बुधवार, 6 जुलाई 2011

बंद करो ये अत्याचार


मित्रों एक मित्र ने ये कविता मुझे भेजी...किसने लिखी है पता नहीं, किन्तु जिसकी भी ये कृति है उन्हें बहुत बहुत धन्यवाद...



बंद करो ये लहूधार का , जीवन का व्यापार
मूक पशू की पीड़ा समझो,अपनाओ शाकाहार

अरे मनुज ने मानवता तज , पशुता का यह मार्ग चुना
नीच कर्म यह महापाप है , सब पापों से कई गुना

दर दर भटके शांति खोजता , मानवता के नारों में
 उलझा तीन टके के पीछे , पशू वध के व्यापारों में

कहाँ सुकून मिलेगा हमको,जब हर घर में चित्कार है
लाल लहू से जीभ रंगी है , अरु हाथों में तलवार है

चोट यदि मुन्ने को लगती , तब कितनी पीड़ा होती है
क्यों कोई फर्क नहीं पड़ता,जब बकरे की अम्मा रोती है

कई माओं की छिपी व्यथा है,तेरी षटरस थाली में
कई वधों की लिखी कथा , तेरे होटों की लाली में

मंदिर में पूजे गोमाता , कब घर में आदर पाती है
दूध पिलाना बंद करे तो , गाय कतल की जाती है

आज यदि पशू रोता है तो , कल तेरी भी बारी है
इन तलवारों की धारों की , नहीं किसी से यारी है

अरे पशू की छोड़ो चिंता , अब अपनी ही बात करो
रहे नहीं जो यदि काम के ,वे बोलेंगे अपघात करो

कहो कहाँ दरकार रही , अब बाहर के शत्रु की
गर्भपात कर करते ह्त्या,खुद अपने शिशुओं की

मेरी तेरी हो या पशुओं की , अरे जान तो जान है
इसमें उसमें जो फर्क करे,वह कायर है,बेईमान है

मांसाहार का दूषण लोगों,नहीं दूर क्षितिज का रहा अन्धेरा
आज द्वार पर दस्तक देता , जाने कब कर लेगा डेरा

अरे अश्रु की धाराओं ने , अपने आशय खो डाले
अरे लहू के लाल रंगों से , खेलें बालक भोले भाले

उनके जीवन में कहाँ दया , क्या प्रेम भावना रह पायेगी
खुद ही आपको लुटा पाओगे , जब बाढ़ खेत को खायेगी

करे शूल का बीजारोपण , उगता पेड़ बबूल का
अनंत काल भुगतोगे दूषण,एक समय की भूल का

इससे पहिले की लुट जाएँ, जाग्रत हो जाना चाहिए
हम भी रहें शाकाहारी , औरों को बनाना चाहिए

अब नेक दयालू युवकों ने , छेड़ दिया अभियान
अरे निरीह पशुओं के प्रति अब,करलो युद्धविराम

तुम खुद भी हो जीव, जीव का रखो तो सम्मान
नहीं बनो कातिल हत्यारे, तुम तो हो भगवान्

अरे! एक जीवन की खातिर, कितने जीवन छीनोगे
अपनी उनकी एक जात है, कब इस सच को चीन्होगे


7 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय भाव....हर पंक्ति मन को उद्वेलित करती है ..

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  2. दिवस जी,
    इस प्रस्तुति के लिए हृदय से आभार्।
    एक एक शब्द मन के कोमल भावों को झिंझोड़ कर जाग्रत करते हुए।
    बेहद प्रभावशाली कविता।

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  3. बात तो ठीक है, परन्तु नहीं लगता है कि ऐसा होगा।

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  4. एक एक पंक्ति उद्वेलित करने वाली ............. मांसाहार, गर्भपात जैसे महापराधों के विरुद्ध एक विषद प्रतिबद्धत्ता प्रत्येक इंसान में जाग्रत होनी चाहिये ......... आभार !

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  5. बहुत ही बेहतर प्रस्तुति है

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  6. आपकी इस उत्कृष्ट प्रवि्ष्टी की चर्चा आज शुक्रवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है!

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