सोमवार, 5 सितंबर 2011

केवल शाकाहार से पोषक मूल्यों का पूर्ण संतुलन



मानव तन के लिए उर्ज़ा, शक्ति और पोषण के लिए, प्रोटीन, शर्करा, वसा, विटामिन्स, खनिज व रेशे आदि पदार्थ उचित अनुपात में होने अत्यंत ही आवश्यक है। साथ ही पोषक पदार्थों की शरीर व आहार के अनुकूल गुणवत्ता का होना भी इतना ही आवश्यक है। सौभाग्य से शाकाहार में सभी प्रकार के पौष्टिक और श्रेष्ठ गुणवत्तायुक्त तत्व, पर्याप्त मात्रा में विद्यमान होते है। भारी भरकम और कुपाच्य मांसाहार की तुलना में, साधारण से न्यूनत्तम शाकाहारी पदार्थों से शरीर को आवश्यक पोषण और उर्ज़ा प्रदान की जा सकती है। शाकाहारी संस्कृति में इन पोषण मूल्यों का प्रबन्धन युगों-युगों से होता चला आ रहा है। इतना ही नहीं, बहुमूल्य खनिज व निरामय रेशे का शाकाहार से ही प्राप्त होना अतिरिक्त संजीवनी बूटी के समान है, जो कि मांसाहारी पदार्थों में नदारद है।

मानव शरीर के लिए पोषक तत्वों की आवश्यकता और मामूली से शाकाहार द्वारा उसकी संतुलित पूर्ती की प्रबंध जानकारी यहाँ प्रस्तुत की जा रही है-

तालिका-1, औसत व्यक्ति के लिए पोषक तत्वो की दैनिक आवश्यकता :---

मानव   प्रोटीन  
Gms
 फैट
Gms 
  कैलॉरीज़  
  पुरूष(Moderate work)    60  15 2700
  पुरूष(Sedentary work)    60  15 2350
  महिला(Moderate work)    50  15 2100
  महिला(Sedentary work)    50  15 1800
  बालक(13 से 15 वर्ष)    71  15 2400
  बालिका(13 से 15 वर्ष)    67  15 2050


तालिका-2, न्यूनत्तम शाकाहारी पदार्थों से पोषक तत्वो की संतुलित पूर्ती :--


 पदार्थ  मात्रा 
Gms.
 प्रोटीन
Gms
 फैट
Gms
  कैलॉरीज़
 अनाज (Cereals) 400 48.40 6.80 1384
 दालें (pulses) 60 14.60 7.30 209
 हरी पत्तेदार सब्जियां 100 2.00 0.70 26
 अन्य सब्जियां 75 2.00 0.30 22
 कंद-मूल सब्जियां 75 1.20 __ 72
 फल 50 0.30 __ 24
 दूध 250 8.00 10.20 168
 फैट्स(घी-तेल) 25 __ 25.00 225
 शर्करा 30 __ __ 120
 कुल 1065 76.50 50.30 2250

अपनी शरीरिक की आवश्यकता और शरीर की प्रकृति के अनुसार, सामग्री की मात्रा में संयोजन नियोजन करके  समुचित अनुकूल और संतुलित प्रबन्धन सम्भव है।

## यह आंकडे, National institute of nutrition, ICMR, Hyderabad से प्रकाशित Nutritive Value of Indian Foods के आधार से प्रस्तुत किए गए है।

मंगलवार, 30 अगस्त 2011

मानव के भोजन का उद्देश्य




भोजन का उद्देश्य मात्र उदरपूर्ति या स्वादतृप्ति ही नहीं है। हम भोजन के लिए नहीं जीते, बल्कि जीवित रहने के लिए हमें भोजन करना पडता है। भोजन का उद्देश्य, शरीर सौष्ठव बनाना मात्र नहीं है। आहार से तो बस हमें जीवन उर्ज़ा मात्र चाहिए। आहार से उर्ज़ा प्राप्त कर, उस शक्ति को मानसिक और चारित्रिक विकास में लगाना हमारा ध्येय है। 

सुविधायुक्त जीना हमारा भ्रांत लक्ष्य है, सुखरूप जीना ही वास्तविक लक्ष्य है। दूसरों को सुखरूप जीने देना हमारे ही सुखों का अर्जन है। सुखरूप जीनें के लिए आचार-विचार उत्तम होने चाहिए। दया, करूणा और सम्वेदनाओं से हृदय भरा होना चाहिए । हमारी सम्वेदनाएं आहार से प्रभावित होती है। मन की सोच पर आहार का स्रोत हावी ही रहता है,यदि वह स्रोत क्रूरता प्रेरित है तो हमारी कोमल भावनाओं को निष्ठुर बना देता है। 

आहार का आचार विचार व व्यवहार से गहरा सम्बंध है। हमारा सम्वेदनशील मन किसी के प्रति, प्रिय अप्रिय भावनाएं पैदा करता है। जिस प्रकार बार बार क्रूर दृश्य देखने मात्र से हमारे करूण भावों में कमी आती है, ठीक उसी प्रकार आहार स्रोत के चिंतन का प्रभाव हमारी सम्वेदनाओं का क्षय कर देता है। अतः भोजन का उद्देश्य, भौतिक ही नहीं मानसिक विकास भी होता है।

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

शाकाहार के प्रति वैश्विक आकर्षण

आहार सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व है, जिसका व्यक्तित्व निर्माण से घनिष्ठ सम्बन्ध है. आहार दो प्रकार के है- शाकाहार और मांसाहार. फल, सब्जी, अनाज, बादाम आदि, बीज सहित वनस्पति-आधारित भोजन के प्रयोग को शाकाहार कहते हैं. आजकल शाकाहार का प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, यह परिवर्तन जागरुकता के कारण हो रहे हैं. जैसा आहार लिया जाता है, वैसे ही भाव-विचार और आचार होते हैं.

हमारी पश्चिमी दुनिया के अनुसार मुख्य रूप से चार प्रकार के शाकाहारी होते हैं. एक लैक्टो-शाकाहारी जिनके आहार में दुग्ध उत्पाद शामिल हैं लेकिन मीट, मछली और अंडे नहीं. एक ओवो शाकाहारी जिनके आहार में अंडे शामिल होते हैं लेकिन मगर मीट, मच्छी और दूग्ध-उत्पाद नहीं खाते. और एक ओवो-लैक्टो-शाकाहारी जिनके आहार में अंडे और दुग्ध उत्पाद दोनों शामिल हैं. एक वेगन अर्थात अतिशुद्ध शाकाहारी जो दूध तो क्या शहद भी नहीं खाते. इस के अनुसार भारत में हम हिन्दू जो शाकाहार में विश्वास रखते हैं लैक्टो-शाकाहारी के अन्तरगत आते हैं. क्योंकि हम शहद, दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन करते हैं.

पश्चिमी दुनिया में, 20वीं सदी के दौरान पोषण, नैतिक, और अभी हाल ही में, पर्यावरण और आर्थिक चिंताओं के परिणामस्वरुप शाकाहार की लोकप्रियता बढ़ी. अमेरिकन डाएटिक एसोसिएशन और कनाडा के आहारविदों का कहना है कि जीवन के सभी चरणों में अच्छी तरह से योजनाबद्ध शाकाहारी आहार “स्वास्थ्यप्रद, पर्याप्त पोषक है और कुछ बीमारियों की रोकथाम और इलाज के लिए स्वास्थ्य के फायदे प्रदान करता है”.

मेडिकल साईंस व बडे-बडे डॉक्टर एवं आहार विज्ञानी आज यह मानते हैं कि शाकाहारी आहार में हर प्रकार के तत्व जैसे प्रोटीन, विटामिन, खनिज लवण आदि पायें जाते हैं. शाकाहार में संतृप्त वसा, कोलेस्ट्रॉल और प्राणी प्रोटीन का स्तर कम होता है, और कार्बोहाइड्रेट, फाइबर, मैग्नीशियम, पोटेशियम और विटामिन सी व ई जैसे एंटीऑक्सीडेंट तथा फाइटोकेमिकल्स का स्तर उच्चतर होता है. एक शाकाहारी को ह्रदय रोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह टाइप 2, गुर्दे की बीमारी, अस्थि-सुषिरता (ऑस्टियोपोरोसिस), अल्जाइमर जैसे मनोभ्रंश और अन्य बीमारियां कम हुआ करती हैं. शाकाहारियों को मांसाहारियों कि तुलना में बेहतर मूड का पाया गया और शाकाहार जीवन को दीर्धायु, शुद्ध, बलवान एवं स्वस्थ बनाता है.

मांसाहार का उपभोग पशुओं से मनुष्यों में अनेक रोगों के संक्रमण का कारण हो सकता है. साल्मोनेला के मामले में संक्रमित जानवर और मानव बीमारी के बीच संबंध की जानकारी अच्छी तरह स्थापित हो चुकी है. 1975 में, एक अध्ययन में सुपर मार्केट के गाय के दूध के नमूनों में 75 फीसदी और अंडों के नमूनों में 75 फीसदी ल्यूकेमिया (कैंसर) के वायरस पाए गये. 1985 तक, जांच किये गये अंडों का लगभग 100 फीसदी, या जिन मुर्गियों से वे निकले हैं, में कैंसर के वायरस मिले. मुर्गे-मुर्गियों में बीमारी की दर इतनी अधिक है कि श्रम विभाग ने पोल्ट्री उद्योग को सबसे अधिक खतरनाक व्यवसायों में एक घोषित कर दिया. आज भी समय समय पर ऐसे रोगों की पुष्टि होती है जिनकी वजह मांसाहार को माना जाता है.

हिन्दू धर्म के अधिकांश बड़े पंथों ने शाकाहार को एक आदर्श के रूप में संभाले रखा है. इसके मुख्यतः तीन कारण हैं: पशु-प्राणी के साथ अहिंसा का सिद्धांत; आराध्य देव को केवल “शुद्ध” (शाकाहारी) खाद्य प्रस्तुत करने की नीयत और फिर प्रसाद के रूप में उसे वापस प्राप्त करना; और यह विश्वास कि मांसाहारी भोजन मस्तिष्क तथा आध्यात्मिक विकास के लिए हानिकारक है.

अपनी रुचि और आर्थिक स्थिति के अनुसार पदार्थों का चयन कर शाकाहारी भोजन तैयार किया जा सकता है. मांसाहार की अपेक्षा शाकाहार सस्ता होने के साथ-साथ स्वादिस्ट, रोगप्रतिरोधक तथा शक्तिप्रद भी होता है. फल सब्जियों तथा कुछ विशेष प्रकार के फाइबर अनेक रोगों को दूर करने में अचूक औषधि का काम करते हैं. जब सभी प्रकार के विटामिन्स तथा पौष्टिक तत्त्व शाकाहार से पूर्ण हो सकती है तो क्यों जीवित प्राणियों की हत्या करके मांसाहार की क्या जरूरत है ? प्रकृति ने कितनी चीजें दी हैं जिन्हें खाकर हम स्वस्थ रह सकते है फिर मांस ही क्यों ? अब तय आपको करना है कि शाकाहार बेहतर है या मांसाहार.

ऎसे युवाओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, जो मांसाहार को किसी भी रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. शाकाहार एक सर्वोत्तम आहार है जो मानव के अन्दर संतोष, सादगी, सदाचार, स्नेह, सहानुभूति और समरसता जैसे चारित्रिक गुणों का विकास कर सकता है. भरपूर पौष्टिक खाना शरीर को ऊर्जा देता है जो मांस से नहीं मिल सकता. शाकाहारी का मन जितना संवेदनशील होता है. एक संतुलित सामाजिक प्रगति के लिये शाकाहार की अनिवार्यता अपरिहार्य है.

सोमवार, 22 अगस्त 2011

हमारे खान-पान का हमारी संवेदना पर असर होता है

क्या किसी सार्वजनिक यज्ञ में भागीदारों की मनोवृत्ति का यज्ञ के परिणामों पर प्रभाव पड़ता है? यहाँ यज्ञ से मेरा तात्पर्य 'कार्यक्रम' [प्रोग्राम] से है. 

एक सामाजिक संस्था ने पूंजीवादी मानसिकता से शोषित एक बस्ती में 'भय-उन्मूलन' कार्यक्रम किया. बहुत लोग सम्मिलित हुए अर्थात शाकाहारी, मांसाहारी, अल्पाहारी, अत्याहारी, वृतधारी, योगी, भोगी, खाऊ, पेटू, आदि सभी तरह के लोग थे. 

— क्या भरे पेट वाले और और खाली पेट वाले 'भूख' के प्रति एक समान भाव धारण कर सकते हैं? 
— कार्यक्रम के मूल-उद्देश्य के प्रति क्या शाकारियों और मांसाहारियों की संवेदना एक-सी होगी?  
— व्रतधारी, योगी और भोगी व्यक्तियों का प्रयास पूरी ईमानदारी से एक-सा कहा जा सकता है? 
— क्या बस्ती के लोगों के मन में संस्था के प्रत्येक सदस्य के प्रति अलग-अलग भाव बनेंगे? 

.......... मैंने भी देखा है कि एक ही संस्था में दो तरह के व्यक्ति होते हैं. एक अपने स्वभाव से संस्था की छवि बेहतर बनाते हैं  और दूसरे अपने स्वभाव से संस्था के प्रति खिन्नता के भाव जागृत करते हैं.
कार्यक्रम कोई भी हो... चाहे 'मौलिक अधिकारों के लिए जन-जागृति का हो' अथवा 'राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति सजग करने का' उसमें जब तक कार्यकर्ताओं का आहार शुद्ध नहीं होगा तब तक उनके विचार जन-कल्याण के कार्यक्रमों के प्रति गंभीर नहीं होंगे. 

— क्या दिनभर हँसाने वाला जोकर [कोमेडियन] दूसरे की पीड़ा के भाव को पूरी गंभीरता से आत्मसात कर सकता है? 
— क्या कोई 'कसाई' समाज में हुए किसी के क़त्ल पर उतनी संवेदना से जुड़ सकता है जितनी संवेदना से कोई 'पानवाला'?
— क्या चिड़ियों को पिजरों में पालने का शौक़ीन स्वतंत्रता की सही-सही व्याख्या कर सकता है? 

प्रश्न इस तरह के अनेक हो सकते हैं... मुख्य बात है कि हमारे आहार-विहार से ही हमारा स्वभाव बनता है और हमारे तरह-तरह के शौकों का निर्माण होता है. 

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

शान्ति और तृप्ति का आधार शाकाहार



निरामिष आहार से हमारे विचार प्रभावित होते हैं। यदि हम मन, वचन और कर्म से पवित्र होना चाहते हैं, तो इसके लिए हमें शाकाहार, यानी साग-सब्जी से पूर्ण आहार ही लेना चाहिए। कहते है, हर इंसान के मन के एक कोने में पशु सम व्यवहार छुपा होता है। इसलिए यदि हमें उस पशुता के उभार से मुक्त होना है, तो मांसाहार का त्याग करना ही होगा।


हमें न केवल अपनी जीभ के स्वाद के लिए दूसरे जीवों को हानि पहुंचाने से बचना होगा, बल्कि उनकी रक्षा के लिए लगातार प्रयास भी करते रहना होगा। इसलिए ऐसा भोजन ही करना चाहिए, जो न केवल पौष्टिक हो, बल्कि उसे खाने से किसी जीव की हानि भी न हो। निरामिष आहार किसी भी व्यक्ति के जीने की शैली भी निर्धारित करता है। ऐसे आहार न केवल दिल, बल्कि शरीर को भी मजबूत करते हैं। देखा गया है कि शाकाहार से न केवल हमारे विचार अच्छे होते हैं, बल्कि दया, करूणा क्षमा आदि भावों का भी विकास होता है। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हम लोग जीने के लिए भोजन करते हैं, न कि भोजन के लिए जीते हैं। स्मरण रहे कि आहार जीवन के लिए मात्र एक साधन है, साध्य नहीं।

प्राणिविज्ञान के अनुसार, मनुष्य भी पशु जगत का ही एक प्राणी है, लेकिन उसकी बुद्धि और संवेदनाएं ही उसे पशुओं से अलग करती हैं। यह करुणा का ही भाव है, जो उसे अपने आहार के लिए दूसरे प्राणी का प्राण नहीं लेने की प्रेरणा देता है। यदि हम गहराई से विचार करें, तो पाएंगे कि हमारी तरह ही दूसरे प्राणियों को भी जीने का प्राकृतिक अधिकार प्राप्त है।

यदि जीवन प्रकृति है, तो जीवन का नाश विकृति है। हम अपनी भूख को मिटाने के लिए भोजन तो करते हैं, लेकिन सच तो यह है कि इससे हमारी आत्मा भी प्रभावित होती है। यदि हम मांसाहारी हैं, तो इसके लिए पहले हमें मूक एवं निर्बल पशुओं की हत्या से जुड़ना पडता है और हत्या-हिंसा के कारण ही सभी अशांतियों का जन्म होता है। दूसरी ओर, शाकाहार के लिए हमें हिंसा की जरूरत नहीं पडती है, इसलिए आत्मा को शांति और तृप्ति मिलती है।

मंगलवार, 9 अगस्त 2011

शाकाहार में है ज्यादा शक्ति


शाकाहार में है ज्यादा शक्ति  गुरूवार, 23 जून 2011( 12:32 IST )ND

संतुलित शाकाहारी भोजन शरीर को सभी पोषक तत्व प्रदान करता है। यही नहीं,वह हृदय रोग, कैंसर,उच्च रक्तचाप,मधुमेह,जोड़ों का दर्द व अन्य कई बीमारियों से हमें बचाता भी है।

उन लोगों में हाई ब्लड प्रेशर ज्यादा पाया गया जो मांस से अधिक प्रोटीन प्राप्त करते थे। शाकाहारी प्रोटीन में एमीनो एसिड पाया जाता है। यह शरीर में जाकर ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है।

सब्जियों में एमीनो एसिड के साथ-साथ मैग्नेशियम भी पाया जाता है। यह हमारे रक्तचाप को नियंत्रित रखता है।

अधिक मांसाहार करने वाले लोगों में फाइबर की भी कमी पाई गई है। फाइबर हमें अनाज से मिलता है। दाल,फलों का रस और सलाद से कई पोषक तत्व मिलते हैं। ये हमारे शरीर के वजन को भी संतुलित रखते हैं।

ज्यादा मांसाहार मोटापा भी बढ़ा देता है। मांस में वसा की मात्रा बहुत होती है। हमारे शरीर को सबसे ज्यादा जरूरत होती है कार्बोहाड्रेट की।

अगर आप सोचते हैं कि यह मांस में मिलेगा तो आप गलत हैं,क्योंकि मांस में कार्बोहाइड्रेट बिलकुल नहीं होता। यह ब्रेड, रोटी, केले और आलू वगैरह में पाया जाता है।


शनिवार, 30 जुलाई 2011

विदेश में शाकाहार की प्रगति - झलकियाँ


न्यूयॉर्क में शाकाहारियों की पंक्ति
अमेरिका में रहने के कारण यहाँ के जन-जीवन को पहचानना और समझना मेरे लिये पहले से अधिक आसान हो गया है। अमेरिका आप्रवासियों का देश है। संसार भर की संस्कृति की झलक यहाँ आसानी से हो जाती है। विभिन्न भाषायें, वेश-भूषा और भोजन शैलियों से परिचय होता है। अंतर्राष्ट्रीय लोक-महोत्सव जैसे समारोहों में तो यह विविधता अनुभव होती ही रही है पर अब सामान्य जीवन में भी मुखर हो रही है। देख रहा हूँ कि पिछले दिनों में शाकाहारी भोजनालयों की संख्या भी बढी है और उनके ग्राहकों की संख्या भी। कुछ झलकियाँ

बोस्टन मेट्रो में वीगन पोस्टर
शाकाहारी पुस्तकें व टीवी कार्यक्रम आसानी से सर्व-सुलभ होते जा रहे हैं। अनेक संस्थायें भी मांस व्यवसाय द्वारा पशु-उत्पीडन के विरुद्ध सामने आये हैं।

भारत, थाइलैंड, मध्यपूर्व के शाकाहारी भोजन का चलन बढा है
ग्रामीण व उपनगरीय क्षेत्रों में कृषक तथा नगरों में कई फ़ार्मर्स मार्केट व फल विक्रेता बच्चों-बडों के लिये स्वयं फल चुने जैसे कार्यक्रम नियमित चलाते हैं, जिनमें लोग अपनी-अपनी टोकरी लेकर बाग़ में जाते हैं और अपनी पसन्द के फल चुनकर खुद ही तोडकर, तुलवाकर भुगतान करके घर ले आते हैं।
पिट्सबर्ग में एक ब्लू-बेरी पिकिंग फ़ार्म
जिस प्रकार हिन्दी के विस्तार के लिये हिन्दी दिवस से अधिक काम हिन्दी फ़िल्मों ने किया है उसी प्रकार से टॉप्सी टर्वी जैसे उलटे टांगने वाले पौधों के दर्शनीय प्रयोगों से लोग अपार्टमेंट के अन्दर भी विभिन्न फल-सब्ज़ियाँ जैसे स्ट्राबेरी, टमाटर आदि घरों में उगाकर स्वस्थ भोजन की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं।
टॉप्सी टर्वी के टांगने योग्य उलटे टमाटर


यहाँ, करुणा और शाकाहार की भारत जैसी प्राचीन सुदृढ परम्परा भले ही न हो, जन-जागृति फिर भी हो रही है। कई नगरों में शाकाहारी समूह बने हैं जिनकी सदस्य संख्या लगातार बढती जा रही है।

शुद्ध शाकाहारी भोजनालय


सोमवार, 25 जुलाई 2011

मानव शरीर संरचना शाकाहार के ही अनुकूल (कायिक प्रकृति)

मानव शरीर की संरचना व क्षमता शाकाहार के लिए ही उपयुक्त है

 • दांत-

दांतो की बनावट मांसाहारी जीव से शाकाहारियों में बिलकुल ही अलग है।

माँसाहारी- इनके केनाईन दांतो की बनावट मोटी चमडी में गड़ाकर शिकार को प्राणरहित करने में समर्थ है चिरफाड़ के लिए नुकीले दाँत होते हैं। ये आहार को चबा नहीं सकते उसे टुकड़े टुकडे कर निगलना पडता है। क्योंकि जो चपटे मोलर दाँत चबाने/पिसने के काम आते हैं नहीं होते।

शाकाहारी और मनुष्य- दोनों में तेज नुकीले दाँत नहीं होते जबकि इनमें मोलर दाँत होते हैं। इनके दांत आहार को चबाने में समर्थ होते है जिन दो दांतो को केनाईन कहा जाता है वे माँसाहारी प्रणियों के केनाइन समान नहीं है। जो दो-चार दांत कुछ अर्ध नुकीले पाये भी जाते हैं वह तो मुलायम फल सब्जी काटने के लिये भी जरूरी हैं।

• जबड़ों की क्रिया-

जबड़े की क्रिया भी मांसाहारी जीव से शाकाहारियों में सर्वथा भिन्न हैं |

माँसाहारी- यह अपने जबड़े को मात्र ऊपर – नीचे की दिशा में ही हिला सकते है।

शाकाहारी और मनुष्य- अपने दाँतों के जबड़े को उपर-नीचे, दायें - बाये चला सकते है चबाने,पीसने और एकरस करने के लिए यह आवश्यक भी है।

• पंजे-

भी मांसाहारी जीव से शाकाहारियों में पंजो की संरचना पूर्णतः अलग हैं।

माँसाहारी-इनके पंजे नुकीले व धारदार होते है,शिकारियों की तरह मोटी चमडी चीरने-फाड़ने में समर्थ होते हैं

शाकाहारी और मनुष्य- इनके पंजे नुकीले व धारदार नहीं होते, अधिक से अधिक बल सहने और पकड़ के योग्य होते है।

• आहारनालतंत्र-

आंतो की रचना तो दोनो आहारियों में अपने आहार की पाचन आवश्यक्ता के अनुरूप एकदम विलग है।

माँसाहारी- इनमें Intestinal tract शरीर की लम्बाई के ३ गुनी होती है मांसाहारी जीवों की आंत छोटी और लगभग लम्बवत होती है ताकि पचा हुआ मांस शरीर से जल्द निकल सके।

शाकाहारी और मनुष्य- इनमें Intestinal tract शरीर की लम्बाई के १०-१२ गुनी लम्बी होती है। तत्व शोषण में सहायता के लिए आंत लम्बी व घुमावदार होती है।

• श्वसन प्रक्रिया-

किसी भी शाकाहारी जीव की श्वसन प्रक्रिया मांसाहारी की तुलना में धीमी होती है

माँसाहारी- शेर , कुत्ते , विड़ाल इत्यादि तीव्र और हाँफते हुए सांस लेते है। श्वसन दर १८० से ३०० तक होती है।

शाकाहारी और मनुष्य- मनुष्य सहित गाय , बकरी , हिरन , खरगोश, भैंसे इत्यादि सभी धीमे - धीमे से सांस लेते है। इनकी श्वसन दर ३० - ७० श्वास प्रति मिनट तक होती है।

• जल शोषण-

पानी पीने की प्रकृति उभय आहारियों में सर्वदा भिन्न होती है।

माँसाहारी- मांसाहारी जीव अपनी जीभ से चाट - चाटकर पानी पीता है।

शाकाहारी और मनुष्य- अपने फेफडों से वायुदाब उत्पन्न करते हुए खींच कर पानी पीते हैं।

• चलायमान बल-

शाकाहारी व मांसाहारी के शक्ति उपयोग का तरीका कुदरती अलग है।

माँसाहारी- इनकी शारीरिक क्षमता सिर्फ शिकार करने की ही होती है , जैसे शेर की ताकत मात्र शिकार को दबोचने और गिराने की उसके आगे उससे किसी प्रकार का श्रम संभव नहीं है।

शाकाहारी और मनुष्य- इनका बल लगातार चलायमान होता है , जैसे घोडे , बैल , हाथी , मनुष्य इत्यादि।

• स्वेद ग्रंथि-

माँसाहारी-इनमें स्वेद ग्रंथियाँ /त्वचा में रोम छिद्र नहीं होते इसलिए ये प्राणी जीभ के माध्यम से शरीर का तापमान नियंत्रित करते हैं।

शाकाहारी और मनुष्य-इनके शरीर में रोम छिद्र /स्वेद ग्रंथियां उपस्थित होती हैं और ये पसीने के माध्यम से अपने शरीर का तापमान नियंत्रित रखते हैं।

• पाचक रस-

माँसाहारी- इनमें बहुत ही तेज पाचक रस (HCl- हैड्रोक्लोरिक अम्ल ) होता है जो मांस को पचाने में सहायक है।

शाकाहारी और मनुष्य- इनमें यह पाचक रस (हैड्रोक्लोरिक अम्ल) माँसाहारियों से २० गुना कमजोर होता है।

• लार ग्रंथि -

माँसाहारी- इनमें भोजन के पाचन के प्रथम चरण के लिए अथवा भोजन को लपटने के लिए आवश्यक लार ग्रंथियों की आवश्यकता नहीं होती है।

शाकाहारी और मनुष्य- इनमें अनाज व फल के पाचन के प्रथम चरण हेतु मुख में पूर्ण विकसित लार ग्रंथियाँ उपस्थित होती हैं।

• लार-

मांसाहारियों - में अनाज के पाचन के प्रथम चरण में आवश्यक एंजाइम टाइलिन (ptyalin) लार में अनुपस्थित होती है। इनका लार अम्लीय प्रकृति की होती है।

शाकाहारी और मनुष्य- में एंजाइम टाइलिन (ptyalin) लार में उपस्थित होती है व इनका लार क्षारीय प्रकृति की होती है।

शनिवार, 16 जुलाई 2011

मनुज प्रकृति से शाकाहारी

मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !
पशु भी मानव जैसे प्राणी
वे मेवा फल फूल नहीं हैं !!

वे जीते हैं अपने श्रम पर
होती उनके नहीं दुकानें
मोती देते उन्हे न सागर
हीरे देती उन्हे न खानें
नहीं उन्हे हैं आय कहीं से
और न उनके कोष कहीं हैं
केवल तृण से क्षुधा शान्त कर
वे संतोषी खेल रहे हैं
नंगे तन पर धूप जेठ की
ठंड पूस की झेल रहे हैं
इतने पर भी चलें कभी वें
मानव के प्रतिकूल नहीं हैं

अत: स्वाद हित उन्हे निगलना
सभ्यता के अनुकूल नहीं है!
मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !!

नदियों का मल खाकर खारा,
पानी पी जी रही मछलियाँ
कभी मनुज के खेतों में घुस
चरती नहीं वे मटर की फलियाँ
अत: निहत्थी जल कुमारियों
के घर जाकर जाल बिछाना
छल से उन्हे बलात पकडना
निरीह जीव पर छुरी चलाना
दुराचार है ! अनाचार है !
यह छोटी सी भूल नहीं है
मनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है  !!

मित्रो माँस को तज कर उसका
उत्पादन तुम आज घटाओ,
बनो निरामिष अन्न उगानें--
में तुम अपना हाथ बँटाओ,
तजो रे मानव! छुरी कटारी,
नदियों मे अब जाल न डालो
और चला हल खेतों में तुम
अब गेहूँ की बाल निकालो
शाकाहारी और अहिँसक
बनो धर्म का मूल यही है
मनुज प्रकृति से शाकाहारी,
माँस उसे अनुकूल नहीं है !!

रचनाकार:-----श्री धन्यकुमार

सोमवार, 11 जुलाई 2011

प्रागैतिहासिक मानव, प्राकृतिक रूप से शाकाहारी ही था। (नवीनतम शोध)



‘नेशनल अकादमी आफ साइंसेज’ के जर्नल में प्रकाशित अनुसंधान रिपोर्ट के मुताबिक पुरापाषाण काल के मनुष्य, यूरोपीय आलू जैसे किसी शाक को पीस कर आटा बनाते थे और बाद में इसमें पानी मिला कर इस आटे को माढ लेते थे। अनुसंधानकर्ताओं में शामिल इटालियन इंस्टीटयूट आफ प्रिहिस्ट्री एडं अर्ली हिस्ट्री की खोजकर्ता लाउरा लोन्गो ने बताया कि यह बिल्कुल चपटी रोटी के समान होता था।उन्होंने कहा कि इसे गर्म पत्थरों पर सेंका जाता था, जो पकने के बाद करारी तो भले होती थी, लेकिन बहुत स्वादिष्ट नहीं होती थी।किसी वयस्क की हथेली में लगभग समा जाने वाले और पीसने के काम में आने वाले पत्थर इटली, रूस और चेक गणतंत्र में पुरातात्विक जगहों पर मिले हैं। करीब 30 हजार वर्ष पुराने पत्थरों पर खाद्यान्न के टुकडे पाए गए हैं। मानव का रोटी से पुराना है नाता। इससे पहले इजरायल में मिले 20 हजार वर्ष पुराने पत्थरों पर खाद्यान्न मिलने के बाद यह अनुमान लगाया गया था कि पहली बार आटे का इस्तेमाल 20 हजार वर्ष पहले किया गया था। नयी खोज से पता चला है कि रोटी का प्रचलन 30 हजार वर्ष पहले भी था। इस अनुसंधान ने इस धारणा को चुनौती दी है कि प्रागैतिहासिक काल का मानव मुख्य भोजन के रूप में मात्र मांस खाता था। नए साक्ष्य बताते हैं कि भारत जैसे देशों के समान ही, मुख्य भोजन के रूप में रोटी का उपयोग प्राचीन काल से होता रहा है। 
यह शोध पत्र 'नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज' के जर्नल में छपा है। 

एक अन्य शोध के अनुसार निएंडरथल मानव सब्ज़ियां भी खाया करते थे. आदि मानवों पर किए गए एक नए शोध के अनुसार आदिमानव (निएंडरथल) सब्ज़ियां पकाते थे और खाया करते थे.अमरीका में शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्हें निएंडरथल मानवों के दांतों में पके हुए पौधों के अंश मिले हैं.यह पहला शोध है जिसमें इस बात की पुष्टि होती है कि आदिमानव अपने भोजन के लिए सिर्फ़ मांस पर ही निर्भर नहीं रहते थे बल्कि उनके भोजन की आदतें कहीं बेहतर थींयह शोध प्रोसिडिंग्स ऑफ नेशनल एकेडेमी ऑफ साइंसेज़ में छपा है.

आम तौर पर लोगों में आदि मानवों के बारे में ये धारणा रही है कि वो मांसभक्षी थे और इस बारे में कुछ परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी मिल चुके थे. तब उनकी हड्डियों की रासायनिक जांच के बाद मालूम चला था कि वो सब्ज़ियां कम खाते थे या बिल्कुल ही नहीं खाते थे.इसी आधार पर कुछ लोगों का ये मानना था कि मांस भक्षण के कारण ही हिमकाल के दौरान बड़े जानवरों की तरह ये मानव भी बच नहीं पाएहालांकि अब दुनिया भर में निएंडरथल मानवों के अवशेषों की रासायनिक जांच से मिले परिणामों ने उक्त अवधारणा को झुठलाया है. शोधकर्ताओं का कहना है कि इन मानवों के दांतों की जांच के दौरान उसमें सब्ज़ियों के कुछ अंश मिले हैं जिसमें कुछ तो पके हुए हैं.निएंडरथल मानवों के अवशेष जहां कहीं भी मिले हैं वहां पौधे भी मिलते रहे हैं लेकिन इस बात का प्रमाण नहीं था कि ये मानव वाकई सब्ज़ियां खाते थे।

जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एलिसन ब्रुक्स ने बीबीसी न्यूज़ से कहा, ‘‘ हमें निएंडरथल साइट्स पर पौधे तो मिले थे लेकिन ये नहीं पता था कि वो वाकई सब्ज़ियां खाते थे या नहीं. हां लेकिन अब तो लग रहा है जब उनके दांतों में अग्नीपक्व सब्ज़ियों के अंश मिले हैं इसलिए निश्चित तौर पर कह सकते हैं कि वो शाकाहारी भी थे।’’