थित कीटाणु अधिकत्तम तापमान पर भी नष्ट नही होते। पशु की हत्या के समय उसके शरीर में बड़े पैमाने पर विषैले रसायनों का अन्तर्स्राव होता है जो मानव स्वास्थ्य के लिए घातक होते है एवं कई बिमारियों को जन्म देते है।

 

ईश्वर ने हमारा पाचन तंत्र शाकाहार के ही अनुकूल बनाया है। माँसाहार से जीवों की क्रूर हत्या होती है जो मानव के शान्ति लक्ष्य के विरूद्ध है। शाकाहार से मानव के लिए आहार श्रंखला और उर्जाचक्र सुनियोजित रहता है। जबकि माँसाहार से पर्यावरण में गम्भीर असंतुलन पैदा होता है।

 

माँसाहार से आपराधिक प्रवृत्ति की ओर रूझान देखा गया है इसका चिंतन ही आवेश आक्रोश और हिंसा में वृद्धि करता है। हम विचार करें, तो हमें अनुभूति होगी कि जो खाना हम खाते हैं, उसका हमारे शरीर, भावना तथा मानसिक स्थिति पर अप्रत्यक्ष किन्तु एक निश्चित प्रभाव पङता है। करूणा व अहिंसा के भाव शाकाहारी भोजन का आधार हैं। यदि हम अहिंसा और दया से पूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, यदि हम अधिक गंभीर शांत और संतुष्ट होना चाहते हैं, यदि हम अपने मन और इंद्रियों पर संयम रखना चाहते हैं, तब हमें स्वाभाविक रुप से ऐसा आहार ग्रहण करना होगा, जो कि हमें हमारे ध्येय की प्राप्ति में सहायक हो। शान्त सुखमय संतोषी जीवन ही हमारा लक्ष्य है। शाकाहार उस लक्ष्य का सहज सरल मार्ग है।

मंगलवार, 5 जून 2012

शाकाहार संकल्प और पर्यावरण संरक्षण (पर्यावरण दिवस पर विशेष)


हरे भरे जीवनदायी ग्रह पर जहां हम निवास करते हैं, वहां से जीवों की कई प्रजातियां हमेशा के लिए विलुप्त हो रही हैं। ऐसा सदियों से होता आ रहा है। कई प्रजातियां इंसान के प्रादुर्भाव से पहले धरती को विदा कह गई, जबकि कई प्रजातियां हमारे सामने विलुप्त हो गई। इंसान के लालच और जरूरत के चलते जिस गति से इन दिनों जंगलों से जैव विविधता नष्ट की जा रही है, उसे देखते हुए लगता है कि जल्दी ही हमारा अस्तित्व ही संकट में आ जाएगा। जिस गति से जंगल और समुद्र जीवों से रीते होते जा रहे हैं, क्या उसका असर समूचे पर्यावरण पर नहीं प़ड रहा है ? जाहिर है कि धरती पर जीवन को सुरक्षित रखना हमारी पहली प्राथमिकता है।

आज दुनिया का अस्तित्व ही संकट में है और संकट का कारण है बिगड़ता पर्यावरण तथा ग्लोबल वार्मिंग। माना जा रहा है कि ग्रीन हाउस गैस ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य कारक है और जानवर ग्रीनहाउस गैस का उर्त्सजन करते है। वास्तव में पशु-पक्षी हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं और इनका आहार के रूप में भक्षण प्रकृति विरोधी है निश्चित तौर पर हर प्रकृति विरोधी बात पर्यावरण विरोधी होती है, जहॉ तक माँसाहार की बात है इसके लिए पशुओ की फार्मिंगं पर्यावरण विरोधी है।

ब्रेंट फोर्ड के सांसद लोर्ड स्टर्न जोर देकर कहते हैं कि शाकाहारी भोजन ही पृथ्वी को विनाश से बचा सकता है। लॉर्ड स्टर्न का तर्क है कि मांसाहार का सेवन करने से जैविक चक्र तो बाधित होता ही है, साथ ही साथ मीट की प्रोसेसिंग में पानी का अनहद उपयोग होता है और ग्रीनहाउस गेसों का उत्सर्जन भी। इससे पृथ्वी के स्रोतों का इस्तेमाल कई गुना बढ जाता है।

शाकाहार से पर्यावरण संरक्षण इस विचारधारा पर आधारित है कि जन उपभोग के लिए मांस उत्पाद और पशु उत्पाद खाद्य पर्यावरण की दृष्टि से अरक्षणीय होते हैं. 2006 में संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर किए गए एक अनुसंधान के अनुसार, दुनिया में पर्यावरण संबंधी की दुर्दशा में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से एक मवेशी उद्योग है, मांसाहारी खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए आधुनिक तरीकों से पशुओं की तादद बढ़ाने से बहुत ही बड़े पैमाने पर वायु और जल प्रदूषण, भूमि क्षरण, जलवायु परिवर्तन जैव विविधता को नुकसान हो रहा है। निष्कर्ष में यह तथ्य उभर पर आया कि स्थानीय से लेकर वैश्विक प्रत्येक स्तर पर, पर्यावरणीय समस्याओं में सबसे महत्वपूर्ण योगदानकर्ताओं में पशुपालन क्षेत्र का स्थान एकदम से शीर्ष पर दूसरा या तीसरा है।

इसके अलावा, पशु फार्म ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के बड़े स्रोत हैं और दुनिया भर में 18 प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन, जिसे CO2 के समकक्ष मापा गया है, के लिए ये पशु फार्म ही जिम्मेवार है। तुलनात्मक रूप से, दुनिया भर के सभी परिवहनों (जहाजों, सभी की गाड़ियों, ट्रकों, बसों, ट्रेनों, जहाजों और हवाई जहाजों समेत) से उत्सर्जित CO2 का प्रतिशत 13.5 है. पशु फार्म मानव संबंधित नाइट्रस ऑक्साइड का उत्पादन 65 प्रतिशत करता है और सभी मानव प्रेरित मीथेन का प्रतिशत 37 है। जो लगभग 21 गुना अधिक है। मीथेन गैस के ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल (GWP) की तुलना में कार्बन डाइ ऑक्साइड और नाइट्रस ऑक्साइड का GWP 296 गुना है।

चारे पर निर्भर पशुओं की तुलना में  अनाज  पर पोषित पशुओं को कहीं अधिक पानी की जरूरत पड़ती है। यूएसडीए (USDA) के अनुसार, फार्म पशुओं को खिलाने के लिए उगाई फसलों की पैदावार के लिए पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका के लगभग आधी जल आपूर्ति और 80 प्रतिशत कृषि भूमि के पानी की जरूरत होती है. इसके अतिरिक्त, अमेरिका में भोजन के लिए पशुओं को बड़ा करने में 90 प्रतिशत सोया की फसल, 80 प्रतिशत मक्के की फसल और 70 प्रतिशत कुल अनाज की खपत हो जाती है

शाकाहार को बढ़ाने में एक जापानी वैज्ञानिक के प्रयोग भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। इन प्रयोगों में सिद्ध किया गया है कि एक किलो बीफ के उत्पादन के साथ 36.4 किलो कार्बन डाइऑक्साइड भी उत्पन्न होती है। यह गैस ग्रीन हाउस प्रभाव के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है।

पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसीलिए कहा था कि यदि दुनिया बीफ (गाय का मांस) खाना बंद कर दे तो कार्बन उत्सर्जन में नाटकीय ढंग से कमी आएगी और ग्लोबल वॉर्मिंग में बढ़ोतरी धीमी हो जाएगी। सौभाग्य की बात है कि भारत में गौमांस (बीफ) का ज्यादा चलन नहीं है। मांस के ट्रांसपोर्टेशन और उसे पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले ईंधन से भी ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन होता है। इतना ही नहीं, जानवरों के मांस से स्वयं भी कई प्रकार की ग्रीन हाउस गैसें उत्पन्न होती हैं जो वातावरण में घुलकर उसके तापमान को बढ़ाती हैं।

जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण के क्षेत्र में काम कर रहे संगठन ग्रीनपीस के नीति सलाहकार श्रीनिवास के अनुसार शाकाहार अपनाने से अप्रत्यक्ष तौर पर पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया जा सकता है। उनके मुताबिक माँसाहार के अधिक प्रचलन के कारण कहीं न कहीं वातावरण में कार्बनडाई ऑक्साइड जैसी गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है। इसलिए माँसाहार जलवायु परिवर्तन में भूमिका निभा रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि माँसाहार का बढ़ता प्रचलन प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जलवायु परिवर्तन और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार है। इससे बचाव और पर्यावरण संतुलन के लिए विशेषज्ञ शाकाहार को अपनाने का सुझाव देते हैं।वास्तव में पर्यावरण की सुरक्षा हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी है। और शाकाहार इसकी एक महत्तवपूर्ण कड़ी है। अगर हम गम्भीरता से पर्यावरण संरक्षण की बात करतें है तो हमें शाकाहारी होना चाहिए।

मंगलवार, 29 मई 2012

पादप एवं जंतु -3: प्रजनन में अंतर


पिछले दो भागों में हमने पादपों और जंतुओं की शारीरिक संरचना और पोषण में फर्क को जाना, अब इस आखिरी भाग में हम इनमे प्रजनन प्रक्रियाओं पर एक तुलनात्मक अध्ययन करने का प्रयास करते हैं ।

किसी भी जीव की उत्तरजीविता (continuation of species ) के लिए प्रजनन आवश्यक है । हर तरह के प्राणी - चाहे पादप हों या जंतु, उत्तरजीवी बने रहने के लिए प्रजनन करते हैं । यहाँ हम दोनो पर अलग अलग नज़र डालते हैं ।
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पादपों में जनन :                 

अधिकाँश पादपों में जड़ें, तने, टहनियां और पत्ते होते हैं । ये सब कायिक अंग (vegetative parts) कहलाते हैं। फूल, फल, बीज, आदि जनन अंग (reproductive parts) कहलाते हैं। पौधों में जनन दो प्रकार से होता है: लैंगिक या अलैंगिक जनन (sexual and asexual reproduction)। 

जब पौधे अपने कायिक अंगो (vegetative parts) से नयी पौध को जन्मे देते हैं - तो इसे अलैंगिक जनन (चित्रों के लिए लिंक क्लिक कीजिये) कहा जाता है । इसके कुछ उदाहरण हम सब जानते ही हैं, गुलाब की कटी हुई टहनी से नया पौधा उगना, आलू से नए पौधे का उगना, ब्रायोफिलम की पत्तियों से प्रजनन, यीस्ट ( ब्रेड बनाने में प्रयुक्त होने वाली) में मुकुलन, स्पाइरोगाइरा में खंडन आदि ।

पौधों के प्रजनन अंग हैं उनके फूल । फूलों की पंखुड़ियों को हटाया जाए तो भीतर ऐसा कुछ पायेंगे :
(चित्र गूगल इमेजेस से साभार)
इस चित्र में stamen  (पुंकेसर) पुरुष जनन अंग और pistil (स्त्रीकेसर)मादा जनन अंग हैं । किन्ही फूलों में इनमे से सिर्फ एक ही हो सकता है - ऐसे फूल एकलिंगी पुष्प कहलाते हैं । जिनमे ये दोनों हों - वे द्विलिंगी पुष्प हैं । इनके लिए यह चित्र देखिये ( हिंदी और अंग्रेजी दोनों लेबल वाले चित्र लगा रही हूँ ) :
(चित्र NCERT की वेबसाईट से साभार )

अब परागकोष (anther) में जो पराग है वह स्वयमेव तो अंडकोष (ovary) तक पहुँच नहीं सकता - सो तितलियों, मधुमखियों आदि की सहायता चाहिए । इसीलिए पुष्पों में इन के लिए nectar होता है और खुशबू भी। जब ये फूल का रस लेने आते हैं, तो इनके पंखों आदि से पराग कोष से पराग गण वर्तिकाग्र (stigma - अंडाशय का प्रवेश द्वार) पर गिरते हैं । फिर इन से एक पराग नलिका (pollen tube ) बढती है (नर युग्मक को मादा युग्मक तक ले जाने के लिए)। इसे germination (या अंकुरण ) कहते हैं । नर युग्मक और अंडाणु के मिल जाने पर युग्मनज़ ( zygote) बनता है - जो आगे जाकर बीज में विकसित होता है। यह जुड़ने की प्रक्रिया निषेचन (fertilization) कहलाती है । यदि एक ही पुष्प के अपने ही नर और मादा युग्मक इस प्रक्रिया में जुडें तो यह स्वपरागण और दूसरे पुष्प के जुड़े तो पर परागण  कहलाती है ।

                           
germination and fertilization (अंकुरण एवं निषेचन)
- formation of zygote 








स्व परागन और पर परागण
 (self and cross pollination )












यह निषेचन हो जाने के बाद पुष्प सूख कर झड जाते हैं और pistil  सूजने लगती है । युग्मनज़ अब बीज में परिवर्तित होने लगता है और स्त्रीकेसर का अंडाशय (ovary ) फल में बदलने लगती है । इस फल में स्वादिष्ट गूदा आदि है - जो पौधे द्वारा बनाया गया अतिरिक्त भोजन है । ध्यान दीजिये की पौधे विचरण नहीं कर सकते - सो प्रजनन प्रक्रिया में सफलता के लिए दो जगह सहायता चाहिए । निषेचन के लिए कीटों की सहायता - जिसके लिए फूलों की खुशबू और मधु मेहनताने जैसा है, और फिर बने हुए बीजों को जनक पौधे से दूर ले जाकर रोपित करने के लिए भी पौधों को सहायता चाहिए । इसे बीज प्रकीर्णन (seed dispersal ) कहते हैं । यह इसलिए आवश्यक है की यदि सब बीज वहीँ गिर जाएँ जहां जनक पौधा था - तो मिटटी के खनिजों, सूर्य के प्रकाश , जल आदि के लिए गंभीर प्रतिस्पर्धा होगी , और शायद कोई भी नव अंकुरित पौधा पनप नहीं पायेगा ।  इस बीज प्रकीर्णन के लिए अलग अलग प्रक्रियाएं हैं ।

1.  कुछ बीजों में कांटे से होते हैं - जो पशुओं की खाल, उनकी पूँछों के बाल, भेड़ों के ऊन, मनुष्यों के कपड़ो आदि में फंस कर दूर तक पहुँच जाते हैं ।
2. कोई इतने हलके रेशों (रोमों) के साथ हैं की वे हवा में उड़ कर फैलते हैं (रुई या कपास)
3. कुछ भीतर से खोखले हैं और इनके खोल स्पंजी या तंतुमय होने से ये पानी में तैर कर दूर पहुँच सकते हैं (नारियल)
4. किन्ही में पंख हैं (मेपल) ..... आदि

तो - यह जो प्रश्न बार बार उठाया जाता है - कि क्या पौधे सिर्फ दूसरे प्राणियों के लिए भोजन बनाते हैं ? उसका उत्तर यहाँ है । पौधे अपने लिए भी भोजन बनाते हैं और दूसरे प्राणियों के लिए भी । अतिरिक्त भोजन को दूसरे प्राणियों के लिए प्रलोभन / प्रोत्साहन / मेहनताने की तरह प्रयुक्त किया जाता है । फूलों के मधु से कीट पतंगे आकर्षित होते हैं जिससे निषेचन में सहायता मिलती है । फल का गूदा, जन्तुओं (मनुष्यों भी) द्वारा बीजों को दूर ले जाने का प्रतिलाभ (incentive) है ।

अब आते हैं - अन्न पर । बहुत बार यह पढ़ा / सुना है की अन्न को खाना "भ्रूण" को खाना है । हाँ  अन्न अपने पौधे का बीज ही हैं । यदि वे रोपित हों - तो नयी पौध को जन्म दे सकते हैं । अन्न देने वाले (घास प्रजाति के) पौधे बालियों में अनेकों बीजों को धारण करते हैं । ऐसी बालियाँ भी एक पौधे पर बहुत सी होती हैं । यह संभव ही नहीं की वहीँ गिरे हुए ये सारे बीज वहीँ पर रोपित हो सकें । ध्यान देने की बात है कि ये अन्न के दाने भारी हैं - सो उड़ नहीं सकते, इनमे कांटे नहीं - सो खाल आदि से चिपक कर दूर नहीं फ़ैल सकते, इनमे पंख भी नहीं, ये तैर भी नहीं सकते । तब बीजों का प्रकीर्णन कैसे हो ? यदि ये सारे बीज वहीँ गिर जाएँ जहां पौधा था - तो शायद ये सब मर जाएँ । क्यों ? क्योंकि प्रतिस्पर्धा गहरी होगी और संसाधन कम । ऊपर से दूसरी मुश्किल यह की - जो parent पौधा था (जिसने अन्न के बीज बनाए) - वह बीज के तैयार होने तक मृत हो गया होता है - सो उसकी जड़े और तने नए बीजों को अपने डंठलों से निकल कर मिटटी में रोपित होने में भी अड़चन  करेंगे । ऐसा नहीं कि कोई पौधा उगेगा ही नहीं - उगेगा अवश्य - किन्तु वह शायद स्वस्थ नस्ल नहीं होगी ।

तो - अन्न के बीज कैसे फैलें ? प्राकृतिक तरीका यह है कि इन्हें स्तनपायी जीव (गाय आदि) घास के साथ खाएं । फिर जब यह गाय गोबर करती है - तो ये बीज ऐसे ही निकल कर दूसरी जगह पहुँच जाते हैं (बिना आग पर पकाए हुए बीजों पर एक सुरक्षा परत होती है - जो इसे पाचन तंत्र में पचने से बचाती है) । गाय का पाचन तंत्र घास को पचाता है, बालियों को भी - और बीज ऐसे ही बाहर निकल आते हैं । ( हमारे एक ऋषि ऐसे भी थे - जो अहिंसा के चलते गाय के गोबर से चुने हुए अन्न बीजों को ही धोकर प्रयुक्त करते थे ) । दूसरा तरीका यह भी है की हम मनुष्य खेत में प्राकृतिक से अधिक संख्या में एक ही तरह के अन्न के कई पौधे उगायें । फिर इनके बीज उपयोग में भी ला, और कुछ संख्या में उन्हें अगले बरस के लिए संरक्षित कर के रख लें - जिससे उतनी ही भूमि में उतने ही पौधे फिर से उग सकें । यदि मानव ये अन्न के बीज न भी लेता - तो भी उतने ही पौधे उगते - और ले रहा है - तब भी उतने ही (बल्कि शायद उससे अधिक, क्योंकि किसान द्वारा देख रेख हो रही है) उग रहे हैं । इसमें प्रजनन में कोई हानि नहीं होती है । भ्रूण हत्या यह इसलिए नहीं कहला सकता है कि बीज जब भूमि में रोपित होता है - तब अंकुरित होता है - मिटटी को पौधे की माँ यूँ ही नहीं कहा जाता :)। यदि बीज मिटटी में रोपित न हो - तो वह वैसे ही नए पौधे में नहीं बदल सकता - भले ही हम उसे खाएं - या न खाएं ।
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 जंतुओं में प्रजनन :             

जंतु विचरण कर सकते हैं । इसलिए इन्हें प्रजनन के लिए बाहरी सहायता नहीं चाहिए , और इसीलिए इन्हें किसी को "मेहनताने" के रूप में भोजन भी नहीं देना । तो ये अपने शरीर में अतिरिक्त पोषक तत्व इकट्ठे नहीं करते । सिर्फ उतना ही शरीर बनता है - जितना स्वयं अपने ही जीवन यापन के लिए आवश्यक हो । जंतुओं को विचरण के लिए ऊर्जा अधिक चाहिए - और उनके शरीर का वजन जितना अधिक होगा, ऊर्जा उतनी ही अधिक बर्बाद होगी । सो - स्वाभाविक तौर पर - जंतु अपने शरीर में उतना ही मांस बनाते हैं जितना आवश्यक हो - अतिरिक्त "भार" नहीं ढोते ।  कुछ अतिरिक्त चर्बी जो जंतुओं के शरीर बनाते हैं (और ढ़ोते हैं) - वह मुश्किल समय में (अकाल आदि- जब भोजन उपलब्ध न हो) काम आने के लिए है । मृत कोशिकाएं तो जंतुओं के शरीर के वजन के अनुपात में न के बराबर हैं - सिर्फ पंजे / नाखून और बाल - क्योंकि मृत कोशिकाएं भार बढ़ाती हैं, और ऊर्जा का अपव्यय करती हैं । जबकि पौधों में मृत कोशिकाएं ही अधिक हैं - mechanical strength and support के लिए । पंजे और नाखून अँगुलियों को चोट से बचाने और भोजन पाने के लिए हैं, और बाल सर्दी आदि से बचाव के लिए । इसके अलावा शरीर में संगृहीत fat भी सर्दी से बचाव में इन्सुलेटर का काम करता है । शरीर की हर जीवित कोशिका से तंत्रिका तंत्र जुड़ा है, और रक्त का प्रवाह भी । कोई भी अंग काटना - पीड़ादायक तो है ही - रक्त के बहाव से मृत्युकारक भी हो सकता है ।

जैसे पौधों में अनेक प्रकार से प्रजनन/ बीज प्रकीर्णन होता है , उसी तरह जंतुओं में भी भेद हैं । मुख्य रूप से तीन तरह से प्रजनन होता है ।

1. स्तनपायी जीवों में (गाय, मनुष्य, व्हेल मछली - the mammals ) मादा शरीर के भीतर ही निषेचन होता है । यह भ्रूण भी माँ के शरीर के भीतर ही विकसित होता है - पूरे विकास के बाद ही बच्चे का जन्म होता है । किन्तु यह बच्चा अभी भी अपने आप survive कर सके यह बहुत कठिन है - माँ इसे दूध पिलाती है । माता ही (कभी कभी पिता भी) अक्सर बच्चे / बच्चों का पालन पोषण भी करती है । इस तरह के प्राणियों में माँ और संतान के बीच भावनात्मक लगाव भी बहुत अधिक होता है - जो की बच्चे के जीवन के लिए बहुत हद तक आवश्यक भी है ।

2. अंडे देकर उन्हें सेने वाले प्राणी : चिड़िया, मुर्गी, आदि - ये मादाएं अंडे देती हैं । परन्तु अंडे अपने आप में बच्चों को जन्म नहीं देते - माँ उन्हें सेती है (कभी कभी पिता भी ) जब अण्डों से बच्चे निकलते हैं - तो माता पिता (या दोनों) उन बच्चों का पालन पोषण करते हैं । ये प्राणी बहुत अधिक मात्रा में अंडे नहीं देते - क्योंकि बच्चों के जीवित रहने की संभावना अधिक है (क्योंकि माता पिता उनका रख रखाव, देख भाल कर रहे हैं)। किन्तु फिर भी अधिकतर एक साथ ही एक से अधिक बच्चों का जन्म होता है । भावनात्मक लगाव यहाँ भी बहुत है ।

3. अंडे देने वाली प्रजातियाँ जो अंडे नहीं सेतीं : तितलियाँ, मच्छर आदि - ये भी अंडे देते हैं - किन्तु ये अंडे की देखभाल आदि नहीं करते । अंडे अपने आप ही विकसित होते हैं और समय आने पर बच्चे निकल आते हैं । क्योंकि इन अण्डों / बच्चों की कोई देखभाल नहीं करने वाला है - इसलिए जीवित रहने की संभावनाएं कम हैं । सो एक तो ये प्रजातियाँ एक ही समय में बहुत अधिक संख्या में अंडे देती हैं, और अधिकतर अंडे किसी ऐसे सुरक्षित स्थान पर देती हैं जहाँ जीवित रहने की संभावना अधिक हो । परन्तु इसके आगे ये अपनी संतति के लिए कुछ नहीं करते ।


इन सभी केसेज़ में - जंतु या तो अपनी संतति के भोजन का इंतज़ाम खुद करते है (स्तनपायी) या फिर अंडे के भीतर almost perfectly सिर्फ उतना पोषक तत्व जमा होता है जितना उस भ्रूण के विकास होकर जन्म लेने तक के लिए काफी हो । यह मात्रा कभी भी आवश्यक से अधिक नहीं होती। तो इससे तो यही लगता है कि अंडे प्राकृतिक रूप से सिर्फ संतति के जन्म के लिए हैं - न कि मनुष्य या अन्य प्राणियों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए [ पढ़िए -  अंडे का क्रूर फंडा ]

यह आलेख शृंखला पढने के लिए आप सभी का आभार । आशा है यह उपयोगी हुआ हो । आभार ।
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सम्बंधित कड़ियाँ :                  

http://www.ncert.nic.in/NCERTS/textbook/textbook.htm?ghsc1=12-18 (पादपों में जनन - कक्षा 7 पाठ 12 - हिंदी में)
http://www.ncert.nic.in/NCERTS/textbook/textbook.htm?gesc1=12-18 (plant reproduction class 7-lesson 12 in english )
http://www.ncert.nic.in/NCERTS/textbook/textbook.htm?hhsc1=9-18 (जंतुओं में जनन - कक्षा 8 पाठ 9 - हिंदी में)
http://www.ncert.nic.in/NCERTS/textbook/textbook.htm?hesc1=9-18(animal reproduction - class 8 - lesson 9)

गुरुवार, 24 मई 2012

पादप एवं जंतु -2: पोषण का अंतर

पिछले भाग में हमने देखा कि पादपों और जंतुओं के कोशिकाओँ और ऊतकों में क्या फर्क है । इस भाग में हम पोषण के फर्क और समानता को समझने का प्रयास करते हैं । इसमें भी मैंने कई जगह से सामग्री ली है - किन्तु नीचे सिर्फ NCERT पुस्तकों के लिंक ही दे रही हूँ, जो कि (आठवी और सातवी कक्षा की ) स्कूली किताबें हैं, CBSE के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम के लिए ।

भोजन हर जीव लिए आवश्यक है - जंतुओं के लिए भी, और पादपों के लिए भी। किन्तु इन दोनों में बहुत से फर्क हैं । पहली बात तो यह कि  जंतुओं को विचरण करना होता है - तो उनमे पेशियाँ होती हैं - और उन्हें ऊर्जा अधिक चाहिए । पादप एक स्थान पर स्थिर रहते हैं - सो उन्हें जंतुओं की तुलना में कम भोजन चाहिए, किन्तु भोजन चाहिए अवश्य। दूसरी बात यह कि, जंतुओं को विचरण करते हुए चोटिल होने की भी संभावना है, और हिल सकने की काबिलियत से उस चोट के स्रोत से दूर हटने / बचने भागने की भी । ये दोनों ही बातें पादपों में नहीं हैं । सो दर्द महसूस करने / खतरे के स्रोत को देखने / सूंघने / सुन पाने से अपने शरीर की रक्षा की संभावनाएं जंतुओं में अधिक हैं । इसिलिये तंत्रिका तंत्र (nervous system) अधिक विकसित होता है । हम इलेक्ट्रोनिक इंजीनियर्स जो artificial neural networks बनाते हैं, उसमे पढ़ते हैं की जीवों का तंत्रिका तंत्र कैसे सीखने की प्रक्रिया करता है । इसे विकसित होने के लिए feedback loop पूरा होना चाहिए - एक तरफा दर्द महसूस भर करने और उससे बच न पाने की स्थिति में यह पूरा नहीं हो पाता । हम मनुष्यों के doctors भी बताते हैं की कैसे, जिन बच्चों का दिमाग ठीक से विकसित नहीं हुआ हो - वे मानसिक कमजोरी के चलते धीरे धीरे अपनी उम्र के दूसरे बच्चों से शारीरिक रूप से भी पिछड़ जाते हैं - क्योंकि feedback लूप अधूरा होता है। 

अब आते हैं भोजन की आवश्यकता की आपूर्ति पर । यदि कोई जीव अपना भोजन स्वयं संश्लेषित (photosynthesis) कर सकते हैं - तो इस प्रक्रिया को स्वपोषण कहते हैं। यह सिर्फ वे पादप ही कर सकते हैं जिनमे क्लोरोफिल हो। जंतु यह नहीं कर सकते - वे पूरी तरह बाहरी स्रोतों पर निर्भर हैं पोषण के लिए। जंतुओँ को (और ऐसे पौधों को जो पोषण के लिए दूसरे पर निर्भर हैं) विषमपोषी कहते हैं।

पत्तियां पादपों की खाद्य फैक्टरियां हैं। यहाँ कुछ चित्र आप देख सकते हैं इस संश्लेषण की प्रक्रिया पर। कुछ पौधों में पत्तियां नहीं, बल्कि हरी टहनियां और तने भी संश्लेषण करते हैं । इनमे नन्हे छिद्र (रंध्र या stomata ) होते हैं - जिससे ये कार्बन डाई ओक्साइड भीतर लेते हैं और ओक्सिजन और पानी की भाप बाहर छोड़ते हैं । सूर्य से धूप (सौर ऊर्जा) मिलती है, और जडें मिटटी से पानी और खनिज सोखती हैं । हमारी रक्त धमनियों की तरह, जाइलम धरती से सोखे हुए खनिजों को ऊपर पत्तियों तक ले आती हैं । इसमें पत्तियों से सूखे हुए पानी का ऋणात्मक दबाव, और सर्फेस टेंशन (surface tension - सतही तनाव या खिंचाव ) मदद करते हैं । ये चित्र देखिये
 पत्ती की रचना (STRUCTURE OF LEAF) 

प्रकाश संश्लेषण (PHOTOSYNTHESIS)









यह प्रवाह (हमारे रक्त की तरह) दो तरफा नहीं, बल्कि एक तरफा है - सिर्फ नीचे से ऊपर की और। इसी तरह फ्लोएम पत्तियों में बने भोजन को पौधे में दूसरे भागों तक पहुंचाती हैं। दूसरे भागों में इस भोजन का उपयोग भी होता है - परन्तु कम मात्रा में। ऐसा इसलिए है, क्योंकि पौधे स्थिर हैं तो उन्हें विचरण के लिए ऊर्जा नहीं चाहिए। अधिकतर बना हुआ भोजन एकत्रित और परिमार्जित किया जाता है, दूसरे जीवों के उपयोग लिए। पहले पत्तियां सिर्फ SIMPLE CARBOHYDRATE का उत्पादन करती हैं। बाद में इसका परिमार्जन कर के प्रोटीन आदि बनते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि पौधे सिर्फ दूसरे जीवों को भोजन देने भर के लिए हैं। सिर्फ कुछ -हिस्से - जिनमे अतिरिक्त भोजन जमा है - सिर्फ वही दुसरे जीवों के ग्रहण योग्य हैं, बाकी का पूरा पौधा नहीं। न ही ऐसा है की उस भाग को दुसरे जीव लें तो इससे उस पौधे की जीवन अवधि में कोई फर्क आये - क्योंकि ये भाग ऐसे हैं जिनके निकाले या काटे जाने से भी पौधे के जीवन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि पादप अपनी निजी ज़रुरत से बहुत अधिक भोजन का उत्पाद करते हैं - जो जीव साइकल का एक हिस्सा है।

यह अतिरिक्त भोजन इस तरह से संगृहित किया जाता है जिससे यह बिना पौधे को नुक्सान पहुंचाए दूसरे जीवों द्वारा ग्रहण किया जा सके । उदाहरण के लिए - पत्तियों में और घास में सेल्युलोज (CELLULOSE ) नामक स्टार्च है - जो गायें आदि (RUMINANT - रुमिनंट प्राणी ) खाती हैं और पचा सकती हैं (हम मनुष्य नहीं - हमारे पास इन्हें पचाने वाले अंग नहीं हैं - नीचे इसे समझाया गया है ) - किन्तु उनके खाने से वह पौधा मरता नहीं ।

इसी तरह से अतिरिक्त भोजन फल के गूदे में भी संगृहित किया जाता है - जिससे फल खाने वाले जंतु फल खाने के लिए पादप के स्थान से दूर ले जा सकें, और फल खाने के बाद उसके बीज को जनक पौधे से दूर स्थापित कर सकें । यह एक तरह का मेहनताना जैसा समझा जा सकता है :)। ऐसा इसलिए है कि, जंतु अपने बच्चे का पालन, पोषण, संरक्षण कर सकते हैं, क्योंकि वे विचरण कर सकते हैं। जंतु दूर से भोजन ला कर संतान को खिला सकते हैं, शत्रु जीवों को भगा कर / मार कर अपनी संतान की रक्षा कर सकते हैं। किन्तु पादपों के बारे में ऐसा नहीं है - क्योंकि वे विचरण कर ही नहीं सकते। यदि संतति भी वहीँ जन्मे जहां पैतृक पादप पहले से है, तो उसी जगह की मिटटी, धुप और हवा के लिए प्रतियोगिता हो, जिसकी वजह से नए पौधे का पनपना भी मुश्किल होगा और जनक पौधे को भी नुकसान होगा। अन्न आदि बीज के बारे में भी ऐसा ही है। एक पौधा एक से बहुत अधिक अन्नबीजों को बनाता है । वे सभी बीज वहीँ गिर जाएँ , तो कोई भी नहीं पनप सकेगा क्योंकि मिटटी में खनिज इसके लिए काफी नहीं होंगे। इस पूरी विधि पर अगले भाग (जंतुओं और पादपों में प्रजनन) में विस्तृत रूप से बात करूंगी।

सभी पौधे भोजन उत्पन्न नहीं करते। जिनमे chlorophyll ( पर्ण हरिमा ) न हो, या जिन्हें धूप न मिल पाती हो , या फिर जिन्हें कार्बन डाई ओक्साइड न मिले - ऐसे पौधे भी अपने पोषण के लिए बाहरी स्त्रोत पर निर्भर होते हैं। ऐसे पौधे जो स्वयं भोजन न बना पाएं वे भी अलग अलग प्रकार से भोजन प्राप्त करने के लिए विकसित हुए हैं। इनमे से कुछ परजीवी (parasitic ) हो जाते हैं (अमरबेल की तरह दूसरे पेड़ों आदि पर चढ़ कर उनसे भोजन प्राप्त करते हैं ), कुछ मृतजीवी (saprophytic ) होकर पहले से मृत जीवों/ जैव वस्तुओं (जैसे जूते का चमड़ा,ऊनी कपडे, रेशम) पर अपना पालन करते हैं (कुकुर मुत्ते और फंगस की तरह जो जो, सडती हुई ब्रेड आदि पर बनती है) और कुछ कीटभक्षी (insectivorous ) बन कर कीड़े मकोड़ों आदि को पकड़ कर खाते हैं।

स्वपोषी और विशमपोषी के अलावा कुछ पौधे परस्परजीवी भी हैं। जैसे दालों के पौधे (लिग्यूमनस = leguminous plants) । इन्हें नाइट्रोजन अधिक चाहिए - जड़ों के द्वारा सोखे जाने योग्य रूप में मिटटी में नाइट्रोजन । हवा में gas के रूप में जो नाइट्रोजन है - उसे ये प्रयुक्त नहीं कर सकते । सो इनकी जड़ों में कुछ विशिष्ट (रिज़ोबियम - rhizobium bacteria) बैक्टेरिया रहते हैं जो हवा के नाइट्रोजन को सोखे जाने लायक रूप में परिवर्तित करते हैं। बदले में उन्हें पौधे की जड़ों से विशिष्ट पोषण मिलता है।
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जंतुओं में पोषण की शैलियाँ  :

जैसे पौधे अलग-अलग पोषण शैलियों से अपना पोषण पाते हैं, उसी तरह जंतुओं में भी अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं ।  घोंघा, चील, मच्छर, मधुमक्खी, अजगर, मनुष्य सब में पोषण विधियाँ अलग हैं। छीलना, चूसना, निगलना, चबाना, पचाना आदि ग्रहण  के अलग-अलग तरीके हैं ।

मैं यहाँ ख़ास तौर पर मनुष्य, शाकाहारी, और मांसाहारी जीवों की पोषण विधियों पर ही बात करूंगी। यह चित्र देखिये : (चित्र गूगल इमेजेस और edublogs से साभार )


1. छोटी अंत की लम्बाई : माँसाहारी प्राणियों में शरीर से तीन गुना के आस पास और शाकाहारियों में 12 गुना । मानवों में यह लम्बाई शाकाहारी जीवों जैसी है । 
2. मुंह: मांसाहारी जीवों (जैसे शेर) का मुंह उनके सर का अधिकतर भाग होता है - यानि की सर का आधे से अधिक भाग मुंह है - क्योंकि उन्हें शिकार को पकड़ना, जकड़ना, चीरना और फाड़ना है। शाकाहारी प्राणियों के सर का बहुत छोटा भाग होता है उनका मुख। मनुष्य में भी ऐसा ही है ।
3. शिकार करने योग्य विशिष्ट क्षमताओं वाला शरीर : मांसाहारी जीवों की शारीरिक संरचना हुई ही इस प्रकार से है कि  वे शिकार को पकड़ सकें - उनका शरीर एंड्यूरेंस में कम परंतु ताकत में भी आगे है और उनके नाखून, पंजे आदि भी शिकार करने के लिए बने हैं । मनुष्य को जंगल में शिकार करना हो - तो बिना जाल / हथियारों के संभव नहीं ।
4. हम , कच्चा मांस तो पचा ही नहीं पाते आमतौर पर, क्योंकि हमारा पाचनतंत्र उस तरह के रस (enzymes) नहीं बनाता । 
5. हमारे दाँतों की संरचना मांस को चीरने फाड़ने के लिए नहीं बनी है । सिर्फ चार ही canine teeth  हैं, वे भी मांसाहारी जीवों की तरह बड़े, तीखे और गहरी जड़ों वाले नहीं हैं । 
6. हम शाकाहारी जीवों की तरह कच्चा सेल्ल्युलोज़ भी (हरी घास और पत्तियों में एक विशेष कर्बोहाइड्रेट ) नहीं पचा सकते, क्योंकि हमारे पास  सीकम नहीं है (ऊपर चित्र  देखिये ), न  ही रुमन है ।
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सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ मानी जाने वाली रचना माना गया है मानव। सो इस अग्रतम जीव की आपात स्थितियों में रक्षा/संरक्षण / survival के लिए, हमारे शरीर में शाक और मांस दोनों स्रोतों से पाया गया भोजन पचा सकने की क्षमता है तो अवश्य, किन्तु हमारे पाचन तंत्र की तुलना यदि शाकाहारी और मांसाहारी दोनों जीव जंतुओं से की जाए तो ऐसा लगता है कि मूल रूप से शाकाहार के लिए बना तंत्र, सिर्फ आपातस्थिति में जीवन यापन के लिए मांसाहार को पचाने की काबिलियत के अनुकूलित (adapted ) तो है, परन्तु दीर्घकाल में उसी पर जीने के लिए नहीं बनाया गया है ।

अगले भाग में पादपों और जंतुओं के प्रजनन प्रक्रियाओं पर बात करेंगे और जानेंगे कि प्रजनन में सफलता के लिए क्यों पादप अपनी आवश्यकता से अधिक भोजन बना कर संगृहीत करते हैं और क्यों जंतुओं के शरीर ऐसा नहीं करते ।

पढने के लिए आप सभी का आभार ।

यदि यह कुछ ज्यादा जटिल हो रहा हो - तो टिप्पणियों में बताइये - अगले भाग में कम गहराई में जाऊंगी। आभार ।
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सम्बंधित कड़ियाँ 
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शुक्रवार, 18 मई 2012

पादप एवं जंतु -1: शारीरिक संरचना में अन्तर


पौधों और जंतुओं में शारीरिक संरचना में फर्क : एक वैज्ञानिक तुलना 
कई बार, कई जगह, कई लोगों को, कहते सुना है कि - 
पौधों में भी जीव है / शाकाहार में भी हिंसा है / श्री बोस ने प्रमाणित किया है ..... आदि आदि | इस ही सम्बन्ध में यह पोस्ट लिख रही हूँ | एक वैज्ञानिक तुलना, कि क्या दोनों प्रकार के आहार सामान्य / बराबरी से हिंसाकारक कहे जा सकते हैं ?

पौधों और जंतुओं के ऊतक (tissues) और कोशिकाएं (cells ) एक सामान नहीं होते हैं | ncert की पाठ्य पुस्तिकाएं देखिये - आठवी ओर नवी कक्षा की विज्ञान की किताबें - ऑनलाइन उपलब्ध है (कड़ियाँ नीचे दी गयी हैं ) 

यहाँ कोशिकाओं और ऊतकों के बारे में समझाते हुए कहा गया है कि एक समान आकृति की कोशिकाएं (cells) एक समूह में एक ऊतक (tissue ) बनाती हैं जो एक प्रकार का कार्य करते हैं | वहां से कुछ जानकारी 

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क्या पौधों और जंतुओं की संरचनाएं समान हैं? नहीं | दोनों में स्पष्ट अंतर है |

पौधे स्थिर होते हैं - विचरण नहीं करते | सो इनके अधिकाँश ऊतक सहारा देने वाले होते हैं | ये पौधे को संरचनात्मक शक्ति देते हैं | ऐसे अधिकाँश ऊतक मृत होते हैं | ये मृत ऊतक जीवित ऊतकों के ही सामान यांत्रिक शक्ति (mechanical strength ) देते हैं, और इन्हें संरक्षण की आवश्यकता कम है |

 जंतु विचरण करते हैं इसलिए उनकी ऊर्जा उतनी अधिक व्यय होती है जितना भार अधिक हो | तो मृत ऊतकों को ढोना अतिरिक्त ऊर्जा व्यय करेगा - सो अधिकतर जीवित ऊतक हैं |
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किस किस तरह की ऊतक हैं पौधों और जंतुओं में ? इनमे भी classes हैं | 

१  पेशीय कोशिका (muscle ) - फैलने सिकुड़ने का काम - विचरण के लिए | जाहिर है कि पौधों को विचरण नहीं करना, सो पेशियों की आवश्यकता नहीं है | इसलिए इस तरह के ऊतक जंतुओं में होते हैं, किन्तु पौधों में नहीं होते । 

२. तंत्रिका कोशिका (nerves ) सन्देश ले जाने के लिए - दो तरह के सन्देश - एक शरीर  के विभिन्न अंगों से मस्तिष्क की ओर, ओर दूसरे मस्तिष्क से अंगों की ओर | {जैसे आपने कहीं जलते तवे पर हाथ रखा - तो पहले तरह की nerves यह सन्देश ले जायेंगी कि दर्द हुआ, और फिर दूसरी nerves दिमाग से हाथ को यह सन्देश लायेंगी कि पेशियाँ सिकुडें और हाथ तुरंत हटाया जाए |} | 

    शोध चल रही है कि पौधों में भी दर्द आदि के अनुभव करने के लिए तंत्रिका ऊतक हैं - परन्तु शोध अधूरी ही है | मस्तिष्क की खोज तो हुई ही नहीं है | किन्तु वैज्ञानिकों का मानना है कि इलेक्ट्रोनिक यंत्रों में जिस प्रकार "सेंसर" और "फीडबैक" होता है, सिस्टम को असामान्य स्थिति में स्वयं को विनष्ट होने से बचाने के लिए (जैसे यदि स्टील बनाने के लिए आयरन ओर  पिघलाने वाली फर्नेस का तापमान अधिक हो रहा है तो सेंसर यह फीडबैक माइक्रो कंट्रोलर को देंगे, जो तुरंत यंत्र को बचने के लिए बिजली बंद करेगा आदि) इसी तरह हमारे शरीर में nervous system दर्द की अनुभूति करता कराता है हमें चोट से बचाने के लिए | जब तंत्रिकाएँ दर्द के स्त्रोत का अनुभव करती हैं , वे मस्तिष्क तक यह खबर ले जाती हैं, और मस्तिष्क पेशियों को आदेश देता है कि चोट की जगह से दूर हटा जाए | 

    क्योंकि पौधे हट तो सकते नहीं (पेशियाँ नहीं हैं ) तो सिर्फ एकतरफा दर्द का अनुभव उनकी फीडबैक लूपको पूर्ण नहीं होने देता । और अधूरा लूप - सिर्फ सेंसर्स का होना, मस्तिष्क और पेशियों का अभाव कुछ लोजीकल नहीं लगता | फिर से कहूँगी - शोध चकल रही है - नतीजे नहीं हैं - किन्तु लोजिकल दृष्टि से यही प्रतीत होता है । 

३. वाहक/संयोजक कोशिकाएं - जंतुओं के शरीर में रक्त ओर धमनियां ओर दिल - ये शरीर में हजम हुआ भोजन, ओक्सिजन, आदि इधर से उधर ले जाने लाने का काम करते हैं । दिल रक्त को पम्प करता है - और धमनियों में बहता हुआ रक्त, फेफड़ों (lungs) से ऑक्सीजन , अंतड़ियों से पचा हुआ भोजन आदि शरीर में प्रवाहित करता है ।  
   
   धमनियों जैसी कोशिकाएं पौधों में भी हैं | जैसे हमारे शरीर में रक्त धमनियां (arteries and veins ) हैं, पौधों में xylem  (जाइलेम) ओर phloem (फ्लोएम ) हैं | ये दो काम करती हैं । एक तो ये (जाइलेम) जड़ों द्वारा जमीन से सोखा हुआ पानी और खनिज (minerals ) ऊपर को ले जाती हैं, दूसरा (फ्लोएम ) पत्तियों में बना भोजन पौधे के अन्य भागो को ले जाती हैं ।  इनमे अधिकतर मृत कोशिकाओं के रेशे हैं । 

   ध्यान देने वाली बात है कि  पौधे में दिल नहीं होता - न रक्त होता है । इनमे ऊपर जाने वाला द्रव्य ऊपर जाने की प्रक्रिया कुछ लम्बी है - साधारण शब्दों में यह (जाइलेम) ऐसे काम करती है :
   
   capilary action का अर्थ है - बहुत ही पतली ट्यूबों में द्रव्य का खुद बी खुद प्रवाहित होंना - यह surface tension से होता है । कुछ वैसा ही जैसे कपडा एक जगह पानी में या स्याही में छू जाए - तो वह स्याही/ पानी  खुद ही ऊपर को चढ़ता है - उसे पम्प करने की आवश्यकता नहीं होती । तो इस प्रक्रिया से पानी जड़ों से ऊपर को चढ़ने लगता है । इसके अलावा एक और phenomenon  इसमें योगदान करता है - जिसे कहते हैं transpiration  । इसका अर्थ है - पत्तियों के बेहद महीन छेदों से पानी का भाप बन कर सूखना - जिससे ऋणात्मक दबाव बनता है और पानी नीचे की तरफ से ऊपर की और खिंचता है ।

     और बने हुए भोजन को दुसरे भागों तक ले जाने का काम करती है फ्लोएम - जो osmosis  (जैसे की आजकल reverse  osmosis वाले water purifiers में होता है ) से काम करती हैं । 

४. वृद्धि (growth / merismatic) कोशिकाएं  जहां एक ओर पादपों के शरीर की कुछ ही कोशिकाएं वृद्धि करती हैं (जैसे टहनी का अंतिम भाग, जड़ का अंतिम भाग ) इसे merismatic tissue (विभज्योतक ऊतक ) कहते हैं | वहीँ जंतुओं के शरीर की हर कोशिका जीवित है ओर बढती है (cell division ) | 
नीचे कोशिकाओं के चित्र हैं - ncert से साभार |
   


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आप देख सकते हैं कि पादप कोशिका का अधिक भाग vacuole (रिक्तिका) है - जो पौधे द्वारा बनाए अतिरिक्त भोजन को सहेज कर रखने का स्थान देता है | 

जैसा पहले भी कहा गया है - क्योंकि पौधे विचरण नहीं करते - उनके अधिकाँश ऊतक मृत हैं - जो उसे यांत्रिक शक्ति तो देते हैं - किन्तु उन्हें संरक्षण की आवश्यकता नहीं होती ।

५. फिर जंतुओं के शरीरों की कई अंग प्रणालियाँ हैं - जैसे digestive system (पाचन तंत्र) , respiratory system (श्वसन प्रणाली) , excretary system (उत्सर्जन संबंधी) आदि | इनमे से हर प्रणाली पादपों में नहीं होती क्योंकि उन्हें इसकी आवश्यकता ही नहीं होती | हाँ प्रजनन तंत्र (reproductory system पादपों और जंतुओं दोनों में है, और करीब करीब एक सा ही है - जिसके हिस्से हैं पादपों के बीज (जिनमे अन्न भी हैं ) , फल और फूल | जिन पौधों से फल लिया जाता है - उनके बारे में भी कहा जाता है कि हम फल लेकर पौधे को "दर्द" दे रहे हैं, क्रूरता या हिंसा कर रहे हैं | इस विषय में इस तीन पोस्ट्स की शृंखला की आगे की पोस्टस  में विस्तार से बात करूंगी | यहाँ इस सिलसिले में इतना ही कहूँगी : अन्न देने वाले पौधे अन्न के तैयार होने तक अपनी जीवन यात्रा समाप्त कर चुके होते हैं | पौधे को काटने में कोई हिंसा नहीं होती क्योंकि वह जीवन विहीन हो ही चुका होता है (याद दिला दूं कि पौधों में सिर्फ बढ़ते स्थान पर जीवित merismatic tissue है, बाकी की कोशिकाएं पहले ही मृत कोशिकाएं हैं - सो जो पौधा काटा जा रहा है अन्न लेने के लिए - वह पहले ही मृत है )

तो जैविक वैज्ञानिक तौर पर किये अध्ययन भी यही दिखाते हैं कि पौधों की संरचना में कुछ ऊतक (जैसे फलों का गूदा ) पौधे द्वारा बनाया अतिरिक्त भोजन जमा करने और दूसरे प्राणियों को भोजन देने के ही लिए ख़ास तौर पर specialised है, जबकि जंतुओं के बारे में ऐसा नहीं है |

शायद इस जानकारी से आपको निर्णय लेने में सहायता मिले कि शाकाहारी भोजन हमारे लिए बेहतर choice है , या मांसाहारी भोजन |  आभार ।

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सम्बंधित कड़ियाँ - ( कोशिकाएं और ऊतक - cells and tissues )

गुरुवार, 10 मई 2012

मांसाहार और स्वास्थ्य से जुडी दस बातें , कुछ जानकारियाँ

शाकाहारी बनें, स्वस्थ रहें, ज़िम्मेदार रहें 
१. मांसाहारी सिर्फ पशु कोशिकाएं एवं वसा ही नहीं, बल्कि वेस्ट प्रोडक्ट भी ग्रहण करते हैं | जैसे पशुओं को खिलाये जाने वाले रासायनिक भोज्य। उन्हें इंजेक्शन द्वारा दिए गए ड्रग्स जिससे वे जल्दी मोटे/बड़े हों । उन्हें बड़ी संख्या में बिना लड़े, झगडे, हिले डुले, कम जगह में स्थिर रखने के लिए दिए गए नशीले पदार्थ (जिस से व्यायाम न होने और कैलारीज़ न जलने से ये जल्दी मोटे हों) । पशु को मारने के बाद रासायनिक रंग, और मांस व खाल को नर्म रखने वाले स्प्रे आदि।

२. हैमबर्गर गाय के मांस (beef) से बनता है - परन्तु कौन सी गाय? the 4 d's - dead, dying, disabled, diseased. इसी वजह से कुछ लोग हैमबर्गर खाने से मृत्यु के कगार तक पहुँच जाते हैं (कुछ को बचाया भी नहीं जा पात़ा)। अभी भी एक ऐसा कोर्ट केस न्यूज़ में चर्चा में बना हुआ है।

३. मांसाहारियों को अपक्षय (degenerative) बीमारियाँ - जैसे आर्थ्राइटिस, गाउट (arthritis, gout) आदि, ज्यादा होती हैं।

४ . पशु को मारते समय (slaughter house में), कई विषाक्त रसायन ( उसके शरीर से न निकल पाए वेस्ट ) खून से पेशियों में सोख लिए जाते है (जैसे यूरिक एसिड, ऐड्रिनलिन - जिन्हें मृत्यु हो जाने के कारण गुर्दे बाहर नहीं निकाल पाते)। यह सब कुछ उस मासाहारी मनुष्य के पेट में जाता है, जो उसे खायेगा। मारे जा रहे पशु के भय, दर्द, बदले की भावना, और नफरत के कारण, के खून में कई होरमोन आते हैं जैसे एपिनेफ्रिन, नोरेपिनफ्रिन और स्टीरॉइड्स। ये सब विष उस मृत पशु को खाने वाले मनुष्य के पेट में पहुँचते हैं। मनुष्य के शरीर को इस सब से छुटकारा पाने के लिए १५ गुणा अधिक काम करना पड़ता है - फिर भी ये सब पूरी तरह नहीं निकल पाते।

५. अंधापन, गर्भपात, पीलिया रोग और नर्वस बीमारियों को ट्रिगर करने करने वाले परजीवी (पेरासाईट = parasites) भी मांस के माध्यम से शरीर में प्रविष्ट हो सकते हैं।

६. समुद्री भोज्य - मछली, झींगा (प्रॉन) आदि को जीवित रखने के लिए पानी के टैंकों में बोरिक एसिड का प्रयोग होता है। जाहिर है यह उनके शरीर में घुलेगा ही। यह यकृत पर हमला करता है और मस्तिष्क पर भी - और कई बार कोमा की भी स्थिति आ सकती है। इसके विपरीत - यदि इसे फलों और सब्जियों पर स्प्रे किया भी जाए तो भी इनमे वे हॉर्मोन, एंटीबायोटिक आदि नहीं पाए जाते जो मांस में पाए जाते हैं।

७. सूअर (pig) में ट्रिकिनोसिस जीवाणु (trichinosis bacteria) है - जो पेट और अंतड़ियों की दीवारों से चिपक जाता है, और मृत्यु तक हो सकती है।

८. बीफ और पोर्क से तीक्ष्ण एसिडिटी बनती है।

९. मांसाहार से सोडियम इंटेक अधिक होती है - जिससे हाइपरटेंशन (हाई ब्लड प्रेशर) होता है।

१०. टाइप २ का मधुमेह (डाईबिटिज़) मांसाहार की जटिल शर्करा (काम्प्लेक्स कार्बोहाईड्रेट) से अतिशीघ्र और उग्र रूप लेकर भड़क उठता है।

यह जानकारी सभी पाठकों से शेअर कर रही हूँ - आभार।

[शिल्पा मेहता]