सोमवार, 14 अक्तूबर 2013

अमृतपान - एक कविता

(अनुराग शर्मा)

हमारे पूर्वजों के चलाये
हजारों पर्व और त्यौहार
पूरे नहीं पड़ते
तेजस्वी, दाता, द्युतिवान
उत्सवप्रिय देवों को
जभी तो वे नाचते गाते
गुनगुनाते
शामिल होते हैं
लोसार, ओली व खमोरो ही नहीं
हैलोवीन और क्रिसमस में भी
लेकिन मुझे यकीन है कि
बकरीद हो या दसाइन
बेज़ुबान प्राणियों की
कुर्बानी, बलि या हत्या में
उनकी उपस्थिति नहीं
स्वीकृति भी नहीं होती
मृतभोजी नहीं हो सकते वे
जो अमृतपान पर जीते हैं

7 टिप्‍पणियां:

  1. स्वयं का उत्सव भला दूसरों को दुख कैसे पहुँचा सकता है।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज मंगलवार (15-10-2013) "रावण जिंदा रह गया..!" (मंगलवासरीय चर्चाःअंक1399) में "मयंक का कोना" पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का उपयोग किसी पत्रिका में किया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. यथार्थ है, अमृतजीवी, मृतभोजी कैसे हो सकते है,किसी की हत्यारी मौत पर महोत्सव कैसे हो सकता है.

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  4. लेकिन मुझे यकीन है कि
    बकरीद हो या दसाइन
    बेज़ुबान प्राणियों की
    कुर्बानी, बलि या हत्या में
    उनकी उपस्थिति नहीं
    स्वीकृति भी नहीं होती
    बेहद सशक्‍त भाव ....

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  5. अनुराग जी इस लिस्ट से आप क्रिसमस को बाहर रख सकते थे क्योंकि वह निर्विवाद सारी दुनिया में

    मनाया जाता है।

    अलबत्ता त्योहारों का स्वरूप अब आलमी (अंतर -राष्ट्रीय )ही होता जा रहा है। हैलोवीन पर्व है मृत आत्माओं के आवाहन का पर्व है। लोग अपने घरों के बाहर उनके लिए खाना रख देते हैं। रोशनिया रखते हैं घर खुला रखते हैं ,जन विश्वास है पूर्वजों की आत्मा जीमने आतीं हैं अपने सम्बन्धियों के पास योरोप ही नहीं अमरीका में भी यह पर्व दीवानगी की हद तक मनाया जाता है। कई तो बा -कायदा खाने की मेज पे उनकी प्लेट लगाते हैं।

    ३१ अक्टूबर को मनाया जाता है यह पर्व। इन दिनों अमरीका में हेलोवीन फीवर तेज़ी पर है। हर घर की बाहर पम्पकिन रखा मिलेगा यकदम से गहरे पीले रंग का। इसकी लालटेन भी बनाई जाती है।

    भूत -प्रेत -आत्माओं के मुखौटे यहाँ खूब बिकते हैं। हेलोवीन मांगने बच्चे घर घर जाते हैं -

    होली मांगे उपला दिवाली मांगे तेल , .... वाला अंदाज़ है यहाँ भी।

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  6. सर्वाहारी मनुष्य ने अपनी जीभ के स्वाद और क्षुधा की पूर्ति के लिए यह सब आयोजन गढ़ लिया है। अपना दोष मिटाने के लिए देवताओं का नाम ले लिया होगा। इसको इस नजरिए से देखें तो लगता है कि बलि देने वाला भी इस कार्य को बहुत ठीक नहीं मानता होगा; लेकिन हाय से मनुष्य तेरी भूख के क्या कहने...!!!

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  7. श्रेष्ठ वैचारिक रचना। आखिरी पंक्ति कविता की आत्मा है।

    इस पंक्ति के लिए विशेष साधुवाद।

    "मृतभोजी नहीं हो सकते वे

    जो अमृतपान पर जीते हैं। " वाह-वाह !!!

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