शनिवार, 21 अप्रैल 2012

अहिंसा की गंगोत्री



अक्सर लोगों द्वारा दुर्भावनाओं के वशीभूत, हिन्दुत्व पर हिंसक और माँसाहारी होने के आरोपण किए जाते है। किन्तु हिन्दुत्व अपने आदि-काल से ही अहिंसा प्रधान धर्म रहा है।अहिंसा परमो धर्मः ही इसका आदि-अनादि परम् उपदेश उपदेश रहा है। उतरोत्तर निम्न काल  प्रभाव से कुछ विकृतियों का पनपना सामान्य है पर इस दर्शन की यह विशेषता है कि सिद्धांतो को प्रमुखता देकर यह स्व-सुधार में सक्षम है। जैसे गंगा अपने उद्भव पर परम शुद्ध रहते हुए अपने परिचालन मार्ग में अस्वच्छ हो जाती है। किन्तु इसका जल अपनी पावनता सुरक्षित रखता है। उसी तरह वैदिक धर्म के मूल सिद्धान्त  पावन और प्रवर्तमान रहते है। यही अहिंसा का मूल  सिद्धांत वेद-उपदेशों में ग्रंथित है।  अर्थात अहिंसा गुण ही वेदों की गंगोत्री है। देखें परम् पवित्र वेदों से प्रवाहित अहिंसा की गंगोत्री……

अहिंसा को पुष्ठ करते वेदमंत्र और शास्त्र श्रलोक :-----

ऋग्वेद- 

 अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वत: परि भूरसि स इद देवेषु गच्छति (ऋग्वेद- 1:1:4)

 -हे दैदीप्यमान प्रभु ! आप के द्वारा व्याप्त ‘हिंसा रहित’ यज्ञ सभी के लिए लाभप्रद दिव्य गुणों से युक्त है तथा विद्वान मनुष्यों द्वारा स्वीकार किया गया है |

ऋग्वेद संहिता के पहले ही मण्डल के प्रथम सुक्त के चौथे ही मंत्र में यह साफ साफ कह दिया गया है कि यज्ञ हिंसा रहित ही हों। ऋग्वेद में सर्वत्र यज्ञ को हिंसा रहित कहा गया है इसी तरह अन्य तीनों वेदों में भी अहिंसा वर्णित हैं | फिर यह कैसे माना जा सकता है कि वेदों में हिंसा या पशु वध की आज्ञा है ?

अघ्न्येयं सा वर्द्धतां महते सौभगाय (ऋग्वेद- 1:164:26)

 -अघ्न्या गौ- हमारे लिये आरोग्य एवं सौभाग्य लाती हैं |

सूयवसाद भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम 
अद्धि तर्णमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती (ऋग्वेद 1:164:40)

-अघ्न्या गौ- जो किसी भी अवस्था में नहीं मारने योग्य हैं, हरी घास और शुद्ध जल के सेवन से स्वस्थ रहें जिससे कि हम उत्तम सद् गुण,ज्ञान और ऐश्वर्य से युक्त हों।

सुप्रपाणं भवत्वघ्न्याभ्य: (ऋग्वेद- 5:83:8)

-अघ्न्या गौ के लिए शुद्ध जल अति उत्तमता से उपलब्ध हो |

क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः । 
एहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन ।। (ऋग्वेद- 7:6:21:9)

-"मैं मांस भक्षी या जलाने वाली अग्नि को दूर हटाता हूँ, यह पाप का भार ढोने वाली है ; अतः यमराज के घर में जाए. इससे भिन्न जो यह दूसरे पवित्र और सर्वज्ञ अग्निदेव है, इनको ही यहाँ स्थापित करता हूँ. ये इस शक्तिशाली हविष्य को देवताओं के समीप पहुँचायें ; क्योंकि ये सब देवताओं को जानने वाले है."

आरे गोहा नृहा वधो वो अस्तु (ऋग्वेद 7:56:17)

-ऋग्वेद गौ- हत्या को जघन्य अपराध घोषित करते हुए मनुष्य हत्या के तुल्य मानता है और ऐसा महापाप करने वाले के लिये दण्ड का विधान करता है |

वैदिक कोष निघण्टु में गौ या गाय के पर्यायवाची शब्दों में अघ्न्या, अहि- और अदिति का भी समावेश है। निघण्टु के भाष्यकार यास्क इनकी व्याख्या में कहते हैं -अघ्न्या – जिसे कभी न मारना चाहिए। अहि – जिसका कदापि वध नहीं होना चाहिए | अदिति – जिसके खंड नहीं करने चाहिए। इन तीन शब्दों से यह भलीभांति विदित होता है कि गाय को किसी भी प्रकार से पीड़ित नहीं करना चाहिए । प्राय: वेदों में गाय इन्हीं नामों से पुकारी गई है।

घृतं वा यदि वा तैलं, विप्रोनाद्यान्नखस्थितम ! 
यमस्तदशुचि प्राह, तुल्यं गोमासभक्षण: !! 
माता रूद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाममृतस्य नाभि: ! 
प्र नु वोचं चिकितुपे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ट !! (ऋग्वेद- 8:101:15)

अर्थात- रूद्र ब्रह्मचारियों की माता, वसु ब्रह्मचारियों के लिए दुहिता के समान प्रिय, आदित्य ब्रह्मचारियों के लिए बहिन के समान स्नेहशील, दुग्धरूप अमृत के केन्द्र इस (अनागम) निर्दोष (अदितिम) अखंडनीया (गाम) गौ को (मा वधिष्ट) कभी मत मार. ऎसा मैं (चिकितेषु जनाय) प्रत्येक विचारशील मनुष्य के लिए (प्रनुवोचम) उपदेश करता हूँ.

यः पौरुषेयेण क्रविषा समङ्क्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः 
यो अघ्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च (ऋग्वेद-10:87:16)

-मनुष्य, अश्व या अन्य पशुओं के मांस से पेट भरने वाले तथा दूध देने वाली अघ्न्या गायों का विनाश करने वालों को कठोरतम दण्ड देना चाहिए |

ऋग्वेद के ६ वें मंडल का सम्पूर्ण २८ वां सूक्त गाय की महिमा बखान रहा है –

१.आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु

-प्रत्येक जन यह सुनिश्चित करें कि गौएँ यातनाओं से दूर तथा स्वस्थ रहें |

२.भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने

-गाय की देख-भाल करने वाले को ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त होता है |

३.न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति

-गाय पर शत्रु भी शस्त्र का प्रयोग न करें |

४. न ता अर्वा रेनुककाटो अश्नुते न संस्कृत्रमुप यन्ति ता अभि

-कोइ भी गाय का वध न करे |

५.गावो भगो गाव इन्द्रो मे अच्छन्

-गाय बल और समृद्धि लातीं हैं |

६. यूयं गावो मेदयथा

-गाय यदि स्वस्थ और प्रसन्न रहेंगी तो पुरुष और स्त्रियाँ भी निरोग और समृद्ध होंगे |

७. मा वः स्तेन ईशत माघशंस:

-गाय हरी घास और शुद्ध जल क सेवन करें | वे मारी न जाएं और हमारे लिए समृद्धि लायें |

अथर्ववेद-

वत्सं जातमिवाघ्न्या (अथर्ववेद- 3:30:1)

-आपस में उसी प्रकार प्रेम करो, जैसे अघ्न्या – कभी न मारने योग्य गाय – अपने बछड़े से करती है |

ब्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम् एष वां भागो निहितो 
रत्नधेयाय दान्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च (अथर्ववेद- 6:140:2)

-हे दंतपंक्तियों! चावल, जौ, उड़द और तिल खाओ। यह अनाज तुम्हारे लिए ही बनाये गए हैं| उन्हें मत मारो जो माता–पिता बनने की योग्यता रखते हैं|

शिवौ ते स्तां ब्रीहीयवावबलासावदोमधौ ! 
एतौ यक्ष्मं विबाधेते एतौ मुण्चतौ अंहस: !! (अथर्ववेद- 8:2:18)

-हे मनुष्य ! तेरे लिए चावल, जौं आदि धान्य कल्याणकारी हैं. ये रोगों को दूर करते हैं और सात्विक होने के कारण पाप वासना से दूर रखते हैं.

य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: ! 
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)

-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !

अनागोहत्या वै भीमा कृत्ये मा नो गामश्वं पुरुषं वधीः (अथर्ववेद-10:1:29)

-निर्दोषों को मारना निश्चित ही महापाप है | हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार |

धेनुं सदनं रयीणाम् (अथर्ववेद- 11:1:4)

-गाय सभी ऐश्वर्यों का उद्गम है |

"मा हिंस्यात सर्व भूतानि "

-किसी भी प्राणी की हिंसा ना करे.

पुष्टिं पशुनां परिजग्रभाहं चतुष्पदां द्विपदां यच्च धान्यम ! 
पय: पशुनां रसमोषधीनां बृहस्पति: सविता मे नियच्छात !! (अथर्ववेद- 19:31:5)

इस मन्त्र में भी यही कहा है कि- मैं पशुओं की पुष्टि वा शक्ति को अपने अन्दर ग्रहण करता हूं और धान्य का सेवन करता हूँ. सर्वोत्पादक ज्ञानदायक परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बनाया है कि (पशुनां पय:) गौ, बकरी आदि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण किया जाये न कि मांस तथा औषधियों के रस का आरोग्य के लिए सेवन किया जाए. यहां भी "पशुनां पयइति बृहस्पति: मे नियच्छात:" अर्थात- ज्ञानप्रद परमेश्वर नें मेरे लिए यह नियम बना दिया है कि मैं गवादि पशुओं का दुग्ध ही ग्रहण करूँ, स्पष्टतया मांसनिषेधक है !

यजुर्वेद-

अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)

-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |

पशूंस्त्रायेथां (यजुर्वेद- 6:11)

-पशुओं का पालन करो |

ऊर्जं नो धेहि द्विपदे चतुष्पदे (यजुर्वेद-11:83)

-सभी दो पाए और चौपाए प्राणियों को बल और पोषण प्राप्त हो |

विमुच्यध्वमघ्न्या देवयाना अगन्म (यजुर्वेद-12:73)

-अघ्न्या गाय और बैल तुम्हें समृद्धि प्रदान करते हैं |

घृतं दुहानामदितिं जनायाग्ने मा हिंसी: (यजुर्वेद-13:49)

-सदा ही रक्षा के पात्र गाय और बैल को मत मार |

द्विपादव चतुष्पात् पाहि (यजुर्वेद-14:8)

-हे मनुष्य ! दो पैर वाले की रक्षा कर और चार पैर वाले की भी रक्षा कर |

अन्तकाय गोघातं (यजुर्वेद-30:18)

-गौ हत्यारों का अंत हो |

यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानत: 
तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यत: (यजुर्वेद- 40:7)

-जो सभी भूतों में अपनी ही आत्मा को देखते हैं, उन्हें कहीं पर भी शोक या मोह नहीं रह जाता क्योंकि वे उनके साथ अपनेपन की अनुभूति करते हैं | जो आत्मा के नष्ट न होने में और पुनर्जन्म में विश्वास रखते हों, वे कैसे यज्ञों में पशुओं का वध करने की सोच भी सकते हैं ? वे तो अपने पिछले दिनों के प्रिय और निकटस्थ लोगों को उन जिन्दा प्राणियों में देखते हैं |

वेदों में पशुओं की हत्या का विरोध तो है ही बल्कि गौ- हत्या पर तो तीव्र आपत्ति करते हुए उसे निषिद्ध माना गया है | यजुर्वेद में गाय को जीवनदायी पोषण दाता मानते हुए गौ हत्या को वर्जित किया गया है |

महाभारत ---

अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो तपः। 
अहिंसा परमो सत्यं यतो धर्मः प्रवर्तते॥
अहिंसा परमो धर्मः, अहिंसा परमो दमः। 
अहिंसा परम दानं, अहिंसा परम तपः॥ 
अहिंसा परम यज्ञः अहिंसा परमो फलम्‌। 
अहिंसा परमं मित्रः अहिंसा परमं सुखम्‌॥ (महाभारत/अनुशासन पर्व-115:23/116:28,29)

"अहिंसा सकलो धर्मः।" (अनुशासन पर्व- महाभारत) 
भावार्थ:- सभी प्रकार की धार्मिक और सात्विक प्रवृत्तियों का समावेश केवल अहिंसा में हो जाता है।


अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः। (आदिपर्व- 11:13)

-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।

प्राणिनामवधस्तात सर्वज्यायान्मतो मम । 
अनृतं वा वदेद्वाचं न हिंस्यात्कथं च न ॥ (कर्णपर्व-69:23)

-मैं प्राणियों को न मारना ही सबसे उत्तम मानता हूँ । झूठ चाहे बोल दे, पर किसी की हिंसा न करे ।

सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् । 
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)

-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।

मनुस्मृति में माँसाहार निषेध-

यद्ध्यायति यतकुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च ।
तद्वाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किञ्चन ॥ (मनुस्मृति- 5:47)

-ऐसा व्यक्ति जो किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता तो उसमें इतनी शक्ति आ जाती है कि वह जो चिंतन या कर्म करता है तथा जिसमें एकाग्र होकर ध्यान करता है वह उसको बिना किसी प्रयत्न के प्राप्त हो जाता है

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित ।
न च प्राणिवशः स्वर्ग् यस्तस्मान्मांसं क्विर्जयेत् ॥ (मनुस्मृति- 5:48)

-किसी दूसरे जीव का वध किया जाये तभी मांस की प्राप्ति होती है इसलिए यह निश्चित है कि जीव हिंसा से कभी स्वर्ग नही मिलता, इसलिए सुख तथा स्वर्ग को पाने की कामना रखने वाले लोगों को मांस भक्षण वर्जित करना चाहिए।

अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी । 
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)

अर्थ - अनुमति = मारने की आज्ञा देने, मांस के काटने, पशु आदि के मारने, उनको मारने के लिए लेने और बेचने, मांस के पकाने, परोसने और खाने वाले - ये आठों प्रकार के मनुष्य घातक, हिंसक अर्थात् ये सब एक समान पापी हैं ।

मां स भक्षयिताऽमुत्र यस्य मांसमिहाद् म्यहम्। 
एतत्मांसस्य मांसत्वं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ (मनुस्मृति- 5:55)

अर्थ – जिस प्राणी को हे मनुष्य तूं इस जीवन में खायेगा, अगामी जीवन मे वह प्राणी तुझे खायेगा।

"अहिंसया च भूतानानमृतत्वाय कल्पते।" (मनु-स्मृति) 
भावार्थ:- अहिंसा के फल स्वरूप, प्राणियों को अमरत्व पद की प्राप्ति होती है।

अन्य ग्रंथ-

"अहिंसा परमं दानम्।" (पद्म-पुराण) 
 भावार्थ:- अहिंसा स्वरूप अभयदान ही परम दान है। 

"अहिंसा परमं तपः।" (योग-वशिष्ट) 
 भावार्थ:- अहिंसा ही सबसे बड़ी तपस्या है। 

"अहिंसा परमं ज्ञानम्।" (भागवत-स्कंध) 
 भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। 

"अहिंसा परमं पदम्।" (भागवत-स्कंध) 
भावार्थ:- अहिंसा ही सर्वोत्तम आत्मविकास अवस्था है। 

"अहिंसा परमं ध्यानम्।" (योग-वशिष्ट) 
भावार्थ:- अहिंसा की परिपालना ही उत्कृष्ट ध्यान है।

"अहिंसैव हि संसारमरावमृतसारणिः।" (योग-शास्त्र) 
भावार्थ:- अहिंसा ही संसार रूप मरूस्थल में अमृत का मधुर झरना है। 

"रूपमारोग्यमैश्वर्यमहिंसाफलमश्नुते।" (बृहस्पति स्मृति) 
भावार्थ:- सौन्दर्य, नीरोगता एवं ऐश्वर्य सभी अहिंसा के फल है। 


"ये न हिंसन्ति भूतानि शुद्धात्मानो दयापराः।" (वराह-पुराण) 
भावार्थ:- जो प्राण-भूत जीवों की हिंसा नहीं करते, वे ही आत्माएं पवित्र और दयावान है।

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

सूरज को दिया दिखाने की जिद।

मैंने देखी है कुछ लोगों की इस दुनिया में, 
      मांसाहार को शाकाहार से श्रेष्ठ बताने की जिद। 
जगमगाते सूर्यदेव को अंधियारा बतलाकर, 
      जुगनू की टिमटिमाहट को रौशन कहवाने की जिद। 

हलाल होते हुए तड़पते जीव को "दर्द नहीं है" कह कर, 
      अन्नाहार में भ्रूण हत्या साबित कराने की जिद। 
"गौ शुद्ध मानी गयी है" का मुखौटा ओढ़ कर, 
      गौमाता को वैदिक यज्ञों में बलि चढ़वाने की जिद। 

गोरक्षक इन्द्रदेव को ऋषभ कंद की आहुति, 
      वृषभों की बलि की सीख बनाने की जिद। 
कहीं और के लाये संस्कृत शब्दों को, 
      वेदवाणी बना कर पेश कराने की जिद। 

पोषण की झूठी, घुमावदार बातों के झांसों में, 
      उच्चाहारियों को निम्न भोज्य पर खींच लाने की जिद। 
भारत की महान संस्कृति को लीप पोतकर, 
      अहिंसा के आदेश को हिंसात्मक जतलाने की जिद। 

शाक फलों को ग्रहण करने में पादप हिंसा ढूंढ कर, 
      पशु काटने को प्रभु आज्ञा साबित कराने की जिद। 
टमाटर जैसे पौधे को मांसाहारी कह कर, 
      मछली को आलू सा शाकाहार कहलवाने की जिद। 

वैदिक संस्कृत पर अपने अधूरे अर्थ थोप कर, 
      वेदों को पशु हिंसापूर्ण जतलाने की जिद। 
बाहरी संस्कृतियों के निचोड़ों को ला कर, 
      भारतीय संस्कृति पर पानी चढाने की जिद। 

किसी महापुरुष के प्रिय पुत्र कुर्बान करने को,
      बकरों की कटवाई की आज्ञा बनाने की जिद। 
जीभ के स्वाद के क्रूर आनंद की पूर्ति के लिए, 
      परमपिता को ही क्रूर साबित कराने की जिद। 

जिस धर्म की आज्ञा है कि प्रतीकों को न पकड़ो, 
      उसी धर्म को पुरजोर प्रतीकात्मक बनाने की जिद। 
गलत परम्पराओं के विरोध में खड़े ज्ञानी पुरुषों को, 
      स्वयं एक परंपरा भर में बदलवाने की जिद। 

जुगनुओं की टिमटिमाती रौशनियों में, 
      खलिहान में सुई खोज लाने की जिद। 
कबसे देख रही हूँ बारम्बार दुनिया में , 
      सूरज को दिया दिखाने की जिद।

-शिल्पा मेहता

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

सब्जी-फ़लों के रोग निवारक गुण


गाजर के गुण:
             गाजर मे प्रचुर मात्रा में विटामिन ए होता है। यह विटामिन बीटा केरोटीन (beta carotene) के रूप में मौजूद रहता है। लिवर में बीटा केरोटीन विटामिन ए में बदल जाता है।गाजर के रस में कैंसर विरोधी तत्व पाये जाते हैं। अनुसंधान में पाया गया है कि गाजर में कैंसर को ठीक करने के गुण विद्यमान हैं। यह फ़ेफ़डे, स्तन और बडी आंत के कैंसर से बचाव करता है।चर्म विकृतियों में भी गाजर का उपयोग लाभप्रद रहता है। चेहरे पर कांति के लिये गाजर का उपयोग किया जाना चाहिये।
                  गाजर हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक  क्षमता को बढाता है। इसे टोनिक के रूप में व्यवहार करना चाहिये। यह नेत्रों के लिये बेहद फ़ायदेमंद है।बुढापे में आने वाले मोतियाबिंद की रोकथाम करता है। गाजर हमारे शरीर के सेल्स को तंदुरस्त रखते हुए बुढापा आने की गति को धीमा करता है।शरीर की खरोंच, घाव ठीक करने के लिये गाजर को कूटकर लगाना चाहिये। गाजर को मेश करके उसमे थोडा सा शहद मिलाकर फ़ेस पेक की तरह इस्तेमाल करने से चेहरे की खूबसूरती में इजाफ़ा होता है।इसमें संक्रमण (इन्फ़ेक्शन) विरोधी तत्व होते हैं। गाजर में अल्फा केरोटीन और ल्युटीन (lutein) तत्व होने की वजह से हृदय रोगों से भी बचाव करता है। शरीर को स्वच्छ और विजातीय पदार्थों से मुक्त रखने में गाजर की महती भूमिका हो सकती है।यह लिवर की सहायता करके पित्त दोष का निवारण करता है और चर्बी घटाता है।

सेब के गुण:
               सेब में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते हैं। इसमें खनिज तत्व और विटामिन अधिक मात्रा में मौजूद रहते है। सेब में उपस्थित लोह तत्व से शरीर में नया खून बनने में मदद मिलती है। गुर्दे की पथरी वाले रोगियों को नियमित रूप से सेवफ़ल इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। सेब में कब्ज तोडने की अद्भुत शक्ति है। कच्चे सेब के नियमित उपयोग से कब्ज का स्थाई इलाज हो जाता है। उबले सेब  खाने से बच्चों के अतिसार(दस्त लगने) में लाभ होता है।

                हृदय-रोगों में सेब गुणकारी सिद्ध हुआ है। उच्च रक्तचाप में इसका उपयोग लाभदायक है। इसमें अच्छी मात्रा में पोटेशियम और फ़ास्फ़ोरस पाया जाता और सोडियम न के बराबर होता है। यही कारण है कि  सेब  हृदय रोगों में इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। इसमे पेक्टीन (pectin) होता है जो कोलेस्टरोल(LDL) को घटाता है। दो सेब  नित्य खाने से कोलेस्टरोल १६ % तक कम हो जाता है।  सेब  में उपस्थित पेक्टीन शरीर मे गेलेक्टेरुनिक एसिड (galacturonic acid) उत्पन्न करता है जिससे इन्सुलिन की जरूरत कम हो जाती है। इस प्रकार  सेब  डायबीटीज में हितकारी है। इसीलिये तो कहते हैं "an apple a day keeps doctor away."

चुकंदर के गुण:
        
               
 पारंपरिक रूप से चुकंदर शरीर में नया खून बनाने वाले मूल के रूप में जाना जाता है। चुकंदर लिवर, पित्ताशय, तिल्ली, और गुर्दे के विकारों में लाभप्रद पाया गया है। इन अंगों के दूषित तत्वों को बाहर निकालने की शक्ति चुकंदर में पाई गई है। चुकंदर में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। केल्शियम, फ़ास्फ़ोरस और लोह तत्व भी खूब होता है। इसमें पाये जाने वाले लोहे से कब्ज नहीं होती है। चुकंदर अपने क्षारीय तत्वों की वजह से अम्लपित्त(एसिडिटी) में उपयोगी रहता है।

कटहल के गुण: 
               कटहल के फल में कई प्रकार के महत्वपूर्ण प्रोटीन्स, कार्बोहाईड्रेट्स और विटामिन्स पाये जाते हैं। सब्जी के तौर पर इस्तेमाल किये जाने वाले कटहल से अचार और पापड भी बनाये जाते हैं। कटहल की पत्तियों की राख में अल्सर को ठीक करने के गुण होते हैं। पके हुए कटहल का गूदा निकालकर भली प्रकार मेश करें, फ़िर उबालकर ठंडा करें,यह मिश्रण पीना जबर्दस्त स्फ़ूर्तिदायक होता है। यह मिश्रण शरीर में टानिक का काम करता है।

               कटहल के छिलकों से निकलने वाले दूध को गांठनुमा सूजन, कटी-फटी त्वचा अथवा घाव पर लगाने से लाभ होता है। कटहल की कोंपलों को कूटकर गोली बनालें। इनको चूसने से स्वर भंग और गले के रोगों में फ़ायदा होता है। इसकी पत्तियों का रस शूगर रोगियों और उच्च रक्तचाप में लाभ पहुंचाता है।

केला के गुण: 
               केला संसार भर में सबसे विस्तृत क्षेत्र में उपयोग होने वाला फल है। इसे छिलका उतारकर या छिलका सहित खाया जा सकता है। इसमें सोडियम की मात्रा कम और पोटेशियम ज्यादा होने से उच्च रक्तचाप में लाभप्रद फल  है। हाई ब्लड प्रेशर की जटिलताओं को भी नियंत्रित करता है। केले में पाया जाने वाला रेशा भी इसमें सहायता करता है। केले में उपस्थित पोटेशियम के प्रभाव से गुर्दों के जरिये केल्शियम की कम हानि होती है और इस प्रकार केला अस्थि-क्षरण रोग में लाभ देता है।

                अतिसार रोग मे केला अत्यंत हितकारी है। इससे इलेक्ट्रोलाईट्स की पूर्ति होती है और पौषक तत्वों का शरीर में संचय होता है। केले में अम्लता विरोधी तत्वों की मौजूदगी से पेप्टिक अल्सर के रोगियों को केला खाने की सलाह दी जा सकती है। केले में उपस्थित पेक्टीन से आंतों की कार्यकुशलता बढती है और कब्ज रोग में फ़ायदा होता है। कच्चा केला शुगर रोगियों के लिये बेहद लाभप्रद है। केले के अंदर केरोटोनाईड होता है,इससे विटामिन ए की पूर्ति होती है और रात्रि-अंधत्व रोग में इस्तेमाल करना प्रयोजनीय है। पर्यात मात्रा में केले का सेवन करते रहने से किडनी के  कैंसर से बचाव हो सकता है लेकिन प्रोसेस्ड जूस ज्यादा उपयोग करने से किडनी के कैंसर की संभावना बढ जाती है।

पाईनेपल(अनानास) के गुण:
              वैसे तो सभी ताजा फ़लों में प्रचुर मात्रा में एन्जाईम्स होते हैं लेकिन अनानास में एक अद्भुत एन्जाईम होता है जिसे ब्रोमेलैन (bromelain) कहा जाता है।ब्रोमेलैन की उपस्थिति से यह फ़ल शरीर के किसी भाग में आई सूजन में लाभकारी है और पीडानाशक भी है। इसमें विटामिन सी का भंडार है।  अनानास  चोंट, खरोंच, मोच, मांसपेशी तनाव, शोथ में हितकारी फ़ल माना गया है। इसके सूजन विरोधी गुण से संधिवात और गठिया रोगी लाभान्वित हो सकते हैं। शल्य क्रिया के बाद की सूजन ठीक करने में भी इसका व्यवहार उपयोगी है। ब्रोमैलेन प्रोटीन पचाने में भी सहयोगी रहता है। यहां यह भी बताना उचित होगा कि एन्जाईम्स ताप से नष्ट हो जाते हैं, इसलिये  अनानास या जूस को उबालना लाभप्रद नहीं है।   

जामुन के गुण:

1) जामुन की गुठली चिकित्सा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी मानी गई है। इसकी गुठली के अंदर की गिरी में 'जंबोलीन' नामक ग्लूकोसाइट पाया जाता है। यह स्टार्च को शर्करा में परिवर्तित होने से रोकता है। इसी से मधुमेह के नियंत्रण में सहायता मिलती है।
२)जामुन के कच्चे फलों का सिरका बनाकर पीने से पेट के रोग ठीक होते हैं। अगर भूख कम लगती हो और कब्ज की शिकायत रहती हो तो इस सिरके को ताजे पानी के साथ बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह और रात्रि, सोते वक्त एक हफ्ते तक नियमित रूप से सेवन करने से कब्ज दूर होती है और भूख बढ़ती है।
३) इन दिनों कुछ देशों में जामुन के रस से विशेष औषधियों का निर्माण किया जा रहा है, जिनके माध्यम से सिर के  बाल सफेद होना बंद हो जाएँगे।
४) गले के रोगों में जामुन की छाल को बारीक पीसकर सत बना लें। इस सत को पानी में घोलकर 'माउथ वॉश' की तरह गरारा करना चाहिए। इससे गला तो साफ होगा ही, साँस की दुर्गंध भी दूर हो जाएगी और मसूढ़ों की बीमारी से भी राहत मिलेगी।
५)  जामुन यकृत को शक्ति प्रदान करता है और मूत्राशय में आई असामान्यता को सामान्य बनाने में सहायक होता है।
६) जामुन के रस को शहद, आँवले या गुलाब के फूल का रस बराबर मात्रा में मिलाकर एक-दो माह तक प्रतिदिन सुबह के वक्त सेवन करने से रक्त की कमी एवं शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। यौन तथा स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।
७) जामुन के एक किलोग्राम ताजे फलों का रस निकालकर ढाई किलोग्राम चीनी मिलाकर शरबत जैसी चाशनी बना लें। इसे एक ढक्कनदार साफ बोतल में भरकर रख लें। जब कभी उल्टी-दस्त या हैजा जैसी बीमारी की शिकायत हो, तब दो चम्मच शरबत और एक चम्मच अमृतधारा मिलाकर पिलाने से तुरंत राहत मिल जाती है।
८)  जामुन और आम का रस बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से मधुमेह के रोगियों को लाभ होता है।
९) गठिया के उपचार में भी जामुन बहुत उपयोगी है। इसकी छाल को खूब उबालकर बचे हुए घोल का लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में आराम मिलता है।

                जामुन स्वाद में खट्टा-मीठा होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। इसमें उत्तम किस्म का शीघ्र अवशोषित होकर रक्त निर्माण में भाग लेने वाला तांबा पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। यह त्वचा का रंग बनाने वाली रंजक द्रव्य मेलानिन कोशिका को सक्रिय करता है। साथ ही यह रक्तहीनता तथा ल्यूकोडर्मा की उत्तम औषधि है। इतना ध्यान रहे कि अधिक मात्रा में जामुन खाने से शरीर में जकड़न एवं बुखार होने की सम्भावना भी रहती है। इसे कभी खाली पेट नहीं खाना चाहिए और न ही इसके खाने के बाद दूध पीना चाहिए।

संतरा (नारंगी) के गुण:
             नारंगी रंग का दिखने वाला संतरा ठंडा, तन और मन को प्रसन्नता देने वाला फल है। यह जितना खाने में स्वादिष्ट होता है उतना ही स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होता है। एक व्यक्ति को जितनी विटामिन ‘सी’ की आवश्यकता होती है, वह एक संतरें को प्रतिदिन खाते रहने से पूरी हो जाती है। संतरे के सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है, चुस्ती-फुर्ती बढ़ती है, त्वचा में निखार आता है तथा सौंदर्य में वृद्धि होती है। प्रस्तुत है इसके कुछ प्रयोग- औषधीय गुण:
1. संतरे का सेवन जहाँ जुकाम में राहत पहुँचाता है, वहीं सूखी खाँसी में भी फायदा करता है। यह कफ को पतला करके बाहर निकालता है।
2. संतरे में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, लोहा और पोटेशियम काफी होता है। संतरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें विद्यमान फ़्रक्टोज़, डेक्स्ट्रोज, खनिज एवं विटामिन, शरीर में पहुंचते ही ऊर्जा देना प्रारंभ कर देते हैं।
3. संतरे का एक गिलास रस तन-मन को शीतलता प्रदान कर थकान एवं तनाव दूर करता है, हृदय तथा मस्तिष्क को नई शक्ति व ताजगी से भर देता है।
4. पेचिश की शिकायत होने पर संतरे के रस में बकरी का दूध मिलाकर लेने से काफी फायदा मिलता है।
5. संतरे का नियमित सेवन करने से बवासीर की बीमारी में लाभ मिलता है। रक्तस्राव को रोकने की इसमें अद्भुत क्षमता है।
6. तेज बुखार में संतरे के रस का सेवन करने से तापमान कम हो जाता है। इसमें उपस्थित साइट्रिक अम्ल मूत्र रोगों और गुर्दा रोगों को दूर करता है।
7. दिल के मरीज को संतरे का रस शहद मिलाकर देने से आश्चर्यजनक लाभ मिलता है।
8. संतरे के सेवन से दाँतों और मसूड़ों के रोग भी दूर होते हैं।
9. छोटे बच्चों के लिए तो संतरे का रस अमृततुल्य है। उन्हें स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए दूध में चौथाई भाग मीठे संतरे का रस मिलाकर पिलाने से यह एक आदर्श टॉनिक का काम करता है।
10. जब बच्चों के दाँत निकलते हैं, तब उन्हें उल्टी होती है और हरे-पीले दस्त लगते हैं। उस समय संतरे का रस देने से उनकी बेचैनी दूर होती है तथा पाचन शक्ति भी बढ़ जाती है।
11. पेट में गैस, अपच, जोड़ों का दर्द, उच्च रक्तचाप, गठिया, बेरी-बेरी रोग में भी संतरे का सेवन बहुत कुछ लाभकारी होता है।
12. गर्भवती महिलाओं तथा यकृत रोग से ग्रसित महिलाओं के लिए संतरे का रस बहुत लाभकारी होता है। इसके सेवन से जहाँ प्रसव के समय होने वाली परेशानियों से मुक्ति मिलती है, वहीं प्रसव पीड़ा भी कम होती है। बच्चा स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट पैदा होता है|
13. संतरे के सूखे छिलकों का महीन चूर्ण गुलाब जल या कच्चे दूध में मिलाकर पीसकर आधे घंटे तक लेप लगाने से कुछ ही दिनों में चेहरा साफ, सुंदर और कांतिमान हो जाता है। कील मुँहासे-झाइयों व साँवलापन दूर होता है।
14. संतरे के ताजे फूल को पीसकर उसका रस सिर में लगाने से बालों की चमक बढ़ती है। बाल जल्दी बढ़ते हैं और उसका कालापन बढ़ता है।

आम के गुण:
           आम सिर्फ स्वाद में ही नम्बर वन नहीं है, यह अनेक गुणों का भी खजाना है। आइये जानते हैं कि आम किन-किन घातक बीमारियों में मिटाने में हमारी मदद कर सकता है:

1. शहद के साथ पके आम के सेवन से क्षयरोग एवं प्लीहा के रोगों में लाभ होता है तथा वायु और कफ दोष दूर होते हैं।
2. यूनानी चिकित्सकों के अनुसार, पका आम आलस्य को दूर करता है तथा मूत्र संबंधी रोगों का सफाया करता है।
3. प्राकृतिक रूप से पका हुआ आम क्षयरोग यानी टीबी को मिटाता है, गुर्दे एवं बस्ति (मूत्राशय) की खोई हुई शक्तियों को लौटाता है।
4. जिन लोगों को शुक्रप्रमेह शारीरिक विकारों और वात यानी वायु संबंधी दोषों के कारण संतानोत्पत्ति न होती हो उनके लिए पका आम किसी वरदान से कम नहीं है। मतलब कि संतान सुख से वंचित दंपत्ती के लिये आम बेहद लाभदायक होता है।
5. प्राकृतिक रूप से पके हुए ताजे आम के सेवन से पुरूषों में शुक्राणुओं की कमी, नपुंसकता, दिमागी कमजोरी आदि रोग दूर होते हैं।
6. कच्चे और पके दोनों तरह के आम कई तरह की किस्मों में मिलते हैं । कच्चे आम में गैलिक एसिड (gallic acid) के कारण खटास होती है। आम के पकने के साथ उसका रंग भी सफेद से पीला हो जाता है। यही पीले रंग का कैरोटीन हमारे शरीर में जाकर विटामिन 'ए' में परिवर्तित हो जाता है। इसमें विटामिन 'सी' भी काफी होता है।

कच्चा आम-
            कच्चे आम में बहुत से गुण पाए जाते हैं। कच्चे आम को आग में भूनकर पानी में मसलकर आम का पन्ना बनाते हैं। फिर इसमे भुना हुआ जीरा, सेंधानमक और कालीमिर्च डालते हैं। इस पन्ना को पीने से लू लगने के रोग में आराम आता है। आम के पन्ना को शरीर पर मलने से ठण्डक मिलती है।
7. पका आम-
मीठे और पके आम शरीर में वीर्य को बढ़ाने वाले, ताकत पैदा करने वाले, त्वचा को निखारने वाले, ठंडे और पित्त को सन्तुलित रखने वाले होते हैं।
8. आमरस-
आम का रस भारी- ताकत बढ़ाने वाला, वात को हरने वाला, दस्त लाने वाला, प्यास को कम करने वाला और शरीर में कफ की मात्रा को बढ़ाने वाला होता है। अगर आम के रस को निकालकर उसमे बराबर मात्रा में दूध और सफेद बूरा या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर कपड़े में छानकर इस्तेमाल किया जाए तो ये बहुत ही स्वादिष्ट आम का रस बन जाता है।
9. दूध और मिश्री मिला हुआ आम का रस शरीर के अन्दर से पित्त को समाप्त करता है। ये पुष्टिदायक, रुचिकारक और वीर्य तथा बल को बढ़ाने वाला होता है। ये आम का रस स्वाद में मीठा और तासीर में ठंडा होता है। आम का रस यक्ष्मा (टी.बी) के रोगियों के लिए बहुत ही लाभकारी है। इसको पीने से बुखार तथा खांसी जैसे रोग दूर हो जाते हैं। यक्ष्मा (टी.बी ) के रोगी की सांस जब चढ़ने लगती है, बलगम में खून आता हो तो ऐसे समय में रोगी को आम का रस देने से बहुत लाभ होता है।
कब न खाएँ :
भूखे पेट आम न खाएँ। इसके अधिक सेवन से रक्त विकार, कब्ज और पेट में गैस बनती है। कच्चा आम अधिक खाने से गला दर्द, अपच, पेट दर्द हो सकता है। कच्चा आम खाने के तुरंत बाद पानी न पिएँ। मधुमेह के रोगी आम से परहेज करें। खाने से पहले आम को ठंडे पानी या फ्रिज में रखें, इससे इसकी गर्मी निकल जाएगी।

करेला के गुण:
            एक असाध्य बीमारी है मधुमेह ‘डायबिटीज’ । करेला मधुमेह के रोगियों के लिए ‘अमृत’ तुल्य है। 100 मिली. के रस में इतना ही पानी मिलाकर दिन में तीन बार लेने से लाभ होता है और प्रात: चार किलोमीटर टहलना चाहिए तथा मिठाई खाने से परहेज रखना चाहिए। करेला मधुमेह के अलावा अन्य शारीरिक तकलीफों में भी लाभदायक है। कब्ज: नित्य करेला सेवन करने से कब्ज दूर होता है। यह एक अनुपम सब्जी है और इसमें ज्यादा तेल-मसाले नहीं डालने चाहिए। पीलिया: ताजा करेले का रस सुबह-शाम पीने से लाभ होता है। दमा: दमा के मरीज भी करेले का रस सुबह खाली पेट लेकर राहत पा सकते हैं। सब्जी भी ज्यादा खानी चाहिए। पथरी: पथरी गुर्दे की हो या मूत्राशय की, इसे तोड़कर बाहर निकालने की क्षमता करेला रखता है। करेले का रस दिन में दो बार और दोनों समय भोजन में करेले की सब्जी खानी चाहिए। खूनी बवासीर : मस्से फटने से रक्तस्राव होता है जिसे खूनी बवासीर कहा जाता है। रोगी नित्य दिन में दो समय करेले के रस में दो चम्मच शक्कर मिलाकर पिये तो लाभ होगा। पाचन शक्ति : यदि पाचन शक्ति कमजोर हो तो किसी भी प्रकार करेले का नित्य सेवन करने से पाचन शक्ति मजबूत होती है। करेला स्वयं भी शीघ्र पचता है। रक्त शुद्धि : करेला खून की शुद्धि करने में पूरी तरह सक्षम है। यदि त्वचा-रोग हो तो भी रक्त-शुद्धि हेतु करेले का रस कुछ दिनों तक आधा-आधा कप पीना लाभदायक है। इस प्रकार कड़ुवा करेला अनेकों रोगों में औषधि रूप में काम आ सकता है बशर्ते उसे उसी रूप में लिया जाये- रस या सब्जी बनाकर।

लौकी के गुण:
            सब्जी के रुप में खाए जाने वाली लौकी हमारे शरीर के कई रोगों को दूर करने में सहायक होती है। यह बेल पर पैदा होती है और कुछ ही समय में काफी बड़ी हो जाती है। वास्तव में यह एक औषधि है और रोगियों पर इसका उपयोग  सलाद के रूप में अथवा रस निकालकर या सब्जी के रुप में एक लंबे समय से किया जाता रहा है। लौकी को कच्चा भी खाया जाता है, यह पेट साफ करने में भी बड़ा लाभदायक साबित होती है और शरीर को स्वस्थ और शुद्ध भी बनाती है। लंबी तथा गोल दोनों प्रकार की लौकी वीर्य वर्धक , पित्त तथा कफनाशक और धातु को पुष्ट करने वाली होती है। आइए इसके औषधीय गुणों पर एक नज़र डालते हैं-
1. हैजा होने पर 25 एम.एल. लौकी के रस में आधा नींबू का रस मिलाकर धीरे-धीरे पिएं। इससे मूत्र बहुत आता है।
2. खांसी, टीबी, सीने में जलन आदि में भी लौकी बहुत उपयोगी होती है।
3. हृदय रोग में, विशेषकर भोजन के पश्चात एक कप लौकी के रस में थोडी सी काली मिर्च और पुदीना डालकर पीने से हृदय रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
4. लौकी में श्रेष्ठ किस्म का पोटेशियम प्रचुर मात्रा में मिलता है, जिसकी वजह से यह गुर्दे के रोगों में बहुत उपयोगी है और इससे पेशाब खुलकर आता है।
5. लौकी श्लेष्मा रहित आहार है। इसमें खनिज लवण अच्छी मात्रा में मिलते है।
6. लौकी के बीज का तेल कोलेस्ट्रॉल को कम करता है तथा हृदय को शक्ति देता है। यह रक्त की नाडि़यों को भी तंदुरस्त बनाता है। लौकी का उपयोग आंतों की कमजोरी, कब्ज, पीलिया, उच्च- रक्त्चाप, हृदय रोग, मधुमेह, शरीर में जलन या मानसिक उत्तेजना आदि में बहुत उपयोगी है।

टमाटर के गुण:
           टमाटर स्वादिष्ट होने के साथ पाचक भी होता है। पेट के रोगों में इसका प्रयोग औषधि की तरह किया जा सकता है। जी मिचलाना, डकारें आना, पेट फूलना, मुँह के छाले, मसूढ़ों के दर्द में टमाटर का सूप अदरक और काला नमक डालकर लिया जाए तो तुरंत फायदा होता है।

           टमाटर के सूप से शरीर में स्फूर्ति आती है। पेट भी हल्का रहता है। सर्दियों में गर्मागर्म सूप जुकाम इत्यादि से बचाता है। अतिसार, अपेंडिसाइटिस और शरीर की स्थूलता में टमाटर का सेवन लाभदायक है। रक्ताल्पता में इनका ‍निरंतर प्रयोग फायदा देता है। टमाटर की खूबी है कि इसके विटामिन गर्म करने से भी नष्ट नहीं होते। बेरी-बेरी, गठिया तथा एक्जिमा में इसका सेवन आराम देता है। ज्वर के बाद की कमजोरी दूर करने में इससे अच्छा कोई विकल्प नहीं। मधुमेह के रोग में यह सर्वश्रेष्ठ पथ्य है।

               टमाटर में विटामिन 'सी' होता है, जो कि इम्युनिटी के स्तर को बढ़ाता है जिससे साधारण सर्दी और कफ की शिकायत नहीं होती। गॉलस्टोन और लिवर कन्जेशन में भी टमाटर का सेवन कारगर है। हम कह सकते हैं कि टमाटर पोषक तत्वों का खजाना है, क्योंकि इसमें पाए जाने वाला विटामिन 'ए' आँखों और त्वचा के लिए व पोटेशियम मांसपेशियों में होने वाली ऐंठन में भी फायदा पहुँचाता है।

               टमाटर में जो लाल रंग का तत्व होता, उसे लायकोपिन (lycopene) कहते हैं,यह तत्व शरीर को विषैले पदार्थों (toxins) से मुक्त करने में सहायक है। लायकोपिन शरीर को फ़्री रेडिकल्स से मुक्त करने के मामले में बीटा केरोटीन से भी आगे है।

              अनुसंधान में पाया गया है कि टमाटर के नियमित सेवन से प्रोस्टेट कैंसर से बचाव होता है। इसराईल के वैज्ञनिकों के अनुसार टमाटर फ़ेफ़डे, बडी आंत और गर्भाशय के कैंसर से बचाव करता है। और सबसे सुखप्रद तथ्य ये कि टमाटर सेवन करने से व्यक्ति लंबे समय तक बुढापे की चपेट मे नहीं आता है।

 पपीता के गुण:
                पपीता न केवल एक स्वादिष्ट फ़ल है बल्कि इसमे उपस्थित औषधीय गुणों का विशेष महत्व है। पपीते में उच्च मात्रा में पोटेशियम तत्व पाया जाता है और इसके गूदे में भरपूर विटामिन" ए " मिलता है। पपीता के बीज और पत्तियां अपने कीटाणुनाशक गुणों के चलते आंतों में निवास करने वाले किटाणुओं को मारने के लिये प्रयोग किये जा सकते हैं। इसके नियमित उपयोग से कब्ज रोग का ईलाज हो जाता है। इसमें पाये जाने वाले पापैन(Papain, या papaya proteinase I) का हमारे शरीर के पाचन संस्थान को चुस्त-दुरस्त रखने का उत्तरदायित्व है। पपीते का जूस नियमित पीने से बडी आंत की सफ़ाई होती है और उसमें स्थित संक्रमण,श्लेष्मा और पीप का निष्कासन होने लगता है। ऐसे घाव जो अन्य चिकित्सा से ठीक न हो रहे हों पपीता का छिलका उन घावों पर कुछ रोज लगाकर अच्छे परिणाम की उम्मीद की जा सकती है। पपीता में सूजन विरोधी और केंसर से बचाने के गुण मौजूद हैं। इस सूजन विनाशक गुण के चलते पपीता उन लोगों के लिये फ़ायदेमंद है जो शोथ,संधिवात ,गठिया रोग से पीडित है।

                पपीता उदर रोगों में लाभकारी है। आमाशय को स्वच्छ करता है। एक ताजा अध्ययन का निष्कर्ष है कि ३-४ रोज सिर्फ़ पपीता खाने से आमाशय और आंतों को आशातीत लाभ मिलता है। कच्चा पपीता खाने से मासिक धर्म के विकार नष्ट होते हैं। मासिक धर्म खुलकर और नियमित आने लगता है। पपीता उन लोगों के लिये अमृत समान है जो सर्दी,खासी,फ़्लु से बार-बार परेशान रहते हैं। पपीता का उपयोग करने से हमारे शरीर का इम्युन सिस्टम मजबूत होता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफ़ा होता है।गर्भवतियों में सुबह की मिचली नियंत्रित करने के लिये पपीता का सेवन हितकारी है।

               धमनियों के कठोर होने के दोष को निवारण करने में पपीता उपयोगी है। शूगर रोगियों की हृदय की बीमारियों में पपीता अत्यंत हितकारी है। पपीता का रेशा खराब कोलेस्टरोल (एल डी एल) का स्तर घटाता है और इस प्रकार हृदय की सुरक्षा करता है। इसके नियमित सेवन से अंगों और ग्रंथियों में केंसर की रोकथाम और बचाव होता है।

कद्दू(काशीफ़ल) के गुण:
           कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और संतरी कद्दू में केरोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। बीटा केरोटीन एंटीऑक्सीडेंट होता है जो शरीर में फ्री रैडिकल से निपटने में मदद करता है। कद्दू ठंडक पहुंचाने वाला होता है। इसे डंठल की ओर से काटकर तलवों पर रगड़ने से शरीर की गर्मी खत्म होती है। कद्दू लंबे समय के बुखार में भी असरकारी होता है। इससे बदन की हरारत या उसका आभास दूर होता है।

                कद्दू के बीज भी बहुत गुणकारी होते हैं। कद्दू व इसके बीज विटामिन सी और ई, आयरन, कैलशियम मैग्नीशियम, फॉसफोरस, पोटैशियम, जिंक, प्रोटीन और फाइबर आदि के भी अच्छे स्रोत होते हैं। यह बलवर्धक, रक्त एवं पेट साफ करता है, पित्त व वायु विकार दूर करता है और मस्तिष्क के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। प्रयोगों में पाया गया है कि कद्दू के छिलके में भी एंटीबैक्टीरिया तत्व होता है जो संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं से रक्षा करता है।

               कद्दू का रस भी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। यह मूत्रवर्धक होता है और पेट संबंधी गड़बड़ियों में भी लाभकारी रहताहै। यह खून में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने में सहायक होता है और अग्नयाशय को भी सक्रिय करता है। इसी वजह से चिकित्सक मधुमेह के रोगियों को कद्दू के सेवन की सलाह देते हैं।
               प्रोस्टेट ग्रंथि बढने के रोग में ३० ग्राम कद्दू के बीज(छिलका रहित) तवे पर सेक लें और खाएं। ऐसा दिन में तीन बार करें। इन बीजों में फ़ायटोस्टरोल तत्व की उपस्थिति से प्रोस्टेट ग्रंथि सिकुडकर मूत्र बिना रुकावट खुलकर आने लगता है।

लेखक परिचय  
डॉ. दयाराम आलोक,
एम.ए., आयुर्वेद रत्न,D.I.Hom(London), व्यवसाय-हर्बल चिकित्सा।

आप विशेषत: गुर्दे एवं पित्ताशय की पथरी और प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र बाधा की चिकित्सा में सलग्न है। समाजसेवा के कार्य में विशेष गरीब परिवारों की कन्याओं के लिये स्ववित्तपोषित नि:शुल्क समूह विवाह के आयोजन करते है। आप ‘अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ.’ के संचालक है। इन्टरनेट पर सामाजिक, स्वास्थ्य विषयक एवं कविता के ब्लॉग लिखना इनकी प्रधान रुचियों में से है।

प्रमुख ब्लॉग :
रोगों की सरल चिकित्सा 
जटिल रोगों की सरल चिकित्सा.

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

आहार ही औषध - फ़ल-चिकित्सा


फ़ल-चिकित्सा:फ़लों से करें रोग निवारण.

यह तो प्रायः सभी जानते हैं कि फ़ल और सब्जियां सबसे अच्छे भोज्य पदार्थ हैं।अत: भोजन में इनको ज्यादा से ज्यादा शामिल करना अच्छे स्वास्थ के लिये बेहद जरूरी है। यहां मैं उन लोगों के लिये जो विभिन्न प्रकार के रोगों से संघर्ष करते हुए जीवन जी रहे हैं ,रोगों के अनुसार फ़लों व सब्जियों से चिकित्सा का प्रावधान प्रस्तुत कर रहा हूं। आप आयुर्वेदिक, ऐलोपैथिक, यूनानी जो भी ईलाज ले रहे हों, फ़ल-सब्जी से चिकित्सा का आप अतिरिक्त लाभ उठा सकते हैं। फ़लों और सब्जियों में एन्टिओक्सीडेंट्स पाये जाते हैं। शरीर का इम्यून पॉवर यानी रोग-प्रतिकार क्षमता बढती है।

  • उच्च रक्त चाप:

अंगूर, टमाटर, अखरोट, तरबूज, संतरा, सेवफ़ल, केला, नाशपती, पत्तागोभी, लहसुन, ककडी, नींबू.

  • रक्ताल्पता,एनीमिया,खून की कमी:

टमाटर, संतरा, अंगूर, सेवफ़ल, स्ट्राबेरी,चुकंदर, गाजर, अंजीर, आलूबुखारा, दाख, पालक, शलजम.

  • उच्च कोलेस्टरोल(खराब वाला):

आम, अखरोट, सेवफ़ल, जामुन, गाजर, प्याज, लहसुन, संतरा.

  • हृदय के रोग:

सेवफ़ल, अख्र्रोट, केला, पाएनेपल, तरबूज, नाशपती.

  • लिवर के विकार:

पपीता, नीबू, अंगूर, गाजर, टमाटर, ककडी, चुकंदर.
  • धमनियां कठोर हो जाना:

संतरा, टमाटर, सेवफ़ल, स्ट्राबेरी, अखरोट, केला.

  • मधुमेह,डायबीटीज,शूगर:

टमाटर, तरबूज, नाशपती, अमरूद, खट्टे फ़ल.

  • छोटी आंत में पीडा,मरोड,दर्द:

अंगूर टमाटर, सेवफ़ल, केला, अमरूद, पाईनेपल.

  • खांसी:

अंगूर, सेवफ़ल, स्ट्राबेरी, नाशपती, पाईनेपल, गाजर, नींबू.प्याज, पालक, संतरा.

  • अतिसार,दस्त लगना:

सेवफ़ल.

  • बदहजमी:

पपीता, सेवफ़ल, अंगूर, गाजर, चुकंदर, नीबू,संतरा, पाईनेपल, पालक.

  • बवासीर:

सेवफ़ल, केला, अंगूर, संतरा, पपीता, पाईनेपल, गाजर, पालक, शलजम.

  • संधिवात:

अंगूर, सेवफ़ल, गाजर, नींबू, नाशपाती, ककडी, पाईनेपल, टमाटर, लाल मिर्च, संतरा, चुकंदर, पालक.

  • गठिया:

अनानास(पाईनेपल),ककडी,चुकंदर,पालक,टमाटर.

  • दांत की तकलीफ़:

अंगूर, स्ट्राबेरी.

  • चर्म रोग:

सेवफ़ल, टमाटर, पपीता, अखरोट, स्ट्राबेरी.

  • फ़्लू बुखार:

नींबू, पाईनेपल, लोकाट, स्ट्राबेरी.

  • गर्भवती को उल्टी होना:

नाशपती

  • कमर दर्द: 

तरबूज, नाशपती.

  • पीठ दर्द:

तरबूज, नाशपती.

  • मोटापा:

नीबू, संतरा, अंगूर, पाईनेपल, पपीता, चुकंदर, गोभी, टमाटर।
(सेवफ़ल सप्ताह में एक बार आधा लिटर जूस पीयें।)

  • वातव्याधि:

विटामिन" सी" और एंटी ओक्सेडेंट परिपूर्ण फ़लों का सेवन करं।

  • हार्ट अटेक,स्ट्रोक:

रसभरी फ़ल(रास्पबेरी)
जितना भी पचा सकें ,खाएं। इससे धमनी का रक्त दाब घटता है और कोलेस्टरोल की मात्रा भी संतुलित होती हैं।

  • मुख पाक,मुख के संक्रमण:

सतरा, नाशपती, अमरूद.

  • किडनी फ़ेल्योर रोगी: (जो रोगी डायलिसिस पर चल रहे हों उन्हें ककडी का जूस कई महीने देते रहने से डायलिसिस की जरूरत नहीं रहेगी। किडनी एक्टीवेट करने वाला फ़ल है-)

सेवफ़ल, संतरा, नीबू, गाजर,चुकंदर का रस भी उपयोगी हैं।

  • बुढापा रोकने वाले फ़ल:

सेवफ़ल, पत्तागोभी, ब्रोकली,जामुन, आंवला, लहसुन, अंगूर, मूली, पालक, टमाटर.

  • दमा,अस्थमा:

गाजर, संतरा, नाशपाती, लाल मिर्च.

  • सर्दी,जुकाम:

लहसुन, गाजर, पत्तागोभी, नीबू, प्याज, संतरा,स्ट्रॉबेरी, पाईनेपल.

  • कब्ज:

गाजर, पत्तागोभी, अंजीर, अंगूर, संतरा, पपीता, आलूबुखारा, कद्दू, चुकंदर, सेवफ़ल, शलजम.

  • चेहरे पर कील,मुहासे:

आम, गाजर, अंगूर, संतरा, तरबूज, प्याज, कद्दू, पालक, स्ट्राबेरी.

  • ब्लाडर,मूत्राषय समस्याएं:

नीबू, ककडी, गाजर, सेवफ़ल.

  • नींद की कमी,निद्राल्पता:

नीबू, गाजर, अंगूर, सेवफ़ल.

  • पीलिया:

नीबू, गाजर, नाशपाती, अंगूर, पालक, चुकंदर, ककडी, पपीता.

  • नाडी मंडल का दर्द,न्यूराईटीज:

पाईनेपल, सेवफ़ल, गाजर, चुकंदर, संतरा.

  • मासिक धर्म के विकार:

आलू बुखारा, शलजम, चुकंदर, पालक, अंगूर.

  • एक्जीमा:

गाजर, लाल अंगूर, पालक, ककडी, चुकंदर.

  • सिर दर्द:

नीबू, गाजर, अंगूर, पालक.

  • मिर्गी रोग,एपिलेप्सी:

पालक, अंजीर, गाजर, लाल अंगूर.

  • किडनी विकार:

सेवफ़ल, नीबू,संतरा, ककडी, गाजर, चुक्कंदर.
  • पेट के अल्सर:

अंगूर, गोभी, गाजर.

  • गले के विकार:

नीबू, संतरा, पाईनेपल, गाजर, मूली, पालक, आलूबुखारा, टमाटर, प्याज.

लेखक - डॉ. दयाराम आलोक,
लेखक परिचय  

डॉ. दयाराम आलोक,
एम.ए., आयुर्वेद रत्न,D.I.Hom(London), व्यवसाय-हर्बल चिकित्सा।

आप विशेषत: गुर्दे एवं पित्ताशय की पथरी और प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र बाधा की चिकित्सा में सलग्न है। समाजसेवा के कार्य में विशेष गरीब परिवारों की कन्याओं के लिये स्ववित्तपोषित नि:शुल्क समूह विवाह के आयोजन करते है। आप ‘अखिल भारतीय दामोदर दर्जी महासंघ.’ के संचालक है। इन्टरनेट पर सामाजिक, स्वास्थ्य विषयक एवं कविता के ब्लॉग लिखना इनकी प्रधान रुचियों में से है।
प्रमुख ब्लॉग :

मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

विटामिन सी के बिना रोगमुक्त होने की कल्पना नहीं

शरीर को रोगमुक्त और ऊर्जावान बनाए रखने के लिए तमाम तरह के अवयवों की जरूरत होती है, लेकिन इनमें भी विटामिन सी एक ऐसा अवयव है जिसके बिना शरीर को रोगमुक्त रखने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

 विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है और इसकी कमी से स्कर्वी और रक्त अल्पता जैसे कई गंभीर रोग हो सकते हैं।

विटामिन सी की पहचान चार अप्रैल 1932 को हुई थी और तभी से चिकित्सक तथा वैज्ञानिक मानव शरीर पर इसके प्रभावों और महत्व को लेकर शोध करते रहे हैं।

इसे एल एस्कार्बेट या एस्कोर्बिक एसिड (Ascorbic Acid या L-Ascorbate) भी कहा जाता है जो ताजा फलों, सब्जियों, खासकर संतरा और नींबू जैसे खट्टे फलों में अधिक मात्रा में पाया जाता है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के पूर्व चिकित्सक डॉ.रमेश कुमार के अनुसार विटामिन सी एंटीआक्सीडेंट की तरह काम करता है और आक्सीडेटिव स्ट्रेस से बचाव करता है।

उनके अनुसार विटामिन सी की कमी से स्कर्वी नामक रोग हो सकता है, जिसमें शरीर में थकान, मांसपेशियों की कमजोरी, जोड़ों और मांसपेशियों में दर्द, मसूढ़ों से खून आना और टांगों में चकत्ते पड़ने जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

विटामिन सी शरीर में रोग पैदा करने वाले विषाणुओं से लड़ने की ताकत पैदा करता है और शरीर में इसकी संतुलित मात्रा बने रहने से रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत रहती है।

इसके विपरीत यदि विटामिन सी की कमी हो तो शरीर छोटी छोटी बीमारियों से लड़ने की ताकत भी खो देता है, जिसका नतीजा बीमारियों के रूप में सामने आता है।

बहुत पहले यह बीमारी नाविकों, जलदस्युओं और ऐसे लोगों में आम हुआ करती थी जो लंबे समय तक ताजा फलों और सब्जियों से वंचित रहते थे, लेकिन आज के समय में जंक फूड खाने वालों और पौष्टिक भोजन से मुंह बिसूरने वाले बच्चों पर यदि उचित ध्यान न दिया जाए तो वह इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं।

आहार विशेषज्ञ ऋचा सिंह के अनुसार शरीर को पर्याप्त मात्रा में विटामिन सी नहीं मिलने से स्कर्वी के अलावा हृदय रोग, रक्त अल्पता, कैंसर और मोतियाबिन्द जैसी बीमारी भी हो सकती है। विटामिन सी की कमी होने पर जुकाम की समस्या बार बार बनी रहती है।

उनके मुताबिक यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि विटामिन सी का आवश्यकता से अधिक सेवन हजारों मिलीग्राम में नकारात्मक साबित हो सकता है और इससे डायरिया तथा अपच जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

विटामिन सी हासिल करने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। हरी सब्जियों और नींबू, संतरे जैसे खट्टे फलों में यह खूब पाया जाता है। इन्हें अपने रोजमर्रा के खानपान का हिस्सा बना लीजिए और शरीर में विटामिन सी की कमी न होने दीजिए।

शाकाहारी बनें स्वस्थ रहें!
सम्पादकीय टिप्पणी

आज ४ अप्रेल है - जिस दिन विटामिन सी की खोज हुई थी |

        इस सिलसिले में एक और जानकारी जो शायद कई लोग पहले ही जानते होंगे , फिर भी - जो न जानते हों उनके लिए | गर्मियों में कई बार कई लोगों को नाक से खून बहने की समस्या होती है | इसमें माएं अक्सर बच्चों को प्याज सुंघाती हैं | यदि गर्मी की शुरुआत से पहले विटामिन सी का एक १५ दिन का कोर्स हो - तो यह समस्या नहीं आती | इसके अलावा - सर्दियों में होने वाली खांसी सर्दी से भी निजात दिलाता है विटामिन सी का प्रिवेंटिव कोर्स |

       जामफलों में भी यह है, कई लोग सिट्रिक फल (संतरा आदि ) खाना पसंद नहीं करते - उनके लिए जामफल, आंवला, नीम्बू पानी आदि अच्छे ऑल्टर्नेटिव हैं | गर्मियों में कच्चे आम (कैरी) से बनी लौंजी भी बहुत सहायक होती है | मुरब्बा उतना फायदेमंद नहीं - क्योंकि उसके तैयार होने तक अधिकतर विटामिन सी बिखर जाता है | हर सन्डे को चार बड़ी कच्चे कैरियां छिलकों सहित कूकर में उबालें, फिर ठंडा होने पर हाथ से ही छिलके अलग कर के गूदे को मसल कर एक दूसरी भगोनी में रखें | इसमें मुरब्बे जैसी ही शक्कर और दो चुटकी नमक (नमक पड़ने से कुछ काला रंग आएगा - यह नुकसानदेह नहीं है ) , कुछ जीरा मिला कर कडछी से लगातार घुमाते हुए दस मिनट उबल लें | ठंडा होने पर साफ़ बर्तन में निकाल कर फ्रिज में रख लें | हफ्ते भर आराम से चार लोगों के परिवार में खाने के साथ इसे लिया जा सकता है | इसे बनाने में कोई ज्यादा मेहनत भी नहीं लगती | इसे शरबत की तरह ठन्डे पानी में मिला कर भी पिया जा सकता है | मेरे घर में यह पूरी गर्मियों में एक आवश्यक फ़ूड आयटम है | :)
 शिल्पा मेहता

बुधवार, 21 मार्च 2012

पश्चिम में प्रकाश - भारत के बाहर शाकाहार की परम्परा


बात सभ्यता की हो, अध्यात्म की, योग की या शाकाहार की, भारत का नाम ज़ुबान पर आना स्वाभाविक ही है। सच है कि इन सभी क्षेत्रों में भारत अग्रणी रहा है। वैदिक ऋषियों, जैन तीर्थंकरों, बौद्ध मुनियों और सिख गुरुओं ने अपने आचरण और उपदेश में वीरता, त्याग, प्रेम, करुणा और अहिंसा को अपनाया है मगर शाकाहार का प्रसार छिटपुट ही सही, भारत के बाहर भी रहा अवश्य होगा ऐसा सोचना भी नैसर्गिक ही है।

निरामिष पर एक पिछली पोस्ट में हमने इंग्लैंड में हुए एक अध्ययन के हवाले से देखा था कि वहाँ सर्वोच्च बुद्धि-क्षमता वाले अधिकांश बच्चे 30 वर्ष की आयु तक पहुँचने से पहले ही शाकाहारी हो गये थे। इसी प्रकार बेल्जियम के नगर घेंट में नगर प्रशासन ने सप्ताह के एक दिन को शाकाहार अनिवार्य घोषित करके शाकाहार के प्रति प्रतिबद्धता का एक अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया था। पश्चिम जर्मनी व अमेरिका में बढते शाकाहार की झलकियाँ भी हम निरामिष पर पिछले आलेखों में देख चुके हैं। शाकाहार के प्रति वैश्विक आकर्षण कोई नई बात नहीं है। आइये आज इस आलेख में हम यह पड़ताल करते हैं कि भारत के बाहर शाकाहार के बीज किस तरह पड़े और निरामिष प्रवृत्ति ने वहाँ किस प्रकार एक आन्दोलन का रूप लिया।
पायथागोरस इतने बुद्धिमान थे कि उन्होंने कभी मांस नहीं खाया और मांसाहार को सदा पाप कहा
~ पायथागोरस की जीवनी खंड 23
आज के भारत में शाकाहारी होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमारे पास भूतदया, करुणा और शाकाहार की इतनी पुरानी और सुदृढ परम्परा है कि शाकाहार पर नहीं, आश्चर्य तो मांसाहार पर होना चाहिये। लेकिन सरसरी तौर पर देखने से पश्चिमी जगत में शाकाहार के लिए पर्याप्त उदाहरण, उपदेश और प्रेरणाएं नज़र नहीं आतीं बल्कि वह कुछ असाधारण व्यक्तियों के हृदय में स्वतः ही उत्पन्न हुआ लगता है। निश्चित रूप से इसके पीछे अच्छे स्वास्थ्य की कामना और पर्याप्त ज्ञान तो है ही, जीवदया और करुणा का महत्व भी कम नहीं है।

जिन लोगों ने आरम्भिक गणित पढा होगा उन्हें धर्मसूत्र के रचनाकार के रूप मे प्रसिद्ध बौधायन (800 ईसा पूर्व) की समकोण त्रिकोण प्रमेय (Pythagoras theorem) को पश्चिम में स्वतंत्र रूप से सिद्ध करने वाले पाइथागोरस (इटली 570 - 495  ईसा पूर्व) की याद तो होगी ही। एक समय में पायथागोरस और उनका गणित इतना आदरणीय था कि उनके वैसे ही अनेक अनुसरणकर्ता बन गये थे जैसे कि किसी धर्मगुरु के अनुयायी होते हैं। किमाश्चर्यम् कि घनघोर मांसाहारी यूरोप का यह प्रसिद्ध गणितज्ञ और विचारक पूर्णतया शाकाहारी था। वैसे पायथागोरस को पुनर्जन्म में भी न केवल विश्वास था बल्कि उनका दावा यह था कि उन्हें अपने चार पिछले जन्मों की बातें याद हैं। पायथागोरस के प्रमुख शिष्यों ने भी शाकाहारी जीवन अपनाया। ये लोग न केवल मछली, अंडा आदि खाने के विरोधी थे बल्कि धर्म के बहाने से की जाने वाली पशुहत्या को भी अमानवीय मानते थे।

होमर के ग्रंथों में कमलपोषित कहकर उत्तरी अफ़्रीका की शाकाहारी प्रजातियों के और इथोपिया के शाकाहारियों के सन्दर्भ आये हैं। पाँचवीं शताब्दी  ईसा पूर्व के दार्शनिक एम्पेडोक्लीज़ भी अपने शाकाहार के लिये जाने गये थे। उस समय के यूरोप के शाकाहारी विद्वानों और मांसाहारी आमजनों के बीच अनेक शास्त्रार्थ होने के बावजूद उनमें इस बात पर सहमति थी कि एक आदर्श समाज में जीवहत्या, शिकार आदि के लिये कोई स्थान नहीं होना चाहिये, ऐसी जानकारी प्लेटो, हेसोइड व ओविड आदि दार्शनिकों के आलेखों से ज्ञात है। प्लेटो और उसके अनुयायी भी पूर्णतः शाकाहारी थे। इनसे इतर विचारधारा का दार्शनिक स्टोइक यद्यपि स्वयं शाकाहारी नहीं था पर उसके प्रसिद्ध शिष्य सेनेका शाकाहारी थे।

विश्व भर में विभिन्न चैम्पियन खिलाड़ियों ने शाकाहार अपनाकर अपने को शिखर पर बनाये रखा है। मगर पश्चिम में भी क्षमतावान होने के लिये शाकाहार का यह प्रयोग कोई नई बात नहीं है। सिकन्दर के विश्वविजयी सैनिकों को युद्धकाल में शाकाहारी रहने के निर्देश थे। अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि रोम के विश्वविख्यात ग्लैडियेटर्स अधिक शक्ति, स्फूर्ति व गति के लिये न केवल शाकाहारी बल्कि वीगन हुआ करते थे।

यूरोप में ईसाई धर्म के प्रसार के साथ विद्वानों व संतों के बीच शाकाहार की अनिवार्यता समाप्त हो गयी तथापि अनेक ईसाई संत या तो शाकाहारी रहे या शाकाहार के साथ मत्स्याहारी। परंतु धीरे-धीरे चर्च और विद्वानों के बीच टकराव बढता गया। शक्तिशाली चर्च ने विद्वानों के दमन की नीति अपनाई। यहाँ तक कि कई विद्वानों, विचारकों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों को धर्मविरोधी होने के आरोप में मार दिया गया। ऐसे अन्धकारमय काल के यूरोपीय जीवन में  हिंसा और मांसाहार सामान्य सा हो गया। इंग्लैंड में तो कई समूह यह दावा करते दिखते थे कि पशुओं को ईश्वर ने उनके आहार के लिये ही बनाया है। यूरोप के पुनर्जागरण के काल (रेनेसां = Renaissance) में एक लगभग पूर्ण मांसाहारी यूरोप में जन्मी विभूतियों जैसे लियोनार्दो दा विंची (1452–1519) और पियरे गासेन्दी (1592–1655) ने शाकाहार अपनाकर उसे फिर से विद्वानों के भोजन की प्रतिष्ठा दिलाई। इनके कुछ समय बाद इंग्लिश लेखक टॉमस ट्रायन (1634–1703) ने इंग्लैंड में शाकाहार की वकालत की।

अमेरिका में शाकाहार का जन्म मेरे वर्तमान राज्य पेंसिल्वेनिया में 1732 में योहान कॉनराड द्वारा स्थापित एफ़्राटा क्लॉइस्टर (Ephrata Cloister) समुदाय में हुआ। तत्कालीन इंगलैंड में अनेक कवि, लेखक, विचारक और विद्वान शाकाहार अपना रहे थे। सन 1809 में विलियम काउहर्ड द्वारा शाकाहारी सिद्धांतों पर आधारित बाइबल क्रिस्चियन चर्च की स्थापना हुई। 1838 में लंडन के पास खुले कंकॉर्डियम स्कूल ने मांसाहार को पूर्णतः प्रतिबन्धित कर दिया। भारत के बाहर शाकाहार के आधुनिक इतिहास में एक प्रमुख घटना 30 सितम्बर 1847 को घटी जब 140 अंग्रेज़ों ने एक स्वयंसेवी संस्था "वेजीटेरियन सोसायटी" को पंजीकृत कराया। इसके बाद तो शाकाहार की ऐसी धूम मची कि सन 1853 में 889 सदस्यों की संस्था में सन 1897 तक 5,000 सदस्य थे। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ, महात्मा गान्धी और पॉल मैककॉर्टनी जैसे महानुभाव इस संस्था के सदस्य रह चुके हैं। वेजीटेरियन सोसायटी आज भी कार्यरत है और अन्य ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ विभिन्न आहारों को शाकाहारी प्रमाणित करने का काम भी करती है। जिलेटिन और पशु रेनेट (animal rennet) युक्त खाद्य पदार्थों को भोजन से हटाने या स्पष्टतः मांसाहार के रूप में लिखे जाने का दवाब बनाना जैसे कार्य भी इसकी सूची में हैं।

जीवदया के उद्देश्य से सन 1980 में स्थापित संस्था पीटा (PETA = People for the Ethical Treatment of Animals) अपने तीस लाख सदस्यों के साथ शायद इस समय संसार की सबसे बड़ी पशु संरक्षक संस्था है जिसका एक सहयोगी उद्देश्य शाकाहार को बढावा देना भी है। पीटा का मुख्यालय नॉर्फ़ोक वर्जिनिया (अमेरिका) में है।

इस प्रकार हमने देखा कि विश्व भर में अलग-अलग बिखरे हुए विद्वानों व बुद्धिजीवियों द्वारा अपनाई जाने वाली निरामिष आहार शैली किस प्रकार जनमानस के सामान्यजीवन का अंग बनी। भारत में भी यही सब लगभग इसी प्रकार से हुआ होगा। हाँ इतना अवश्य है कि इस मामले में हम शेष विश्व से कई हज़ार साल आगे निकल आये थे और इसीलिये आज भी भारत शाकाहारियों के लिये स्वर्ग है। प्रसन्नता की बात है कि विज्ञान की प्रगति और नित नये अध्ययनों के आधार पर शाकाहार के संतुलित और सम्पूर्ण होने का ज्ञान विद्वानों से आगे बढकर आम जनता तक पहुँच रहा है।

इंसानियत तो दुनियाभर में शाकाहार की प्रगति का मुख्य कारण है ही परंतु मांस उद्योग द्वारा किये जा रहे पर्यावरण प्रदूषण, संसाधन हानि और मानव स्वास्थ्य पर मांस द्वारा पड़ने वाले दुष्प्रभावों के कारण भी विदेश में शाकाहार का प्रचलन बढ रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने आधुनिक विश्व में अहिंसा के पुरोधा महात्मा गान्धी के जन्मदिन को अंतर्राष्ट्रीय शाकाहार दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। ब्रिटेन में 1985 मे जहॉ कुल जनसंख्या का 2.6 प्रतिशत शाकाहारी था वही आज बढ़कर 7 प्रतिशत से अधिक हो गया है। परम्परागत रूप से मांसाहारी ताइवान में पिछले वर्ष पर्यावरण संरक्षण के लिये "नो मीट नो हीट" अभियान में लगभग दस लाख नागरिकों ने शाकाहार अपनाने की शपथ ली जिसमें ताइवान की संसद के प्रमुख और ताइपेइ तथा काओस्युंग के मेयर भी शामिल हैं।

शाकाहार के सम्बन्ध में यदि आपको कोई भी जानकारी अपेक्षित हो तो आप इन संस्थाओं (वेजीटेरियन सोसायटी व पीटा) से सीधे भी सम्पर्क कर सकते हैं और यदि उचित समझें तो हमसे भी पूछ सकते हैं। इस विषय में आपकी सहायता करने में हमें हार्दिक प्रसन्नता होगी।
   * सम्बन्धित कड़ियाँ * 
* पायथागोरस एवम पशु अधिकार
* वेजीटेरियन सोसायटी
* पीटा

सोमवार, 19 मार्च 2012

संतुलित पोषण के लिए शाकाहार का योजनाबद्ध प्रयोग



भारत में प्राच्यकाल से ही अहिंसा, स्वास्थ्य और पोषण के लिए ‘सात्विक आहार गुण' नाम से संतुलित पोषण उपदेशित होता रहा है। भारतीय संस्कृति में शाकाहार शैली एक श्रेष्ठ आहार शैली के रूप में स्थापित है। किन्तु अब पश्चिमी दुनिया में भी शाकाहार सजगता बढ़ी है। अमेरिकन डायटिंग एसोसिएशन और कनाडा के आहारविदों का कहना है कि “जीवन के सभी चरणों में शाकाहार का यदि योजनाबद्ध प्रयोग और पदार्थों का उचित नियोजन किया जाय तो शाकाहार पर्याप्त पोषक और स्वास्थ्यवर्धक है। निसंदेह शाकाहार रुग्णावस्था में परहेज विकल्प तो है ही साथ ही कुछ बीमारियों की रोकथाम और इलाज में असरकारक है।”


पोषण के साधारणतया तीन प्रकार होते है-

(1.) जो शरीर को उर्जा प्रदान करता है: कार्बोहाइड्रेट, वसा युक्त पदार्थ
जैसे- अनाज, कंदमूल, फल, मेवा, गुड़ तेल आदि

(2.) जो शरीर का वृद्धि-विकास और क्षतिपूर्ति करता है: प्रोटीन युक्त पदार्थ
जैसे- दूध, फलीदार अनाज, दालें, सोयाबीन, मूंगफली, मेवे गिरीवाले फल आदि

(3.) जो स्वास्थ्य सुरक्षा करते है: विटामिन खनिज युक्त पदार्थ
जैसे- हरी सब्ज़ी, हरी पत्तेदार सब्ज़ी, दुग्ध पदार्थ, दालें, फलों का रस आदि

आहार विशेषज्ञ शाकाहारी पदार्थों में निम्नानुसार पौष्टिक तत्त्व प्रकाशित करते हैं:-

1. प्रोटीन: यह शारीरिक वृद्धि-विकास, कोषों की क्षतिपूर्ति करता है। यह दालों, अनाज, चना, मटर, सोयाबीन, मूँगफली, काजू, बादाम, हरी सब्जियों, दूध, दही, पनीर, सेव, फल, मेवे आदि में पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध होता है।

2. वसा: इसे चिकनाई कह सकते है जो बलवर्धक होती है शरीर में इसका संचय होता है और आपूर्ति के अभाव के समय यही वसा, उर्जा व बल प्रदान करती है। यह दूध, घी, मक्खन, मलाई, सरसों, नारियल तथा तिल के तेल एवं बादाम, अखरोट व अन्य सूखे मेवे आदि से प्रचुर मात्रा में प्राप्त होती है। इसे पचाने के लिये शारीरिक श्रम और व्यायाम आवश्यक है।

3. कार्बोहाइड्रेट्स: यह शरीर में उर्जा, शक्ति,स्फूर्ति और उष्मा पैदा करता है। यह गेहूँ, चावल, मक्का, ज्वार, बाजरा, गन्ना, खजूर, दूध, मेवा, मीठे फल, गुड, शक्कर, बादाम, दाल, ताजी सब्जियाँ आदि में बहुतायत से पाया जाता है। कार्बोहाइड्रेटस का पूरा लाभ उठाने के लिये भोजन को खूब चबा कर खाना चाहिये। जितनी लार भोजन में मिलेगी उतना ही अधिक कार्बोहाइड्रेट्स शरीर को प्राप्त होगा।

4. खनिज लवण  

  • (अ.) कैल्शियम : यह हड्डियों और दाँतों को मजबूत बनाता है, बाल घने और मजबूत बनाता है और दिल को भी स्वस्थ रखने में सहयोग करता है। यह हरी सब्जियों, गेहूँ, चावल, दालों, दूध, छाछ, पनीर, बादाम, समस्त मीठे फल, शक्कर, मुरब्बा आदि से प्राप्त होता है।

  • (ब.) फॉस्फोरस: बढते शरीर और दिमाग की ताकत के लिये यह विशेष लाभदायक है और पनीर, दही, गेहूँ, मक्का, दाल, दूध, छाछ, पनीर, बादाम, समस्त मीठे फल, शक्कर, मुरब्बा आदि में पाया जाता है।

  • (स.) आयरन: यह खून बनाता है और हिमोग्लोबिन बढ़ाता है साथ ही शरीर के प्रत्येक तंतु तक ऑक्सीजन पहुँचाता है। इसकी कमी को साधारण तया खून की कमी कहा जाता है, यह हरे पत्तेदार शाक, हरी तरकारी, अनाज, दाल, सेम, मटर, सूखे मेवे, सेव, अनार आदि फल व दूध में पाया जाता है।

  • (द.) मैग्नीशियम: अतिअल्प मात्रा में आवश्यक मैग्नीशियम हमारे रक्तचाप को नियंत्रित रखता है। यह ताजा सब्ज़ियों से पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है।

5. विटामिन्स

  • विटामिन A- हरी सब्जियों, नीबू, अमरूद, आँवला, संतरा, मौसमी आदि में मिलता है।

  • विटामिन B- हरी पत्तेदार सब्जियों तथा अनाज व दुग्ध पदार्थों में पाया जाता है।

  • विटामिन C- हरी सब्जियों, नीबू, अमरूद, आँवला, संतरा, मौसमी आदि में मिलता है।
  • विटामिन D- यद्यपि इसका प्रमुख प्रेरक स्त्रोत सूर्य की किरणें है । तथापि दुग्ध-पदार्थों तथा पौधों से भी प्राप्त होता है।

  • विटामिन E- यह घी मक्खन में बहुतायत से होता है।

  • विटामिन K- यह हरी सब्जियों से पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो जाता है।

6. आहारीय रेशे: शरीर से विषाणु और प्रतिकूल पदार्थों का विसर्जन करने में सहायक होते है यह शाक फल सब्ज़ी सूखे मेवे साबुत धान्य चोकर आदि में प्रचुरता से प्राप्त होते है।

अपनी रुचि और स्थिति के अनुसार पदार्थों का चयन कर संतुलित पोषक आहार नियोजित किया जा सकता है. मांसाहार की अपेक्षा शाकाहार सस्ता होने के साथ-साथ स्वादिष्ट, रोगप्रतिरोधक क्षमता से भरपूर और शक्तिवर्धक भी होता है। फल सब्जियों व अन्न-दालों से मिलने वाले फाइबर तो अनेक रोगों को दूर रखने में अचूक औषधि का काम करते हैं। जब सभी प्रकार के विटामिन्स, उत्तमप्रकार के प्रोटीन, आवश्यक खनिज आदि पौष्टिक तत्त्व शाकाहार से पूर्ण संतुलित हो सकते है तो जीवित प्राणियों की हत्या से उपार्जित अनैतिक आहार की भ्रमणा में फंसने की क्या आवश्यकता?

कुछ सावधानियाँ-

  1. ज्यादा कैलोरी युक्त वस्तुएं लें तो उसे खर्च करने के लिए श्रम भी करें।
  2. आवश्यक कैलोरी न लेने से आंते कमजोर होती हैं।
  3. हर रोज 6 से 8 घंटे की नींद ब्लड प्रेशर मधुमेह और दिल की बीमारी, हार्मोनल असंतुलन को दूर करती है।
  4. हर रोज सूर्य निकलने से पहले चारपाई छोड़ें और कम से कम 15 से 45 मिनट व्यायाम जरूर करें।
  5. खाने में फल सब्जियां साबित अनाज तनाव दूर करने में सहायक है।
  6.  भोजन में नमक का इस्तेमाल संतुलित करें। मीठी वस्तुएं मोटापा बढ़ाती हैं अति से बचें।
  7. प्रत्येक व्यक्ति का मेटाबोलिज्म स्वभाव भिन्न हो सकता है, संतुलित और पोषक आहार के उपरांत भी शरीर में पदार्थ आवश्यक उर्जा तत्व में परिणित नहीं होते तो अपने चिकित्सक की सलाह अवश्य लें और उसी आधार पर सप्लीमेंट ग्रहण करें।
  8. शारिरिक शक्ति के लिए उचित उर्जा चाहिए। शरीर को पुष्ट करने वाली उर्जा और उष्मा के लिए प्रोटीन, शर्करा, विटामीन, खनिज, वसा आदि पदार्थ उचित अनुपात और पर्याप्त मात्रा में चाहिए। उसकी गुणवत्ता हमारे आहार के संयोजन पर निर्भर करती है। किसी तत्व की अधिकता भी प्रतिकूल परिणाम देती है।
  9. भोजन में ऐसे पदार्थ भी होने चाहिए जो हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करे। और ऐसे पदार्थों की भी उपस्थिति हो जो शरीर में उपभोग के बाद व्यर्थ बचे खुचे व हानिकारक तत्वों का सहजता से निष्कासन करनें में सहायक हो। भोज्य-पदार्थों में रोगोत्पादक, संक्रमण सम्भाव्य और अनावश्यक हार्मोन रसायन उत्प्रेरक तत्व न हो। और ऐसे उत्तेजक पदार्थ भी न हो जो मानसिक आवेगों को जन्म दे और मानस को असंयमित करने का कार्य करे।

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

शाकाहार अपनाइये प्रसन्न रहिये।

शाकाहार अपनाइये प्रसन्न रहिये।

शाकाहार स्वास्थ्यप्रद है, इस तथ्य में किसी को भी शंका नहीं है। आज के समय में हर किसी को पता है कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी अच्छे स्वास्थ्य के कारण शाकाहार की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं। भारतीय विचारधारा और हमारे व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर यह समझा जाता है कि मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य पर भी शाकाहार का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। अभी तक इस विषय पर कोई वैज्ञानिक अध्ययन न होने के कारण वैज्ञानिक दायरों में विशेषकर मांसाहार-मत्स्याहार को प्रोत्साहन देने वाले विभागों में शायद यह बात खुलकर नहीं कही जा रही हो, लेकिन अब स्थिति बदल रही है। पश्चिम में शाकाहार का प्रचलन बढने के साथ-साथ उसके स्वास्थ्य प्रभावों के वैज्ञानिक अध्ययन बढ रहे हैं और निरामिष भोजन शैली के पक्ष में नई-नई अकाट्य जानकारियाँ सामने आ रही हैं।

पिछले दिनों देखा गया था कि अज्ञानवश अफ़वाहें फैलाने वाले कुछ लोग तो शाकाहार को अल्ज़ाइमर और बौद्धिक बौनेपन से भी जोड़ने का अधकचरा प्रयत्न कर रहे थे। ऐसी अफ़वाहों के पीछे कुछ सामान्य भ्रम थे, जैसे मत्स्य या मांस को आवश्यक पोषक तत्वों का अकेला आपूर्तिकारक मानना।

ऐसे ही भ्रमों के बारे में सत्य जानने के लिये एक अध्ययन अमेरिका के ऐरिज़ोना राजकीय विश्वविद्यालय के पोषण विभाग में डॉ बॉनी बीज़होल्ड (Bonnie L Beezhold) के नेतृत्व में हुआ था जिसकी रिपोर्ट जून 2010 से अंतर्जाल पर उपलब्ध है। इस अध्ययन में संयुक्त राज्य के दक्षिण पश्चिम क्षेत्र के सेवेंठ डे ऐड्वेंटिस्ट समुदाय से स्वस्थ भागीदारों को लेकर उन्हें पहले शाकाहारी या मांसाहारी भोजन उपलब्ध कराया गया और फिर उनसे 152 प्रश्नों की निम्न तीन प्रश्नावलियों के आधार पर जाँच की गयी:

  • भोजन की आवृत्ति
  • अवसाद, बेचैनी, तनाव की मात्रा (DASS=Depression Anxiety Stress Scale)
  • बदनुमाई की माप (POMS=Profile of Mood States) 


इस अध्ययन से एक बार फिर यह बात स्पष्ट हुई कि शाकाहार करने से जीवन में प्रसन्नता पढती है, तनाव और अवसाद कम होता है और यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिये मांसाहार से कहीं अधिक हितकर है। इस अध्ययन में यह बात भी सामने आयी कि मछली खाने वालों के मुकाबले कुछ कम ओमेगा-3 की मात्रा होने पर भी शाकाहारियों पर इसका कोई भी प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता है।

इस अध्ययन के लिये तैयार हुये स्त्री व पुरुषों में 64 शाकाहारी और 79 मांसाहारी थे जिनमें से गर्भवती लोगों को अध्ययन से हटाने के बाद 138 लोग बचे। मांसाहारियों में अवसाद, बेचैनी व तनाव की मात्रा शाकाहारियों से दोगुनी थी। बदनुमाई की मात्रा में भी मांसाहारी शाकाहारियों से कहीं आगे थे। शाकाहारी भोजन में वसा की मात्रा भी मांसाहारियों से कम पाई गयी।  इस अध्ययन ने इस जानकारी को फिर से पुष्ट किया है कि शाकाहार अपनाने में ही बुद्धिमानी है और शरीर और मस्तिष्क का हित भी है।

अधिक जानकारी के लिये इस अध्ययन की झलक देने के लिये परिणामों की एक तालिका यहाँ प्रस्तुत है। और अधिक जानकारी के इच्छुक न्युट्रिशन जर्नल पर पूरी रिपोर्ट पढ सकते हैं।

* शाकाहारी बनें, प्रसन्न रहें, स्वस्थ रहें!*

परिणाम तालिका - बायोमेड सेंट्रल से साभार (© 2010 Beezhold et al; licensee BioMed Central Ltd.)

DASS and POMS scores by diet group

OMNVEGP

Mean± SEMean± SEvalue

n = 78n = 60*



DASS-total117.511.888.320.880.000
     DASS-D4.810.691.670.280.000
     DASS-A4.310.531.530.240.000
     DASS-S8.400.925.120.520.024






POMS-total215.333.100.101.990.007
     Tension-anxiety6.043.833.830.400.031
     Depression-dejection8.990.804.364.100.000
     Anger-hostility7.086.724.280.550.010
     Fatigue7.590.665.030.470.021
     Confusion4.650.433.240.380.085
     Vigor19.150.7120.610.710.133

* < 0.05 is significant.
1 DASS normative scores: D-5.55, A-3.56, S-9.27, total 18.38.
2 POMS normative scores, M-F: T 7.1-8.2, D 7.5-8.5, A 7.1-8.0, V 19.8-18.9, F 7.3-8.7, C 5.6-5.8, total 14.8-20.3.
Beezhold et al. Nutrition Journal 2010 9:26   doi:10.1186/1475-2891-9-26


 कीवर्ड: Bonnie L Beezhold, Carol S. Johnston, Deanna R. Daigle, Arizona State University